आपातकाल का सच: इंदिरा गांधी और कांग्रेस ने लोकतंत्र को जकड़ा, संविधान को कैसे कुचला ? जानें सत्ता बचाने की पूरी कहानी
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आपातकाल का सच: इंदिरा गांधी और कांग्रेस ने लोकतंत्र को जकड़ा, संविधान को कैसे कुचला ? जानें सत्ता बचाने की पूरी कहानी

भारतीय लोकतंत्र में ऐसा भी कुछ हो सकता है, किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। कैसे एक लोकतांत्रिक देश की संसद में कोई दल और नेता अपनी मजबूती और महत्वाकांक्षा का बेजा इस्तेमाल कर देश के लोकतांत्रिक ढांचे और संविधान को तहस-नहस कर सकता है।

Written byअभय कुमारअभय कुमार
Jun 24, 2026, 03:28 pm IST
inभारत
आपातकाल का सच

आपातकाल का सच

25 जून 1975, इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया। यह भारत की आजादी के बाद के इतिहास का सबसे काला कालखंड है। भारत का लोकतंत्र सिहर उठा था क्योंकि इस दिन संविधान को कुचला गया, अभिव्यक्ति की आजादी को दबाया गया और लोकतंत्र को जंजीरों में जकड़ा गया था। आधी रात को रेडियो पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी।

भारतीय लोकतंत्र में ऐसा भी कुछ हो सकता है, किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। कैसे एक लोकतांत्रिक देश की संसद में कोई दल और नेता अपनी मजबूती और महत्वाकांक्षा का बेजा इस्तेमाल कर देश के लोकतांत्रिक ढांचे और संविधान को तहस-नहस कर सकता है। इसे आपातकाल यानी इमरजेंसी के रूप में देखा गया। इंदिरा गांधी ने सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए 25 जून की आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत से अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक अशांति के नाम पर पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया।

इसके बाद विपक्ष के तमाम नेताओं को गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया गया और लोगों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिया गया था। देश भर में प्रेस सेंसरशिप लगा दी गई और संविधान को अपने हिसाब से बदलने की पूरी कोशिश की गई थी। आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी विरोधी दलों के नेताओं को गिरफ्तार कर अज्ञात स्थानों पर जेल में बंद कर दिया गया था। सरकार ने मीसा यानी मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट और डिफेंस ऑफ इंडिया रूल यानी डीआईआर के तहत नेताओं को बंदी बनाया था। विपक्षी दलों के सभी बड़े नेताओं मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, जयप्रकाश नारायण को जेल भेज दिया गया। कांग्रेस कार्यकारिणी के निर्वाचित सदस्य चंद्रशेखर को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था।

इस दौरान ऐसा कानून बनाया गया जिसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश करने और जमानत मांगने का भी अधिकार नहीं था। नेताओं की गिरफ्तारी की सूचना उनके रिश्तेदारों, मित्रों और सहयोगियों तक को नहीं दी गई थी। जेल में बंद नेताओं को किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं थी और उनकी डाक तक सेंसर किया जाता था। उनसे मुलाकात के दौरान खुफिया अधिकारी मौजूद रहते थे। आपातकाल की शुरुआत में ही संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 को निलंबित कर दिया गया था। ऐसा करके सरकार ने कानून की नजर में सबकी बराबरी, जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी और गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर अदालत के सामने पेश करने के अधिकारों को रोक दिया था. जनवरी 1976 में अनुच्छेद 19 को भी निलंबित करके अभिव्यक्ति की आजादी, प्रकाशन, संघ बनाने और सभा करने की आजादी को भी छीन लिया गया था। आपातकाल लगाए जाने के साथ ही अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी गई थी। अखबारों और समाचार एजेंसियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने नया कानून बनाया था। सरकार ने चारों समाचार एजेंसियों पीटीआई, यूएनआई, हिंदुस्थान समाचार और समाचार भारती को खत्म कर एक नई समाचार एजेंसी बना दी थी। इसके साथ ही प्रेस के लिए आचार संहिता की घोषणा कर दी गई और कई संपादकों को सरकार विरोधी लिखने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था।

