पंजाब के इतिहास का वो घाव, जिसकी टीस आज भी बाकी है!
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25 जून 1989 : जब मोगा में 25 स्वयंसेवकों ने बलिदान देकर भी बचाई हिंदू-सिख एकता

25 जून 1989 को पंजाब के मोगा में खालिस्तानी आतंकवादियों ने RSS की शाखा पर हमला कर 25 स्वयंसेवकों की हत्या कर दी थी। जानिए भय को हराकर अगले ही दिन फिर शाखा लगाने की पूरी शौर्यगाथा।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by Shivam Dixit
Jun 24, 2026, 08:58 pm IST
inभारत, संघ @100, पंजाब
Moga RSS Shakha Massacre 1989 Punjab Terrorism 25 Swayamsevak Balidan

मोगा। 25 जून, 1989 की वह सुबह पंजाब के इतिहास का ऐसा जख्म बन गई, जिसकी टीस आज भी महसूस की जाती है। यह सिर्फ 25 लोगों की हत्या नहीं थी, बल्कि भारत की एकता, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रभक्ति को चुनौती देने की एक सुनियोजित कोशिश थी। गोलियों की गूंज ने उस दिन मोगा ही नहीं, पूरे देश को झकझोर दिया था। घर-घर मातम था, आंखों में आंसू थे और दिलों में सवाल था कि आखिर इंसानियत का कसूर क्या था?

यह वह दौर था, जब पंजाब आतंकवाद की आग में झुलस रहा था। गांवों और शहरों में डर का साया था। लोग घरों से निकलते समय इस चिंता में रहते थे कि अगला निशाना कौन होगा। लेकिन इसी भयावह माहौल में कुछ लोग हर सुबह खुले मैदान में जुटते थे। उनके हाथों में हथियार नहीं, बल्कि अनुशासन और राष्ट्रसेवा का संकल्प होता था।

25 जून 1989 की सुबह भी मोगा के नेहरू पार्क में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा सामान्य दिनों की तरह लगी हुई थी। सुबह करीब छह बजे स्वयंसेवक प्रार्थना और दैनिक गतिविधियों में व्यस्त थे। पार्क में बच्चों की किलकारियां थीं, लोग टहल रहे थे और वातावरण पूरी तरह सामान्य था। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही मिनटों में यह शांत मैदान इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में शामिल हो जाएगा।

सुबह लगभग 6 बजकर 25 मिनट पर हथियारबंद आतंकवादी पार्क में घुस आए। उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा— झंडा नीचे करो। यह केवल एक आदेश नहीं था, बल्कि राष्ट्र की एकता और विचारधारा को झुकाने की चुनौती थी। स्वयंसेवकों ने झुकने से इनकार कर दिया। इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया।

आतंकियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। कुछ ही मिनटों में नेहरू पार्क चीखों से गूंज उठा। चारों तरफ भगदड़, खून और दर्द का मंजर था। 25 स्वयंसेवक मौके पर ही शहीद हो गए, जबकि 35 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। जिस मैदान में कुछ देर पहले प्रार्थना हो रही थी, वहां अब मौत का सन्नाटा पसरा था।

इसी दौरान पार्क के छोटे गेट के पास खड़े ओमप्रकाश और उनकी पत्नी छिंदर कौर ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। निहत्थे होने के बावजूद उन्होंने भाग रहे आतंकियों को रोकने और पकडऩे का प्रयास किया। उन्हें मालूम था कि सामने एके-47 जैसे घातक हथियार हैं, फिर भी वे पीछे नहीं हटे। अगले ही पल गोलियों की बौछार ने दोनों को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।

उस दिन आतंक की गोलियों ने उम्र भी नहीं देखी। डेढ़ साल की मासूम डिंपल भी इस हिंसा की शिकार बन गई। दस वर्षीय नितिन जैन ने अपनी आंखों के सामने पूरा घटनाक्रम देखा। मासूमियत में उसे लगा कि शायद कोई खेल चल रहा है और वह भी आतंकियों के पीछे दौड़ पड़ा। लेकिन किसी ने उसे रोक लिया। शायद इसलिए कि वह जीवित रहे और उस दिन की सच्चाई का गवाह बन सके।

गोलियों का तांडव थमा भी नहीं था कि पार्क में पहले से लगाए गए बम में विस्फोट हो गया। धमाके में एक दंपती और दो पुलिसकर्मियों की भी मौत हो गई।

उस दिन शहीद हुए लोगों के नाम आज भी मोगा की स्मृतियों में दर्ज हैं—लेखराज धवन, बाबू राम, भगवान दास, शिव दयाल, मदन गोयल, मदन मोहन, प्रभजोत सिंह, नीरज, जगदीश भगत, वेद प्रकाश पुरी, भजन सिंह, सतपाल सिंह कालड़ा, ओम प्रकाश, छिंदर कौर और अनेक अन्य। हर नाम के पीछे एक परिवार था, सपनों से भरा एक संसार था, जो एक ही सुबह में उजड़ गया।

कुछ समय के लिए ऐसा लगा मानो आतंकवाद जीत गया हो। लेकिन असली कहानी तो अगले दिन लिखी गई। 26 जून 1989 की सुबह, उसी नेहरू पार्क में, जहां खून के धब्बे अभी सूखे भी नहीं थे, फिर शाखा लगी। करीब सौ स्वयंसेवक वहां पहुंचे। न किसी के चेहरे पर भय था और न ही प्रतिशोध की भावना। वहां केवल संकल्प था—एकता का, राष्ट्रभक्ति का और आतंक के सामने न झुकने का। उस दिन स्वयंसेवकों ने एक गीत गाया —

‘कौन कहंदा है कि हिंदू-सिख वक्ख ने,

ये भारत मां दी सज्जी-खब्बी अख ने।

यह सिर्फ एक गीत नहीं था, बल्कि उन गोलियों का जवाब था, जो समाज को बांटना चाहती थीं। यह संदेश था कि आतंक भय पैदा कर सकता है, लेकिन एकता को पराजित नहीं कर सकता।

एक वर्ष बाद, 24 जून 1990 को उसी स्थान पर शहीदी पार्क का निर्माण किया गया। शहीदों के परिवारों की सहायता और स्मारक के रखरखाव के लिए समिति बनाई गई। आज भी हर वर्ष 25 जून के बाद आने वाले पहले रविवार को वहां श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है और उन सभी वीरों को नमन किया जाता है, जिन्होंने राष्ट्र और समाज की एकता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

आज, 37 वर्ष बाद भी जब 25 जून की तारीख आती है, तो मोगा की हवाओं में एक सवाल तैरता है— क्या गोलियां इंसानियत को खत्म कर सकती हैं?

और इतिहास हर बार जवाब देता है— ‘नहीं, क्योंकि जहां बलिदान होता है, वहां एकता और भी मजबूत होकर जन्म लेती है।’

Topics: पंजाब में खालिस्तानी आतंकीMoga RSS Shakha Massacre 1989मोगा नरसंहार 25 जूनसंघ के वीर बलिदानी स्वयंसेवकमोगा नेहरू पार्क शाखाकौन कहता है कि भारत का विभाजन हो गयाRSS History PunjabPanchjanya news
राकेश सैन
राकेश सैन
वरिष्ठ पत्रकार। पंजाब के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन। [Read more]
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