सावरकर और गांधी: जानें मतभेदों के बीच अगाध सम्मान का सच!
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सावरकर जयंती विशेष: सावरकर और गांधी जी में था गहरा सम्मान, जानिए दोनों के बीच के रिश्ते की अनसुनी बातें

वीर सावरकर और महात्मा गाँधी के आपसी रिश्ते, कार्यशैली के मतभेद, मुलाकातों और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके प्रयासों पर आधारित ऐतिहासिक विश्लेषण

Written byShivam DixitShivam Dixit
May 28, 2026, 03:29 pm IST
inभारत, विश्लेषण, मत अभिमत
veer savarkar and mahatma gandhi relationship history

प्रख्यात लेखक धनंजय कीर लिखते हैं कि समाज की भलाई के लिए कई बार दो महान लोग एक समय में अलग-अलग कार्य कर रहे होते हैं। कीर के अनुसार, एक व्यक्ति वह होता है जो समाज के भलाई के लिए कष्ट सहन करता है और दूसरा उसकी बेहतरी का बीड़ा उठता है; गाँधी जी पहली तरह के व्यक्तियों में शामिल थे जबकि सावरकर दूसरी तरह के लोगों का नेतृत्व करते थे।

बता दें कि धनंजय कीर ने वीर सावरकर के अलावा लोकमान्य तिलक, डॉ. भीमराव आंबेडकर और ज्योतिराव फुले की भी जीवनी लिखी है।

लंदन से रत्नागिरी तक: मुलाकातों का सिलसिला

महात्मा गाँधी का वीर सावरकर से रिश्ता बहुत पुराना था और वे एक-दूसरे से साल 1909 में विजयादशमी के दिन लंदन में पहली बार मिले थे। गाँधी ने उस दिन वहां एक भाषण दिया और कहा था कि उन्हें सावरकर के साथ बैठने का सम्मान मिलने पर बहुत गर्व है तथा भारत को सावरकर के त्याग और देशभक्ति का बहुत जल्दी फायदा मिलेगा।

गाँधी जी और सावरकर की अगली प्रत्यक्ष मुलाकात 1927 में रत्नागिरी में हुई थी, जब गाँधी वहां के दौरे पर थे और सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने नजरबंद कर रखा था। दोनों ने अस्पृश्यता और शुद्धि के सम्बन्ध में बातचीत की, और यद्यपि इस विषय को लेकर उनके बीच मतभेद भी थे, लेकिन किसी ने एक-दूसरे से बैर नहीं रखा।

गाँधी जी ने सावरकर को पत्र लिखकर कहा था कि सत्यप्रेमी तथा सत्य के लिए प्राणतक न्योछावर कर सकने वाले व्यक्ति के रूप में उनके मन में सावरकर के लिए बहुत आदर है और अंततः दोनों का ध्येय भी एक ही है।

सावरकर बंधुओं की देशभक्ति पर गाँधी जी के विचार

जब सावरकर बंधु कालेपानी की सजा भुगत रहे थे, तब गाँधी जी ने लिखा था कि सावरकर बंधुओं की प्रतिभा का उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए। गाँधी ने उन्हें बहादुर, चतुर, देशभक्त और क्रन्तिकारी बताया था जो मौजूदा शासन प्रणाली की बुराई को बहुत पहले देख चुके थे। गाँधी ने यह भी कहा था कि अगर सच्ची और न्यायी सरकार होती तो वे किसी ऊँचे शासकीय पद को सुशोभित कर रहे होते।

वैचारिक मतभेद और आपसी सम्मान

गाँधी जी और सावरकर में कार्यशैली और राजनैतिक विचारधारा को लेकर मतभेद थे, लेकिन व्यक्तिगत रूप से उन्होंने कभी एक-दूसरे का अनादर नहीं किया।

  • जब सावरकर को रत्नागिरी में नजरबंद किया गया, तो वे कुछ दिनों तक पटवर्धन परिवार के यहाँ रुके थे।
  • इस परिवार के अप्पासाहेब पटवर्धन गाँधी के अनुयायी थे, लेकिन सावरकर को भी अपनी प्रेरणा मानते थे। गाँधी जी ने कभी अप्पासाहेब का सावरकर के साथ काम करने पर ऐतराज नहीं जताया।
  • गाँधी जी के कांग्रेस नेताओं के साथ भी मतभेद रहे हैं- भारत के विभाजन के दौरान वे कांग्रेस से नाराज थे। 1 जून 1947 को मनु गाँधी को लिखे पत्र में गाँधी ने विभाजन के फैसले पर अपना दुख और अकेलापन व्यक्त किया था।