आपातकाल के दौरान अमृत नाहटा की फिल्म किस्सा कुर्सी का को जब्त कर लिया गया और किशोर कुमार जैसे गायकों को काली सूची में डाल दिया गया था। आंधी फिल्म पर पाबंदी लगा दी गई थी। आपातकाल के दौरान पुलिस अत्याचार और दमन आम बात हो गई थी। आपातकाल के सबसे बुरे प्रभावों में से एक परिवार नियोजन था। नसबंदी के लिए अध्यापकों और छोटे कर्मचारियों पर सख्ती की जाती थी और लोगों का जबरदस्ती परिवार नियोजन किया जा रहा था।

दरअसल 1971 में हुए लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली सीट से निर्वाचित हुई थीं। इंदिरा गांधी ने राज नारायण को पराजित किया था। चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप में राज नारायण ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द करते हुए अगले 6 साल तक उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दिया था। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और 24 जून को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था। सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन रद्द करने के फैसले को सही ठहराया लेकिन इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने की छूट दे दी थी। इंदिरा गांधी लोकसभा में जा सकती थी, लेकिन वहां वोट नहीं कर सकती थी। दूसरी तरफ उस वक्त देश भर में बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर इंदिरा गांधी के खिलाफ लोगों में काफी नाराजगी थी. पूरा विपक्ष इंदिरा गांधी से इस्तीफा मांग रहा था।

इस घटनाक्रम के मध्य इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय ने इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बने रहने की उम्मीद को खत्म कर दिया था। इंदिरा गांधी सत्ता में बने रहने के लिए पूरे देश को आपातकाल की आग में झोंक दिया जो भारतीय लोकतंत्र का सबसे बदनुमा धब्बा है। आपातकाल 25 जून की आधी रात से 21 मार्च 1977 तक जारी रहा। 21 महीने तक चलने वाला आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में सत्तारूढ़ सरकार की तानाशाही का इतिहास है।

आपातकाल कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ और इसके बाद हुए 1977 के चुनाव में कांग्रेस की बुरी हार हुई थी। 1977 चुनावों के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी।

संविधान का 42वां संशोधन किया गया

आपातकाल के दौरान कांग्रेस द्वारा किया गया संविधान संशोधन भारतीय राजनीतिक इतिहास का सबसे विवादास्पद संविधान संशोधन है। इस दौरान संविधान का 42वां संशोधन किया गया, जिसके जरिए संविधान के मूल ढांचे को कमजोर करने, संघीय विशेषताओं को नुकसान पहुंचाने और सरकार के तीनों अंगों के संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश की गई थी। 42वां संविधान संशोधन (1976) भारतीय लोकतंत्र और संविधान के इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय है। आपातकाल की आड़ में किए गए इस संशोधन के जरिए सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण किया गया, न्यायपालिका की समीक्षा शक्तियों को सीमित कर कार्यपालिका को असीमित अधिकार दिए गए, राज्यों के अधिकारों में कटौती कर संघीय ढांचे को कमजोर किया गया। इस संशोधन को व्यापक बदलावों के कारण ‘मिनी-संविधान’ भी कहा जाता है। 42वां संविधान संशोधन के तहत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की न्यायिक समीक्षा की शक्ति को काफी कम कर दिया गया और संसद को संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति दे दी गई और न्यायिक जांच से बाहर कर दिया गया। राज्य सरकारों के अधिकार कम किए गए और ‘शिक्षा’, ‘वन’ जैसे महत्वपूर्ण विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया। मौलिक अधिकारों का हनन करते हुए राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को मौलिक अधिकारों पर वरीयता दी गई।

आपातकाल के दौर में कई संविधान संशोधन

आपातकाल को समय की जरूरत बताते हुए इंदिरा गांधी ने उस दौर में कई संविधान संशोधन किए थे। जुलाई 1975 में 38वें संविधान संशोधन के जरिए न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार छीन लिया गया था। इसके 2 महीने बाद ही 39वें संविधान संशोधन के जरिए राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा के अध्यक्ष के निर्वाचन को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया गया था। 40वें और 41वें संशोधन के जरिए संविधान के कई प्रावधानों को बदलने के बाद 42वां संविधान संशोधन किया गया। 42वें संशोधन के जरिए एक प्रकार से पूरे संविधान का पुनरीक्षण किया गया और संविधान में बहुत से मूलभूत बदलाव कर दिए गए थे। 42वें संशोधन के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता देना था। इस प्रावधान के कारण किसी भी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित किया जा सकता था। इस संशोधन ने न्यायपालिका को पूरी तरह से बौना कर दिया था। दूसरी तरफ विधायिका को अपार शक्तियां दे दी गई थीं। इन बदलावों के कारण तब के केंद्र सरकार को यह भी शक्ति थी कि वह किसी भी राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कभी भी सैन्य या पुलिस बल भेज सकती थी। इसके अलावा राज्यों के कई अधिकारों को केंद्र के अधिकार क्षेत्र में डाल दिया गया था। 42वें संशोधन के जरिए यह प्रावधान किया गया कि संसद से किए गए संविधान संशोधनों को किसी भी आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। लोकसभा का कार्यकाल भी 5 साल से बढ़ाकर 6 साल कर दिया गया था।

