डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान : नेहरू की भूमिका, मौत के पीछे की साजिश, मां का पत्र और बेटी का रहस्योद्घाटन
October 4, 2026
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डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान : नेहरू की भूमिका, मौत के पीछे की साजिश, मां का पत्र और बेटी का रहस्योद्घाटन

भारत माता के महान सपूत श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जम्मू कश्मीर को मिले विशेष दर्जे यानी अनुच्छेद 370 का सबसे पहले विरोध किया था. शायद इसी कारण श्रीनगर में 23 जून 1933 को उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया गया था.

Written byअभय कुमारअभय कुमार
Jun 24, 2026, 10:35 am IST
inभारत
dr Shyama prasad Mukharjee mystirious death

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी

भारत के इतिहास में 23 जून 1953 भारत के इतिहास की एक ऐसी तारीख है जिसे कभी नहीं भुलाया जा सकता है. आज के ही दिन महान भारतीय नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमयी मौत हुई थी जिन्होंने एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेगा का नारा दिया था. भारत माता के महान सपूत श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जम्मू कश्मीर को मिले विशेष दर्जे यानी अनुच्छेद 370 का सबसे पहले विरोध किया था. शायद इसी कारण श्रीनगर में 23 जून 1933 को उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया गया था. भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत सामान्य नहीं थी बल्कि यह एक गहरी साजिश थी.

ये इतिहास का वह पन्ना जिसे नेहरूवादी इतिहासकारों ने हमेशा छुपा कर रखा है. 1953 में जम्मू कश्मीर की हिंदू आबादी नेशनल कॉन्फ्रेंस के शेख अब्दुल्ला की मुस्लिम कांफ्रेंस की सरकार के अत्याचारों का सामना कर रही थी. जम्मू में हिंदुओं ने प्रजा परिषद के नेतृत्व में एक जबरदस्त आंदोलन छेड़ रखा था जिसे कुचलने के लिए शेख अब्दुल्ला ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी थी. करीब 100 से ज्यादा लोग पुलिस की गोली से मारे जा चुके थे. हिंदू आंदोलनकारियों की मांग थी कि जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करके उसका भारत में पूरी तरह विलय किया जाए और अनुच्छेद 370 को भी हटाया जाए. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर के हिंदुओं की मांग से सहमत थे लिहाजा उनके नेतृत्व में जनसंघ भी इस आंदोलन में शामिल हो गया था. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने पूरे भारत में जम्मू कश्मीर के हिंदुओं के के पक्ष में धरने प्रदर्शन किया लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू अपनी जिद पर अड़े रहे.

नेहरू की मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के विरोधी थे डॉ मुखर्जी

नेहरू पहले से ही हिंदूवादी नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पसंद नहीं करते थे. दूसरी तरफ डॉक्टर मुखर्जी नेहरू की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के विरोधी थे. नेहरू जब पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं की रक्षा करने में नाकाम हो गए तो श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 1951 में ही नेहरू सरकार से इस्तीफा दे दिया था.1952 के चुनाव में दोनों की राजनीतिक दुश्मनी पूरे उफान पर पहुंच गई और संसद में भी नेहरू को श्यामा प्रसाद मुखर्जी के तीखे सवालों का सामना करना पड़ता था. डॉ मुखर्जी ने जब कश्मीर के हिंदुओं की आवाज उठाई तो वो नेहरू के सबसे बड़े दुश्मन बन गए थे.

