सेंधमार सीमा से बाहर
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होम विश्लेषण

बंगाल से विशेष रिपोर्ट : सेंधमार सीमा से बाहर

भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए पश्चिम बंगाल से भाग रहे हैं। भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठियों की भीड़ लगी है। वे किसी भी तरह अपने मुल्क बांग्लादेश की सीमा में प्रवेश करना चाहते हैं। सरकार बदलते ही पश्चिम बंगाल की प्रशासनिक इच्छाशक्ति ने वह कर दिखाया है, जिसकी मांग हर भारतीय कर रहा था

Written byविप्लव विकासविप्लव विकास
Jun 8, 2026, 08:25 pm IST
in विश्लेषण, पश्चिम बंगाल
भारत-बांग्लादेश सीमा पर अपनी बारी का इंतजार करते घुसपैठिए

भारत-बांग्लादेश सीमा पर अपनी बारी का इंतजार करते घुसपैठिए

इन दिनों पश्चिम बंगाल में वह हो रहा है, जिसकी प्रतीक्षा पांच दशक से की जा रही थी। बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए बांग्लादेश जाने के लिए रास्ते ढूंढ रहे हैं। 4 मई, 2026 से पहले तक ये घुसपैठिए भारत में आने के लिए अनेक तरीके अपनाते थे, दलालों को पैसे देते थे। जान जोखिम में डालकर नदी-नालों के रास्ते भारत में प्रवेश करते थे, लेकिन अब उल्टा हो रहा है। ये घुसपैठिए अपने मुल्क बांग्लादेश वापस जाने के लिए भारत सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और सीमा सुरक्षा बल से सहयोग की ‘भीख’ मांग रहे हैं। घुसपैठियों में वापस जाने की जबर्दस्त भगदड़ मची है। भागते हुए घुसपैठियों को देखकर हर वह भारतीय खुश है, जो भारत को केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, मां मानता है।

हालांकि भारत में ही कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें घुसपैठियों के बांग्लादेश वापस जाने से नींद नहीं आ रही है। ऐसे लोग झूठ बोलते रहे हैं कि भारत में कोई घुसपैठिया नहीं है। लेकिन उन्हें वे घुसपैठिए ही आईना दिखा रहे हैं, जो बांग्लादेश वापस जाने के लिए सीमा पर कतार में खड़े हैं। ऐसे लोगों को बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ करने वाली मजूफा खातून की बात अवश्य सुननी चाहिए। वह कहती है,“पश्चिम बंगाल में मेरे पास राशन कार्ड, वोटर कार्ड और आधार कार्ड, सब कुछ है। ये सभी पहले वाली सरकार ने ही बनवा कर दिए थे। मैंने तीन बार वोट भी दिया है। मुझे लंबे समय तक ‘लक्ष्मी भंडार योजना’ के तहत पैसा मिला। मेरे पास स्वास्थ्य साथी कार्ड भी था और मुझे सरकार की सभी सुविधाएं मिलती थीं। मेरी बेटी का जन्म पश्चिम बंगाल में ही हुआ था और वह सरकारी स्कूल में पढ़ती थी। मैं बिराटी-बिशरपारा में रहती थी। अब नई सरकार हमें पश्चिम बंगाल में नहीं रहने देना चाहती है। ऐसे में हमें वापस बांगलदेश जाना ही पड़ेगा। मेरा घर बांग्लादेश के खुलना जिले में है।”

घुसपैठियों की एक भीड़

मजूफा खातून उन हजारों घुसपैठियों में से एक है, जो बांग्लादेश वापस लौटने के लिए हाकिमपुर सीमा पर सामान के साथ बैठी है। इस समय उत्तर 24 परगना के स्वरूपनगर प्रखंड में स्थित हाकिमपुर सीमा पर बांग्लादेशी घुसपैठियों की भीड़ लगी है। कल तक जो सीमा भारत के भीतर ‘मौन जनसांख्यिकीय आक्रमण’ का प्रवेश द्वार बनी हुई थी, आज वही सीमा बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए ‘बाहर जाने का रास्ता’ बन चुकी है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही पूरे पश्चिम बंगाल के राजनीतिक, सामाजिक और जनसांख्यिकीय परिदृश्य में एक अभूतपूर्व भूचाल आया हुआ है। सरकार की ‘पहचानो, हटाओ, निकालो’ यानी 3-डी नीति ने उस तंत्र की रीढ़ तोड़ दी है, जिसे पिछले पांच दशक से वामपंथ, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने मिलकर सींचा था।

