ब्रह्मोस बनी कूटनीतिक ब्रह्मास्त्र
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रक्षा क्षेत्र : ब्रह्मोस बनी कूटनीतिक ब्रह्मास्त्र

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस ने सिर्फ दुश्मन के ठिकाने नहीं ध्वस्त किए, बल्कि दुनिया की सामरिक और कूटनीतिक सोच भी बदल दी है

Written byमृदुल त्यागीमृदुल त्यागी
Jul 7, 2026, 03:57 pm IST
inभारत, विज्ञान और तकनीक

कभी-कभी एक हथियार पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक समीकरण बदल डालता है। रूस की बर्फीली हवाओं और भारत की गर्म धरती का जब मेल हुआ तो एक ऐसी मिसाइल का जन्म हुआ, जो दुश्मन के किसी भी ठिकाने को चीर डालने की ताकत रखती है। रूस की मॉस्कवा और भारत की ब्रह्मपुत्र नदियों को मिलाकर इसका नामकरण ब्रह्मोस किया गया। यह न सिर्फ दुश्मन के हर डिफेंस सिस्टम को चीर डालता है, बल्कि एशिया के शक्ति संतुलन को हमेशा के लिए बदल रहा है।

ध्वति की गति से तीन गुना तेज की गति से सतह से महज 10 मीटर की ऊंचाई पर उड़ती इस भारतीय मिसाइल ने जब पाकिस्तान के तमाम रडार और मिसाइल सुरक्षा प्रणालियों को चकमा देते हुए उसके सैन्य ठिकानों को राख में तब्दील कर डाला, तो दुनिया चौंक उठी। मनीला, हनोई और जकार्ता के दरबारों में बस एक चर्चा है, भारत से ब्रह्मोस कब मिलेगी। फिलीपींस खरीद चुका है, वियतनाम ने सौद पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इंडोनेशिया से बातचीत अंतिम चरण में है। कई और भी देश गुप-चुप भारत से ब्रह्मोस की खरीदने की जुगत में लगे हुए हैं।दरअसल, ब्रह्मोस चीन के खिलाफ सबसे मजबूत प्रतिरोधक हथियार के रूप में उभरी है। इसके अंदर वो ताकत है, जो दक्षिण चीन सागर में चीनी नौसेना की गुंडागर्दी को हमेशा के लिए खत्म कर सकती है। ब्रह्मोस सिर्फ एक हथियार के सौदे का मामला नहीं है। भारत इस मिसाइल के जरिए पूरे इंडो-पैसेफिक (हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के आपस में जुड़े हुए समुद्री क्षेत्रों का एक विशाल भू-राजनीतिक और जैव-भौगोलिक हिस्सा ) क्षेत्र में खामोशी के साथ शतरंज की ऐसी बिसात बिछा रहा है, जहां चीन की नौसेना के लिए बस मात के अलावा कुछ नहीं हैं। अपने युद्धपोतों और कृत्रिम द्वीपों के जरिए जहां चीन अपनी ताकत बढ़ा रहा था, वहां अब उसे हर पल आसमान से आती किसी चीज में ब्रह्मोस का डर नजर आने लगा है। चीन की नौसैनिक धौंस खिलाफ इस सुपरसोनिक मिसाइल ने एक आक्रामक दीवार सी खड़ी कर दी है।

ब्रह्मोस की कहानी

इस मिसाइल की कहानी शुरू होती है 1998 से, दुनिया की जंग और हथियारों की सूरत बदल चुकी थी। ऐसे में 12 फरवरी 1998 को भारत और रूस सरकार के बीच एक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए। भारतीय रक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (डीआरडीओ) और रूसी एजेंसी एन.पी.ओ. मशीनोस्ट्रोयेनिया (रूस की एक प्रमुख एयरोस्पेस और रक्षा कंपनी ) के बीच संयुक्त रूप से एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (ध्वनि की गति से तेजी से यात्रा करने वाले हथियार) विकसित करने पर सहमति बनी।