जब डॉ मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर जाने का ऐलान किया

इसी बीच डॉ मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर जाने का ऐलान किया और पंजाब के रास्ते 8 मई 1953 को अपनी मंजिल की तरफ निकल पड़े. लेकिन यह उनके जीवन की अंतिम यात्रा साबित हुई क्योंकि साजिशें रास्ते में उनका इंतजार कर रही थी. डॉ मुखर्जी के कई करीबी लोगों ने उन्हें यह दौरा रद्द करने की सलाह दिया था. त्रिपुरा और मेघालय के पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय ने अपनी किताब अप्रतिम नायक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी में इस ऐतिहासिक घटना का जिक्र किया है.किताब में पृष्ठ संख्या 353 पर दी गई जानकारी के अनुसार, जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1953 में जम्मू-कश्मीर जाने की तैयारी कर रहे थे तब उनकी करीबी मित्र और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सुचेता कृपलानी मिलने गई थीं.सुचेता कृपलानी ने उन्हें आगाह करते हुए कहा था: “आपको जम्मू और कश्मीर नहीं जाना चाहिए, पंडित जवाहरलाल नेहरू आपको वापस नहीं आने देंगे.” जब डॉ. मुखर्जी ने यह कहा कि उनकी नेहरू से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है और वह केवल एक कारण के लिए काम कर रहे हैं, तब सुचेता कृपलानी ने उन्हें चेताया था: “आप नेहरू को नहीं जानते, मैं जानती हूँ, वह आपको अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानते हैं.” सुचेता कृपलानी बाद के दिनों में उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी थी.

भारत सरकार देती थी परमिट

उस दौर में जम्मू कश्मीर में प्रवेश करने के लिए भारत सरकार से परमिट लेना होता था. लेकिन देशभक्त श्यामा प्रसाद मुखर्जी को यह कानून मंजूर नहीं था. इस कारण उन्होंने बिना परमिट के ही जम्मू की सीमा में दाखिल होने का ऐलान किया था. इसके जरिए वह 370 खत्म करने के लिए नेहरू सरकार को चुनौती दे रहे थे. अपनी जम्मू यात्रा के दौरान उन्होंने एक बयान में नेहरू की कश्मीर नीति की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि नेहरू जी ने बार-बार ऐलान किया है कि जम्मू कश्मीर का भारत में 100% विलय हो चुका है लेकिन मुझे यह देखकर हैरानी होती है कि इस राज्य में भारत सरकार से परमिट लिए बिना कोई दाखिल क्यों नहीं हो सकता है.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी दिल्ली, अंबाला, करनाल, पानीपत, जालंधर, अमृतसर और गुरदासपुर से होते हुए जम्मू कश्मीर की सीमा से सटे पठानकोट तक पहुंच गए. पूरी यात्रा के दौरान पंजाब सरकार का एक डिप्टी कमिश्नर स्तर का अधिकारी उनके साथ था जिसका काम डॉ मुखर्जी पर नजर रखना था. हैरत की बात है कि इस पूरी यात्रा के दौरान उन्हें पंजाब में कहीं भी गिरफ्तार नहीं किया गया था.

दरअसल उस दौर में जम्मू कश्मीर में प्रवेश करने के लिए जो परमिट लगता था वह भारत सरकार जारी करती थी. जो व्यक्ति बिना परमिट के दाखिल होने की कोशिश करता था उसे पंजाब की पुलिस सीमा पर ही गिरफ्तार कर लेती थी. इस घटना के एक महीने पहले ही जनसंघ के दो बड़े नेताओं को भी बिना परमिट के दाखिल होने के आरोप में पंजाब पुलिस ने ही गिरफ्तार किया था. लेकिन डॉ मुखर्जी को लेकर पंजाब पुलिस की योजना कुछ अलग ही थी. इस घटना के बारे में तथागत राय अपनी उस किताब के पेज नंबर 345 पर लिखते हैं कि पठानकोट पहुंचने के बाद गुरदासपुर के डिप्टी कमिश्नर जो डॉ मुखर्जी का पीछा कर रहे थे उनसे मिलने के लिए पहुंचा. उसने डॉ मुखर्जी को बताया कि सरकार ने फैसला किया है कि वो उन्हें जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने दें. उस अफसर को खुद हैरानी हो रही थी कि सरकार ने अपना फैसला पलट क्यों दिया है. कहीं ना कहीं नेहरू सरकार चाहती थी कि डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पंजाब में नहीं बल्कि उन्हें जम्मू कश्मीर में गिरफ्तार करवाया जाए. इसका कारण काफी विचलित करनेवाला था.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला जम्मू कश्मीर में लागू नहीं होता था