इस समय हाकिमपुर, घोझाडांगा, पेट्रापोल और हिली जैसे संवेदनशील सीमाई इलाकों में अजीब अफरा-तफरी का माहौल है। कंधे पर भारी-भरकम बोरिया-बिस्तर लादे, चेहरे पर पकड़े जाने का खौफ लिए और हाथों में दलालों को देने के लिए बचे-खुचे भारतीय नोट थामे सैकड़ों घुसपैठिए बांग्लादेश की सीमा में वापस घुसने की फिराक में कतारों में खड़े हैं। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में संभवतः पहला ऐसा मौका है, जब बिना किसी युद्ध के, केवल प्रशासनिक इच्छाशक्ति के बल पर घुसपैठिए अपने देश वापस लौटने के लिए जी-जान लगाए हुए हैं।

सीमा पर कड़ा पहरा

हाकिमपुर सीमा पर इस समय कड़ा पहरा है। सीमा सुरक्षा बल के जवान और स्थानीय स्वरूपनगर थाने की पुलिस संयुक्त रूप से गश्त कर रही है। लेकिन इस कड़े पहरे के बीच भी खेतों और कंटीली तारों के पास के रास्तों से बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस भागने की कोशिश कर रहे हैं। 34 वर्षीय शाहिदुल गाजी बांग्लादेश के सातखीरा जिले का रहने वाला है। वह पिछले चार साल से कोलकाता के मटियाबुर्ज इलाके में एक राजमिस्त्री के रूप में काम कर रहा था। उसके पास भारत का फर्जी आधार कार्ड और वोटर कार्ड भी था, जिसे उसने 7,000 रु. देकर बनवाया था। शाहिदुल ने अपना बैग संभालते हुए कहता है, “हुजूर, हमें लग रहा था कि जैसे पहले सरकारें बदलती थीं, वैसे ही यह भी है, लेकिन इस बार मामला अलग है। पुलिस मोहल्लों में आकर मकान मालिकों से ‘किराएदार सत्यापन फॉर्म’ भरवा रही है। ठेकेदार ने सीधे बोल दिया कि अगर तुम्हारे पास असली दस्तावेज नहीं हैं तो कल से काम पर मत आना। मैंने सुना है कि मालदा और मुर्शिदाबाद में बड़े-बड़े ‘होल्डिंग सेंटर’ बन गए हैं, जहां हम जैसे लोगों को बंद किया जा रहा है। जेल में सड़ने से अच्छा है कि मैं अपने वतन बांग्लादेश वापस लौट जाऊं। इसलिए मैं और मेरे तीन साथी दलाल को पैसे देकर वापस सीमा पार करने आए हैं।”

