आदरणीय राहुल देव जी। गांधीवाद पर आपके विचारों से अवगत होता रहा हूं। आपने अपना डीपी भी गांधी का ही लगाकर यह संदेश देते रहने के कोशिश की है, हालांकि बहुधा आचरण आपका उस वाद के प्रतिकूल ही दिखा है। वैसे भी आचरण और विचार के समानता का नाम ही गांधी होना चाहिए, जिसकी उपेक्षा करते आपको देखना दुखद है।
राहुलजी,
जिस तरह मार्कण्डेय काटजू को देख कर यह समझा जा सकता है कि जज रहते हुए उन्होंने कैसे निर्णय दिए होंगे, वैसे ही आपको देख कर अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि संपादक रहते हुए आपने कैसा न्याय किया होगा। यह पाती आप प्रभृति हर उस साठोत्तर-सत्तरोत्तर ZEN Z के लिए लिखा समझ सकते हैं, जिनके लिए गालियां अब न्यू नार्मल है। जो गालियों के नए व्यवसायी बने हैं।
आपके द्वारा गाली के समर्थन में जारी फतवे का नोटिस लेकर ही हमने कुछ कुभाषित आपतक पहुंचाया था, ताकि भाषाविद् भी होने के नाते आपकी कुछ सहायता की जा सके, आपके संग्रह में कुछ वृद्धि की जा सके। वे कुभाषित पूरी तरह लिंगमुक्त, छंदमुक्त, अतुकांत और शाकाहारी किस्म के ही थे, जैसी गालियों की कल्पना से आप रोमांचित हो जाते हैं, वे वैसे ही थे। उनमें कहीं भी स्त्रियों को हमने बीच में नहीं लाया था।
फिर भी बौखला गए आप, यह उचित तो नहीं। अपने नाम के अनुकूल ही राहुलजी आप बिल्कुल नए वाले गांधी की तरह बौखला जाते हैं। ऐसा भी क्या आहत होना भला? आप अपनी वरिष्ठता बिसार कर हमें संस्कारों की याद दिलाने से लेकर न जाने कैसे-कैसे हिंसक शब्दों में फुफकारने लगे, मजाक उड़ाने लगे। उपहास करने लगे। मसखरी का परिचय तो ऐसा दिया जैसे खानदानी पेशा आपका यही रहा हो। अपने जैसे तमाम सत्तरोत्तर-अष्टावक्रोत्तर ZEN Z को भी उठा-उठा कर ले आए। मेरे कामकाज, मेरे दायित्व को भी जज करने लगे, मानो बस इन्हीं का प्रमाण पत्र आना बचा हुआ था मेरे उद्धार के लिए। बहरहाल!
आते हैं मूल विषय पर।
आपकी भावना इससे बहुत आहत हुई कि मैंने गांधीजी से आगे मोदीजी को कैसे बता दिया। बिल्कुल दिलनवाज होकर आपने घोषणा की कि पहली बार आप मेरे पटल पर आए। जबकि यह भी झूठ होने के कारण गांधी सिद्धांतों के प्रतिकूल आचरण रहा आपका। पहली बार आने के ऐसी घोषणा करते हुए आप ऐसे पेश आए मानो किसी अजीमो शाह शहंशाह कि तरह आपने न जाने कितनी बड़ी कृपा कर दी मुझ नाचीज पर, गोया ‘लुटियन’ का सूचना सलाहकार हो जाने में बस आपका आगमन ही अकेला रोड़ा था, अब तो मेरे दुख भरे दिन बीते रे भैया।
सोच-सोच कर सर पटक लेने का मन करता है कि आज भी आप जैसे लोग स्वयं को कितनी गंभीरता से लेते हैं। विमर्श का सारा पाराडाइम शिफ्ट हो गया है देव साहब। अब दुनिया आपके आगे से ना जाने कितना आगे चला गया है। कहीं आगे निकल गयी है, और आपको लगता है कि आप जैसे ही लोग आज भी हांक रहे हैं समाज को। ऐसा मुगालता पाल लेने के बदले आप गांधी के तरह बकरी क्यों नहीं पाल लेते महाशय। कुछ दोष ही कम से किमी मिल जायेगा आपको। कभी अपने हांके पर संदेह होने पर झट से कथित जेनजी भी बन जाने की आप जैसों के भौंडी सी कोशिश भी एक अलग तरह की ही समस्या है। ऐसा करते हुए आप जैसे लोग विशुद्ध निरीह ही नजर आते हैं। फिर एक लोक कहावत जैसे ‘सिंह कटा कर पर्रू बन जाने’ की कोशिश में मितरों, फ़्रैंड्स, परिधान मंत्री आदि पता नहीं क्या-क्या लिखते चले जाते हैं। ऐसी भाषा तो अब तिलचट्टे भी नहीं लिखते। आपको अनुमान तो होना चाहिए कि ऐसा कर, अपनी ओढ़ी हुई गरिमा खो कर आप जैसे लोग न घर के रहते न घाट के…… ।