उस समय भारत के सुप्रीम कोर्ट का फैसला जम्मू कश्मीर में लागू नहीं होता था. कश्मीर का अपना एक अलग हाई कोर्ट था. ऐसे में अगर डॉ मुखर्जी पंजाब में गिरफ्तार होते तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट से तत्काल जमानत मिल जाती लेकिन अगर वह कश्मीर में गिरफ्तार होते तो उनकी जमानत का फैसला वहां का हाई कोर्ट वहां के स्पेशल कानून के हिसाब से करता. नेहरू सरकार की इस साज़िश का खुलासा दिल्ली जनसंघ के अध्यक्ष वैद्य गुरुदत्त जो उस वक्त खुद श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ थे और उनकी मौत तक उनके साथ वह जेल में बंद रहे थे. चश्मदीद गुरुदत्त के बयान श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिज डेथ इन डिटेंशन नाम की किताब के पेज नंबर 36 पर प्रकाशित हुआ है. इस किताब को डॉक्टर मुखर्जी के सगे भाई उमा प्रसाद मुखर्जी ने लिखा था. गुरुदत्त के मुताबिक गुरदासपुर के डिप्टी कमिश्नर ने हमें जम्मू की सीमा में दाखिल होने के लिए वाहन उपलब्ध करवाने का प्रस्ताव रखा. यहां तक की हमें माधोपुर चेकपोस्ट यानी जम्मू की सीमा तक पहुंचाने के लिए एक जीप तक का भी इंतजाम कर दिया गया. माधोपुर चेकपोस्ट पर हमें डीएम मिले और उन्होंने हमसे कहा कि आपकी यात्रा मंगलमय हो लेकिन हमारी जीप का ड्राइवर घबरा रहा था क्योंकि हमारे पास परमिट नहीं था.तब डीएम ने कहा कि परमिट पहुंच जाएगा.

जम्मू कश्मीर की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया

11 मई 1953 की शाम 4 बजे श्यामा प्रसाद मुखर्जी और उनके साथी माधोपुर चेकपोस्ट पर पहुंच गए. यहां दोनों राज्यों की सरहद के बीचो बीच एक पुल था. जैसे ही डॉ मुखर्जी की जीप पुल के बीचो बीच पहुंची जम्मू कश्मीर की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. यह गिरफ्तारी इसलिए नहीं हुई थी कि डॉक्टर मुखर्जी के पास परमिट नहीं था बल्कि ये गिरफ्तारी इसलिए हुई क्योंकि सरकार का आरोप था कि उनके यहां आने से राज्य की शांति भंग होगी. डॉ मुखर्जी को जब गिरफ्तार किया गया तो उनके साथ अटल बिहारी वाजपेयी भी थे। डॉ मुखर्जी ने उनसे कहा कि जाओ और पूरे देश को बताओ कि मैं एक बंदी के तौर पर जम्मू कश्मीर में दाखिल हो गया हूं. अब मेरी गैर मौजूदगी में मेरे काम को बाकी लोग आगे बढ़ाएं.

