यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम् ।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति।।2।।
हिन्दी अर्थ-
शरीर के भरण-पोषण के लिए जितना आवश्यक है, उतने पर ही मनुष्य का अधिकार है। जो अधिक ग्रहण करता है, वह ‘चोर’ है। अतएव दण्डनीय है।

















