जब कोई बच्ची छत पर बैठकर तारों को निहारते हुए अंतरिक्ष के सपने देखती है और आगे चलकर उन्हीं सपनों को हकीकत में बदल देती है, तो उसकी कहानी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन जाती है। भारत की प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक ऋतु करिधल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने अपनी प्रतिभा, मेहनत और दृढ़ संकल्प के बल पर न केवल अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में पहचान बनाई, बल्कि देश को चंद्रमा और मंगल तक पहुंचाने वाले महत्वपूर्ण मिशनों में भी अहम भूमिका निभाई।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 13 अप्रैल 1975 को जन्मी ऋतु करिधल बचपन से ही मेधावी की छात्रा रही हैं। विज्ञान और अंतरिक्ष के प्रति उनकी गहरी रुचि थी। स्कूल के दिनों में वह इसरो और नासा से जुड़ी खबरें पढ़ती थीं और उन्हें सहेजकर अपने पास रखती थीं। खाली समय में घंटों अंतरिक्ष से संबंधित पुस्तकें पढ़ना उनका पसंदीदा काम था। गणित उनका प्रिय विषय था और वे गणित पर कविताएं तक लिखती थीं। यही जिज्ञासा और लगन आगे चलकर उनके करियर की मजबूत नींव बनी।
ऋतु ने लखनऊ विश्वविद्यालय से भौतिकी में एमएससी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 1997 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में अपने करियर की शुरुआत की।
मंगलयान, चंद्रयान मिशन में अहम जिम्मेदारियां निभाईं
इसरो की वरिष्ठ वैज्ञानिक ऋतु करिधल का नाम भारत के सबसे महत्वपूर्ण अंतरिक्ष मिशनों से जुड़ा हुआ है। वह मंगलयान मिशन की उप संचालन निदेशक रहीं और इस मिशन की सफलता में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके अलावा उन्होंने चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 जैसे ऐतिहासिक मिशन में भी अहम जिम्मेदारियां निभाईं। चंद्रयान-2 मिशन की कमान संभालने पर उनके नेतृत्व की काफी सराहना हुई। उनकी कार्यकुशलता और अनुभव को देखते हुए इसरो ने चंद्रयान-3 मिशन में भी उन्हें बड़ी जिम्मेदारी सौंपी।
कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित
उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। वर्ष 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने उन्हें इसरो यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड प्रदान किया। इसके अलावा उन्हें मार्स ऑर्बिटर मिशन के लिए इसरो टीम पुरस्कार, एएसआई टीम पुरस्कार तथा सोसाइटी ऑफ इंडियन एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी एंड इंडस्ट्रीज का एरोस्पेस वुमन अचीवमेंट अवॉर्ड भी मिला। वर्ष 2019 में लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। उनकी उपलब्धियों के कारण उन्हें पूरे देश में “रॉकेट वुमन ऑफ इंडिया” के नाम से जाना जाता है। उनकी जीवन यात्रा से प्रेरित होकर बनी फिल्म ‘मिशन मंगल’ में अभिनेत्री विद्या बालन ने उनके चरित्र को पर्दे पर जीवंत किया।
लक्ष्य स्पष्ट हो, तो कोई भी सपना असंभव नहीं होता
व्यस्त वैज्ञानिक जीवन के बावजूद ऋतु परिवार की जिम्मेदारियां भी बखूबी निभाती हैं। उनके पति अविनाश श्रीवास्तव बेंगलुरु की एक कंपनी में कार्यरत हैं। उनके दो बच्चे आदित्य और अनीशा हैं। ऋतु करिधल की सफलता यह साबित करती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और उसे पाने का जुनून हो, तो कोई भी सपना असंभव नहीं होता। उनकी कहानी देश की बेटियों और युवाओं को बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने की प्रेरणा देती है।
















