आपातकाल की सबसे बड़ी सीख : जागरूक समाज ही लोकतंत्र का वास्तविक प्रहरी
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आपातकाल की सबसे बड़ी सीख : जागरूक समाज ही लोकतंत्र का वास्तविक प्रहरी

50 वर्ष बाद भी प्रासंगिक है आपातकाल विरोधी संघर्ष का संदेश, पटना संगोष्ठी में वक्ताओं ने बताया लोकतंत्र की ‘दूसरी आजादी’ का महत्व

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Jun 25, 2026, 12:28 am IST
inभारत, बिहार
50 Years of Emergency India Sunil Ambekar Ram Bahadur Roy Patna Seminar RSS

पटना । भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 का दिन एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसे लोकतांत्रिक मूल्यों की सबसे कठिन परीक्षा माना जाता है। आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पटना में आयोजित ‘इमरजेंसी के 50 साल : बिहार आंदोलन और आपातकाल’ विषयक संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि आपातकाल लोकतंत्र की रक्षा के लिए समाज की चेतना, संघर्ष और संकल्प का जीवंत उदाहरण है।

कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर, वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक पद्मश्री रामबहादुर राय, पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे, हिन्‍दुस्‍थान समाचार न्‍यूज एजेंसी के अध्‍यक्ष अ‍रविन्‍द भालचंद्र मार्डीकर तथा अन्य वक्ताओं ने लोकतंत्र, बिहार आंदोलन और आपातकाल विरोधी संघर्ष के विभिन्न आयामों पर विस्तार से विचार रखे।

समाज की जागरूकता ने हराई तानाशाही

मुख्य वक्ता सुनील आंबेकर ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संविधान की धाराओं से अधिक समाज की जागरूकता और लोकतांत्रिक चेतना है। उन्होंने कहा कि यदि समाज सजग और सक्रिय बना रहे तो कोई भी तानाशाही व्यवस्था लंबे समय तक टिक नहीं सकती।

आंबेकर ने कहा कि दुनिया के अनेक देशों में तानाशाही दशकों तक कायम रही, लेकिन भारत में आपातकाल मात्र 19 महीनों में समाप्त हो गया। इसके पीछे किसी राजनीतिक दल की ताकत नहीं, बल्कि समाज की लोकतंत्र के प्रति गहरी आस्था थी। उस दौर में अनेक बड़े नेता जेलों में बंद थे, लेकिन सामान्य नागरिक, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वयंसेवक लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्षरत रहे। यही जनशक्ति अंततः लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का कारण बनी।

उन्होंने कहा कि आपातकाल का सबसे बड़ा संदेश यह है कि लोकतंत्र केवल चुनावों या संवैधानिक प्रावधानों से सुरक्षित नहीं रहता, बल्कि जागरूक नागरिकों और सशक्त समाज से उसकी रक्षा होती है। जब समाज सत्ता के अति-केंद्रीकरण और तानाशाही प्रवृत्तियों के प्रति सतर्क रहता है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है।

संघ पर प्रतिबंध और लोकतंत्र की लड़ाई

सुनील आंबेकर ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राजनीतिक दल नहीं था, फिर भी आपातकाल के दौरान उस पर प्रतिबंध लगाया गया। उन्होंने इसे राजनीतिक मानसिकता का परिणाम बताते हुए कहा कि संघ को लंबे समय से कुछ राजनीतिक शक्तियां अपने प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखती रही थीं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का संघर्ष केवल अपने ऊपर लगे प्रतिबंध को हटाने तक सीमित नहीं था। संघ के स्वयंसेवकों ने लोकतंत्र, संविधान और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए व्यापक स्तर पर कार्य किया। यह सत्ता प्राप्ति का आंदोलन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को बचाने का प्रयास था।

लोकतंत्र केवल राजनीति का विषय नहीं

आंबेकर ने कहा कि आपातकाल ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतंत्र की रक्षा केवल राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, शैक्षणिक संस्थान, सामाजिक संगठन और सामान्य नागरिक भी इसके समान भागीदार हैं। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब समाज अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहता है। उन्होंने भारतीय संविधान और भारतीय संस्कृति के बीच संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्य केवल संवैधानिक शब्द नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का हिस्सा हैं। समाज की सांस्कृतिक चेतना और नैतिक मूल्य लोकतंत्र को स्थायित्व प्रदान करते हैं।

संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर दिए गए ‘पंच परिवर्तन’ के आह्वान का उल्लेख करते हुए उन्होंने सामाजिक समरसता, परिवार व्यवस्था की मजबूती, पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली, कर्तव्यबोध और समाज जागरण को लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक बताया।

लोकतंत्र की दूसरी आजादी थी आपातकाल विरोधी संघर्ष

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता पद्मश्री रामबहादुर राय ने आपातकाल विरोधी आंदोलन को भारतीय लोकतंत्र की “दूसरी आजादी की लड़ाई” बताया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन राजनीतिक स्वतंत्रता की दिशा में निर्णायक कदम था, उसी प्रकार 1975-77 का संघर्ष लोकतंत्र को तानाशाही से मुक्त कराने वाला आंदोलन था। उन्होंने कहा कि 1947 में भारत को विदेशी शासन से मुक्ति मिली थी, जबकि 1977 में लोकतंत्र को तानाशाही प्रवृत्तियों से मुक्ति मिली। इसलिए दोनों संघर्ष भारतीय इतिहास में समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