यह साजिशों की शुरुआत थी. डॉ मुखर्जी को आराम से जम्मू में किसी जेल में रखा जा सकता था लेकिन उन्हें रात भर पहाड़ी रास्तों पर सफर करवाते हुए श्रीनगर लाया गया जहाँ उन्हें शहर से 16 किलोमीटर दूर एक छोटे से मकान में रखा गया था. इस मकान में ना तो फोन था ना दूसरी सुविधाएं थी. अब डॉक्टर मुखर्जी समझ चुके थे कि वो साजिश का शिकार बन चुके हैं. उन्होंने अगले दिन एक चिट्ठी लिखी जिसमें उन्होंने लिखा कि भारत सरकार और जम्मू कश्मीर की सरकार ने मिलकर साजिश रची है. भारत सरकार ने मुझे बिना किसी परमिट के यहां आने से नहीं रोका. सरकारी अधिकारियों ने मुझे आसानी से यहां प्रवेश करने दिया और अब अजीबोगरीब हालात में मुझे श्रीनगर में लाकर रखा गया है. इसी बीच 24 मई को प्रधानमंत्री नेहरू श्रीनगर पहुंचे उनके साथ देश के तत्कालीन गृह मंत्री कैलाश नाथ काटजू भी थे. लेकिन दोनों ने ही डॉ मुखर्जी से मिलने की कोई कोशिश नहीं की जबकि मुखर्जी देश के इतने बड़े नेता थे .इतना ही नहीं श्रीनगर के साथ-साथ दिल्ली में भी इस दौरान डॉक्टर मुखर्जी के खिलाफ साजिश रची जा रही थी. दरअसल तब डॉ मुखर्जी श्रीनगर में जब बंद थे तब ठीक उसी समय दिल्ली की अदालत में एक पुराने राजनीतिक मामले में उन पर केस चल रहा था. इस बात की पूरी संभावना थी कि दिल्ली की अदालत डॉ मुखर्जी को इस केस में पेश होने के लिए श्रीनगर से दिल्ली बुला सकती है. लेकिन ऐसा ना हो इसके लिए दिल्ली में भी साजिश रची गई थी. डॉक्टर मुखर्जी की मौत के बाद इस साजिश का खुलासा संसद के अंदर सांसद एनसी चटर्जी ने किया था जो कम्युनिस्ट नेता सोमनाथ चटर्जी के पिता थे. हिंदू महासभा के सांसद एनसी चटर्जी ने 18 सितंबर 1953 को संसद में कहा था कि दिल्ली की अदालत में डॉक्टर मुखर्जी से जुड़े केस में जानबूझकर देरी की जा रही थी. इस केस से जुड़ा दिल्ली पुलिस का एक सब इंस्पेक्टर जानबूझकर बार-बार अदालत में गवाही देने के लिए उपस्थित नहीं होता था जिससे यह केस लंबा खिंच रहा था. जब जज को शक हुआ तो उन्होंने खुद पता किया कि सब इंस्पेक्टर बीमारी का बहाना बनाकर गायब हो रहा है.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमयी हालात में मौत

