छत्रपति शिवाजी महाराज से संघ तक: राष्ट्र पुनर्निर्माण की वह विचारधारा जिसे जानना जरूरी है
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छत्रपति शिवाजी महाराज से संघ तक: राष्ट्र पुनर्निर्माण की वह विचारधारा जिसे जानना जरूरी है

श्रीगुरुजी छत्रपति शिवाजी का आदर्श प्रस्तुत करते हुए कहते हैं, "श्रीशिवाजी महाराज महान् नीतिज्ञ थे। युद्धनीति विजयप्राप्ति का शास्त्र होती है। इस का सम्यक ज्ञाता चारों ओर की हलचल तथा अशांति के कारण अपनी योजना से कभी विचलित नहीं होता।

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by Mahak Singh
Jun 19, 2026, 02:30 pm IST
inभारत
छत्रपति शिवाजी महाराज

छत्रपति शिवाजी महाराज

डॉक्टर जी ने न केवल शिवाजी महाराज को राष्ट्रपुरुष के रूप में स्वीकार कर उनके गुणों को अंगीकृत किया था; अपितु वे स्वयं भी उसी उच्च ध्येयवाद से प्रेरित होकर यश की ओर समाज को ले जानेवाले महापुरुषों की मालिका के एक मणि थे। (डॉ. हेडगेवार चरित, पालकर जी, पृष्ठ 264)

केशव एवं उनके मित्रों के बाल-मनों पर स्वराज्य संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन का भारी प्रभाव था। नागपुर में सीताबर्डी के किले पर ‘यूनियन जैक’ दिन-भर फहरता दिखता था। उसे देखकर इन बालकों के मन में यह विचार उठा कि यदि उसे हटाकर वहाँ भगवाझण्डा लगा दिया तो किला फतह हो जायेगा। इस कल्पना के अनुसार उन बालकों ने निश्चय किया कि वहाँ अपना झण्डा लगाना चाहिए। (डॉ. हेडगेवार चरित, पालकर जी, पृष्ठ 26)

शिवाजी की अध्यक्षता में भाषण

जिस समय डॉक्टर जी कोल्हापुर गये, उन दिनों वहाँ का संघ कार्य ‘राजाराम स्वयंसेवक संघ’ के नाम से चलता था; क्योंकि सरकारी दबाव के कारण वहाँ की रियासत के अधिकारियों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। वहाँ के प्रसिद्ध अम्बाबाई के मन्दिर के आँगन में डॉक्टर जी के भाषण की योजना की गयी थी। सभा में जनता आकर बैठ गयी; किन्तु अध्यक्ष महोदय शासन के भय के कारण नहीं आये। इस पर डॉक्टर जी ने छत्रपति शिवाजी महाराज के चित्र को अध्यक्ष की कुर्सी पर आसीन करने को कहा तथा उनकी अध्यक्षता में ही अपना भाषण प्रारम्भ किया। दो-तीन हजार की श्रोतामण्डली को सम्बोधित करते हुए डॉक्टर जी ने कहा “कोल्हापुर जैसे नगर में मेरे भाषण के लिए प्रत्यक्ष छत्रपति होने पर अन्य किसी अध्यक्ष की क्या आवश्यकता है? मुझे शिवाजी महाराज अध्यक्ष के नाते प्राप्त हुए, यह मेरा कितना अहोभाग्य है।” (डॉ. हेडगेवार चरित, पालकर जी, पृष्ठ 308)

