आपातकाल में आर्य भवन : लोकतंत्र की रक्षा का गुप्त दुर्ग
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आपातकाल में आर्य भवन : लोकतंत्र की रक्षा का गुप्त दुर्ग

लोकतंत्र की सरेआम हत्या कर दी गई थी। नागरिक अधिकारों को कुचल दिया गया था। सरकार के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा था।

Written byगंगा प्रसादगंगा प्रसाद
Jun 25, 2026, 01:57 pm IST
in भारत
आर्य भवन

आर्य भवन

आपातकाल को 51 वर्ष पूरे हो चुके हैं लेकिन उस दौर की स्मृतियां आज भी मेरे मन-मस्तिष्क में जीवंत हैं। उस समय का खौफनाक मंजर याद आते ही रोम-रोम सिहर उठता है। लोकतंत्र की सरेआम हत्या कर दी गई थी। नागरिक अधिकारों को कुचल दिया गया था। सरकार के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा था। देशभर की जेलें आंदोलनकारियों से भर गई थीं और भय का वातावरण व्याप्त था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ से सक्रिय रूप से जुड़े होने के कारण मैं भी सरकार की नजर में था। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान दो बार जेल जा चुका था। आपातकाल लागू होने के बाद जब बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां शुरू हुईं, तब मैं भूमिगत होकर सरकार विरोधी गतिविधियों में जुट गया। गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावजूद कई दिनों तक पुलिस को चकमा देता रहा।

गायों और बछड़ों को भी जब्त कर ले गई पुलिस

जब मेरी गिरफ्तारी नहीं हो सकी तो प्रशासन ने मेरे घर, खाजपुरा स्थित आर्य भवन, की कुर्की जब्ती कर दी। दानापुर पुलिस घर के सामान के साथ मेरी गायों और बछड़ों को भी जब्त कर ले गई। चारा-पानी देने गए लोगों को भी पुलिस ने भगा दिया। जब मुझे पता चला कि थाने में उन बेजुबान पशुओं को भूखा रखा गया है तो मैं स्वयं को रोक नहीं सका और तत्काल दानापुर थाने पहुंचकर गिरफ्तारी दे दी। रातभर थाने में रखने के बाद मुझे कैंप जेल भेज दिया गया। पटना में लगभग तीन महीने बाद बाढ़ का पानी मेरे घर में घुस जाने के कारण मुझे पेरोल पर रिहा किया गया।

पिताजी ने बढ़ाया मेरा मनोबल

इस संघर्ष में मेरे पिताजी श्रद्धेय मुंदर साह जी की भूमिका अत्यंत प्रेरणादायक रही। वे जानते थे कि सरकार के विरोध का परिणाम कितना गंभीर हो सकता है, फिर भी उन्होंने हर परिस्थिति में मेरा मनोबल बढ़ाया और संघर्ष जारी रखने की प्रेरणा दी।
धीरे-धीरे मेरा आवासीय परिसर आर्य भवन लोकतंत्र सेनानियों की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। परिसर में प्याज का गोदाम होने के कारण लोगों का आना-जाना स्वाभाविक था, जिससे संदेह की आशंका बना कम रहती थी। उस समय कांग्रेस और साम्यवादी दलों को छोड़ अधिकांश विपक्षी दलों के कार्यालय बंद हो चुके थे। आंदोलन की रणनीति तैयार करने के लिए सुरक्षित स्थानों का अभाव था। ऐसे में आर्य भवन गुप्त बैठकों और योजनाओं का केंद्र बन गया। अर्थात आर्य भवन आपातकाल के दौरान प्रमुख केन्द्र के रूप में स्थापित हुआ था।

आंदोलनकारियों की विशेष रणनीति

गिरफ्तारी से बचने के लिए आंदोलनकारियों ने विशेष रणनीति बनाई। वेषभूषा बदलकर आने-जाने की व्यवस्था की गई और प्रमुख नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के लिए रामायण, महाभारत और पंचतंत्र के पात्रों के नाम पर कोड वर्ड तय किए गए। पटना जंक्शन के पास संघ के एक कार्यकर्ता की छोटी सी दुकान से पहला संकेत मिलता था। इसके बाद राजवंशी नगर पहुंचने पर दूसरा कोड दिया जाता था। आर्य भवन के मुख्य द्वार पर प्रवेश भी कोड बताने के बाद ही संभव था।

उस समय कार्यकर्ताओं में रविंद्र वोकिल जी (तत्कालीन संघ के प्रचारक) जैसे साथी भी थे, जो पषु-पक्षियों की आवाजें निकालने में माहिर थे। कई बार इन्हीं संकेतों का उपयोग संदेश पहुंचाने में किया जाता था। आर्य भवन के सामने ही सीआरपीएफ का केन्द्र था। मैं जानता था कि पकड़े जाने या यह जानकारी होने पर कि आर्य भवन संघ की गतिविधियों का मुख्य केन्द्र है, मेरी पूरी सम्पत्ति जब्त हो सकती थी। फिर भी मेरे मन में कोई संशय नहीं था और मैंने निडरता से परिणाम की चिंता किए बिना आपातकाल का सामना किया।