आखिरकार जज ने जम्मू कश्मीर के चीफ सेक्रेटरी को नोटिस दिया और कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी को दिल्ली की अदालत में पेश किया जाए. लेकिन 2 जून 1953 को जम्मू कश्मीर की सरकार ने ऐसा करने से इंकार कर दिया. क्या भारत का एक राज्य एक अदालत के साथ इस तरह का व्यवहार कर सकता है? दिल्ली के ताकतवर लोगों की मदद के बिना यह असंभव है. दिल्ली की सत्ता पर बैठे ताकतवर लोगों की पूरी कोशिश यही थी कि डॉ मुखर्जी श्रीनगर में ही कैद रहे. नजरबंदी में करीब 40 दिन रहने के बाद 20 जून को श्यामा प्रसाद मुखर्जी की की तबीयत बिगड़ गई. शेख अब्दुल्ला की सरकार ने उनका इलाज करने के लिए डॉक्टर अली मोहम्मद को चुना . इस डॉक्टर ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को स्ट्रेप्टोमाइसिन के इंजेक्शन लगाने शुरू कर दिए जबकि डॉक्टर मुखर्जी ने उसे साफ-साफ बताया कि ये इंजेक्शन लेने के लिए उनके कोलकाता के फैमिली डॉक्टर ने पहले से ही उन्हें मना कर रखा है लिहाजा इंजेक्शन उन्हें ना लगाए जाएं. लेकिन डॉक्टर अली मोहम्मद ने उन्हें यह भरोसा दिलाया कि यह नए तरह का स्टेप्टो माइसिन इंजेक्शन से नुकसान नहीं होगा. साथ ही डॉ अली मोहम्मद ने उन्हें पेनकिलर के नाम पर एक सफेद पाउडर भी पीने को दिया. इस पाउडर में क्या था यह आज तक किसी को नहीं मालूम है. इलाज का पूरा प्रिस्क्रिप्शन बाद में गायब कर दिया गया था.अगले दिन यानी 21 जून को मुखर्जी को देखने के लिए सिर्फ एक जूनियर डॉक्टर को भेजा गया. 22 जून की सुबह पौने पांच बजे मुखर्जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई.सुबह 7:30 बजे डॉक्टर अली मोहम्मद उन्हें देखने के लिए पहुंचे और 11:30 बजे जाकर एंबुलेंस में नहीं बल्कि एक टैक्सी में बिठाकर उन्हें अस्पताल ले जाया गया. डॉ मुखर्जी को अस्पताल ले जाने में पूरे सात घंटे की देरी की गई थी. इतना ही नहीं उन्हें अस्पताल की पहली मंजिल तक पैदल चलाकर ले जाया गया था. ऊपर से उन्हें अस्पताल के महिलाओं के डिलीवरी वार्ड में रखा गया. सवाल है कि फिर डॉक्टर मुखर्जी जैसे देश के इतने बड़े देता के साथ ऐसा क्यों किया जा रहा था? आखिरकार उसी रात श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमयी मौत हो गई.

डॉ मुखर्जी की बेटी ने दिया था जवाब

सवाल है कि क्या अस्पताल में उनके साथ कोई साजिश रची गई थी ? इसका जवाब डॉ मुखर्जी की बेटी सबिता बनर्जी ने दिया था. दरअसल सबिता बनर्जी ने अपने पिता की मौत के बाद उस नर्स को ढूंढ लिया था जो आखिरी समय पर उनके साथ वहां मौजूद थी. उस नर्स का नाम राजदुलारी टिक्कू था. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बेटी सबिता बनर्जी ने बताया था कि नर्स राजदुलारी टिक्कू के मुताबिक उस रात अस्पताल में डॉक्टर मुखर्जी सो रहे थे. उनका इलाज करने वाला डॉक्टर नर्स को एक इंजेक्शन थमा कर घर चला गया था. जब डॉक्टर मुखर्जी जागे तो नर्स ने उन्हें वो इंजेक्शन लगा दिया. उसी समय डॉक्टर मुखर्जी पूरी ताकत से चीखे हमको जलन हो रही है. नर्स टेलीफोन की तरफ दौड़ी ताकि डॉक्टर को बता सके लेकिन डॉक्टर ने फोन पर कहा सब ठीक हो जाएगा. इसी बीच डॉकर मुखर्जी शायद मर चुके थे. यहां यह बताना भी जरूरी है कि जिस दिन डॉक्टर मुखर्जी की मौत हुई उसके अगले दिन ही उन्हें कश्मीर हाई कोर्ट से जमानत मिलने वाली थी यानी आजाद होने से एक दिन पहले ही डॉक्टर मुखर्जी एक रहस्यमई मौत के शिकार हो गए. इसके अलावे उनका एक ब्रीफ केस और डायरी भी गायब हो गई थी.

