माटी गई, मंदिर गया बिखर गया मन
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होम भारत

विभाजन की विभीषिका : माटी गई, मंदिर गया, बिखर गया मन

भारत विभाजन के बाद 10,32,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पाकिस्तान के हिस्से में गई। हमारे अनगिनत मंदिर और तीर्थ उस क्षेत्र में रह गए, जो आज बेहाल हैं। बड़ी संख्या में लोग मारे गए और विस्थापित हुए। किसी की संस्कृति, किसी की भाषा, किसी की परंपरा समाप्त हुई। सबसे बड़ी बात यह कि वर्षों तक इस त्रासदी की चर्चा तक नहीं होने दी गई

डॉ. रविप्रकाश टेकचंदाणीमेघा खेमाणीWritten byडॉ. रविप्रकाश टेकचंदाणीandमेघा खेमाणी
Aug 18, 2026, 02:27 pm IST
inभारत
बांग्लादेश की राजधानी ढाका का नामकरण ढाकेश्वरी देवी के नाम पर हुआ है, ले​किन अब ढाकेश्वरी मंदिर टूटा पड़ा है।

बांग्लादेश की राजधानी ढाका का नामकरण ढाकेश्वरी देवी के नाम पर हुआ है, ले​किन अब ढाकेश्वरी मंदिर टूटा पड़ा है।

विभाजन की त्रासदी को समझने के लिए उस मनःस्थिति में उतरना आवश्यक है, जिसमें एक मनुष्य ने अपने घर की देहरी आखिरी बार पार की होगी, बिना यह जाने कि वह लौटेगा भी या नहीं, या अब यहां से निकलकर वह आखिर कहां जाएगा। उस समय भय केवल भयावह हिंसा का नहीं, बल्कि अनिश्चितता का भी था। यह न जान पाने का भय कि अगली सुबह कहां होगी, घर कब लौटना होगा और लौटना संभव भी होगा या नहीं। जो कुछ घट रहा था, उसे समझ पाने का अवकाश भी शायद किसी के पास नहीं था। जिस आजादी का स्वप्न पीढ़ियों ने देखा था, उसी के साथ एक ऐसा अंधकार भी उतर आया। देश आजाद हुआ, किंतु असंख्य भारतीय अपने ही घरों से बेघर हो गए।

बदला भूगोल

विभाजन ने सबसे पहले मनुष्य के भूगोल को बदला। सदियों से किसी नगर, कस्बे या गांव में रहने वाले समुदाय अचानक अपने ही देश में अल्पसंख्यक और विस्थापित बन गए। परिवार बिखरे, पड़ोस बदले और अनेक स्थानों की सामाजिक संरचना का चरित्र ही परिवर्तित हो गया। किस घर में कौन रहता था, किस गली-कूचे में कौन-सा मंदिर था, दरिया किनारे कब कौन-सी पूजा होगी, किस दुकान से विवाह के लिए सामान आता था और किस बुजुर्ग को पूरे मोहल्ले का इतिहास मालूम था। इस दृष्टि से विस्थापन केवल स्थान-परिवर्तन नहीं था।
यह सामुदायिक निरंतरता का व्यवधान था। भूमि केवल भौतिक संपत्ति नहीं होती।

वह आस्था का भूगोल भी निर्मित करती है। किसी समुदाय के लिए कोई पर्वत, नदी, मंदिर, गुरुद्वारा, तीर्थ या कुलदेवी का स्थान केवल स्थापत्य नहीं होता; वह पीढ़ियों की उपस्थिति का प्रमाण होता है। विभाजन के पश्चात अनेक ऐसे धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल नई सीमा के दूसरी ओर चले गए। हिंदू परंपरा में हिंगलाज माता का तीर्थ, शारदा पीठ और कटासराज जैसे स्थल; सिख परंपरा में ननकाना साहिब और पंजा साहिब जैसे गुरुद्वारे; साधुबेला, जो सिंधी आस्था और संत परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा, पीछे छूट गया। झूलेलाल की जन्मभूमि, दरियाई परंपराओं से जुड़े स्थल और पीढ़ियों से पूजे जाते रहे अनेक छोटे-बड़े धार्मिक केंद्र अचानक दूसरी ओर हो गए।