दलाल पार कराते थे सीमा

कोलकाता, हावड़ा जैसे शहरों में घरेलू सहायिका (मेड) का काम अधिकतर बांग्लादेशी महिलाएं करती हैं। अब सख्ती होने से लोग इन महिलाओं से काम नहीं करा रहे हैं। इसका असर इन महिला घुसपैठियों पर हुआ है और वे वापस बांग्लादेश जाने के लिए बोरिया-बिस्तर बांध चुकी हैं। उनमें एक है बांग्लादेश के खुलना जिले की रहने वाली 25 वर्षीया तक्लीमा खातून। वह हावड़ा के एक संभ्रांत इलाके में ‘मेड’ का काम करती थी। वह दो साल पहले घोझाडांगा सीमा के रास्ते अवैध रूप से भारत आई थी। उसने रोते हुए बताया, “दीदी (ममता बनर्जी) के समय हमसे कोई नहीं पूछता था कि तुम कहां से आई हो। हमारी बस्तियों में राशन कार्ड आसानी से बन जाते थे, लेकिन नई सरकार आते ही बाबू लोगों ने हमें काम से हटा दिया है। वे कहते हैं कि अगर पुलिस ने तुम्हारे चक्कर में हमें पकड़ा तो हम पर देशद्रोह का मामला दर्ज होगा। सीमा पर जो दलाल हमें भारत लाते थे, अब वे खुद छिपे हुए हैं। कोई हमें शरण देने को तैयार नहीं है। मेरे पास जो चार-पांच हजार रुपए बचे थे, वह मैंने एक दलाल को दिए हैं, ताकि वह मुझे रात के अंधेरे में हाकिमपुर के रास्ते नदी पार करवा दे।”घुसपैठ का धंधा कितना संगठित है, इसे जानकर आपको आश्चर्य होगा कि भारत के साथ किस तरह का छल हो रहा है। घुसपैठिया 28 वर्षीय मोहम्मद अली शेख कहता है, “हम बांग्लादेश और भारत के एजेंटों की मदद से पश्चिम बंगाल आते थे। इसके लिए हमें सिर्फ 8,000 से 10,000 रुपए देने होते थे। वे हमें सीमा पार कराकर सीधे सियालदह या हावड़ा की लोकल ट्रेन में बैठा देते थे। भारत में घुसते ही हमारे फोटो लिए जाते थे और कुछ दिनों के भीतर ही एक राजनीतिक दल के स्थानीय नेता के जरिए हमारा नाम ‘वोटर लिस्ट’ में जुड़वा दिया जाता था। लेकिन अब सीमा पर बीएसएफ बहुत सख्त है और गांवों के लोग (हिंदू आबादी) भी सजग हो गए हैं। वे तुरंत पुलिस को फोन कर देते हैं।”

मजूफा खातून, शाहिदुल गाजी, तक्लीमा खातून, मोहम्मद अली शेख जैसे हजारों घुसपैठियों का दर्द एक ही है कि भाजपा की नई सरकार उन्हें पश्चिम बंगाल में नहीं रहने दे रही है। इसलिए वे अपने वतन बांग्लादेश वापस जा रहे हैं। वहीं सरकार का कहना है कि घुसपैठियों के विरुद्ध हो रही कार्रवाई देश के संविधान और संप्रभुता की रक्षा के लिए है। यही कारण है कि राज्य सरकार ने वापसी की कागजी कार्रवाई तक घुसपैठियों को अस्थाई रूप से रखने के लिए मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और नदिया जैसे सीमावर्ती जिलों में युद्ध स्तर पर आधुनिक सुविधायुक्त ‘होल्डिंग सेंटर्स’ का निर्माण किया है। इस प्रशासनिक सख्ती का ही परिणाम है कि आज सीमावर्ती जिलों के स्थानीय प्रशासन ने राशन कार्डों के डिजिटलीकरण और आधार कार्डों के सत्यापन का एक महा-अभियान शुरू किया है, जिससे फर्जी पहचान पत्र धारकों में हड़कंप मच गया है।

घुसपैठ का काला पन्ना

पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ कोई रातों-रात नहीं हुई है। यह पांच दशक तक चली एक सुविचारित, योजनाबद्ध और राष्ट्र-विरोधी राजनीतिक षड्यंत्र का दुष्परिणाम है। घुसपैठ के जरिए पश्चिम बंगाल और शेष भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव का महाषड्यंत्र रचा गया है। इस षड्यंत्र में गजवा-ए-हिंद का सपना देखने वाले कट्टरवादियों के साथ भारत के वे सेकुलर हैं, जो वोट बैंक के लिए मानवाधिकार की आड़ में इनके लिए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच जाते हैं। इस षड्यंत्र ने आज पश्चिम बंगाल के कई जिलों को मुस्लिम-बहुल बना दिया है। इतना ही नहीं, ये घुसपैठिए पूरे भारत में बस चुके हैं। अब जब पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार आई तो इनमें डर पैदा हुआ है। और यही डर उन्हें अपने वतन बांग्लादेश भागने के लिए मजबूर कर रहा है।