इस साझा उपक्रम में डीआरडीओ मुख्य हिस्सेदार थी। यानी स्वामित्व डीआरडीओ (भारत सरकार) का था। भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मॉस्कवा नदी के मिश्रण से नामकरण हुआ ब्रह्मोस। ये समझौता इंद्र कुमार गुजराल के समय में हुआ, लेकिन मार्च में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दूरदर्शी प्रधानमंत्री की सरकार आ गई थी। क्या 1998 में किसी ने सोचा था कि भारत के पास एक ऐसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल होगी, जिसका तोड़ दुनिया में किसी देश के पास नहीं होगा, लेकिन सपना सच हुआ। 2001 में चांदीपुर रेंज में इसका पहला सफल परीक्षण हुआ। इसके बाद लंबे परीक्षण और फिर नए-नए संस्करणों के रूप में ब्रह्मोस एक लंबी यात्रा से गुजरी है।

पाकिस्तान पर कहर

फिर वो पल आया, जिसके लिए ब्रह्मोस को तैयार किया गया था, नौ-10 मई 2025 की वो रात, ऑपरेशन सिंदूर, पाकिस्तान ने कहा था, वो भारत के हमले का जवाब देगा। पाकिस्तान कुछ करता, उससे पहले ही भारतीय वायुसेना के सुखोई 30 एमकेआई आसमान का सीना चीरते हुए, पाकिस्तान पर झपटे। इन विमानों से दागी हुई 19 ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइलें लक्ष्यों की ओर दाग दी गईं। मैक-3 की रफ्तार से समुद्र तल व जमीन से महज दस से मीटर की ऊंचाई पर उड़ते हुए इन्होंने पाकिस्तान के रडारों को चकमा दे दिया, पाकिस्तानी वायुसेना का दिल, कमांड सेंटर और खबरों के अनुसार पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का भंडार ‘नूर खान एयरबेस’ (रावलपिंडी) निशाना बना। यहां तैनात चीनी एचक्यू-9बी बैटरियां और तुर्की सहयोग से बने आधुनिक एआई-आधारित अगली पीढ़ी के मोबाइल मिशन कंट्रोल सेंटर धुआं हो गए। हैंगर उड़ गए। पाकिस्तान का ड्रोन ऑपरेशंस केंद्र भी तबाह हो गया। बताया तो यहां तक जाता है कि ब्रह्मोस ने सिर्फ एक मीटर चौड़े ‘एयर डक्ट’ से अंदर जाकर बंकर में तबाही मचाई।

भोलारी एयरबेस (कराची) पर तो ब्रह्मोस का सबसे ज्यादा कहर टूटा। यहां चार मिसाइलों ने एक साथ तबाही मचा दी। स्वीडिश अवॉक्स एयरक्राफ्ट वाला हैंगर पूरी तरह ध्वस्त हो गया। तकरीबन 300 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। यहां चीनी जेएफ-17 और अमेरिकी एफ-16 विमानों के शेल्टर को भारी क्षति पहुंची। इसके अलावा जैकबाबाद, सरगोधा, मुरीदके, रफीकी, सक्कर और स्कार्दू पर ब्रह्मोस की बिजली गिरी। रनवे उड़ गए, विमान शेल्टर चकनाचूर हो गए। ईंधन डिपो और गोला-बारूद भंडार में विस्फोट हुए। ‘मुरीदके एअरबेस’ पाकिस्तान के ड्रोन बेड़े का मुख्य केंद्र है। वहां के हैंगर और कंट्रोल सेंटर ब्रह्मोस के सटीक मार से नष्ट हो गए।

चीनी हथियार खिलौने साबित

दुनिया ने जो देखा, वह चीनी हथियारों के भ्रम का विध्वंस भी था। इन सभी एयरबेस पर पाकिस्तान के हर मौसम के दोस्त चीन की एचक्यू-9बी और एचक्यू-9पी लांग रेंज जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल ‘बैटरी’ तैनात थी, इसके अलावा चीन की एलवाई-80 नाम की सुरक्षा प्रणाली भी मोटी रकम में खरीदकर पाकिस्तान ने यहां तैनात की थी। एक और एंटी स्टेल्थ रडार (वाईएलसी-8ई), जिसका चीनी ने बहुत हौव्वा बनाया हुआ था, सजावटी साबित हुई, इसके अलावा एन-टीपीक्यू-43 ट्रैकिंग रडार भी यहां था,लेकिन ब्रह्मोस के सामने यह छिन्न-भिन्न हो गया। नूर खान और सरगोधा में तो एचक्यू9बी सिस्टम ने सिर्फ दो ब्रह्मोस को रोकने के लिए 18 इंटरसेप्टर मिसाइलें दाग डालीं। ब्रह्मोस इन्हें चकमा देते हुए हमले में कामयाब रही।