मुखर्जी की मृत्यु पर नेहरू की प्रतिक्रिया

उधर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत से पूरे देश में हंगामा मच गया था. कोलकाता और दिल्ली में प्रदर्शन शुरू हो गए. इस दौरान नेहरू विदेश यात्रा पर थे और जब उन्हें डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत की खबर दी गई तो वो जिनेवा से काहिरा के लिए रवाना हो रहे थे. नेहरू की इस पर क्या प्रतिक्रिया का जिक्र त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय ने अपनी किताब अप्रतिम नायक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पेज नंबर 362 पर किया है. तथागत रॉय किताब में लिखते हैं कुछ अखबारों में यह खबर छपी थी कि जब एक पत्रकार ने नेहरू को यह बताया कि डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत हो गई है तो नेहरू ने सीटी बजाई और उछल कर खड़े हो गए. वह छड़ी हिलाते हुए उस जगह से निकल गए. जब नेहरू विदेश दौरे से लौटकर मुंबई एयरपोर्ट पहुंचे तो उस पत्रकार ने देखा कि वह खुश होकर लौटे हैं और उन्होंने उस त्रासदी पर एक शब्द भी नहीं बोला जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था. उस दौर में हर कोई यह मान रहा था कि डॉ मुखर्जी की मौत सामान्य नहीं है बल्कि एक साजिश के तहत उन्हें मारा गया है. पूरे देश में यह मांग हो रही थी कि सरकार को डॉ मुखर्जी की मौत की जांच करवाना चाहिए. लेकिन नेहरू ने जांच से साफ-साफ इंकार कर दिया. मजबूर होकर कर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बूढ़ी मां जोगमाया देवी ने प्रधानमंत्री नेहरू से जांच की मांग की थी. इस पर नेहरू ने उन्हें 30 जून 1953 को एक पत्र लिखा जो सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू के सीरीज टू के वॉल्यूम 22 के पेज नंबर 209 पर प्रकाशित हुआ है. नेहरू ने लिखा था कि आपके बेटे को जेल में नहीं बल्कि मशहूर डल झील के किनारे एक बंगले में रखा गया था.जब मैं पाच हफ्ते पहले कश्मीर गया था तो वहां की सरकार ने मुझे बताया था कि उन्होंने डॉक्टर मुखर्जी को सभी सुविधाएं प्रदान की और उनका पूरा ख्याल रखा था.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मां ने नेहरू को लिखा पत्र

नेहरू का यह दिखावटी पत्र पाकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मां क्रोधित हो गईं और उन्होंने 4 जुलाई 1953 को नेहरू को करारा जवाब दिया था. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मां ने नेहरू को लिखा कि नेहरू जी आपने अपनी चिट्ठी में यह बताने की कोशिश की है कि मेरे बेटे के लिए कश्मीर की सरकार ने सब कुछ किया. आपको इस बात पर भरोसा होगा लेकिन जिन्हें कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए उनकी बात पर मैं कैसे भरोसा करूं ? आप कहते हैं कि मेरे बेटे से आपको स्नेह था लेकिन आश्चर्य की बात है कि फिर भी आप कश्मीर में रहते हुए भी उससे मिलने नहीं गए, किसने रोका था आपको ? मुझे शर्म आती है सोचकर कि आप मुझे बताते हैं कि मेरे  बेटे को बंगले में रखा गया था. मैं इसे दुष्प्रचार से हिल जाती हूं, मैं एक महान आत्मा की मां होने के नाते एक निष्पक्ष जांच की मांग करती हूं.मैं चाहती हूं कि भारत के लोगों को पता चले कि इस दुखद घटना के असली कारण क्या है ? जिसे एक स्वतंत्र देश में अंजाम दिया गया और जिसमें आपकी सरकार ने भी एक भूमिका अदा की. लेकिन गुस्से और करुणा से भरी मां की इस पुकार का भी नेहरू पर कोई असर नहीं पड़ा और नेहरू ने जांच की मांग ये कहकर ठुकरा दी कि उन्होंने सब पता कर लिया है और वो इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि डॉ मुखर्जी की मौत में कोई रहस्य नहीं है. सवाल है कि क्या नेहरू खुद को भगवान समझते थे या फिर वह सुप्रीम कोर्ट के जज थे.