घुसपैठ को मिला संस्थागत रूप

पश्चिम बंगाल में घुसपैठ को संस्थागत रूप वाममोर्चा सरकार के दौरान (1977-2011) मिला। 1971 में बांग्लादेश की मुक्ति के समय लाखों शरणार्थी भारत आए। भारत की तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने मानवीय आधार पर उन्हें शरण दी। लेकिन 1977 में जब पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु के नेतृत्व में वामपंथी सरकार बनी, तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने इन शरणार्थियों और उसके बाद लगातार आने वाले घुसपैठियों को अपने ‘स्थायी वोट बैंक’ में बदलने की खतरनाक साजिश रची। वामपंथियों ने गांवों की स्थानीय समितियों को यह काम सौंपा कि सीमा पार से आने वाले घुसपैठियों को कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता दी जाए और उन्हें स्थानीय स्तर पर जमीन उपलब्ध करवाई जाए। इससे मालदा, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर जैसे जिलों में हिंदू आबादी धीरे-धीरे अल्पसंख्यक होने लगी। वामपंथियों के शासनकाल में ही सीमा पर ‘दलाल संस्कृति’ पनपी।

कांग्रेस का मौन समर्थन

वामपंथियों के इस राष्ट्र—विरोधी काम को कांग्रेस का समर्थन मिला। केंद्र में लंबे समय तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी ने असम और पश्चिम बंगाल में घुसपैठ को हमेशा नजरअंदाज किया। कई रिपोर्ट में स्पष्ट माना गया है कि पश्चिम बंगाल में सीमाएं खुली हैं। इसके बावजूद केंद्र की कांग्रेस सरकारों ने ‘वोट बैंक’ के खिसकने के डर से कभी बीएसएफ को खुली छूट नहीं दी। पश्चिम बंगाल में मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिले लंबे समय तक कांग्रेस के गढ़ रहे, और इसका मुख्य कारण यह था कि स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने घुसपैठियों को ‘सुरक्षा कवच’ प्रदान किया था।

तुष्टीकरण की पराकाष्ठा

2011 में जब ममता बनर्जी ‘मां, माटी, मानुष’ का नारा देकर सत्ता में आईं, तो उन्होंने वामपंथियों के वोट बैंक पर कब्जा करने के लिए तुष्टीकरण की सभी सीमाएं लांघ दीं। ममता बनर्जी के कार्यकाल में घुसपैठियों को न केवल शरण मिली, बल्कि उन्हें ‘वीआईपी’ का दर्जा दिया गया। दक्षिण 24 परगना के कैनिंग, भांगड़ और मटियाबुर्ज जैसे इलाके फर्जी आधार कार्ड, पैन कार्ड और पासपोर्ट बनाने के सबसे बड़े केंद्र बन गए। मात्र 500 से 1000 रुपए में कोई भी बांग्लादेशी नागरिक ‘भारतीय’ बन जाता था। ममता सरकार ने न केवल बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों, बल्कि म्यांमार से आए अवैध रोहिंग्या मुसलमानों को भी ‘शरणार्थी’ बताकर राज्य के विभिन्न हिस्सों में बसाया। संदेशखाली की घटना इसका सबसे बड़ा उदाहरण थी, जहां शेख शाहजहां जैसे अपराधियों ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर एक समानांतर साम्राज्य खड़ा कर रखा था। सीमा पार से पशु तस्करी, मानव तस्करी और जाली नोटों का कारोबार इसी राजनीतिक संरक्षण में फला-फूला।

खुश हैं बंगाल के हिंदू

भाजपा की नई सरकार ने घुसपैठियों को पश्चिम बंगाल से बाहर करने के लिए जबर्दस्त इच्छाशक्ति दिखाई है। इस अभूतपूर्व प्रशासनिक परिवर्तन का स्वागत पश्चिम बंगाल के प्रबुद्ध वर्ग, राजनीतिक विश्लेषक और सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता कर रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता विराट मालाकार कहते हैं, ”पश्चिम बंगाल पिछले पचास वर्ष से एक जनसांख्यिकीय ‘टाइम बम’ पर बैठा था। सीमावर्ती जिलों में हिंदुओं की आबादी का घटना और घुसपैठियों की मदद से मुसलमानों की आबादी का अप्रत्याशित रूप से बढ़ना कोई प्राकृतिक विकास नहीं था, बल्कि यह एक सुनियोजित ‘लैंड जिहाद’ था। वामपंथियों ने इसकी नींव रखी और टीएमसी ने इसे अपने चरम पर पहुंचाया। नई सरकार द्वारा की जा रही कार्रवाई राज्य की बंगाली संस्कृति और भारत की संप्रभुता को बचाने के लिए अंतिम अवसर की तरह है।”

