पूज्य Dalai Lama की उपस्थिति में निर्वासित तिब्बती संसद के नेता बने पेनपा, चीन ने ​चिढ़कर कहा-'यह हमारा आंतरिक मामला'​
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पूज्य Dalai Lama की उपस्थिति में निर्वासित तिब्बती संसद के नेता बने पेनपा, चीन ने ​चिढ़कर कहा-‘यह हमारा आंतरिक मामला’​

पेनपा त्सेरिंग दलाई लामा की लंबे समय से चली आ रही 'मध्यम मार्ग' नीति का समर्थन करते हैं, जो स्वायत्तता और 'अहिंसा, संवाद और आपसी लाभ' के माध्यम से चीन-तिब्बत संघर्ष के समाधान की बात करती है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
May 27, 2026, 12:32 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
पेनपा त्सेरिंग दलाई लामा का आशीर्वाद लेते हुए

पेनपा त्सेरिंग दलाई लामा का आशीर्वाद लेते हुए

आज सुबह धर्मशाला (भारत) में सर्वोच्च बौद्ध आध्यात्मिक गुरु परम पावन दलाई लामा की उपस्थिति में पेनपा त्सेरिंग ने निर्वासित तिब्बतियों की चुनी हुई सरकार के नेता के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल की शपथ ग्रहण की। 1950 के दशक के बाद तिब्बत से निर्वासित हो कर परम पावन दलाई लामा ने हिमाचल प्रदेश में तिब्बत में शरण ली थी और तबसे उसे ही तिब्बत की निर्वासित सरकान ने अपना मुख्यालय बनाया हुआ है। भारत सरकार ने हमेशा ही दलाई लामा जी के साथ पूर्ण सम्मान के साथ व्यवहार किया है और तिब्बतियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण भाव दर्शाया है। तिब्बत से निर्वासित होकर भारत आए तिब्बतियों ने भी भारत को अपनी गुरुभूमि मानकर सदा भारत का गौरवगान किया है। लेकिन चीन इससे चिढ़ता है। पेनपा के दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ लेने से पूर्व भी चीन की ओर से सोशल मीडिया पर भारत को बिना मांगे की सलाह दी गई।

भारत स्थित केंद्रीय तिब्बती प्रशासन को चीन ‘एक अलगाववादी राजनीतिक समूह’ बताकर इसकी निंदा ही करता आया है। लेकिन यह निर्वासित तिब्बतियों के लिए एक प्रमुख संस्था है, विशेषकर 2011 में पूज्य दलाई लामा द्वारा राजनीतिक सत्ता सौंपे जाने के बाद से।

पेनपा त्सेरिंग और पूज्य दलाई लामा के साथ विदेशी समर्थक

27 देशों में हुए चुनाव
निर्वासित तिब्बती सरकार के ‘सिक्योंग’ या नेता, पेनपा त्सेरिंग को दूसरे कार्यकाल के लिए चुना गया है। उन्होंने प्रारंभिक दौर में 61 प्रतिशत वोट हासिल किए, जो सीधे तौर पर जीत हासिल करने के लिए काफी थे।

अपने शपथ ग्रहण के अवसर पर आज त्सेरिंग ने कहा कि वह तिब्बत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि दलाई लामा की लंबे समय से चली आ रही ‘मध्यम मार्ग’ नीति का समर्थन करते हैं, जो स्वायत्तता और ‘अहिंसा, संवाद और आपसी लाभ’ के माध्यम से चीन-तिब्बत संघर्ष के समाधान की बात करती है।

श्पथ समारोह में पूज्य दलाई लामा ने स्वयं उपस्थित होकर अपना आशीर्वाद दिया। इस अवसर पर पारंपरिक तिब्बती नर्तकों के समूहों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। लामाओं, भिक्षुओं और भिक्षुणियों ने बड़ी संख्या में पूरे उत्साह के साथ कार्यक्रम में भाग लिया।

‘अटूट बंधन’
पेनपा त्सेरिंग ने न्याय अधिकरियों के सामने शपथ लेने के बाद आगे कहा कि “हम सभी से आग्रह करते हैं कि वे राजनीतिक निर्वासितों के रूप में हमारी साझा पहचान को याद रखें, मतभेदों को भुलाकर एकता को बढ़ावा दें, और तिब्बत के साझा उद्देश्य के प्रति अपने व्यक्तिगत कर्तव्यों को पूरा करें।” उन्होंने कहा कि तिब्बती राष्ट्रीय पहचान को कमजोर करने के चीनी सरकार के सुनियोजित प्रयासों के बावजूद, चीन तिब्बती लोगों के अपनी मातृभूमि के साथ अटूट बंधन को कमजोर नहीं कर सकता।

उल्लेखनीय है कि 91,000 पंजीकृत मतदाताओं में हिमालय के पहाड़ी क्षेत्रों में रह रहे बौद्ध भिक्षु, दक्षिण एशिया के बड़े शहरों में रहने वाले राजनीतिक निर्वासित, और ऑस्ट्रेलिया, यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में रह रहे शरणार्थी शामिल हैं। पांच साल के ​कार्यकाल वाली इस संसद के दुनिया भर से 45 सदस्य हैं जिनमें से 30 सदस्य तीन पारंपरिक प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं, 10 सदस्य पांच धार्मिक परंपराओं का और पांच सदस्य प्रवासी तिब्बतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस संसद की साल में दो बार बैठक होती है। यह संस्था दुनिया भर में निर्वासन में रह रहे लगभग 150,000 तिब्बतियों के लिए एक प्रतिनिधि संस्था के तौर पर काम करती है।