देश के इतने बड़े नेता की हत्या होने के बावजूद देश का प्रधानमंत्री जांच करवाने को तैयार नहीं है. उधर डॉक्टर मुखर्जी की मां जोगमाया देवी ने भी सारी उम्मीदें छोड़ दी थी . लेकिन फिर भी नेहरू को आईना दिखाने के लिए उन्होंने एक आखिरी पत्र 9 जुलाई 1953 को लिखा कि नेहरू जी मैंने एक निष्पक्ष जांच की मांग की थी ना कि आपका कोई निष्कर्ष मांगा था. आखिर आपको एक निष्पक्ष जांच से दिक्कत क्या है? मेरे पास पक्के सबूत हैं जिनसे काफी कुछ साबित हो सकता है. लेकिन आपने उन्हें जानने या समझने की कोई कोशिश नहीं की हैं. आप सबूतों का सामना करने से डरते हैं. मैं कश्मीर की सरकार को अपने बेटे की मौत का जिम्मेदार मानती हूं और यह आरोप भी लगाती हूं कि आपकी सरकार भी इसमें शामिल थी. एक दिन सच सामने आएगा तब आपको भारत के लोगों को और स्वर्ग में भगवान को भी जवाब देना होगा.

नेहरू एक तरफ तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मां और उनके लाखों समर्थकों की जांच की मांग ठुकरा रहे थे वहीं दूसरी तरफ वह कश्मीर की शेख अब्दुल्ला सरकार को यह सलाह दे रहे थे कि इस मुसीबत से वह कैसे निपट सकती है. नेहरू डॉक्टर मुखर्जी की मौत की मिस्ट्री को दबाने के लिए शेख अब्दुल्ला को नए-नए हथकंडे सिखा रहे थे. इसका सबूत उस पत्र से जो 29 जून 1953 को नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को लिखा था. यह पत्र सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू के सीरीज टू के वॉल्यूम 22 के पेज नंबर 200 पर प्रकाशित हुआ है. इसमें नेहरू लिखते हैं कि शेख साहब कुछ लोग डॉक्टर मुखर्जी की मौत का फायदा उठाना चाहते हैं और इस मामले में जांच की मांग कर रहे हैं. मुझे लगता है कि आपको यह बयान देना चाहिए कि डॉक्टर मुखर्जी को कहां रखा गया था. उन्हें बाग में घूमने की आजादी थी और वो किन लोगों से मिलते थे. डॉक्टर मुखर्जी ने अपनी मां को एक टेलीग्राम किया था जिसमें उन्होंने खुद को स्वस्थ बताया था.आपको यह सारे फैक्ट्स जमा करके इन्हें छपवाना चाहिए.नेहरू जानते थे कि अगर जांच हुई तो शेख अब्दुल्ला सरकार के साथ-साथ वह खुद भी जांच के घेरे में आ जाएंगे और इसकी आंच उन तक पहुंच जाएगी. इसी वजह से उन्होंने ठीक उसी दिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ विधान चंद्र राय को भी एक पत्र लिखा. विधान चंद्र राय डॉकर मुखर्जी के दोस्त थे और बंगाल की जनता के दबाब में वह भी जांच की मांग कर रहे थे. 29 जून 1953 को नेहरू ने डॉ विधान चंद्र राय को जो पत्र लिखा जो सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू के सीरीज टू के वॉल्यूम 22 के पेज नंबर 205 पर प्रकाशित हुआ है. नेहरू लिखते हैं कि मैं लोगों की भावनाएं समझता हूं लेकिन हम लोगों की भावनाओं से सरकार नहीं चला सकते हैं. आप चाहें तो खुद श्रीनगर चले जाएं लेकिन जांच कमीशन बनाने से कश्मीर के लोगों पर घातक प्रभाव पड़ेगा वो इसे केंद्र सरकार का दखल समझेंगे.मुझे नहीं पता कि जांच कमीशन कैसे जांच करेगा.हो सकता है वह इस नतीजे पर पहुंच जाए कि डॉक्टर मुखर्जी के इलाज में थोड़ी सी लापरवाही हुई थी या डॉक्टर देर से इलाज करने आए थे.