श्रीगुरुजी ने अपने भाषण में कहा, “आज अपने सम्मुख मैं जो दृश्य देख रहा हूँ, उससे मुझे 300 वर्ष पूर्व के इतिहास का एक पृष्ठ याद आ रहा है, जबकि गुरु गोविंदसिंह के रूप में उत्तर की ओर से एक भारतीय शक्ति दक्षिण की उसी प्रकार की एक अन्य शक्ति से, जो छत्रपति शिवाजी के रूप में प्रकट हुई थी, मिलने गयी थी। किन्तु देश का महान दुर्भाग्य था कि उन दोनों शक्तियों का मिलन संभव न हो सका। यदि वह मिलन संभव हो गया होता, तो भारतीय इतिहास दूसरे ही ढंग से लिखा जाता। परंतु उस समय जो शक्ति-संघटन न हो सका, वह आज हो रहा है। मुझे विश्वास है कि इससे धर्म की रक्षा के लिए एक ऐसी विराट शक्ति का उदय होगा, जिससे भविष्य में धर्म पर संकट आने की कोई आशंका ही नहीं रह जायेगी।” (श्री गुरुजी : व्यक्ति और कार्य, पृष्ठ 132)

शिवाजी: नीति और पराक्रम का आदर्श

श्रीगुरुजी छत्रपति शिवाजी का आदर्श प्रस्तुत करते हुए कहते हैं, “श्रीशिवाजी महाराज महान् नीतिज्ञ थे। युद्धनीति विजयप्राप्ति का शास्त्र होती है। इस का सम्यक ज्ञाता चारों ओर की हलचल तथा अशांति के कारण अपनी योजना से कभी विचलित नहीं होता। किसी वस्तु की गति आजमानी हो, तो एक स्थान पर स्थिर रहकर उसकी ओर देखना पडता है। स्वतः दौडनेवाला अस्थिरचित्त व्यक्ति दूसरी गतिमान वस्तु की गति नहीं जान सकता। शिवाजी महाराज भी ऐसे ही शांत, संयमी और स्थिरचित्त पुरुष थे। इसीलिए वे परिस्थिति की गति को ठीक परख सकने में समर्थ होते थे। विजयाकांक्षी व्यक्ति अपनी दृष्टि अंतिम विजय पर ही केन्द्रित रखता है। वह अपनी राजनीति से विचलित नहीं होता। उसे विजय का पूरा विश्वास होता है। निराशा, दुर्बलता तथा अविवेक उसके मन को स्पर्श तक नहीं कर सकते। भीषण आँधी और तूफान में भी वह हिमालय की भाँति अडिग खडा रहता है। शिवाजी महाराज ने अपनी विजयशालिनी युद्धनीति से अपने जीवन में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना कर दिखायी। यह सफल और विजयी पुरुष हमारा आदर्श है।” (श्री गुरुजी : व्यक्ति और कार्य, पृष्ठ 294)

राष्ट्रीय जीवन में समरसता का मंत्र

श्रीगुरुजी प्रगतिशील राष्ट्रीय जीवन के लिए राष्ट्रपुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेने की बात कहते हैं। वे बताते हैं कि “मान लीजिये कि यहाँ बैठे लोगों में से कोई अमेरिका का नागरिक बनने का विचार करता है तथा उसका अधिकार भी प्राप्त कर लेता है। तब वहाँ जाकर उसे किस ध्वज का अभिमान रखना चाहिए ? भारत के चक्रांकित तिरंगे का ? नहीं। उसे तो अमेरिका के ही ध्वज का अभिमान रखना होगा। फिर राष्ट्रपुरुष के नाते वह किसका गौरव करेगा ? जार्ज वाशिगटन तथा अब्राहम लिंकन का। वहाँ भगवान् राम तथा कृष्ण की पूजा करने की आपको मनाही नहीं होगी परंतु वहाँ के राष्ट्रीय श्रद्धाकेन्द्रों को भी अपनाना पडेगा। — इसी प्रकार ईसाई तथा मुसलमानों को भी भारत के जीवन के साथ समरस होकर यहाँ की नागरिकता के नियमों के अनुसार ही रहना होगा। यहाँ के राष्ट्रजीवन का ही आदर्श सम्मुख रखकर, यहाँ के उत्सवों को ही अपने राष्ट्रीय उत्सव मानते हुए, यहाँ के राष्ट्रपुरुषों का जयजयकार करना होगा। मैं तो कहूँगा कि उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज की ही जय बोलनी होंगी। — उनके लिए यह नितांत आवश्यक होगा कि वेदों के ही नहीं तो उससे भी पूर्व के युग की जीवन-धारा के साथ घुल-मिलकर, भारतीय श्रेष्ठ पुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर, उनकी श्रद्धा को अपनाकर फिर चाहे तो मस्जिद में जायें और पैगंबर मुहम्मद साहब का नाम लें अथवा गिरजे में जायें और बाइबिल पढ़ें। इस विषय में किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी। उन्हें अपने धर्मों का पालन व्यक्तिगत धर्मों के ही रूप में करना होगा। सामूहिक रूप में तो उन्हें यहाँ प्राचीन काल से चले आ रहे जीवन-प्रवाह को ही अपनाना होगा। मेरा विचार है कि इस प्रकार सोचने के बाद ही सुव्यवस्थित राज्य, प्रगतिशील राष्ट्रीय जीवन और प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में अपने राष्ट्र तथा राज्य की समुचित उन्नति करने की प्रेरणा उत्पन्न हो सकेगी।” (श्री गुरुजी : व्यक्ति और कार्य, पृष्ठ 254-255)

