"येन बद्धो बलि राजा...": केवल भाई-बहन का नहीं, राष्ट्र व समाज का महापर्व है रक्षाबंधन, जानिए इसका पौराणिक इतिहास!
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“येन बद्धो बलि राजा…”: केवल भाई-बहन का नहीं, राष्ट्र व समाज का महापर्व है रक्षाबंधन, जानिए इसका पौराणिक इतिहास!

Raksha Bandhan Significance Mantra: रक्षासूत्र मंत्र 'येन बद्धो बलि राजा' के साथ जानिए रक्षाबंधन का सनातन, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व। मां लक्ष्मी-बलि से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक की प्रेरक गाथाएं।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Aug 19, 2026, 11:21 pm IST
inभारत, विश्लेषण, संघ @100, धर्म-संस्कृति
Raksha Bandhan Significance Sanatan Dharma Yen Baddho Bali Raja Mantra Meaning Panchjanya

नई दिल्ली। सनातन परंपरा में रक्षाबंधन का पावन पर्व केवल एक धागा बांधने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण प्रकृति, समाज और राष्ट्र की रक्षा के संकल्प का महापर्व है. सावन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के विराट भाव के साथ हर व्यक्ति को एक-दूसरे की रक्षा के पावन सूत्र में बांधता है. रक्षा का यह भाव साक्षात ‘शिव तत्व’ का प्रतीक है, जहाँ समस्त चराचर जगत के कल्याण और अभय का संकल्प निहित होता है.

वैदिक परंपरा में रक्षासूत्र बांधते समय बोला जाने वाला मूल मंत्र युगों-युगों से इस पर्व का आध्यात्मिक मूलाधार रहा है:

मंत्र: “येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि, रक्षे माचल माचल:॥”
अर्थ: जिस रक्षासूत्र से महाबली और परम दानवीर राजा बलि को बांधा गया था, उसी पवित्र सूत्र से मैं तुम्हें बांधता/बांधती हूँ। हे रक्षे (रक्षासूत्र)! तुम कभी विचलित न होना, अपने रक्षा के संकल्प पर सदैव अडिग रहना।

विभाजनकारी नैरेटिव पर करारा प्रहार: असुर राज बलि और मां लक्ष्मी की नींव

धार्मिक आख्यानों के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार में राजा बलि से तीनों पग भूमि दान में ले ली और उन्हें पाताल लोक का राज्य दिया, तब बलि ने वचनबद्ध कराकर श्रीहरि को अपना द्वारपाल बना लिया. तब माता लक्ष्मी ने पाताल पहुंचकर राजा बलि को रक्षासूत्र बांधा और उपहार स्वरूप अपने पति भगवान विष्णु को मुक्त कराया.

यह प्रसंग उन विभाजनकारी शक्तियों के लिए करारा जवाब है जो सनातन धर्म में जाति, ऊंच-नीच या सुर-असुर के नाम पर विद्वेष फैलाते हैं, क्योंकि इस वैश्विक पर्व की आधारशिला स्वयं मां लक्ष्मी ने असुर राज बलि को रक्षासूत्र बांधकर रखी थी.