नेहरू क्यों नहीं करवा रहे थे जांच

नेहरू जानते थे की श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इलाज में लापरवाही हुई है लेकिन वो इसलिए जांच नहीं करवा रहे थे क्योंकि इससे कश्मीर के लोगों को बुरा लगेगा और कहीं ना कहीं कश्मीर की सरकार भी संकट में आ जाएगी. लेकिन हकीकत में नेहरू को अपनी चिंता सता रही थी. नेहरू ने 2 जुलाई 1953 को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सी राज गोपालाचारी को एक पत्र लिखा जो नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी में है. नेहरू ने इस पत्र में लिखा था कि डॉ मुखर्जी की मृत्यु के बाद पैदा हुए हालातों से हम काफी संकट में फंस गए हैं. दिल्ली का माहौल खराब है और कोलकात्ता का उससे भी ज्यादा खराब है. दरअसल श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद जब उनकी अस्थियां दिल्ली लाई गई तो एक बड़ा जुलूस निकाला गया और इस जुलूस में हजारों हजार लोग शामिल हुए थे जिन्होंने दिल्ली की सड़कों पर नेहरू के खिलाफ नारे लगाए जिससे नेहरू सरकार बुरी तरह से घबरा गई थी. यहां तक कि नेहरू को अपनी जान का डर भी सता रहा था. इस घबराहट और डर का वर्णन वामपंथी इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब भारत गांधी के बाद में किया है. गुहा इस किताब के पेज नंबर 317 पर लिखते हैं दिल्ली की दीवारों पर पर्चे लगे थे जिसमें शेख अब्दुल्ला को दिल्ली आने पर जान से मारने की धमकी दी गई थी. इन पचों को हल्के में नहीं लिया जा सकता था क्योंकि ऐसे ही माहौल में महात्मा गांधी की भी हत्या हुई थी. दिल्ली का हिंदू मिडिल क्लास कट्टरपंथियों के प्रभाव में आ गया था. ऐसा लग रहा था कि नेहरू की हालत भी वही हो सकती है जो महात्मा गांधी की हुई थी. पुलिस को निर्देश दे दिया गया कि प्रधानमंत्री नेहरू के खिलाफ किसी भी तरह के गंभीर दुष्प्रचार योजना या तैयारी पर कठोर नजर रखी जाए. नेहरू अपने विरोध से इतना घबरा गए थे. दिल्ली में तो धरने प्रदर्शन कुछ ही दिन में दबा दिए गए लेकिन कलकत्ता में लगातार डॉक्टर मुखर्जी की रहस्यमई मौत पर आंदोलन हो रहा था लिहाजा इसे दबाने के लिए सरकार ने एक नई चाल चली थी. उसी समय कोलकाता में ट्राम का किराया बढ़ा दिया गया जिसके खिलाफ कम्युनिस्टों ने एक हिंसक आंदोलन छेड़ दिया और इस आंदोलन की आड़ में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के मुद्दे को भुला दिया गया. बंगाल के वरिष्ठ पत्रकार सुखरंजन सेनगुप्ता ने भी अपनी किताब में आरोप लगाया है कि शायद सरकार के इशारे पर ही इस आंदोलन को भड़काया गया था. बंगाल ने भले ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भुला दिया हो लेकिन यह पूरा देश आज भी उनका कर्जदार है. उनके बलिदान के तत्काल बाद जम्मू कश्मीर में परमिट सिस्टम खत्म कर दिया गया और 2019 तक आते-आते कश्मीर से अनुच्छेद 370 का भी नामो निशान मिटा दिया गया. आज डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान की बदौलत इस देश में एक विधान एक निशान और एक प्रधान है.

 

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अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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