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विशेष रिपोर्ट : बोलने से पहले इतिहास पढ़ें ‘राहुल’

कांग्रेस अपनी नीतियों के कारण कभी राष्ट्रीय सरकारों से जुड़ नहीं पाई। परिणामस्वरूप देश की सबसे पुरानी पार्टी आज हाशिए पर पहुंच गई है

Written byकृष्णानंद सागरकृष्णानंद सागर
Jun 4, 2026, 01:16 pm IST
inभारत, विश्लेषण
राहुल गांधी

राहुल गांधी

संसदीय लोकतंत्र में शब्दों की मर्यादा होती है, लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के शब्दों में ऐसा दिखाई नहीं देता। वह संसदीय मर्यादा भूल चुके हैं। पिछले दिनों उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘गद्दार’ कहा। वास्तव में, ‘गद्दार’ कौन है, इसे इतिहास के आईने में देखना दिलचस्प होगा।

कांग्रेस का इंग्लैंड प्रेम

स्वतंत्रता आंदोलन में देश को एकजुट करने के महात्मा गांधी के योगदान को झुठलाया नहीं जा सकता, लेकिन कांग्रेस के नेता के तौर पर गांधी जी को लेकर इतिहासकारों की राय कुछ अलग नजर आती है। डॉ. भोगराजू पट्टाभि सीतारमैया 1948-49 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। उन्होंने दो खंडों में ‘कांग्रेस का इतिहास’ नाम की पुस्तक लिखी है। पुस्तक के खंड-2, पृष्ठ 154-155 में वह लिखते हैं कि एक सितंबर 1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई, 4 सितंबर को वायसराय लिनलिथगो ने तार भेजकर गांधीजी को शिमला बुलवा लिया।

शिमला में वायसराय से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, “मैंने वायसराय को सूचित किया कि इंसानियत की दृष्टि से मेरी सहानुभूति इंग्लैंड और फ्रांस के प्रति है। वह लंदन, जिसे अब तक अभेद्य माना जाता है, उसका विनाश होने की कल्पना करते ही मेरा रोम-रोम कांप उठता है। मैं उनसे बातचीत करते हुए अपनी आंखों के आगे पार्लियामेंट भवन और वेस्टमिंस्टर एबे के विनाश का दृश्य देखने लगा। मेरा धीरज जाता रहा।”

अपनी पुस्तक में उन्होंने यह भी लिखा, ”गांधीजी यहीं नहीं रुके, बल्कि उन्होंने शिमला से वापसी पर वर्धा में ही कांग्रेस कार्यसमिति की गुप्त बैठक बुलाई। यह बैठक 9 से 15 सितंबर 1939 तक चली। वायसराय से जो उनकी बातचीत हुई, वह उन्होंने बैठक में सबको बताई। उन्होंने कहा, “अभी मैं भारत की स्वाधीनता की बात नहीं सोच रहा हूं। वह स्वाधीनता आएगी, परंतु यदि इंग्लैंड व फ्रांस का विनाश हो गया तो (भारत की) स्वाधीनता का क्या मूल्य होगा? इस मुसीबत में कांग्रेसजन व बाकी सब जिम्मेदार हिन्दुस्थानियों को निजी व सामूहिक तौर पर फैसला करना है कि इस भयानक मुसीबत की घड़ी में हिन्दुस्थान को क्या करना है।”

कितना उचित था यूरोप का साथ देना

एक अन्य इतिहासकार बलराम नंदा ने ‘महात्मा गांधी : एक जीवन’ नाम की किताब लिखी है। पुस्तक के पृष्ठ संख्या 64 में वह लिखते हैं, ”गांधीजी साफ-साफ कह रहे हैं कि हमें इस समय भारतीय स्वाधीनता की बात करने के बजाय भयानक मुसीबत में फंसे इंग्लैंड और फ्रांस की सुरक्षा के बारे में सोचना चाहिए। सप्ताह भर कार्यसमिति ने इस पर खूब बौद्धिक शीर्षासन करके 14 सितंबर को एक घोषणा-पत्र जारी किया।” 14 सितंबर 1939 के प्रस्ताव द्वारा कांग्रेस कार्यसमिति ने नाजी आक्रमणकारियों के प्रतिरोध में लगे (इंग्लैंड आदि) राष्ट्रों से सहानुभूति व्यक्त करते हुए नाजीवाद के खिलाफ लड़े जा रहे युद्ध में अपना सहयोग देने की तत्परता प्रदर्शित की।

