मानसा में आयोजित संघ वर्ग में जीरो वेस्ट मॉडल से पर्यावरण संरक्षण की जगाई अलख
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मानसा में आयोजित संघ वर्ग में जीरो वेस्ट मॉडल से पर्यावरण संरक्षण की जगाई अलख

पिछले 20 दिन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग प्रथम (सामान्य) में शारीरिक, बौद्धिक और अन्य गतिविधियों के साथ बड़ा फोकस जीरो वेस्ट पर है।

Written byराजेश शांडिल्यराजेश शांडिल्य
Jun 20, 2026, 06:58 pm IST
inसंघ @100, चण्‍डीगढ़

पिछले 20 दिन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग प्रथम (सामान्य) में शारीरिक, बौद्धिक और अन्य गतिविधियों के साथ बड़ा फोकस जीरो वेस्ट पर है। सीधा बोलें तो कचरा प्रबंधन पर। अगर इसका मूलमंत्र ठीक से समझ लिया जाए तो इसका सकारात्मक असर जीवन शैली पर होगा। दरअसल इसका उद्देश्य मात्र कचरा निपटान नहीं, बल्कि यह समझ विकसित करना है कि जिसे हम कचरा मानते हैं, वह वास्तव में एक संसाधन है। यदि सही प्रबंधन किया जाए तो न दुर्गंध फैलेगी, न प्रदूषण होगा और न ही पर्यावरण पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

पर्यावरण संरक्षण गतिविधि में राष्ट्रीय टोली के सदस्य व जल प्रमुख एवं पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना के प्रोफेसर डा.राकेश शारदा के अनुसार इस प्रयोग की शुरुआत एक महत्वपूर्ण विचार से हुई। इसका उद्देश्य है कि गीला कचरा घरों, दफ्तरों, धार्मिक, सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं इत्यादि से बाहर ही नहीं निकलना चाहिए। आमतौर पर लोग रसोई का कचरा सफाई कर्मचारी को दे देते हैं और फिर वह डंपिंग प्वाइंट से डंपिंग ग्राउंड तक दुर्गंध फैलाते हुए पहुंचता है,जिससे आसपास वातावरण में प्रदूषण की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। जीरो वेस्ट मॉडल इस सोच को बदलने का प्रयास करता है।

पंजाब मानसा में संघ द्वारा आयोजित वर्ग में लगभग 300 स्वयंसेवकों की आवासीय व्यवस्था चल रही है। एक व्यक्ति यदि प्रतिदिन लगभग 350 से 500 ग्राम तक गीला कचरा उत्पन्न करता है तो इस हिसाब से प्रतिदिन सवा से डेढ़ क्विंटल तक गीला कचरा निकल रहा है। सवाल था कि इतने कचरे का क्या किया जाए। उसे जलाया जाए तो वायु प्रदूषण होगा और डंप किया जाए तो दुर्गंध का वातावरण बनेगा।

इसका समाधान खोजते हुए पांच फुट लंबा, पांच फुट चौड़ा और तीन फुट गहरा गड्ढा तैयार किया गया। सबसे पहले उसमें चार से पांच इंच मोटी सूखी पत्तियों की परत बिछाई गई। उसके ऊपर गीला कचरा डाला गया। जब यह परत लगभग एक फुट तक पहुंच गई तो फिर सूखी पत्तियों की नई परत बिछा दी गई। इस दौरान नमी बनाए रखने के लिए पानी का छिड़काव भी किया गया। बीस दिन बाद भी गड्ढा पूरी तरह नहीं भरा, क्योंकि नीचे की सामग्री लगातार बैठती और सड़कर खाद में बदलती जा रही थी। इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गीले कचरे में प्लास्टिक शून्य बराबर है।

