वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ड्रोन, क्रूज मिसाइलों से लेकर अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों के रूप में उभरते हवाई खतरों के बीच भारत अपनी हवाई सुरक्षा को एक अभेद्य किले की तरह मजबूत कर रहा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान देश की रक्षा में अहम भूमिका निभाने वाले रूसी एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 (S-400) की सफलता के बाद अब भारत पूरी तरह आत्मनिर्भरता की राह पर चल पड़ा है।
इसी सिलसिले में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत के अपने स्वदेशी ‘प्रोजेक्ट कुशा’ (Project Kusha) को देश की सुरक्षा के लिए एक गेम-चेंजर एसेट बताया है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित इसे विकसित कर रहा है। जानकार इस सिस्टम को भारत का अपना ‘लोकल एस-400’ कह रहे हैं, जो दुश्मन की हर चाल को हवा में ही नेस्तनाबूद करने की क्षमता रखता है। चलिए भारत के इस लेटेस्ट एयर डिफेंस सिस्टम के बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।
क्या है भारत का ‘प्रोजेक्ट कुशा’?
प्रोजेक्ट कुशा भारत का एक अत्यंत महत्वाकांक्षी, पूरी तरह से स्वदेशी और लंबी दूरी का सतह से हवा में मार करने वाला मिसाइल (SAM) डिफेंस सिस्टम है। इसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा तैयार किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान करना है जो रूस के सबसे आधुनिक एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को सीधी टक्कर दे सके और भविष्य के हवाई युद्धों में भारत को किसी अन्य देश पर निर्भर न रहना पड़े।
जानकारों के अनुसार, इस पूरे प्रोजेक्ट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन के रडार से बच निकलने वाले ‘स्टील्थ’ लड़ाकू विमानों, ड्रोन, क्रूज मिसाइलों और यहां तक कि अत्यधिक तेज गति से आने वाले हाइपरसोनिक हथियारों को भी समय रहते पहचान कर नष्ट कर सकता है। भारतीय सेना और वायुसेना में इसके शामिल होने की आधिकारिक समयसीमा साल 2028 से 2030 के बीच तय की गई है।
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प्रोजेक्ट कुशा की 3 परत वाली मारक क्षमता
प्रोजेक्ट कुशा को दुश्मन की वायुसेना और मिसाइल यूनिट्स के लिए सबसे बड़ा काल माना जा रहा है क्योंकि यह एक मल्टी-लेयर्ड मतलब बहु-स्तरीय सुरक्षा कवच प्रदान करता है। इसमें मुख्य रूप से तीन अलग-अलग रेंज की इंटरसेप्टर (हवा में मार गिराने वाली) मिसाइलें शामिल हैं।
शॉर्ट रेंज की मारक क्षमता 150 किलोमीटर है, जो दुश्मन के ड्रोन, हेलिकॉप्टर और लो-फ्लाइंग मिसाइलें को नष्ट कर देंगी। मीडियम रेंज मिसाइल 250 किलोमीटर तक क्रूज मिसाइलें और लड़ाकू विमान को नेस्तनाबूत करने में सक्षम होगी। और लॉन्ग रेंज वाली मिसाइल 400 किलोमीटर तक स्टील्थ एयरक्राफ्ट, बैलिस्टिक मिसाइलें और हाइपरसोनिक हथियार को खत्म कर देंगी।
यह तीन स्तर का सुरक्षा चक्र सुनिश्चित करता है कि यदि कोई दुश्मन मिसाइल या विमान पहली परत को पार भी कर लेता है तो दूसरी या तीसरी परत की मिसाइलें उसे हर हाल में हवा में ही राख कर देंगी।
ऑपरेशन सिंदूर में निभाई थी अहम भूमिका
हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक कार्यक्रम के दौरान इस बात का खुलासा किया कि प्रोजेक्ट कुशा ने केवल कागजों पर नहीं बल्कि वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी अपनी ताकत को साबित किया है। साल 2025 में पहलगाम में हुए एक आतंकी हमले के बाद भारत की तीनों सेनाओं (थल सेना, नौसेना और वायुसेना) ने मिलकर एक संयुक्त सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में इसका इस्तेमाल किया था।
इस ऑपरेशन का जिक्र करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा, ‘यह एक विश्व स्तरीय स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी महत्ता और उपयोगिता को पूरी तरह साबित कर दिया है। अब इसके लिए किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार द्वापर युग में गोवर्धन पर्वत ने ब्रज के पूरे क्षेत्र की रक्षा की थी, ठीक उसी तरह हमारे इस रक्षा तंत्र ने उस संकट के काल में पूरे क्षेत्र को एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान किया था।
वैश्विक उथल-पुथल के बीच आत्मनिर्भरता की जरूरत
रक्षा मंत्री ने विश्व के मौजूदा हालातों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज पूरा वर्ल्ड तनाव, बदलाव और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। कई जगहों पर गृहयुद्ध चल रहे हैं तो कई जगह सीधे तौर पर युद्ध की स्थिति बनी हुई है। पुरानी मान्यताएं टूट रही हैं और नए सैन्य गठबंधन आकार ले रहे हैं।
ऐसी अनिश्चित परिस्थितियों में भारत किसी भी विदेशी सप्लायर पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकता। हालांकि भारत रूस से अपनी प्रतिबद्धता के तहत पांचवें एस-400 सिस्टम की डिलीवरी और अतिरिक्त मिसाइलों की खरीद पर काम कर रहा है, लेकिन ‘प्रोजेक्ट कुशा’ का सफल होना भारत को रक्षा के क्षेत्र में पूरी दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता देगा। यह स्वदेशी तकनीक दुश्मन देशों (जैसे पाकिस्तान और चीन) के उन मंसूबों पर पूरी तरह पानी फेर देगी जो भारत के हवाई क्षेत्र में घुसपैठ की कोशिश करते हैं।

