मानवाधिकारियों का बदला सुर

यद्यपि मानवाधिकार संगठन अक्सर इस तरह की कार्रवाइयों का विरोध करते हैं, लेकिन वर्तमान जमीनी हकीकत को देखते हुए उनकी राय में भी बदलाव आया है। मानवीय आधार पर शरणार्थियों के अधिकारों की बात करने वाले भी मान रहे हैं कि बिना किसी नियम-कानून के लाखों लोगों का एक सीमित संसाधन वाले राज्य में घुस आना स्थानीय अर्थव्यवस्था को तबाह कर देता है। कोलकाता और आसपास के जिलों में दिहाड़ी मजदूरी की दरें गिर गई थीं, क्योंकि बांग्लादेशी बेहद कम पैसों में काम करते थे। इससे स्थानीय श्रमिकों का रोजगार छिन गया था। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रक्रिया पारदर्शी हो, लेकिन घुसपैठ पर रोक लगाना देश का संप्रभु अधिकार है। सीमावर्ती सुरक्षा संगठन ‘सीमान्त चेतना मंच’ के एक कार्यकर्ता ने कहा, “हम लोग वर्षों से चिल्ला रहे थे कि हाकिमपुर और पेट्रापोल के रास्ते रोजाना हजारों लोग आ रहे हैं।

पूर्ववर्ती सरकार के समय राज्य पुलिस बीएसएफ के काम में रोड़े अटकाती थी। जब बीएसएफ किसी घुसपैठिए को पकड़ती थी, तो स्थानीय टीएमसी नेता पुलिस पर दबाव बनाकर उसे छुड़ा लेते थे या उसे स्थानीय नागरिक साबित कर देते थे। आज जब प्रशासन का सहयोग बीएसएफ को मिल रहा है, तो नतीजे सामने हैं। जो लोग स्वेच्छा से भाग रहे हैं, वे जानते हैं कि उनके पास कोई वैध आधार नहीं है। यह भारत माता की सुरक्षा के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है।” उन्होंने कहा कि सरकार बदलते ही राज्य पुलिस और बीएसएफ के बीच सहयोग और समन्वय बढ़ गया है। पहले यह सहयोग इसलिए नहीं मिल पाता था कि राज्य सरकार ऐसा नहीं चाहती थी। ममता सरकार ने केंद्र सरकार के उस कदम का भी विरोध किया था, जिसमें बीएसएफ के क्षेत्राधिकार को 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 50 किलोमीटर कर दिया था।

बदला हुआ जमीनी परिदृश्य

आज स्थिति पूरी तरह उलट है। पहले जब बीएसएफ घुसपैठियों को पकड़कर स्थानीय पुलिस को सौंपती थी, तो वे कुछ ही दिनों बाद जमानत पर बाहर आ जाते थे और दोबारा उसी चौकड़ी में शामिल हो जाते थे। लेकिन अब राज्य पुलिस ने सीमावर्ती थानों में ‘स्पेशल इमिग्रेशन डेस्क’ बनाई है। अब जैसे ही कोई संदिग्ध पकड़ा जाता है, उसकी पूरी कुंडली खंगाली जाती है। मकान मालिकों को सख्त हिदायत है कि बिना पुलिस जांच के किसी भी अज्ञात व्यक्ति को किराए पर कमरा न दें। होल्डिंग सेंटर्स बनने से बीएसएफ का काम आसान हो गया है, क्योंकि अब घुसपैठियों को अस्थाई रूप से रखने के लिए एक कानूनी और सुरक्षित स्थान मौजूद है।

अवैध विदेशियों पर ‘ममता’

घुसपैठियों के वकील

घुसपैठियों को भारत में बसाने के लिए वकील प्रशांत भूषण और उनकी टीम ने पूरा जोर लगाया था। इस टीम ने सर्वोच्च न्यायालय में बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए कई याचिकाएं दायर की हैं। इनमें से कुछ का निपटारा हो गया है, कुछ अभी भी लंबित हैं। इन याचिकाओं में मानवीय आधार पर घुसपैठियों को भारत में रहने देने और उन्हें एक नागरिक की तरह सुविधाएं देने की मांग की गई है। वहीं सरकार का कहना है कि भारत के संसाधनों पर केवल और केवल यहां के नागरिकों का अधिकार है। और इसलिए घुसपैठियों को वापस जाना ही होगा।