रिहाई के प्रयास और दया याचिका का सुझाव

लंदन और रत्नागिरी की मुलाकातों के बीच भी सावरकर और गाँधी का आपसी संपर्क रहा।

  • 20 जुलाई 1937 को गाँधी जी ने शंकरराव देव को पत्र लिखकर बताया कि उन्होंने सावरकर की रिहाई के लिए अपनी ताकत के अनुसार प्रयास किया था।
  • 16 मार्च 1945 को वीर सावरकर के भाई गणेश दामोदर सावरकर का निधन होने पर गाँधी जी ने सेवाग्राम से 22 मार्च को वीर सावरकर को शोक संवेदना का पत्र भेजा था।
  • 25 जनवरी 1920 को गाँधी जी ने सावरकर के भाई नारायण दामोदर सावरकर को एक संक्षिप्त दया याचिका तैयार करने का सुझाव दिया था, जिसमें अपराध का स्वरुप राजनीतिक बताया जाए ताकि जनता का ध्यान आकर्षित हो सके।
  • गाँधी जी ने अली बंधुओं (शौकत अली और मोहम्मद अली) को भी ब्रिटिश सरकार से क्षमा याचना करने की राय दी थी और स्वयं वायसराय रीडिंग से भी मिले थे।
  • असहयोग आन्दोलन के कारण सावरकर बंधुओं की रिहाई में बाधा पैदा हुई थी, जिसका स्पष्टीकरण स्वयं गाँधी ने दिया था।

सावरकर द्वारा गाँधी की रिहाई की माँग

केवल गाँधी ने ही नहीं, बल्कि सावरकर ने भी गाँधी की रिहाई की माँग की थी। 7 अक्टूबर 1908 को दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी को गिरफ्तार किए जाने के बाद, 16 अक्तूबर को लन्दन में सावरकर सहित लाला लाजपत राय, बिपिन चन्द्र पाल, आनंद के. कुमारस्वामी, और जी.एस. खारपड़े ने गाँधी जी के समर्थन में एक सभा का आयोजन किया था।

दया याचिकाओं का सन्दर्भ और कांग्रेस के तत्कालीन संबंध

सावरकर ने अंडमान जेल से 9 मार्च 1915 को अपने भाई को लिखे पत्र में कहा था कि सरकार क्षमा के अधिकार का उपयोग तब तक नहीं कर सकती, जब तक जनता कैदी को स्वतंत्र करने के लिए जोर न लगाए। उस दौर में कांग्रेस के कई नेताओं के ब्रिटिश अधिकारियों से अच्छे संबंध थे।

उदाहरण के लिए- बंगाल विभाजन के समय वायसराय मिंटो के बुलाने पर गोपाल कृष्ण गोखले ने बहिष्कार रोकने की बात कही थी।

साथ ही, 1919 के अमृतसर अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू ने ब्रिटिश शासन और राजा की तारीफ की थी, जबकि जलियांवाला नरसंहार कुछ दिनों पहले ही हुआ था।

स्वतंत्रता के बाद वीर सावरकर का सम्मान

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभिन्न दलों और प्रबुद्ध वर्गों ने वीर सावरकर का सम्मान किया:

  • 1947 में कांग्रेस समिति द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘To The Gates of Liberty’ में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्तावना लिखी और सावरकर के दो लेखों को शामिल किया गया। इस समिति ने सावरकर के नाम के आगे ‘वीर’ लगाया था।
  • साल 1957 में राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने वीर सावरकर और अन्य बलिदानियों को मान्यता देने के लिए निजी विधेयक पेश किया था, जो पारित नहीं हो सका।
  • फरवरी 1966 में वीर सावरकर के निधन के बाद उन्हें सम्मान दिया गया;
  • 1973 में लोकसभा में गृह मंत्री उमाशंकर दीक्षित ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता देने की पुष्टि की।
  • कम्युनिस्ट पार्टी के ए.के. गोपालन और एच.एन. मुखर्जी जैसे नेता सावरकर के पक्ष में रहे और मुखर्जी ने उनके निधन पर संसद में शोक संदेश जारी करने का सुझाव दिया था।
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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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