लुप्त हुई भाषा, टूटी परंपरा

विभाजन ने सिंधी, मुल्तानी, झंगवी, सराइकी जैसी अनेक भाषाओं और बोलियों के भाषायी भूगोल को भी प्रभावित किया। बोलने वाली आबादियां बिखरीं, साहित्यिक-सांस्कृतिक परंपराएं बाधित हुईं और कई भाषाएं अपने पारंपरिक सामाजिक परिवेश से दूर हो गईं। नई भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों में शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन के लिए राज्य की भाषा सीखना आवश्यक था। फलतः सिंधी और मुल्तानी का प्रयोग धीरे-धीरे घर और सामुदायिक जीवन तक सिमटने लगा। जिस भाषा की जड़ें सिंध और मुल्तान की मिट्टी, उसके लोकजीवन और पीढ़ियों की स्मृतियों में थीं, वह अपनी प्राकृतिक भूमि से दूर होकर एक नई चुनौती से जूझने लगी। उसे बोलने वाले तो बचे रहे, किंतु उसे सहज रूप से जीने का पूरा परिवेश पीछे छूट गया। सिंधी हिंदू समुदाय के संदर्भ में विस्थापन ने लिपि का प्रश्न भी एक गंभीर सांस्कृतिक चुनौती बना दिया। सिंध से दूर नए भाषायी परिवेश में देवनागरी और अरबी-फारसी लिपि के बीच प्रयोग, शिक्षा और पीढ़ियों के हस्तांतरण की परिस्थितियां बदल गईं। परिणामतः नई पीढ़ियों के लिए सिंधी को पढ़ना-लिखना सीखना स्वयं एक चुनौती बन गया। इस प्रकार विस्थापन ने भाषा को भी उसकी अपनी भूमि से उखाड़ दिया।

किसी सभ्यता का निर्माण केवल पुस्तकों और स्मारकों से नहीं होता। वह मिट्टी, जल, ऋतु, कृषि, भोजन, वेशभूषा, बोली, लोकविश्वास और स्मृतियों के लंबे सह-अस्तित्व से बनती है। इसीलिए विस्थापन के बाद परंपराएं जीवित रहते हुए भी बदल जाती हैं। सिंधी हिंदू समुदाय इसका अत्यंत महत्वपूर्ण उदाहरण है। किसी संस्कृति को उसकी बड़ी संस्थाओं से ही नहीं, उसके छोटे-छोटे दैनिक अनुष्ठानों से भी पहचाना जाता है। विवाह में गाए जाने वाले लोकगीत, जन्म और मृत्यु से जुड़े संस्कार, ऋतु-त्योहार, खान-पान, लोककथाएं, प्रार्थनाएं और घरेलू रीति-रिवाज किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा का हिस्सा होते हैं। नई भौगोलिक परिस्थितियों, स्थानीय समाज और भाषायी वातावरण के साथ उनका रूप भी बदलने लगा। यह समुदाय आर्थिक रूप से अत्यंत सफल हो जाने के बाद भी अपनी सांस्कृतिक स्मृति के किसी हिस्से को खो देने के लिए विवश हो गया।

अपूरणीय क्षति

उत्तर-पश्चिम भारतीय उपमहाद्वीप का भूगोल पीढ़ियों से व्यापार और संपर्कों का भूगोल रहा था। नगरों के बाजार केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं थे; वे दूर-दराज के व्यापारिक तंत्र से जुड़े होते थे। परिवारों के व्यवसाय, रिश्ते और आवागमन राजनीतिक सीमाओं से बहुत पुराने थे। विभाजन ने केवल घर और जमीन का भूगोल नहीं बदला, बल्कि व्यापार और आवागमन के उस पुराने भूगोल को भी तोड़ दिया। कराची जैसे समुद्री बंदरगाह, सिंध के ठट्टा, शाहबंदर और सक्कर जैसे व्यापारिक केंद्र, शिकारपुर के साहूकारी और कारोबारी तंत्र, हैदराबाद तथा लाहौर और अमृतसर जैसे परस्पर जुड़े बाजार उस जीवंत आर्थिक संसार के हिस्से थे, जिसमें व्यापार केवल वस्तुओं का लेन-देन नहीं, बल्कि सूचनाओं और संबंधों का आवागमन भी था।

शिकारपुर के व्यापारी अफगानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया तक फैले तंत्र से जुड़े थे। शिकारपुर की स्थिति कंधार की ओर जाने वाले बोलन मार्ग के निकट होने के कारण उसे विशेष व्यापारिक महत्व प्राप्त था। जो रास्ते कभी व्यापारियों के लिए परिचित आवागमन थे, वे अब राजनीतिक नियंत्रण से निर्धारित होने लगे। इन व्यापारिक मार्गों और तंत्रों का विखंडन केवल विस्थापित समुदायों की आर्थिक क्षति नहीं था; यह भारत के उस ऐतिहासिक व्यापारिक भूगोल, उद्यमशील पूंजी और अंतर-क्षेत्रीय संपर्कों की भी अपूरणीय क्षति थी, जिसने सदियों तक उपमहाद्वीप को व्यापक एशियाई संसार से जोड़े रखा था। इस परिवर्तन का सबसे बड़ा अर्थ यह था कि भूगोल की सहजता भारत के लिए समाप्त हो गई।