हिन्दू स्वराज्य का मूल दर्शन

दत्तोपंत ठेंगडी जी अपनी पुस्तक ‘संकेत रेखा’ में लिखते हैं कि “जिसके राज्यारोहण दिवस को हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव के रूप में मनाया जाता है, उस शिवाजी के बारे में क्या हम जानते नहीं कि प्रारम्भ में ही स्पष्ट रूप से उन्होंने कहा था कि यह व्यक्ति का नहीं, कुल का नहीं, जाति का नहीं, धर्म का राज्य है। राज्य स्थापना का प्रयास उन्होंने सत्ता के मोह में नहीं किया। हिन्दू स्वराज्य का निर्माण उन्होंने धर्म के संस्थापन के एक साधन और माध्यम के रूप में किया था। यही कारण है कि हम देखते हैं कि शिवाजी ने अपने जीवन में तीन बार स्वकष्टार्जित, स्वपराक्रामार्जित सत्ता छोड़ दी थी। अपने गुरु रामदास को उन्होंने गरूदक्षिणा के रूप में उनकी झोली में अपना स्वकष्टार्जित स्वराज्य समर्पित कर दिया था। जिसके मन में केवल राजनीतिक आकाक्षाएं होती हैं वह ऐसा नहीं कर सक्ता। जो यह मानता है कि यह मेरा नहीं, धर्म का राज्य है, अर्थात्‌ राजसत्ता अपने पास होते हुए भी सत्ता की पिपासा नहीं, सत्ता का मोह नहीं, और जो धर्म स्थापना के एक साधन के रूप में सत्ता सम्पादन की ओर देखता है वही आदमी यह कार्य कर सकता है। किन्तु इस हिन्दू पृष्ठभूमि, मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि, वायुमण्डल की पृष्ठभूमि को न जानते हुए यदि पश्चिम के तौर-तरीकों के संदर्भ में अर्थ लगाए गए तो हिन्दू बातों को समझना बहुत मुश्किल होगा।“ (संकेत रेखा, पृष्ठ 227)