रामबहादुर राय ने कहा कि बिहार आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि लोकनायक जयप्रकाश नारायण का सक्रिय राजनीति में पुनरागमन था। 1955 के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी, लेकिन 1974 में बिहार आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार कर उन्होंने छात्र आंदोलन को राष्ट्रीय जनआंदोलन में परिवर्तित कर दिया।

‘संपूर्ण क्रांति’ का व्यापक दृष्टिकोण

रामबहादुर राय ने कहा कि बिहार आंदोलन को केवल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन मानना उसके वास्तविक स्वरूप को सीमित करना होगा। इसका मूल उद्देश्य ‘संपूर्ण क्रांति’ के माध्यम से व्यवस्था परिवर्तन था। जयप्रकाश नारायण केवल सरकार बदलने की बात नहीं करते थे, बल्कि राजनीतिक संस्कृति, प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक संरचना में व्यापक सुधार चाहते थे। उन्होंने कहा कि जेपी का चिंतन अत्यंत दूरदर्शी था। वर्ष 1959 में ही उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर संविधान और राज्य व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया था। इससे स्पष्ट है कि वे संरचनात्मक सुधारों के समर्थक थे।

आपातकाल के कारणों पर ऐतिहासिक दृष्टि

रामबहादुर राय ने उस धारणा को भी चुनौती दी कि दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण के भाषण के कारण आपातकाल लगाया गया। उन्होंने कहा कि 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित किए जाने के बाद उत्पन्न राजनीतिक संकट ने आपातकाल की पृष्ठभूमि तैयार की।

उनके अनुसार सत्ता में बने रहने की इच्छा और राजनीतिक अस्थिरता की आशंकाएं आपातकाल लगाने के प्रमुख कारणों में थीं। उन्होंने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए शाह आयोग की रिपोर्ट सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है, जिसमें लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक प्रक्रियाओं पर पड़े प्रभाव का विस्तृत विवरण मिलता है।

जनशक्ति ने बचाया लोकतंत्र

रामबहादुर राय ने कहा कि आपातकाल विरोधी संघर्ष केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं था। इसमें छात्र, युवा, सामाजिक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएं और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले सामान्य नागरिक भी शामिल थे। हजारों लोगों ने जेल यात्राएं कीं और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए संघर्ष किया। उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों ने लोकतंत्र समर्थक शक्तियों को संगठित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

जनवरी 1977 में चुनाव की घोषणा के बाद जनता ने मतदान के माध्यम से अपना निर्णय सुनाया और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। यह भारतीय समाज की लोकतांत्रिक चेतना का सबसे बड़ा प्रमाण था।

बिहार आंदोलन ने तैयार की संघर्ष की आधारशिला

पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि बिहार आंदोलन अचानक पैदा नहीं हुआ था। इसकी पृष्ठभूमि छात्र आंदोलनों और बढ़ते जनअसंतोष में पहले से तैयार हो चुकी थी। उन्होंने बताया कि 18 मार्च 1974 का बिहार विधानसभा घेराव आंदोलन एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ, जिसके बाद छात्र आंदोलन जनआंदोलन में बदल गया।

उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर लोकतांत्रिक परिवर्तन का अभियान बन गया और आगे चलकर आपातकाल विरोधी संघर्ष की मजबूत आधारशिला सिद्ध हुआ।

लोकतंत्र के लिए नैतिकता और जवाबदेही जरूरी

वरिष्ठ स्तंभकार एवं बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य डॉ. हरेन्द्र प्रताप ने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता के विश्वास से मजबूत होता है। उन्होंने अपने जेल जीवन और भूमिगत आंदोलन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि लोकतंत्र की लड़ाई वैचारिक स्तर पर भी लड़ी जाती है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि वर्तमान समय में सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और जवाबदेही का संकट लोकतंत्र के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है।

इसके साथ ही कार्यक्रम में हिन्‍दुस्‍थान समाचार न्‍यूज एजेंसी के विकासक्रम पर विस्‍तार से प्रकाश डाला और बताया कि मीडिया में न्‍यूज एजेंसी अपने सत्‍य, संवाद, सेवा के ध्‍येय को लेकर पहले दिन अप्रैल 1948 लेकर आज भी चल रही हैं। उन्‍होंने संस्‍थान की चुनौतियों एवं उलब्‍धियों का भी प्रभावपूर्ण तरीके से जिक्र किया।

लोकतंत्र की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास

कार्यक्रम में बिहार आंदोलन और आपातकाल विरोधी संघर्ष से जुड़े जेपी सेनानियों का सम्मान किया गया। उन्हें अंगवस्त्र, स्मृति चिह्न और सम्मान पत्र देकर लोकतंत्र की रक्षा में उनके योगदान को याद किया गया। इस अवसर पर ‘युगवार्ता’ और ‘नवोत्थान’ पत्रिकाओं का भी लोकार्पण किया गया, जिनमें बिहार आंदोलन, आपातकाल और लोकतंत्र बचाने के संघर्ष से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं और व्यक्तित्वों का विस्तृत विवरण संकलित है।

Topics: जयप्रकाश नारायण संपूर्ण क्रांतिअश्विनी कुमार चौबेहिन्दुस्थान समाचारRSS Restrictions 1975Panchjanya news50 Years of Emergency Indiaआपातकाल के 50 वर्षसुनील आंबेकर आरएसएसरामबहादुर राय पद्मश्रीबिहार आंदोलन 1974
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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