सांस्कृतिक गरिमा पर चोट

मोहनजोदडो, हड़प्पा, तक्षशिला और उत्तर-पश्चिमी उपमहाद्वीप के अन्य पुरातात्विक स्थल केवल प्राचीन अवशेष नहीं थे; वे इस भूभाग की सभ्यतागत स्मृति, उसकी प्राचीनता और उसके गौरव के जीवंत प्रमाण थे। विस्थापित समुदायों के लिए इन स्थलों का महत्व और भी गहरा था। वे उसी धरती से जुड़े थे, जिसे वे अपना घर, अपनी पूर्वजभूमि और अपनी सांस्कृतिक जड़ों का आधार मानते थे। विभाजन के बाद इनसे भौगोलिक दूरी केवल विस्थापितों की निजी स्मृति की क्षति नहीं थी; भारत ने भी अपनी सभ्यतागत विरासत के उन महत्वपूर्ण अध्यायों से प्रत्यक्ष भौगोलिक निकटता खो दी, जो उसकी प्राचीन सांस्कृतिक गरिमा और ऐतिहासिक वैभव के साक्षी थे। मानचित्र बदला तो केवल सीमाएं नहीं बदलीं; अपनी ही सभ्यता के कुछ गौरवशाली अध्यायों तक हमारी पहुंच और निकटता भी बदल गई। सिंधु सभ्यता, गांधार, तक्षशिला से जुड़ी पुरातात्विक विरासत की दृष्टि से विभाजन ने एक ऐसे सभ्यतागत परिदृश्य को राजनीतिक सीमाओं के भीतर बांट दिया, जिसकी ऐतिहासिक परतें उससे कहीं अधिक पुरानी थीं।

सह-अस्तित्व की क्षति

शायद विभाजन की सबसे गहरी और सबसे कम दिखाई देने वाली हानि सह-अस्तित्व की क्षति थी। सदियों तक साथ रहने वाले समुदायों के बीच मतभेद, संघर्ष और तनाव निश्चित रूप से पैदा हुए थे। राजनीतिक सीमा ने अनेक पुराने सामाजिक संबंधों को एक नए राष्ट्रवादी ढांचे में पुनर्परिभाषित कर दिया। राष्ट्र और धर्म के बीच संबंधों की नई व्याख्याएं सामने आईं। पड़ोसी की पहचान बदल गई। ‘अपना’ और ‘पराया’ जैसी श्रेणियां नए राजनीतिक अर्थ ग्रहण करने लगीं। विभाजन ने बहुत कुछ छीना, लेकिन उसने मनुष्य की पुनर्निर्माण की क्षमता को समाप्त नहीं किया। विभाजन में विस्थापितों का इतिहास इसका सशक्त उदाहरण है। जिन लोगों ने घर, दुकान, जमीन, मंदिर, पड़ोस और जन्मभूमि छोड़ी, उन्होंने नए शहरों में जीवन फिर से बनाया। शरणार्थी शिविरों से निकलकर उन्होंने व्यापार स्थापित किए, संस्थाएं बनाईं, शिक्षा को महत्व दिया और अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास किया।

इसलिए विभाजन को समझना केवल यह याद करना नहीं है कि क्या नष्ट हुआ, बल्कि यह देखना भी है कि इतनी बड़ी क्षति के बाद मनुष्य ने क्या बचाया और क्या फिर से रचा। जो लोग अपनी जन्मभूमि से उखाड़ दिए गए, उन्होंने अपने भीतर एक दूसरी भूमि बनाई, स्मृति की भूमि। और यही वह भूमि है, जहां आज भी खोए हुए घरों की आवाजें सुनाई देती हैं। ‘विभाजन से क्या खोया?’ का उत्तर केवल क्षति की सूची नहीं हो सकता। किंतु विभाजन की स्मृति का सबसे बड़ा अर्थ यही है कि इतिहास को केवल अतीत के रूप में याद न किया जाए, उससे भविष्य के लिए चेतावनी भी ली जाए, क्योंकि विभाजन केवल भूमि का नहीं होता; वह मनुष्यों, परिवारों, भाषाओं, स्मृतियों, संस्कृतियों और पीढ़ियों का भी होता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम उन परिस्थितियों को समझें और उनसे सीखें। सीमाएं मानचित्र पर खिंचती हैं, किंतु उनकी दरारें मनुष्यों के भीतर पीढ़ियों तक रहती हैं। विभाजन की पीड़ा हमें यही सिखाती है कि ऐसी त्रासदी दोबारा न घटे और किसी भी मतभेद का समाधान मनुष्य को उसकी माटी, स्मृति और मानवीय गरिमा से विस्थापित करके न खोजा जाए।

 

Topics: पाञ्चजन्य विशेषस्मृतियों की भूमिहिंगलाज माताहड़प्पाविभाजन की त्रासदीसांस्कृतिक विस्थापनसिंधी समुदायविभाजन की विभीषिकासिंधीभारत विभाजनमुल्तानीमोहनजोदड़ोकटासराजशारदा पीठव्यापारिक तंत्रतक्षशिलासामुदायिक निरंतरता
डॉ. रविप्रकाश टेकचंदाणी
डॉ. रविप्रकाश टेकचंदाणी
अध्यक्ष, भारतीय भाषाएं एवं साहित्यिक अध्ययन विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय [Read more]
मेघा खेमाणी
मेघा खेमाणी
शोधार्थी [Read more]
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