शिवाजी: गुणों का अनुपम संगम

दत्तोपंत ठेंगडी जी छत्रपति शिवाजी महाराज की हिन्दू परंपरा का सन्दर्भ बताते हुए लिखते हैं कि “संसार के गुण-सम्पन्न अनेकानेक महापुरुषों की शिवाजी से तुलना की जा सकती हैः सेना संचालन की दृष्टि से सिकन्दर, सीजर, हानिबाल और नेपोलियन; दारुण निराशा की घड़ियों में जनता का मनोधैर्य टिकाए रखने की क्षमता की दृष्टि से लिंकन और चर्चिल; प्रखर राष्ट्रभाव को जागृत और संगठित करने में मैजिनी, वाशिंगटन तथा बिस्मार्क; राष्ट्र-निर्माण-कार्य में आत्मविसर्जन की दृष्टि से कमालपाशा और लेनिन; आसक्ति रहित शासन करने में मार्क्स आरेलियस तथा चार्ल्स पंचम। किन्तु सम्पूर्ण गुण समुच्चय की दृष्टि से शिवाजी की तुलना किससे करें? कल्याण के सूबेदार की लावण्यमयी पुत्रवधू को मातृवत्‌ सम्मानित करने वाले छत्रपति के चरित्र की तुलना हम अन्य किस सत्ताधीश से करें? माओ और चे-ग्वेबेरा से लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व शिवाजी ने गुरिल्ला युद्धतंत्र का निर्माण किया। नेपोलियन और हिटलर के मास्को अभियान के अनुभवों के सैकड़ों वर्ष पहले, युद्ध के दौरान संभाव्य आपत्काल में आश्रय.स्थान के नाते, सुदूर दक्षिण में उपयुक्त प्रदेश सम्पादित करने की दूरदर्शिता उन्होंने दिखायी। शास्त्र के नाते “जिओपोलिटिक्स” का विकास होने के २५० वर्ष पूर्व उन्होंने सागरीय सत्ता का सूत्रपात प्रयासपूर्वक किया। इतिहास के जिस कालखण्ड में सेक्युलर राज्य की कल्पना पश्चिम में लोकप्रिय नहीं थी, उस समय शिवाजी ने हिन्दू परम्परा के अनुकूल सम्प्रदाय निरपेक्ष धर्मराज्य की स्थापना की।“ (संकेत रेखा, पृष्ठ 225)

यह तीन सौ साल पूर्व की घटना है। हिन्दुस्थान में चारों ओर पराये आक्रामकों का राज्य, साम्राज्य और धर्म पर आक्रमण, हिन्दुओं में आत्मविश्वास का अभाव, पराये आक्रामकों को हम परास्त कर नहीं सकते, इस तरह का मन का भाव और इन परिस्थितियों में एक बालक मन में निश्चय कि “मैं पराये आक्रमण का मुकाबला करूंगा उनको पीछे हटाऊंगा, अपने स्वराज्य की स्थापना करूंगा, धर्मराज्य की स्थापना करूंगा। जबकि विरोध में बड़े राज्य और साम्राज्य, बड़ी-बड़ी सेनाएं और सेनापति, राज्यकार्य- धुरंधर लोग और अपार कोष था। उस बालक के पास कुछ नहीं, केवल पांच-पचास अपने समवयस्क लड़कों की लगन। इतनी ही साधन सम्पत्ति थी उसके पास, किन्तु निश्चय के आधार पर इस अवस्था में भी उसने “रावण रथी बिरथ रघुवीरा” की नाई साधन सम्पन्न राज्यों, साम्राज्यों का मुकाबला करते हुए उनको परास्त करके धर्मराज्य की स्थापना की, जिसकी घोषणा ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी पर हुई। उसको कहा गया “हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव”। आज की स्थिति में भी इस घटना को, वे ही सिद्धान्त, वे ही आदर्श, वे ही स्वप्न, वे ही लक्ष्य सामने रखकर काम करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझना भी आवश्यक है। (संकेत रेखा, पृष्ठ 226)

शिवाजी के पूर्व जो भी पराये राजे, बादशाह और सुल्तान यहां हुए, वे पश्चिम के सर्वसत्तावादी राजा के समान थे। वे ही सर्वेसर्वा थे। तानाशाह थे। उनको नियंत्रित करने वाला कोई कानून नहीं था। उनकी इच्छा ही उनके के राज्य का कानून होती थी। शिवाजी ने इस परिस्थिति से भिन्न परिस्थिति वाले राज्य का निर्माण किया कि अब शासक की इच्छा ही कानून नहीं होगी, बल्कि समाज के कानून के अन्तर्गत राजा को चलना होगा। (संकेत रेखा, पृष्ठ 228)

