वाराणसी। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा भगवान श्री राम को लेकर की गई एक कथित टिप्पणी के मामले में वाराणसी की अदालत से बड़ा फैसला सामने आया है। बुधवार को अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (एमपी-एमएलए कोर्ट) यजुवेंद्र विक्रम सिंह की अदालत ने इस पूरे मामले की सुनवाई दोबारा निचली अदालत में करने का आदेश जारी कर दिया है।
याचिकाकर्ता अधिवक्ता हरिशंकर पाण्डेय ने न्यायालय के इस फैसले की जानकारी देते हुए इसे एक बड़ी कानूनी प्रगति बताया है। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब राहुल गांधी के खिलाफ दायर इस परिवाद पर निचली अदालत को नए सिरे से विचार करना होगा।
“सांसद हैं, लोक सेवक नहीं”— केंद्र की अनुमति जरूरी नहीं
इससे पहले इस मामले को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया गया था, लेकिन अब रिवीजन कोर्ट (पुनरीक्षण अदालत) ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण आदेश में दो बड़ी बातें रेखांकित की हैं:
- केंद्र की अनुमति आवश्यक नहीं: कोर्ट ने कहा है कि इस चरण पर केस दर्ज करने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति (Sanction) की कोई वैधानिक आवश्यकता नहीं है।
- लोक सेवक की श्रेणी में नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि राहुल गांधी एक सांसद (Member of Parliament) हैं, लोक सेवक (Public Servant) नहीं, इसलिए इस मामले में किसी अन्य प्रशासनिक अनुमति की भी जरूरत नहीं है।
इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने निर्देश दिया है कि निचली अदालत इस पूरे मामले को फिर से सुने और कानून के मुताबिक उचित फैसला करे।
क्या है पूरा मामला और राहुल गांधी का कथित बयान?
यह पूरा विवाद पिछले साल का है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने अप्रैल 2025 में अमेरिका के बोस्टन स्थित प्रतिष्ठित ब्राउन यूनिवर्सिटी में आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। आरोप है कि इस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भगवान श्री राम का उल्लेख करते हुए उन्हें एक ‘काल्पनिक व्यक्तित्व’ बताया था। उनके इस बयान को लेकर भारत में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और सनातन धर्म की आस्था को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाते हुए कानूनी कार्रवाई की मांग की गई थी।
मामले का अब तक का कानूनी सफरनामा (Timeline)
अधिवक्ता हरिशंकर पाण्डेय द्वारा दायर इस मामले में पिछले एक साल से कानूनी प्रक्रिया चल रही है, जिसका घटनाक्रम इस प्रकार है:
- मई 2025: राहुल गांधी के बयान के खिलाफ वाराणसी के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एमपी-एमएलए) की अदालत में पहली बार याचिका दायर की गई।
- शुरुआती झटका: मामले की सुनवाई के बाद विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने परिवाद को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि विदेशी धरती पर दिए गए बयान के कारण इसके लिए भारत सरकार से अनुमति लेकर आएं।
- 26 सितंबर 2025: इस खारिज आदेश के खिलाफ जिला जज की अदालत में एक पुनरीक्षण (रिवीजन) याचिका दाखिल की गई। जिला जज ने इस याचिका को सुनवाई के लिए एमपी-एमएलए कोर्ट में स्थानांतरित (Transfer) कर दिया था।
- 10 जून 2026 (बुधवार): एमपी-एमएलए कोर्ट ने पुराने फैसले को पलटते हुए निचली अदालत को पुनः सुनवाई का आदेश जारी किया।
वाराणसी कोर्ट के इस ताजा आदेश के बाद अब यह मामला एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में गरमा गया है। अब सभी की निगाहें निचली अदालत की अगली प्रक्रिया पर टिकी हैं कि वह इस मामले में क्या रुख अपनाती है।