दुनिया में बजा डंका

इस एक रात ने ब्रह्मोस को हथियारों की दुनिया का नया वैश्विक हीरो बना दिया। दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञ और देश अचानक भारत के दरवाजे पर आ खड़े हुए। चीन की धौंस झेलते आ रहे आसियान देशों को समझ आ गया कि चीन की रक्षा प्रणालियों का जवाब ब्रह्मोस ही है। हथियारों के बाजार में ब्रह्मोस की धाक इस तरह जमी कि इसे रोकना चीन की रक्षा प्रणालियों के बूते से बाहर है। अब भारत की ब्रह्मोस कूटनीति दक्षिण चीन सागर में नई सामरिक दीवार बना रही है। चीन भारत के पड़ोस में सैन्य अड्डों के जरिए अरबों डॉलर खर्च करके भारत की घेराबंदी कर रहा था, भारत ने अकेले ब्रह्मोस को बेचकर चीन के लिए नई घेराबंदी तैयार कर दी है। फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देश ब्रह्मोस की खरीद के लिए उतावले हैं।

इन तीनों ही देशों का दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ गंभीर सीमा विवाद हैं। चीन की भारी नौसैनिक मौजूदगी से ये देश फिलहाल उसे जवाब देने की स्थिति में नहीं थे, लेकिन ब्रह्मोस इस बात की गारंटी है कि चीन इन्हें आंख नहीं दिखा पाएगा। फिलीपींस पहले ही भारत के साथ ब्रह्मोस को लेकर 375 मिलियन डॉलर की डील कर चुका है, उसने समुद्री किनारों पर इसकी तैनाती की तैयारी भी शुरू कर दी है।

वियतनाम ने हाल ही में इसके सौदे पर हस्ताक्षर किए हैं। जबकि इंडोनेशिया अंतिम चरण में है। चीनी नौसेना अब ब्रह्मोस के आने से डरी हुई है, क्योंकि उसके पास वही रक्षा प्रणालियां हैं, जो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कागजी साबित हुई। अगर इन तीनों देशों में से किसी ने एक भी ब्रह्मोस दागी, तो चीनी युद्धपोत उसे रोक नहीं पाएंगे, यह भारत की लुक ईस्ट नीति का जवाब है।

ये जवाब सिर्फ दक्षिण चीन सागर तक नहीं है, तुर्की-अजरबैजान-पाकिस्तान धुरी का भी जवाब ब्रह्मोस से दे रहा है। आर्मेनिया को भारी संख्या में भारतीय रक्षा प्रणालियों से लैस किया गया है। अब आर्मेनिया के बारे में भी चर्चा है कि वह ब्रह्मोस खरीदने के लिए इच्छुक है। यदि आर्मेनिया को ब्रह्मोस मिलती है, तो तुर्की और अजरबैजान, दोनों के लिए ही बड़ी चुनौती होगी। इस पूरे क्षेत्र का रक्षा संतुलन बदल जाएगा। तुर्की, पाकिस्तान, चीन से हथियार खरीदने वाले अजरबैजान को इससे बेचैनी होने लगी है। हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का विरोध करने वाले, पाकिस्तान को हथियार देने वाले तुर्की के भी सुर बदलने लगे हैं। आधुनिक दुनिया में मिसाइलें केवल युद्ध नहीं जीततीं, वे कूटनीति की दिशा भी तय करती हैं। भारत ने यह संदेश दुनिया को स्पष्ट रूप से दे दिया है।

Topics: ऑपरेशन सिंदूरSukhoi-30 MKIDRDOBrahMos Missileक्रूज मिसाइलपाञ्चजन्य विशेष
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