दोबारा घुसपैठ पर पूर्ण विराम

कई मीडिया रिपोर्ट और स्थानीय लोगो के अनुसार सीमा पर प्रशासन ने एक और आधुनिक कदम उठाया है। जो भी बांग्लादेशी नागरिक वापस भागते हुए पकड़ा जा रहा है या स्वयं को समर्पित कर रहा है, उसका बायोमेट्रिक डेटा (फिंगरप्रिंट और आईरिस स्कैन) दर्ज किया जा रहा है। इसका लाभ यह होगा कि यदि ये लोग भविष्य में दोबारा किसी अन्य सीमा (जैसे असम या त्रिपुरा) से भारत में घुसने की कोशिश करेंगे, तो केंद्रीय डेटाबेस तुरंत उनके अवैध होने की पुष्टि कर देगा।

नई सुबह की ओर बढ़ता बंगाल

पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशियों के पलायन का सीधा सकारात्मक असर राज्य की अर्थव्यवस्था और कानून-व्यवस्था पर दिखने लगा है। रोजगार के अवसरों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिलने लगी है। कोलकाता, हावड़ा, हुगली और उत्तर 24 परगना के निर्माण क्षेत्रों, कपड़ा मिलों और चमड़ा उद्योग में काम करने वाले स्थानीय श्रमिकों को अब उचित मजदूरी मिलने लगी है। पहले जो काम बांग्लादेशी घुसपैठिए कौड़ियों के भाव कर देते थे, अब वहां स्थानीय युवाओं को अच्छा पैसा मिल रहा है।

अपराध दर में भारी गिरावट

खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में होने वाले अधिकांश जघन्य अपराधों-जैसे लक्षित हत्या, बम बनाना, हथियारों की तस्करी और महिलाओं के साथ हिंसा-में सीमा पार से आए अपराधियों का हाथ होता था, जो अपराध करके वापस बांग्लादेश भाग जाते थे। नई सरकार की ‘नाकाबंदी’ के बाद से सीमावर्ती क्षेत्रों में इस तरह के अपराधों की संख्या में भारी कमी आई है।

वापस जा रहे घुसपैठिए

करोड़ों रुपए की बचत

फर्जी राशन कार्डों के निरस्तीकरण से राज्य सरकार के खाद्य विभाग को करोड़ों रुपए की बचत हो रही है। वह अनाज जो पहले तस्करों के जरिए बांग्लादेश पहुंच जाता था, घुसपैठियों के पेट में जाता था, अब राज्य के गरीब नागरिकों को सुचारू रूप से मिल रहा है।

पश्चिम बंगाल का पुनर्जन्म

हाकिमपुर सीमा से लेकर सुंदरवन के मुहानों तक जो दृश्य आज दिखाई दे रहे हैं, वे इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि यदि राजनीतिक नेतृत्व में इच्छाशक्ति हो, तो दशकों पुरानी और असाध्य लग रही समस्याओं को भी चुटकियों में हल किया जा सकता है। वामपंथ, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने जिस ‘घुसपैठिया तंत्र’ को पश्चिम बंगाल की नियति मान लिया था, आज राष्ट्रबोध की नई बयार ने उस तंत्र को मरुस्थल के रेत के महल की तरह ढहा दिया है। हाकिमपुर सीमा पर भागते हुए बांग्लादेशी इस बात का प्रतीक हैं कि भारत अब किसी भी ‘मौन आक्रमण’ को सहने के लिए तैयार नहीं है। यह डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों के उस पश्चिम बंगाल का पुनर्जन्म है, जो भारत की शक्ति बनकर देश की सुरक्षा और संस्कृति का पहरेदार बनेगा, न कि घुसपैठियों और जिहादियों की सुरक्षित शरणस्थली। ‘3-डी’ नीति का यह चक्रव्यूह घुसपैठियों के पूर्ण निष्कासन तक रुकने वाला नहीं है, और यही नए पश्चिम बंगाल का नया संकल्प है। इस संकल्प की जरूरत अन्य राज्यों को भी है।