गांधी जी से कांग्रेस की दूरी

महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा, आत्मनिर्भरता, सामाजिक समानता और स्वदेशी के सिद्धांतों को दिया और उसके माध्यम से भारत के पुनर्जागरण की आधारशिला रखी। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान चरखे के रूप में अमोघ अस्त्र दिया। यह चरखा स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक माना गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान चरखा और खादी देश के सांस्कृतिक प्रतीक बन गए थे। इससे शहर, कस्बे और गांव की आम जनता तो जुड़ी, लेकिन कांग्रेस अपनी ही नीतियों और विचारों के चलते कभी इन राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़ नहीं पाई।

फिलहाल तो गांधीजी और गांधीवाद से कांग्रेस बहुत दूर खड़ी नजर आती है। चाहे वह गांधी जी की चरखे की बात हो या स्वदेशी जागरण, शिक्षा नीति, उद्योग नीति हो या जन-स्वास्थ्य के बारे में उनके विचार हों। यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद गांधीजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भंग करने के पक्षधर थे। गांधीजी के प्रति कांग्रेस की उदासीनता आज भी स्पष्ट दिखाई देती है। वास्तव में, जिन चीजों या विचारों से भारत या भारतीयता की अस्मिता जुड़ती है, कांग्रेस का रवैया उन मूल्यों से द्रोह करने वाला ही नजर आता है।

व्यक्ति के रूप में गांधी जी की राष्ट्र से जुड़ी जो छवि है वह कांग्रेस के नेता के तौर पर ब्रिटिश शासन के पक्ष में क्यों झुकी दिखती है इसका उत्तर गांधीजी के व्यक्तित्व से ज्यादा कांग्रेस के निर्माण के उद्देश्य और रीति-नीति से जुड़ा है

डॉक्टरजी की अनूठी पहल

द्वितीय विश्वयुद्ध के इस परिप्रेक्ष्य में एक ओर अंग्रेजों के प्रति कांग्रेस का प्रेम जगजाहिर हुआ, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने इस युद्ध को देश को स्वतंत्र कराने के लिए एक स्वर्णिम अवसर माना। उन्होंने इसका लाभ उठाने के लिए संघ कार्य को अति तीव्र गति से बढ़ाने का प्रयास किया। संघ के आरंभ से ही वे स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत रूप से प्रतिज्ञा करवाते आ रहे थे कि मैं हिंदू राष्ट्र को स्वतंत्र कराने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूं। वह समय अब निकट आ रहा है।

उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध देखा था। वह चार वर्ष तक चला था। उनका अनुमान था कि द्वितीय विश्वयुद्ध लगभग 4 वर्ष तो चलेगा ही। तीन वर्ष तक बहुत सारी अंग्रेजी सेना युद्धाग्नि में भस्म हो चुकी होगी और कुछ ही शेष बचेगी। उस समय यदि हम अपनी पूर्ण शक्ति से ब्रिटिश सत्ता पर कुठाराघात करेंगे तो वह निश्चित रूप से ढह जाएगी। देश स्वतंत्र हो जाएगा। इस दृष्टि से उन्होंने 1940 में संघ कार्यकर्ताओं को संघ-कार्य की वृद्धि का लक्ष्य दिया कि तीन वर्ष के अंदर-अंदर नगरों में, गांवों में 1 प्रतिशत गणवेशधारी स्वयंसेवक होने चाहिए। उस लक्ष्य से स्पष्ट है कि उनके मस्तिष्क में 1943 के आस-पास एक साथ सारे देश में विद्रोह खड़ा करके ब्रिटिश सत्ता को जड़-मूल से ध्वस्त कर देने की योजना थी।

डॉ. हेडगेवार के प्रयासों और कांग्रेस के इन संवादों से यह साफ अंतर दिख रहा है कि आखिर देश में गद्दार कौन? देश की स्वतंत्रता को त्याग कर ब्रिटिश सत्ता का साथ देने वाली कांग्रेस या ब्रिटिश सत्ता को धूल-धूसरित कर देश को स्वतंत्र कराने का संकल्प लेने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

Topics: नेता प्रतिपक्षRSSभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसभारत छोड़ो आंदोलनDr K B Hedgewarसंसदीय मर्यादावायसराय लिनलिथगोराहुल गांधीडॉ. पट्टाभि सीतारमैयामहात्मा गांधीबलराम नंदाद्वितीय विश्वयुद्धनाजीवाद और फासीवादस्वतंत्रता संग्रामपाञ्चजन्य विशेष
कृष्णानंद सागर
कृष्णानंद सागर
प्रख्यात लेखक। [Read more]
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