क्या जनजातीय समाज के मुद्दों को राजनीति अपनी सुविधा के अनुसार चुनती है? क्या जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के साथ-साथ सांस्कृतिक अस्मिता, आस्था और परंपराओं की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है? इस विशेष परख में चर्चा जनजातीय पहचान, कन्वर्जन, डीलिस्टिंग की मांग, संवैधानिक संरक्षण, ग्रेट निकोबार परियोजना और राजनीतिक दोहरेपन पर। आखिर जनजातीय समाज के वास्तविक हितों की बात कौन कर रहा है और कौन केवल राजनीतिक विमर्श गढ़ रहा है? संपादक हितेश शंकर ने परख की है, इन तमाम सवालों की. पूरा विश्लेषण देखिए और खुद ही समझिए कि जनजातीय समाज की असल मांग क्या है?, कन्वर्जन इसमें कितना बड़ा रोड़ा?
















