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बंगाल: हर परिणाम से बड़ी वन्देमातरम् की घड़ी

रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बंगाल की अस्मिता पुनः जागृत हो उठी है। भारत का सर्वसमावेशी, एकात्म और आध्यात्मिक जीवन-दर्शन-अर्थात भारत का हिंदुत्व-एक बार फिर मुखर होकर सामने आया है

Written byडॉ. मनमोहन वैद्यडॉ. मनमोहन वैद्य
Jun 24, 2026, 07:00 am IST
inभारत, पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों ने पूरे देश को अचंभित और आनंदित किया है। दिसंबर 2025 और फरवरी 2026 में मुझे बंगाल जाने का अवसर मिला था। वहां अधिकांश लोग परिवर्तन की इच्छा तो रखते थे, किंतु यह परिवर्तन वास्तव में संभव हो सकेगा, ऐसा विश्वास बहुत कम लोगों को था। परिस्थितियां भी ऐसी थीं कि परिवर्तन किसी चमत्कार से कम नहीं लगता था। निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान के लिए आवश्यक खुला तथा निर्भय वातावरण तैयार करना सबसे बड़ी चुनौती थी। परंतु चुनाव आयोग, सर्वोच्च न्यायालय, केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा सुरक्षा बलों के संयुक्त प्रयासों से यह संभव हो पाया।

बंगाल की जनता ने इस बार बढ़-चढ़कर मतदान किया। पिछले पांच चुनावों 2001, 2006, 2011, 2016 और 2021 में मतदान का औसत 79.22% था, जबकि 2026 में यह बढ़कर 92.47% हो गया। अचानक हुई लगभग 13 प्रतिशत अंकों की इस वृद्धि में SIR का योगदान नकारा नहीं जा सकता। परंतु इसके साथ ही यह वृद्धि निर्भय माहौल और जनता के अभूतपूर्व उत्साह को भी दर्शाती है। इस चुनाव को समाज द्वारा एक सभ्यतागत संघर्ष के रूप में देखना, सुरक्षा बलों द्वारा अपनी भूमिका का समुचित निर्वहन करना और लोगों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग के प्रति आश्वस्त करना, इन कारणों को भी नकारा नहीं जा सकता।

फरवरी 2026 में कोलकाता में एक वरिष्ठ महिला पत्रकार से भेंट हुई थी, जो पूर्णतः वामपंथी विचारधारा की हैं। 29 मई को उनसे फिर बात हुई। उन्होंने बताया कि जब वे 18 वर्ष की थीं, तब उन्होंने पहली बार मतदान किया था और उसके बाद अब 2026 में उन्होंने फिर से मतदान किया। वे इस समय 46 वर्ष की हैं। परिवर्तन की तीव्र इच्छा और यह विश्वास कि परिवर्तन संभव है, उनके मतदान के प्रमुख प्रेरक बने। बंगाल में चुनावों के दौरान हिंसा का इतिहास रहा है। ऐसे में इस बार का चुनाव अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। इसका श्रेय भी केंद्रीय गृह मंत्रालय को दिया जा सकता है। यही कारण है कि लोग निर्भय होकर घरों से बाहर निकले और मतदान किया।
इस चुनाव में केवल भाजपा की जीत नहीं हुई है। बंगाल की जनता ने भारत की आध्यात्मिक परंपरा और हिंदुत्व के विचार की विजय सुनिश्चित की है। ऐसा प्रतीत होता है कि बंगाल की आत्मा पुनः जागृत हुई है। यह रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जगदीशचंद्र बसु और बिपिनचंद्र पाल जैसे आध्यात्मिक एवं राष्ट्रीय जागरण के अग्रदूत महापुरुषों के बंगाल की आत्मा की विजय है।

जागरण की स्मृति

यह क्षण मुझे 1905 में ब्रिटिश शासन द्वारा प्रस्तावित बंगाल-विभाजन के विरोध की याद दिलाता है। उस समय बंकिमचंद्र के ‘वंदे मातरम’ के उद्घोष के साथ बंगाल में अदम्य ऊर्जा, अभूतपूर्व एकता और राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ था। उस जागृति का विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि उसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश शासन को 1911 में बंगाल-विभाजन का प्रस्ताव निरस्त करना पड़ा। इतना ही नहीं, ब्रिटिश शासन को अपनी राजधानी भी 1911 में कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करनी पड़ी। इस दृष्टि से देखा जाए, तो बंगाल के इस 2026 के चुनाव में भारत की आध्यात्मिक परंपरा और हिंदुत्व के विचार की विजय को बंगाल का “वंदे मातरम क्षण” कहा जा सकता है।

‘वंदे मातरम’ गीत बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ के लिए लिखा था। 1896 में इसे पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने गाया था। इसके बाद 1905 में अंग्रेजों द्वारा प्रस्तावित बंगाल-विभाजन के विरोध में बंगाल की जनता ने “वंदे मातरम” को स्वतंत्रता आंदोलन का युद्धमंत्र बना लिया। बंगाल-विभाजन के प्रस्ताव के विरोध में पूरा भारत खड़ा हो गया था। लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिनचंद्र पाल-लाल, बाल, पाल-को सबने अपना नेता मान लिया था। ‘वंदे मातरम’ का गान होते ही लोगों के भीतर अदम्य ऊर्जा और राष्ट्रीय चेतना का संचार हो जाता था। अनेक क्रांतिकारियों ने ‘वंदे मातरम’ के उद्घोष के साथ फांसी का फंदा चूमते हुए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर किए।

ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तावित बंगाल-विभाजन के विरोध में ‘वंदे मातरम’ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। 16 अक्टूबर 1905, रविवार को कोलकाता में मनाया गया रक्षाबंधन उत्सव ऐतिहासिक और अत्यंत महत्वपूर्ण था। सामान्यतः रक्षाबंधन का पर्व श्रावण पूर्णिमा, अर्थात अगस्त महीने में आता है। परंतु बंगाल-विभाजन के विरोध में 16 अक्टूबर को कोलकाता के हिंदू और मुस्लिम महिला-पुरुषों ने गंगाजी में स्नान किया, एक-दूसरे को राखी बांधी और यह संकल्प लिया कि इस रेशमी धागे की तरह हम बंगाल को एक सूत्र में बांधकर एकजुट रखेंगे और बंगाल का बंटवारा नहीं होने देंगे।

तब श्री अरविंद घोष ने पहली बार ‘वंदे मातरम’ को स्वतंत्रता का मंत्र कहा। राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए श्री अरविंद घोष ‘वंदे मातरम’ नाम से साप्ताहिक पत्रिका निकालते थे। 1907 में जर्मनी में मैडम भीकाजी कामा ने स्वतंत्र भारत का जो ध्वज फहराया था, उस पर ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ था। तब से ‘वंदे मातरम’ स्वाधीनता का मंत्र-गान, देशभक्ति का स्फूर्ति-गीत और क्रांतिकारियों का चेतना-मंत्र बन गया।

‘वंदे मातरम’ से प्रज्वलित क्रांति की ज्वाला से भयभीत होकर ब्रिटिश सरकार ने अप्रैल 1906 में इसके सार्वजनिक गायन पर प्रतिबंध लगा दिया। परंतु इस दमन के विरोध में बंगाल में अदम्य उत्साह और ऊर्जा का संचार हुआ और अंततः ब्रिटिश शासन को बंगाल-विभाजन का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।

यह ऊर्जा और उत्साह केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहा। इस जागृति की ज्वाला संपूर्ण भारत में फैल गई। नागपुर में संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार ने, जब वे दसवीं कक्षा के छात्र थे, ‘वंदे मातरम’ का सार्वजनिक उद्घोष कर विद्यालय प्रशासन का रोष सहन किया। इसके कारण उन्हें विद्यालय से निष्कासित भी किया गया।

विचार का विस्तार

तब से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रत्येक वार्षिक अधिवेशन में पूर्ण ‘वंदे मातरम’ का गान होता रहा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सरला देवी चौधरानी, पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर और ओंकारनाथ ठाकुर जैसे मूर्धन्य गायकों ने इसे स्वर दिया। कांग्रेस के सभी सदस्य, चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम, इसे स्वतंत्रता आंदोलन के प्राण-मंत्र के रूप में गाते रहे। किंतु 1921 के बाद ब्रिटेन की विभाजनकारी राजनीति के प्रभाव से कांग्रेस के भीतर सांप्रदायिक शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगा। इसके परिणामस्वरूप तुर्की के खिलाफत आंदोलन का समर्थन तथा ‘वंदे मातरम’ को सांप्रदायिक बताकर उसका विरोध करने जैसी प्रवृत्तियां उभरने लगीं। जो गीत 1920 तक स्वतंत्रता आंदोलन का प्राण-मंत्र माना जाता था, वही 1923 के बाद सांप्रदायिक कहा जाने लगा। यहीं से भारत-विभाजन के बीज बोए जाने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।

भारतीय चिंतन में मनुष्य को केवल शरीर के रूप में नहीं, बल्कि शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा से युक्त पंचकोषात्मक सत्ता के रूप में देखा गया है। इसी प्रकार ‘वंदे मातरम’ में भारत का समग्र स्वरूप प्रस्तुत होता है। इसके प्रथम पद में भारतभूमि का वर्णन है, द्वितीय पद में भारत के जन, अर्थात लोक का चित्रण है, जबकि बाद के पदों में भारत के मन, बुद्धि,  प्राण और आध्यात्मिक चेतना का निरूपण मिलता है।