बात गांधी पर वापस आ ही नहीं पा रही। इतना ‘गुणानुवाद’ करने का मन कर रहा है आप जैसों का कि वहीं-वहीं पहुंच जाता हूं। क्या करें। ऐसे-ऐसों को वैसा-तैसा बनता हुआ देख कर क्षोभ ही इतना है कि क्या ही कहें। खैर।
राहुल साहब, यह घोषणा करते हुए कि पहली बार मेरे फेसबुक पटल पर आए हैं, लगे हाथ गांधी पर लिखे मेरे पोस्ट को भी अपने पटल पर उठा ले गए और ऐसा वितंडा खड़ा करने की कोशिश की, मानो हमने आपके गांधीवाद की ठेकेदारी छीन कर आपकी जीविका छीन ली हो। ऐसा करते हुए आप अपनी ही तमाम स्थापनाओं को भूल गए, सो अलग। मसलन जबरन अंग्रेजी शब्द घुसेड़ना, चरम आक्रोश में आ कर वर्तनी आदि की उपेक्षा करना। कनिष्ठों को मजाक बनाने की कोशिश आदि।
आते हैं मूल विषय पर।
अपन ने लिखा था कि मोदी अब गांधी से मीलों आगे निकल गए हैं। आखिर इसमें ऐसी क्या समस्या है मियां कि पिल पड़े आप? गांधी को ‘इस्लाम’ क्यों बनाने पर तुले हैं कि जरा सी बात हुई नहीं, झट खतरे में आ जाता है। अगर हमें लगा कि यशस्वी प्रधानमंत्री मोदीजी ने अत्यधिक शक्ति होने के बावजूद अत्यधिक अहिंसा और धैर्य का परिचय देकर गांधी से आगे लाकर स्वयं को खड़ा कर लिया है, तो क्या यह लिखने के लिए आपसे मुझे अनापत्ति प्रमाण पत्र चाहिए था?
हम ये कौन सा समाज बनाना चाह रहे, जहां गांधी के आराध्य श्रीराम पर तो भद्दी से भद्दी बातें हो सकती है, उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में लेते हैं आप जैसे लोग, लेकिन गांधी पर बात नहीं होगी। किसीने जरा सा भी गांधी के बारे में बोला तो अगर शक्ति हो आपके पास तो ऐसा कहने वाले के गर्दन का फुटबॉल बना दें आप तो। क्यों मियां, ऐसा क्यों! आपने टेंडर भरा हुआ है क्या करमचंद जी के असली-नकली खानदान के नाम पर? इधर तुलना की नहीं, उधर गांधीवाद खतरे में। इसके विरुद्ध तर्क भी ऐसे-ऐसे भौंडे देंगे कि क्या ही कहे जायें।
कहते हैं कि दुनिया के सौ से अधिक देशों में गांधी की प्रतिमा है। अपनी समझ से तो यह अपने-आपमें गांधीवाद के विरुद्ध है। गांधी ने कब चाहा था या प्रतिपादित किया था कि बच्चों के मुंह का निवाला जिन पैसों से आ सकता है, उसे छीन कर देश के हर चौराहों पर उन्हें आप टांग दें! या विदेशों में लगते रहें इनकी प्रतिमा? क्या गांधीवाद पर्याय है व्यक्तिपूजा का? बिल्कुल नहीं। बल्कि इसका उल्टा है।
इसी तरह बहुत सारे देशों में इनका नाम होने के कारण क्या हर सवालों से इतर मान लिए जायें इन्हें? ऐसे तो विश्व के 56 देश पूरी तरह एक ‘मत’ में रंगे हैं। तो क्या हम यह मान लें कि सच में वह मत इस कारण शांति का हो गया? बिल्कुल नहीं। प्रसार हमेशा ‘गुण’ का पर्याय हो, यह आवश्यक नहीं। फिर अगर तुलना कर ही दिए जायें, किसी विश्व नेता को गांधी से आगे दिखा ही दिए जायें, तो इसमें इतना ‘ही ही खी खी’ क्यों करना भला? होने दीजिये न चर्चा। क्या बिगड़ जाएगा इससे?
जिस गांधी ने स्वयं यह कहा है कि उनके विचार बदलते रहते हैं, द्वंद्व उत्पन्न होने पर आखिरी विचार को उनका प्रतिनिधि विचार माना जाये, वहां आप यह मान लो कि विचार की समाप्ति हो गयी गांधी के जाते ही? अब कोई नया विचार आ नहीं सकता? या गांधी के ग्रंथों को ‘आसमानी किताब’ बना दिए जायें कि नया कुछ अब संभव ही नहीं?