जब गड्ढा पूरी तरह भर जाएगा, तब उसके ऊपर सूखी पत्तियां और मिट्टी डालकर बंद कर दिया जाएगा। लगभग तीन महीने बाद इसमें से उत्कृष्ट जैविक खाद तैयार होगी, जिसका उपयोग बागवानी और खेती में किया जा सकेगा। इस प्रक्रिया को और तेज करने के लिए बायो डी कंपोजर का उपयोग भी किया जा सकता है। गुड़, बायो कंपोजर और 200 लीटर पानी का घोल सात दिन तक ढककर रखने से डी कंपोस्टर तैयार हो जाता है। इसे कचरे पर डालने से 45 से 50 दिनों में अच्छी गुणवत्ता की खाद तैयार हो सकती है।आधुनिक वातावरण और आवासीय व्यस्था में निजी घरों के साथ निरंतर सोसायटी और फ्लैट की संख्या बढ़ रही है,यानी जहां गड्ढे बनाने की स्थिति नहीं है,यहां रहने वाले लोगों के लिए बोकाशी बिन (जापानी डिब्बा) एक उपयोगी विकल्प है। लगभग 20 लीटर क्षमता वाला यह बिन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर 250 से 300 रुपये में उपलब्ध है। इसकी सहायता से घर में ही गीले कचरे का प्रबंधन किया जा सकता है।

इसी प्रकार प्लास्टिक कचरे के लिए भी वर्ग स्थान पर में अलग व्यवस्था बनाई गई है। एक बड़ा थैला लगाया गया है,ताकि सिंगल यूज सारा प्लास्टिक अलग एकत्रित हो। पंजाब मानसा के समीप सरदूलगढ़ क्षेत्र में ऐसी इकाइयां कार्य कर रही हैं,जो सिंगल यूज प्लास्टिक से पेवर ब्लॉक और खपरैल तैयार करती हैं। मैटीरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) के माध्यम से प्लास्टिक का रीसाइकिल किया जा सकता है।यह यूनिट दो रुपये प्रति किलो के हिसाब से सिंगल यूज प्लास्टिक खरीदती है। वहीं अलग अलग उपयोगों के लिए अन्य जगहों पर प्लास्टिक बोतलें 45 से 48 रुपये प्रति किलो तक, जबकि चिप्स और कुरकुरे जैसे मल्टी लेयर कटे फटे पैकेट 60 से 80 रुपये प्रति किलो तक खरीदे जाते हैं। इनसे फर्नीचर, गमले, टी शर्ट और अन्य उपयोगी वस्तुएं बनाई जा रही हैं।

इसके सहित अधिकांश लोगों को यह तक नहीं मालूम कि टॉफी, बिस्कुट और स्नैक्स के पाउच से बेहतर इको ब्रिक भी बनाई जा सकती है। इसके लिए इन पाउचों को खाली प्लास्टिक बोतलों में भरकर ठोस रूप दिया जाता है। बाद में इनका उपयोग बेंच, टेबल और पार्कों की संरचनाओं में किया जा सकता है। प्रशिक्षण वर्ग में जल संरक्षण और रसायन मुक्त जीवन शैली पर भी जोर दिया गया। फलों और सब्जियों के छिलकों, गुड़ और पानी से तैयार होने वाला बायो एंजायम इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। एक भाग गुड़, तीन भाग छिलके और दस भाग पानी के अनुपात से इसे तैयार किया जाता है। 90 दिनों बाद यह प्राकृतिक क्लीनर बन जाता है। इसका उपयोग फर्श पर पोछा लगाने,शीशे साफ करने, फलों और सब्जियों को धोने, टाइलों की सफाई, दुर्गंध नियंत्रण और घरेलू उपयोग के अनेक कार्यों में किया जा सकता है।

यह पूरा प्रयोग एक संदेश देता है कि कचरा समस्या नहीं है, गलत प्रबंधन समस्या है। यदि हर घर, हर संस्था और हर नगर, गांव, डेरा के मोहल्ला, कालोनी, बस्तियां अपने स्तर पर गीले और सूखे कचरे को अलग कर उसका स्थानीय प्रबंधन शुरू कर दे, तो न केवल हमारे आसपास स्वच्छता और अच्छा वातावरण बनेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी बड़ा बदलाव सामने होंगे। अब जीरो वेस्ट कोई सपना नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारी जा सकने वाली जीवन शैली है।

Topics: Waste ManagementSangh Varg organised in MansaZero Waste ModelRSSRashtriya Swayamsevak Sangh
राजेश शांडिल्य
राजेश शांडिल्य
वरिष्ठ पत्रकार [Read more]
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