“तुमि विद्या, तुमि धर्म”-यहां “विद्या” भारत की अध्यात्म-विद्या है, जो मोक्ष का मार्ग सिखाती है। ‘मैं’ को छोटा कर ‘हम’ की भावना को बड़ा करना तथा अपनेपन के भाव से समाज को देना, समाज को लौटाना-यही ‘धर्म’ है; यहां ‘धर्म’ का अर्थ ‘रिलिजन’ नहीं है। भगिनी निवेदिता ने कहा है कि जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक केवल अपने पास न रखकर समाज को देते हैं, उस समाज के पास एकत्रित सामाजिक पूंजी के बल पर संपूर्ण समाज संपन्न और समृद्ध बनता है, तथा समाज का प्रत्येक व्यक्ति भी संपन्न और समृद्ध बनता है। यही “धर्म” है। इसलिए एक अर्थ में समाज की इस सामाजिक पूंजी को समृद्ध करना ही “धर्म” है। इसीलिए स्वतंत्रता के बाद भारत के नेतृत्व ने विचारपूर्वक लोकसभा के लिए “धर्मचक्र प्रवर्तनाय”, राज्यसभा के लिए “सत्यम् वद, धर्मं चर”, सर्वोच्च न्यायालय के लिए “यतो धर्मस्ततो जयः” और राष्ट्रध्वज में धर्मचक्र का समावेश किया। यह विद्या और धर्म भारतमाता के हृदय में हैं; यही भारत का प्राण हैं।
यह भारतमाता शक्ति की देवी दुर्गा, समृद्धि की देवी लक्ष्मी और ज्ञान की देवी सरस्वती-तीनों का एकत्र रूप है। यही भारत है। इसी कारण 1905 से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में संपूर्ण ‘वंदे मातरम’ का गान होता रहा। इसे गाने में लगभग तीन मिनट का समय लगता है। इसमें सांप्रदायिकता कहां है?

बाद में विभाजनकारी और सांप्रदायिक तत्वों के प्रभाव में आकर इसके विरोध का क्रम शुरू हुआ, जो आज भी किसी न किसी रूप में जारी है। इसमें सांप्रदायिकता देखने वाले भारत की आध्यात्मिक धरोहर और परंपरा के बारे में अपना अज्ञान ही प्रदर्शित करते हैं। अथवा ऐसा प्रतीत होता है कि वे तब ब्रिटिश शासन के और आज भारत-विरोधी विभाजनकारी तत्वों के प्रभाव में हैं, या उनके हाथों में खेल रहे हैं।

किंतु ‘वंदे मातरम’ ने भारत के प्राणों को झकझोरा, राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया और जन-जन में स्वाधीनता का भाव प्रज्वलित किया। यही कारण था कि बंगाल-विभाजन के विरुद्ध इतना व्यापक जनक्षोभ उत्पन्न हुआ कि अंततः ब्रिटिश शासन को अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। अभी भारत सरकार ने ‘वंदे मातरम’ को प्राथमिकता देकर संपूर्ण ‘वंदे मातरम’ के गान का आग्रह किया है, यह समुचित और सराहनीय है।

2026 के बंगाल चुनाव के परिणामों ने 1905 से 1911 के बीच बंगाल में हुई जन-जागृति, संकल्प, राष्ट्रीय चेतना और निर्णायक सक्रियता की याद ताजा कर दी है। बंगाल को भाषिक अस्मिता के आधार पर अलग करने के षड्यंत्र इस चुनाव ने ध्वस्त कर दिए हैं। बंगाली भाषा अलग होते हुए भी उसकी अस्मिता भारत की आध्यात्मिक अस्मिता से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा है,यह इस चुनाव के परिणामों ने सिद्ध किया है।

1905 में जिस तरह ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्तियां और जिहादी कट्टरपंथी भारत की राष्ट्रीय पहचान को नष्ट करने के लिए एक साथ मिलकर काम कर रहे थे, उसी तरह 2026 में विचारहीन राजनेता, जिहादी कट्टरपंथी और कल्चरल मार्क्सवादी बंगाल के भारत के साथ संबंधों को समाप्त करने के लिए मिलकर काम कर रहे थे। 1905 और 2026-दोनों ही समय बंगाल के हिंदुओं को अपने अस्तित्व पर आए संकट का सामना करना पड़ा है। प्रतीत होता है कि रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बंगाल की अस्मिता पुनः जागृत हो उठी है। भारत का सर्वसमावेशी, एकात्म और आध्यात्मिक जीवन-दर्शन-अर्थात भारत का हिंदुत्व-एक बार फिर मुखर होकर सामने आया है।

इस परिणाम को संभव बनाने वाले शासन और प्रशासन के सभी अधिकारियों तथा निर्भय होकर अभूतपूर्व संख्या में मतदान करने का साहस और संकल्प प्रदर्शित करने वाले बंगाल के समस्त महिला-पुरुष नागरिकों का मनःपूर्वक अभिनंदन है। उनकी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता और परिवर्तन की आकांक्षा ने इस ऐतिहासिक परिणाम को संभव बनाया है। निःसंदेह, यह बंगाल का “वंदे मातरम क्षण” है।

Topics: कल्चरल मार्क्सवादी बंगालब्रिटिश सरकारवंदे मातरमबंकिमचंद्र चट्टोपाध्यायआनंदमठरवीन्द्रनाथ ठाकुरजिहादी कट्टरपंथी
डॉ. मनमोहन वैद्य
डॉ. मनमोहन वैद्य
डॉ. मनमोहन वैद्य सदस्य, अखिल भारतीय कार्यकारिणी, रा.स्व. संघ [Read more]
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