‘सत्य के लिए संघर्ष’
त्सेरिंग ने समर्थन के लिए मेजबान देश भारत के साथ ही संयुक्त राज्य अमेरिका का भी धन्यवाद व्यक्त किया। उन्होंने कहा, ”मैं भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकारों और लोगों, तथा हमारे सभी समर्थकों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूं। सत्य के लिए हमारे संघर्ष को प्रभावी ढंग से जारी रखने में आपका समर्थन ही सबसे बड़ी ताकत है।”

निर्वासन में रह रहे मतदाता तिब्बतियों का केवल एक छोटा सा हिस्सा हैं। केन्द्रीय तिब्बती प्रशासन का अनुमान है कि दुनिया भर में ऐसे तिब्बतियों की संख्या साठ लाख है, जबकि चीन ने अपनी 2020 की जनगणना में यह संख्या 70 लाख से अधिक बताई थी।

कम्युनिस्ट चीन 1950 से ही तिब्बत को अपना ‘अभिन्न अंग’ बताता आया है। वह इस निर्वासित सरकार को एक ऐसा ‘अवैध संगठन’ कहता है, जो ‘चीनी संविधान और कानूनों का पूरी तरह से उल्लंघन करता है’।

90 वर्ष को हो चले दलाई लामा 1959 में चीनी सेना के एक विद्रोह को कुचल दिए जाने के बाद तिब्बत की राजधानी ल्हासा से निर्वासित होकर भारत आ गए थे और तब से धर्मशाला में ही रह रहे हैं। समारोह के दौरान उन्होंने उपस्थित लोगों को अपना आशीर्वाद दिया।

नोबुल शांति पुरस्कार से सम्मानित पूज्य दलाई लामा के समर्थक इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि खुद को नास्तिक बताने वाले कम्युनिस्ट चीन ने पिछले साल यह कहा था कि दलाई लामा जी के अगले उत्तराधिकारी को उसकी मंजूरी के बिना नियुक्त नहीं किया जा सकता। जबकि इस पर दलाई लामा जी का कहना है कि यह अधिकार केवल उनके भारत स्थित कार्यालय के पास ही है।

तिब्बती बौद्धों का मानना ​​है कि वे एक ऐसे आध्यात्मिक नेता के 14वें अवतार हैं, जिनका जन्म 1391 में हुआ था। दूसरी बार निर्वाचित त्सेरिंग ने कहा भी कि, ‘हम परम पावन दलाई लामा के पुनर्जन्म के संबंध में चीन सरकार द्वारा फैलाए जा रहे दुष्प्रचार और भ्रामक बातों का प्रतिकार करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं।’

File Photo

यहां बता दें कि पेनपा 1967 में कर्नाटक के बाइलकुप्पे (एक बड़ा तिब्बती शरणार्थी नगर) में जन्मे हैं। वे मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक हुए और कॉलेज के दिनों में तिब्बती स्वतंत्रता आंदोलन तथा नाइजीरिया‑तिब्बत मित्रता संघ के महासचिव रहे। वे 2008–2016 तक निर्वासित तिब्बती संसद के स्पीकर रहे और 2001–2008 में दिल्ली में तिब्बती संसदीय व शोध केंद्र के कार्यकारी निदेशक रहे। 2016 में नेता के चुनाव में लोबसांग साङये से हार के बाद उन्होंने 2021 में 34,324 मत प्राप्त कर पहली बार यह पद प्राप्त किया था। अब वह 17वें काशग के बाद 18वें काशग के स्कीयोंग यानी नेता के रूप में दूसरा पांच वर्ष के कार्यकाल के चुने गए हैं।

चीन की आपत्ति

भारत ​स्थित चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग

आज के इस शपथ ग्रहण समारोह की पूर्वसंध्या पर यानी कल चीन ने भारत को एक कूटनीतिक चेतावनी जैसी दी। भारत ​स्थित चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने एक्स पर पोस्ट में कहा कि दलाई लामा के पुनर्जन्म की प्रक्रिया लंबे समय से स्थापित धार्मिक अनुष्ठानों और ऐतिहासिक परंपराओं के अंतर्गत आती है, जिन्हें सदियों से चीन की केंद्र सरकार की मंजूरी की आवश्यकता रही है। उन्होंने यह भी कहा कि 14वें दलाई लामा स्वयं इसी प्रक्रिया से मान्यता प्राप्त हैं। यू जिंग ने दलाई लामा के पुनर्जन्म को ‘चीन का विशुद्ध आंतरिक मामला’ करार दिया और बाहरी हस्तक्षेप का विरोध किया। साथ ही, उन्होंने केन्द्रीय तिब्बती प्रशाासन को वैधता देने से इंकार करते हुए कहा कि केंद्रीय तिब्बती प्रशासन किसी संप्रभु देश द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है और उसका नेतृत्व तिब्बती लोगों का प्रतिनिधित्व करने या पुनर्जन्म प्रक्रिया पर दावा करने का अधिकार नहीं रखता।

इतना ही नहीं, चीन ने नई दिल्ली से अनुरोध किया कि वह तिब्बती स्वतंत्रता‑समर्थक गतिविधियों को मंच न दे और दलाई लामा के पुनर्जन्म प्रक्रिया में हस्तक्षेप से बचे। बीजिंग ने उम्मीद जताई कि भारत पूर्व कूटनीतिक संकल्पों का पालन करेगा।

Topics: भारतचीनtibetदलाई लामातिब्बतIndiadalai lamaChinacentral tibetan administrationtibetan government in exile
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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