संघ का मूल उद्देश्य

यही बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विषय में भी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य है राष्ट्र का पुननिर्माण। हमारी मान्यता है कि यह सम्पूर्ण हिन्दुस्थान अपनी-अपनी उपासना-पद्धति को कायम रखते हुए आगे बढ़े। उपासना पद्धति व्यक्तिगत बात है, यह समझकर हरेक की उपासना पद्धति को पूरी स्वतंत्रता देते हुए राष्ट्र अर्थ में “भारत” हिन्दू राष्ट्र है और इस राष्ट्र को हिन्दू राष्ट्र कहा जाये या न कहा जाये, इसके विषय में विवाद करने वाले लोग मिल सकते हैं तो भी इस राष्ट्र का पुनर्निर्माण होना चाहिए, इस विषय में मतभेद रखने वाला, मैं समझता हूं, कोई नहीं है। यह हो सकता है कि लोग अलग-अलग शब्दों का प्रयोग करते हों, किन्तु सभी चाहते हैं कि पुननिर्माण होना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि सर्वांगीण उन्नति होनी चाहिए, कुछ लोग समग्र क्रान्ति की बात करते हैं, गंभीर से लेकर रोमांटिक तक जिसका जैसा स्वभाव होता है उसके अनुसार अलग-अलग शब्दों का प्रयोग लोग करते हैं। लेकिन सबके मन में यह भाव समान रूप से है कि आज की परिस्थिति अवांछनीय है और जीवन के हरेक क्षेत्र में युगानुकूल, सर्वकष, सर्वांगीण परिवर्तन होना चाहिए। इस दृष्टि से विभिन्न क्षेत्रों में प्रयास चल रहे हैं। यह प्रयास करने वाले लोगों के मन में यह प्रश्‍न उठता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्या कर रहा है? संघ के विराट्‌ रूप और अपार शक्ति को देखकर उनको आनन्द भी होता है। लेकिन साथ-साथ यह भी सोचते हैं कि इतनी बड़ी शक्ति किसी काम की नहीं है। ये लोग सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन के लिए कुछ न करते हुए बस ‘दक्ष-आरम’ कर रहे हैं। इसका क्या उपयोग है? (संकेत रेखा, पृष्ठ 229)

संघ का प्रयास समाज की स्वाभाविक अवस्था निर्माण करने का है। संगठन से संघ का मतलब है समाज के हरेक व्यक्ति के हृदय पर समाज के साथ एकात्मता और समाज के प्रति समर्पण का संस्कार अंकित करना। हर व्यक्ति को यह प्रतीत हो कि मैं अलग नहीं, पृथक्‌ नहीं, स्वतंत्र नहीं, सम्पूर्ण समाज शरीर का अवयव मात्र हूँ, सम्पूर्ण समाज के साथ मैं एकात्मक हूं, समाज के सुख में मेरा सुख, समाज के दुःख में मेरा दुःख, समाज के सम्मान में मेरा सम्मान, समाज के अपमान में मेरा अपमान है। इस दृष्टि से हृदय पर संस्कार अंकित करने वाली दिन-प्रति-दिन एकत्रीकरण की कार्यपद्धति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनाई है। समाज के साथ एकात्मता के संस्कार ग्रहण किए हुए लोगों का अनुशासनबद्ध समूह खड़ा करने का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रयास है। (संकेत रेखा, पृष्ठ 229)

अतः ऐसे एकात्म व्यक्तियों अनुशासनबद्ध संगठन खड़ा किया गया तो वह समाज विभिन्न क्षेत्रों में आने वाली सभी समस्याओं का स्वाभाविक रूप से मुकाबला करने में समर्थ होगा। पश्चिम की ओर से उधार लाई हुई विचार-पद्धतियों से हमारा मौलिक मतभेद है। भारत को भारत की मिट्टी से उपजी विचारधारा चाहिए, पश्चिम से उधार ली गई विचारधारा नहीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य की यही मौलिकता है। इस हिन्दू कल्पना को हिन्दूशब्दच्छाया और संकल्पना के संदर्भ एवं प्रकाश में समझना चाहिए। अपनी परम्पराओं के संदर्भ में हम अपने भविष्य का विचार करेंगे तभी आगे का रास्ता हम ठीक ढंग से निश्चित कर सकेंगे। (संकेत रेखा, पृष्ठ 233)

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