बात होने दीजिये कृपया श्रीमान। कल और आयेंगे नगमों की खिलती कलियां चुनने वाले, तुमसे बेहतर कहने वाले, हमसे बेहतर सुनने वाले। क्यों हम यह मान कर बैठ जायें कि रत्नगर्भा हमारी पृथ्वी, हमारा सनातन और कुछ अब पैदा कर ही नहीं सकती। कि एक मोहनदास को जन्म दे देने के बाद उसका काम समाप्त हो गया? ऐसा नहीं होता राहुलजी।
निस्संदेह गांधी की प्रशंसा होनी चाहिए। होती ही है। भाजपा ने अगर ‘गांधीवादी समाजवाद’ को अपने संविधान में, निष्ठाओं में शुमार किया है, तो कुछ तो बात होगी ही। जब तक हमारे संविधान का वे हिस्सा हैं, तब तक हमारे पथ प्रदर्शक वे रहेंगे ही। पर इससे तुलना या आलोचना बंद थोड़े होनी चाहिए?
सनातन में तो ऐसी तुलना की परिपाटी रही है। संस्कृति रही है। आज गुरु पूर्णिमा है। गुरु से गोविंद की तुलना, गुरु को भगवान से भी बड़ा बताना। भक्त को भगवान से बड़ा बताना। राम से अधिक राम कर दासा जैसे संदर्भ देखें। अगर राम का दासा, राम से बड़ा कहा जा सकता है, तो मोहनदासा से बड़ा दामोदरदासा को बता देने पर ऐसा क्यों लगा आपको कि आपकी दुनिया लुट गयी या भैंस खोल ली गई है आपकी? कि आपकी भैंस मानो पानी में चली गई हो पर्रू समेत! ऐसा नहीं है न मालिक?
यह पत्र गांधीवाद की आलोचना या समीक्षा में नहीं है। उस पर आगे कभी बात हो सकती है। यह पत्र तो बस इस फतवा के विरुद्ध है कि गांधी पर बात करना ही कुफ़्र बना दिए जायें? या ये मान लिया जाये कि अब किसी फैक्ट्री में गांधी से बड़ा उत्पाद आ ही नहीं सकता?
बातें होते रहने दीजिये बड़े भाई! अगर सारे गढ़ और मठ तोड़े जाने को जहां अभिव्यक्ति के खतरे उठाने के रूप में मंडित किया जा सकता है, तो ‘गांधी संप्रदाय’ के मठ को ही क्यों इतना कट्टर बनाने पर तुले हुए हैं कि बात ही नहीं होने दोगे? क्या यह मठ तोड़ कर आपके मुक्ति का बोध होना रुक जाएगा?
स्वयं को गांधी का उपासक बताते हुए, उनकी तस्वीर का डीपी बना कर लोगों को गाली के लिए उकसाना, यह क्या मोहन के विचारों की हत्या नहीं माना जाये? याद लीजिये अपनी ऐसी हिप्पोक्रेसी कि पहलगाम हमले के समय (जिसमें धर्म पूछ-पूछ कर नृशंस हत्याएं हुई हो) उसके विरुद्ध आक्रोश की अभिव्यक्ति की आप निंदा करेंगे, आहत लोगों को दुत्कारेंगे कि पाकिस्तान के विरुद्ध क्यों बोल रहे, पर कॉकरोचों के पक्ष में आप नयी-नयी गालियों का आविष्कार करने का आह्वान करेंगे! और आपके आह्वान पर जब ऐसी गालियां भेंट की जाएगी, तो विक्टिम कार्ड खेलने चले आयेंगे? कहां से सीखा है ऐसा गांधीवाद आपने महाशय? क्या अपने हमनाम राहुल गांधी के साथ उठना-बैठना हो गया है आपका? अगर हां, तो ऐसी गंदी संगति से बचिए कृपया। बड़ा ही नुकसान देती है ऐसी संगत मानव के चरित्र को।
लिखते जा रहा पर मन में ऐसी आंधी मची है कि कोई इसका छोर नजर नहीं आ रहा। बाकी बातें फिर कभी। फिलहाल इतना ही कि समाज को हांकने की कुवृत्ति या अहंकार छोड़ कर मनुष्य बन जायें कृपया। आप विद्वान होंगे, पर आपके कथित विद्वान होने से कोई और मूर्ख नहीं हो जाता।
हर नयी पीढ़ी हर मामले में पिछली पीढ़ी से बेहतर होती हैं। ऐसा मान लेंगे तो आनंद से रहेंगे। वैसे भी कोई ऐसा तीर नहीं मार लिया है आपने, कोई ऐसी दैवीय उपलब्धि नहीं हासिल किया हुआ है आपने कि नयी पीढ़ी इससे आगे जा ही नहीं सकती। आपका अहंकार आपका लोक और परलोक दोनों बिगाड़ देता है। जो भी कंकड़-पत्थर पाया होगा जीवन में, उसे भी बहा ले जाता है। सो, बदलाव को स्वीकार कीजिए और कृपया बड़े बन जाइए।
हां, अगर युवा शक्ति का अर्थ आपके लिए तिलचट्टे होते हों, तो आपको अशेष अ-श्रद्धांजलि के अलावा और दिया ही क्या जा सकता है भला?
ध्यान रखिए अपना। आपके अच्छे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के कामना। शुभकामना।
आपका बिल्कुल भी नहीं …….. पंकज।

