आर्य भवन में कई प्रखर राष्ट्रवादी नेताओं का आगमन

आपातकाल समाप्त होने तक आर्य भवन में कई प्रखर राष्ट्रवादी नेताओं का निरंतर आगमन होता रहा। श्रद्धेय रज्जू भैया जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाते तथा श्रद्धेय जगदीश चंद्र माथुर जी जनसंघ के नाते श्रद्धेय माधवराव मूले जी, श्रद्धेय कैलाशपति मिश्र जी, श्रद्धेय रविंद्र वोकिल जी के अलावे कई प्रमुख राष्ट्रीय स्तर के संघ एवं जनसंघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता यहां बैठकों में शामिल होते रहे। लोकतंत्र की रक्षा के लिए रणनीतियां बनती रहीं और संगठन को सक्रिय बनाए रखने के प्रयास जारी रहे।

आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख माननीय देवरस जी दो दिन के पटना प्रवास पर आये और आर्य भवन में ही ठहरे। उन्होंने जय प्रकाश नारायण जी से मिलने की इच्छा व्यक्त की। उस वक्त पैरोल पर छूट कर जेपी कदमकुआं स्थित चरखा समिति में रह रहे थे। मुलाकात की योजना प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद के सुपुत्र मृत्युंजय बाबू के घर पर तय हुई। श्रद्धेय जयप्रकाश नारायण जी उधर से आए तथा माननीय भाऊराव देवरस जी को मैं आर्य भवन से लेकर पहुंचा। दोनों महानुभावों में लगभग 45 मिनट एक कमरे में वार्ता हुई। इसके बाद पुनः भाऊराव जी वापस आर्य भवन आए।

प्रवास के दौरान अलग-अलग कार्यक्रम के तहत संघ एवं जनसंघ के कई महानुभावों का आर्य भवन में आना-जाना लगा रहता था। संघ के सरकार्यवाह श्रद्धेय माधव राव मूले जी का तीन दिन का प्रवास आर्य भवन में हुआ जिसमें बिहार राज्य स्तर के कार्यकर्ताओं की बैठक हुई।

धर्मपत्नी स्व. कमला देवी का योगदान अविस्मरणीय

इस पूरे अभियान में मेरी धर्मपत्नी स्व. कमला देवी का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने असाधारण साहस और समर्पण का परिचय दिया। पांच बच्चों में चार उस समय छोटे-छोटे थे। तब घर में गैस चूल्हा नहीं होता था। माता-पिता, बच्चों और परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ वे लकड़ी और कोयले के चूल्हे पर 25 से 30 लोगों का भोजन स्वयं तैयार करती थीं। गोपनीयता बनाए रखने के लिए उन्होंने कभी किसी बाहरी महिला की सहायता नहीं ली। उन्हें भली-भांति ज्ञात था कि यदि बैठकों की सूचना लीक हो गई तो कई बड़े नेताओं की गिरफ्तारी हो सकती है। लगभग 21 महीनों तक यह क्रम निरंतर यानी आपातकाल समाप्त होने तक चलता रहा।

आज जब आपातकाल को गुजरे 51 वर्ष हो चुके हैं, तब भी दमन, भय और प्रताड़ना का वह दौर स्मृतियों में ताजा है। मुझे इस बात का संतोष और गर्व है कि अपनी सीमित क्षमता के बावजूद मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ के कार्यकर्ताओं के नेटवर्क को संगठित और सक्रिय बनाए रखने का प्रयास किया। यही संगठनात्मक शक्ति लोकतंत्र की पुर्नस्थापना के संघर्ष की आधारशिला बनी।

सभी ज्ञात और अज्ञात नायकों को श्रद्धापूर्वक स्मरण

आज इस अवसर पर मैं उन सभी ज्ञात और अज्ञात नायकों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करता हूं जिन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपने सुख, सुविधा और स्वतंत्रता तक का त्याग किया। उन पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और सामान्य नागरिकों को नमन करता हूं जिन्होंने तानाशाही के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया और अपने साहस, संघर्ष तथा बलिदान से लोकतंत्र की ज्योति को बुझने नहीं दिया।

‘‘हम तो गुजरता हुआ कल हैं,
भविष्य का कल तो तुम्हारा है
मजबूत कंधों पे उठा लो जिम्मा,
यह नया हिन्दुस्तान तुम्हारा है।’’

(लेखक भाजपा के संस्थापक सदस्य व सिक्किम/मेघालय के पूर्व राज्यपाल हैं। )

Topics: आपातकाल 1975हिटलर-गांधी25 जून 1975आपातकाल का सचआपातकाल 25 जून
गंगा प्रसाद
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(लेखक भाजपा के संस्थापक सदस्य व सिक्किम/मेघालय के पूर्व राज्यपाल हैं। ) [Read more]
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