जनता पार्टी की सरकार ने अधिकार वापस दिलाए

1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने की आवश्यकता महसूस करते हुए 44वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 के जरिए आपातकालीन प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की गई। हालांकि इससे पहले ही 43 वें संविधान संशोधन के जरिए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को उनके अधिकार वापस दिला दिया गया था। इसके बाद 44वां संशोधन करके 42वें संविधान संशोधन से जो क्षति संविधान की हुई थी उसे ठीक करने की कोशिश की गई थी। 44वें संशोधन से 42वें संशोधन के जरिए संविधान में किए गए बदलावों को रद्द करते हुए संविधान को फिर से अपने मूल रूप में वापस लाया गया था। हालांकि संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से हटाकर वैधानिक अधिकार बना दिया गया। 44वें संशोधन ने संविधान में कई ऐसे बदलाव किए जिससे 1975 के आपातकाल जैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न ना हो सके।

आंतरिक अशांति शब्द हटाया गया

पहले अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लगाने के लिए युद्ध बाहरी आक्रमण या आंतरिक अशांति जैसी परिस्थितियों का होना जरूरी था लेकिन 44वें संशोधन में अनुच्छेद 352 में से आंतरिक अशांति शब्द हटा दिया गया और इसकी जगह सशस्त्र विद्रोह शब्द जोड़ा गया। अब इस प्रकार का आपातकाल युद्ध बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह या इस प्रकार की आशंका होने पर ही घोषित किया जा सकेगा। सिर्फ आंतरिक अशांति के नाम पर आपातकाल घोषित नहीं किया जा सकता है। वर्तमान में भी यही व्यवस्था कायम है।

ऐसे बहाल हुआ लोकतंत्र

42वें संशोधन के जरिए आपातकाल की घोषणा को न्यायिक समीक्षा से बाहर कर दिया गया था लेकिन 44वें संशोधन से यह बंधन हटा लिया गया। अब आपातकाल लगाने के सरकार के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। यह भी व्यवस्था की गई कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा करेंगे जबकि मंत्रिमंडल लिखित रूप में राष्ट्रपति को ऐसा परामर्श दे। आपातकाल की घोषणा के 1 महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से इसके लिए मंजूरी लेना जरूरी बनाया गया है। इसे लागू रखने के लिए हर 6 महीने के बाद संसद से मंजूरी आवश्यक है। लोकसभा के कार्यकाल को दोबारा 5 साल कर दिया गया। 38वां संविधान संशोधन के जरिए इंदिरा गांधी ने अनुच्छेद 123 में खंड चार जोड़कर अध्यादेश के मामले में न्यायिक हस्तक्षेप को रोक दिया था जिसे जनता पार्टी की सरकार ने 44वें संशोधन के जरिए इस बदलाव को उलट दिया। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी अनुच्छेद 368 में भी बदलाव कर दिया था जिससे कि संविधान में किए गए बदलाव की न्यायिक समीक्षा न की जा सके। आपातकाल के दौरान किए गए 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत संविधान के लगभग 53 अनुच्छेदों और 14 नए अनुच्छेदों को जोड़ा या संशोधित किया गया। यह एक प्रकार से संविधान का पुनरीक्षण था। हालांकि बाद में सरकार ने संविधान संशोधन के जरिए संविधान में जो बिगड़ा हुआ था उसे सुधारने की भरपूर कोशिश की थी।

 

Topics: हिटलर-गांधीआपातकाल का सचकांग्रेसइंदिरा गांधीपाञ्चजन्य विशेषसंविधान हत्या दिवससंविधान की हत्या
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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