‘केंद्र शासित प्रदेश’ की मांग

साहिबगंज जिले के उधवा प्रखंड का यह मुस्लिम होटल वहां की बदलती जनसांख्यिकीय की ओर इशारा कर रहा है

पश्चिम बंगाल की सीमा से सटा है झारखंड का संथाल परगना प्रमंडल। इस प्रमंडल में छह जिले हैं— दुमका, साहिबगंज, गोड्डा, देवघर, पाकुड़ और जामताड़ा। पहले इस प्रमंडल में केवल दुमका जिला हुआ करता था। सरकारों की तुष्टीकरण नीति ने इस प्रमंडल को बांग्लादेशी घुसपैठियों का अड्डा बना दिया है। सिद्धो-कान्हू और बाबा तिलका मांझी के बलिदान के लिए जाना जाने वाला संथाल परगना क्षेत्र आज एक गंभीर जनसांख्यिकीय और सुरक्षात्मक संकट के मुहाने पर खड़ा है। बांग्लादेशी घुसपैठियों ने इस क्षेत्र को अशांत कर दिया है। सरकार चलाने वाले नेताओं को छोड़कर हर व्यक्ति देख रहा है कि लव जिहाद, जमीन जिहाद, हत्या, चोरी, पशु तस्करी जैसी घटनाओं के पीछे बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं। वर्तमान राज्य सरकार मानती ही नहीं है कि झारखंड में कोई घुसपैठिया है। उसे लगता है ऐसा कहने से उसका वोट बैंक नाराज हो जाएगा और उसकी कीमत उसे चुनाव में चुकानी पड़ेगी। सरकार की इस नीति का दुष्प्रभाव वहां के स्थानीय निवासियों पर पड़ रहा है, वे अल्पसंख्यक हो रहे हैं।

दूसरी ओर पूरे संथाल परगना में मुसलमानों की संख्या में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। प्रशासनिक रिपोर्टों के अनुसार पिछले कुछ दशकों में साहिबगंज, पाकुड़ और आसपास के जिलों में जनजातियों की आबादी में अप्रत्याशित गिरावट आई है। घुसपैठियों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर स्थानीय लोगों की पैतृक जमीन पर कब्जा करना शुरू कर दिया है। संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) के कड़े नियमों के बावजूद पिछले दरवाजे से जमीन हड़पी जा रही है। एक सोची-समझी रणनीति के तहत जनजाति बहू-बेटियों को निशाना बनाया जा रहा है। उनसे विवाह रचाकर न केवल उनकी जमीन पर कानूनी हक जमाया जाता है, बल्कि पंचायत चुनावों में उन्हें मोहरा बनाकर स्थानीय सत्ता और राजनीतिक प्रभाव पर भी कब्जा किया जा रहा है। इसे स्थानीय लोग ‘चुनाव जिहाद’ का नाम दे रहे हैं, जिसके कारण मूल निवासियों का राजनीतिक अस्तित्व खतरे में है।

‘हिंदू धर्म रक्षा मंच’ और क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि राज्य सरकार की तुष्टीकरण की राजनीति और स्थानीय प्रशासनिक शिथिलता के कारण स्थिति अब नियंत्रण से बाहर हो चुकी है। ऐसे में केवल ‘केंद्र शासित प्रदेश’ का गठन ही इस क्षेत्र को बचा सकता है। यही कारण है कि हाल ही में ‘हिंदू धर्म रक्षा मंच’ के केंद्रीय अध्यक्ष संत कुमार घोष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा है, जिसमें उन्होंने मांग की है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर संथाल परगना और गौड़ बंगा के सीमावर्ती जिलों को मिलाकर एक नया केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए।

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विप्लव विकास
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विप्लव विकास लेखक और स्तंभकार हैं। समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और भारतीय विमर्श के मुद्दों पर स्पष्ट व तर्कसंगत लेखन के लिए जाने जाते हैं। अपने लेखों के माध्यम से जटिल विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत कर पाठकों के बीच सार्थक संवाद को बढ़ावा देते हैं। [Read more]
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