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आज का श्लोक : यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम् ।

सुभाषितम् में पढ़ें आज का श्लोक

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Panchjanya

यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम् ।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति।।2।।

हिन्दी अर्थ-

शरीर के भरण-पोषण के लिए जितना आवश्यक है, उतने पर ही मनुष्य का अधिकार है। जो अधिक ग्रहण करता है, वह ‘चोर’ है। अतएव दण्डनीय है।

 

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