डिजिटल अपराधों और साइबर ठगी के खिलाफ गुजरात सरकार ने अब तक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक कार्रवाई की है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात पुलिस ने आम जनता की गाढ़ी कमाई को सुरक्षित रखने के लिए राज्यव्यापी एक स्पेशल अभियान चलाया और इसमें बहुत बड़ी सफलता हासिल की। इस अभियान का नाम ‘ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0’ था, जिसके तहत साइबर अपराधियों के सबसे बड़े नेटवर्क को पुलिस ने नेस्तनाबूद कर दिया गया है।
इस विशेष अभियान मे पुलिस ने ‘म्यूल अकाउंट्स’ (Mule Accounts) को अपना निशाना बनाया, जिनके जरिए देश भर में फैले 2289 करोड़ रुपये के साइबर वित्तीय घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी के मार्गदर्शन और गुजरात पुलिस के ‘साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (CCE) की अगुवाई में चलाए गए इस मिशन ने साइबर अपराधियों की कमर तोड़ कर रख दी है।
क्या होते हैं म्यूल अकाउंट्स?
सबसे पहले जानते हैं कि ये म्यूल अकाउंट्स क्या होते हैं जो इस अभियान का मुख्य हथियार बने। ‘म्यूल अकाउंट्स’ साइबर क्राइम की दुनिया में वे बैंक खाते होते हैं जिनका उपयोग साइबर ठग या अपराधी अवैध रूप से ऐंठे गए पैसों को प्राप्त करने, एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर करने और अंततः उसे सफेद करने के लिए करते हैं। यह ऐसे क्राइम्स की महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। इस प्रकार के खाते के मालिक को ‘मनी म्यूल’ कहते हैं। अक्सर साइबर अपराधी भोले-भाले लोगों, गरीबों या छात्रों को पैसों का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवा लेते हैं। कई बार लोग अनजाने में या थोड़े से कमीशन के चक्कर में अपने खातों का नियंत्रण इन अपराधियों को सौंप देते हैं। ये अपराधी ऐसे खातों का इस्तेमाल देश भर के लोगों से ठगी गई रकम को छिपाने के लिए करते हैं।
गुजरात पुलिस का ‘ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0’
गुजरात पुलिस और साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CCE) ने साल 2025 में ‘ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0’ की शुरुआत की थी। इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें राज्य के सभी पुलिस कमिश्नर, रेंज प्रमुख, स्थानीय अपराध शाखा के निरीक्षक और सभी साइबर पुलिस स्टेशनों ने एक साथ मिलकर काम किया। इस विशाल डेटा को इकट्ठा करने के लिए गुजरात पुलिस की टीम ने केंद्रीय एजेंसियों और प्रणालियों का सहारा लिया। इनमें I4C (भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र), NCRP (राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल) और साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 से प्राप्त शिकायतें शामिल हैं।
इन सभी माध्यमों से मिले डेटा का बारीकी से जांच की गई। इसके बाद प्रत्येक जिले में नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए और जमीनी स्तर पर कार्रवाई के लिए एक समर्पित सपोर्ट टीम बनाई गई। इसके साथ ही सभी बैंकों को सख्त निर्देश जारी किए गए कि वे संदिग्ध लेन-देन का रियल-टाइम डेटा तुरंत पुलिस के साथ साझा करें।
हासिल की ऐतिहासिक सफलता
इस सघन जांच और छापेमारी के जो परिणाम सामने आए हैं, उन्होंने देश भर के सुरक्षा तंत्र को चौंका दिया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस दौरान कुल 565 एफआईआर दर्ज की गईं, 638 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, 4052 साइबर अपराध पहचाने गए जिनमें से 491 गुजरात से जुड़े थे और 2289 करोड़ रुपये का फ्रॉड करने वाले 193 म्यूल अकाउंट्स का पर्दाफाश हुआ।
इतना ही नहीं पुलिस की इस सख्त कार्रवाई का असर यह हुआ कि साइबर सिंडिकेट्स के काम करने के तरीके पूरी तरह बदल गए और उनके लिए बैंकों से पैसे निकालना बेहद मुश्किल हो गया। इस ऑपरेशन के बाद बैंकों से चेक के जरिए होने वाली नकदी निकासी में 75 फीसदी की कमी आई। आंकड़ों के मुताबिक, जहां पहले हर महीने करीब 126 करोड़ रुपये चेक के जरिए निकाले जा रहे थे, वह घटकर सिर्फ 25 करोड़ रुपये पर आ गया। मतलब सीधे तौर पर 80 प्रतिशत की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई।
पुलिस ने बताया कि साइबर ठगी का शिकार हुए पीड़ित का पैसा सबसे पहले जिस खाते में ट्रांसफर होता है, उसे ‘फर्स्ट-लेयर’ म्यूल अकाउंट कहा जाता है। अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच इन शुरुआती खातों की संख्या में 30 प्रतिशत की कमी आई है।
साइबर अपराधी डिजिटल फुटप्रिंट मिटाने और पुलिस की पकड़ से बचने के लिए अक्सर एटीएम से नकद पैसे निकाल लेते थे। पुलिस की सख्त निगरानी के चलते सितंबर से दिसंबर 2025 के बीच एटीएम से होने वाली ऐसी संदिग्ध नकद निकासी में 66 फीसदी की भारी गिरावट देखी गई है।
अब आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI) रोकेगा ठगी
इस अभियान को आगे चलकर और अधिक कुशल, आधुनिक और प्रोएक्टिव यानी सक्रिय बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया है। अब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के मार्गदर्शन में ‘भारतीय डिजिटल भुगतान खुफिया निगम’ (IDPIC) आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक पर आधारित एक आधुनिक रिस्क-स्कोरिंग सिस्टम लागू करने जा रहा है। इस तकनीक के तहत बैंक में होने वाले हर एक लेन-देन को उसकी प्रकृति के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा जाएगा, 1. लो रिस्क (कम जोखिम), 2. मीडियम रिस्क (मध्यम जोखिम) और 3. हाई रिस्क (उच्च जोखिम)।
अगर किसी खाते का लेन-देन ‘हाई रिस्क’ की श्रेणी में आता है तो बैंक सिस्टम तुरंत उसे ब्लॉक या होल्ड कर देगा और संबंधित अथॉरिटी को अलर्ट भेज देगा। इस पूरे मिशन की कमान IDPIC को सौंपी गई है। इसके अलावा सभी बैंकों के बीच संदिग्ध और धोखाधड़ी वाले खातों की जानकारी तुरंत साझा करने के लिए Mulehunter.ai नाम से एक सेंट्रल डेटाबेस भी बनाया गया है।
बता दें कि, पीएम नरेंद्र मोदी ने भी समय-समय पर बढ़ते साइबर अपराधों और विशेष रूप से ‘डिजिटल अरेस्ट’ (जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई या कस्टम अधिकारी बताकर लोगों को वीडियो कॉल पर डराते हैं) जैसे नए तरीकों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। पीएम ने देश के नागरिकों से लगातार अपील की है कि वे बिना किसी डर के, पूरी जागरूकता और समझदारी के साथ डिजिटल लेन-देन करें। गुजरात सरकार का यह अभियान और आरबीआई की नई तकनीक मिलकर पीएम के सुरक्षित डिजिटल भारत के सपने को मजूबत करने में मददगार साबित हो रहे हैं।
