एक नजर में जानिए रक्षाबंधन के प्रमुख पौराणिक एवं ऐतिहासिक संदर्भ

कालखंड / प्रसंगपात्र / संबंधरक्षासूत्र एवं रक्षा का ऐतिहासिक व आध्यात्मिक संदेश
सतयुग / पौराणिकमां लक्ष्मी एवं असुर राज बलिरक्षासूत्र बांधकर भगवान विष्णु को पाताल से वचन बंधन से कराया था मुक्त.
देव-दानव संग्रामइंद्राणी (शचि) एवं देवराज इंद्रगुरु बृहस्पति के निर्देश पर बांधे गए रक्षासूत्र से वृत्रासुर पर प्राप्त की थी विजय.
शिव-विष्णु प्रसंगमाता पार्वती एवं भगवान विष्णुभगवान विष्णु ने धर्म-भाई के रूप में कलाई पर रक्षासूत्र बंधवाकर विवाह की बाधाएं दूर कीं.
गणेश परिवारसंतोषी मां एवं शुभ-लाभशुभ-लाभ की कलाई सूनी न रहे, इसलिए अग्नि से मां संतोषी का हुआ था प्राकट्य.
त्रेतायुगशांता एवं श्रीराम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्नबड़ी बहन शांता बांधती थीं भगवान राम को राखी, अयोध्या में रामलला को आज भी बांधी जाती है राखी.
यम-यमुना गाथायमराज एवं देवी यमुनायमुना के रक्षाबंधन से प्रसन्न होकर यमराज ने दिया था अमरत्व और सुरक्षा का वरदान.
द्वापरयुगभगवान श्रीकृष्ण एवं द्रौपदीसाड़ी का पल्लू बांधने पर श्रीकृष्ण ने चीरहरण के संकट में की थी द्रौपदी की रक्षा.
प्राचीन इतिहासरानी रेक्सोना एवं राजा पुरुसिकंदर की पत्नी की राखी का मान रखते हुए राजा पुरु ने सिकंदर को दिया था जीवनदान.
गोंडवाना साम्राज्यवीरांगना रानी दुर्गावतीमंत्री आधार सिंह, महेश ठाकुर और अन्य  को रक्षासूत्र बांधकर खड़ा किया था रक्षा मोर्चा.
स्वाधीनता संग्रामगुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर (1905)बंगाल विभाजन के विरोध में राष्ट्र जागरण का बना था माध्यम.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और रक्षाबंधन: समरस समाज और राष्ट्र रक्षा का संकल्प

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रक्षाबंधन को एक प्रमुख उत्सव के रूप में मनाता है. संघ की दृष्टि में यह केवल पारिवारिक रस्म नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, व्यक्ति निर्माण, स्वत्व जागरण और राष्ट्र रक्षा का अनुष्ठान है. जाति और वर्ग भेद से ऊपर उठकर एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधने से समाज में एकात्मता का भाव सुदृढ़ होता है और समाज के अंतिम व्यक्ति की सुरक्षा का सामूहिक दायित्व जागृत होता है.

स्वाधीनता संग्राम और सुभद्रा कुमारी चौहान की अमर रचना: “राखी की चुनौती”

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में रक्षाबंधन देश की आजादी के लिए सर्वस्व न्योछावर करने का प्रेरणा-पुंज बना. स्वतंत्रता सेनानी वीरांगना सुभद्रा कुमारी चौहान की कालजयी कविता ने राखी को देश की बेड़ियों को काटने वाली लौहमयी शक्ति बना दिया था:

“बहिन आज फूली समाती न मन में। तड़ित् आज फूली समाती न घन में॥
घटा है न फूली समाती गगन में। लता आज फूली समाती न वन में॥
कहीं राखियाँ हैं चमक है कहीं पर, कहीं बूँद है, पुष्प प्यारे खिले हैं।
ये आई है राखी, सुहाई है पूनों, बधाई उन्हें जिनको भाई मिले हैं॥

मैं हूँ बहिन किंतु भाई नहीं है। है राखी सजी पर कलाई नहीं है॥
है भादों, घटा किंतु छाई नहीं है। नहीं है ख़ुशी पर रुलाई नहीं है॥
मेरा बंधु माँ की पुकारों को सुनकर के तैयार हो जेलख़ाने गया है।
छीनी हुई माँ की स्वाधीनता को वह ज़ालिम के घर में से लाने गया है॥

मुझे गर्व है किंतु राखी है सूनी। वह होता, ख़ुशी तो क्या होती न दूनी?
हम मंगल मनावें, वह तपता है धूनी। है घायल हृदय, दर्द उठता है ख़ूनी॥
है आती मुझे याद चित्तौरगढ़ की, धधकती है दिल में वह जौहर की ज्वाला।
है माता-बहिन रोके उसको बुझातीं, कहो भाई तुमको भी है कुछ कसाला?

है, तो बढ़े हाथ, राखी पड़ी है। रेशम-सी कोमल नहीं यह कड़ी है॥
अजी देखो लोहे की यह हथकड़ी है। इसी प्रण को लेकर बहिन यह खड़ी है॥
आते हो भाई? पुनः पूछती हूँ— कि माता के बंधन की है लाज तुमको?
— तो बंदी बनो, देखो बंधन है कैसा, चुनौती यह राखी की है आज।।”

यह पावन पर्व हमें स्मरण कराता है कि रक्षाबंधन का धागा केवल रेशम का धागा नहीं, बल्कि राष्ट्र रक्षा, सामाजिक सौहार्द और परस्पर विश्वास का अमर बंधन है.

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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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