मलप्पुरम (केरल) । केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) ने मालाबार देवस्वम बोर्ड (Malabar Devaswom Board) को एक कड़ा निर्देश देते हुए अंगड़ीपुरम स्थित प्रसिद्ध तिरुमांधामकुन्नू मंदिर (Thirumandhamkunnu Temple) का प्रशासन उसके पारंपरिक ट्रस्टियों को वापस सौंपने का आदेश दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बोर्ड ने बिना किसी उचित कारण के मंदिर को अपने नियंत्रण में ले लिया था। गौरतलब है कि यह मंदिर पिछले कई वर्षों से सीपीएम (CPM) प्रबंधित मालाबार देवस्वम बोर्ड के नियंत्रण में था।
कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति अवैध: हाईकोर्ट
अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि मालाबार देवस्वम बोर्ड द्वारा मंदिर में ‘कार्यकारी अधिकारी’ (Executive Officer) की नियुक्ति और उसके बाद की गई सभी प्रशासनिक कार्रवाइयां पूरी तरह से अवैध थीं।
अदालत के प्रमुख निर्देश:
- फैसले की तारीख (26 मई) से एक महीने के भीतर एक नया वंशानुगत ट्रस्टी (Hereditary Trustee) नियुक्त किया जाना चाहिए।
- नई नियुक्ति के बाद, वर्तमान कार्यकारी अधिकारी को मंदिर का पूरा प्रशासन नए ट्रस्टी को सौंपना होगा।
- एक नई प्रबंधन समिति (Managing Committee) गठित करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है।
यह ऐतिहासिक आदेश जस्टिस वी. राजा विजयराघवन और जस्टिस के.वी. जयकुमार की खंडपीठ ने जारी किया है।
विवादों का केंद्र रहा है तिरुमांधामकुन्नू मंदिर
यह मंदिर हाल के वर्षों में कई बड़े विवादों के कारण सुर्खियों में रहा था। देवस्वम बोर्ड के नियंत्रण के दौरान कई ऐसे फैसले लिए गए, जिन पर हिंदू संगठनों और श्रद्धालुओं ने कड़ी आपत्ति जताई थी।
प्रमुख विवाद-
मंदिर की संरचनाओं को मस्जिदों की तरह हरे रंग (Green shade) में रंग दिया गया था। इसके अलावा, तिरुमांधामकुन्नू ‘पूरम उत्सव समिति’ में मुसलमानों को शामिल करने को लेकर भी भारी विरोध हुआ था। सबसे गंभीर मामला तब सामने आया जब गैर-हिंदुओं ने मंदिर के गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) में प्रवेश कर हमला किया था।
पारंपरिक अधिकारों का हुआ हनन
कोर्ट ने टिप्पणी की कि कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति ने वल्लुवनाड स्वरूपम (Valluvanad Swaroopam)—जो मंदिर के वंशानुगत ट्रस्टी हैं—के पारंपरिक अधिकारों की अनदेखी की है।
- कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करने का प्राथमिक अधिकार ट्रस्टी के पास ही होता है।
- देवस्वम अधिकारी केवल उन असाधारण परिस्थितियों में ही हस्तक्षेप कर सकते हैं, जब ट्रस्टी अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहता है।
अदालत ने यह भी माना कि 2013 में ‘अस्थायी व्यवस्था’ के रूप में नियुक्त किए गए कार्यकारी अधिकारी को 13 वर्षों तक काम करने की अनुमति देना सीधे तौर पर वंशानुगत ट्रस्टी के प्रशासनिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है।
फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि नई प्रबंधन समिति को मंदिर के देवता और भक्तों के हितों की रक्षा करते हुए पारंपरिक ट्रस्टी परिवारों के प्रमुख सदस्यों की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
अवैध नियुक्तियों वाली याचिकाएं खारिज
इस मुख्य मामले के साथ-साथ, अदालत ने मंदिर में कर्मचारी नियुक्तियों, सेवाओं के नियमितीकरण (Regularization) और बर्खास्तगी से संबंधित कई अन्य याचिकाओं पर भी विचार किया। कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए 29 व्यक्तियों द्वारा दायर उन याचिकाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिनकी नियुक्तियां अवैध और नियम विरुद्ध पाई गई थीं।

















