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मेरे माता-पिता कंपनी हैं और मैं उनका सीईओ हूं

पापा को हर सुबह चाय दे पाता हूँ, माँ के पैर दबा पाता हूँ। ये 2.4 करोड़ रूपए में नहीं मिलता। अगर फिर से मौका मिले, तो मैं फिर वही करूँगा। वीजा कैंसिल, जॉब छोड़, दुकान खोली। क्योंकि कुछ त्याग घाटा नहीं होते, वे निवेश होते हैं, प्यार में।

Written byप्रवीण शर्माप्रवीण शर्मा
May 21, 2026, 06:51 pm IST
inसोशल मीडिया

मेरा नाम विवेक शर्मा है। उम्र 32 साल। लोग जब पूछते हैं, तुम क्या करते हो, तो मैं कहता हूं, किराना दुकान चलाता हूं। वे हंसते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि मैं आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में गोल्ड मेडलिस्ट था और मेरे पास सैन फ्रांसिस्को की एक कंपनी का ऑफर लेटर आज भी अलमारी में रखा है, जिस पर सैलरी लिखी है 2,40,000 डॉलर सालाना। मैंने वह लेटर कभी फाड़ा नहीं, पर कभी इस्तेमाल भी नहीं किया। कहानी 1998 से शुरू होती है।

कानपुर के किदवई नगर में दो कमरे का घर, ऊपर टीन। पापा रेलवे में क्लर्क, मां ट्यूशन पढ़ातीं। मैं इकलौता बेटा। पापा की सैलरी 8,000 रुपये। मां की ट्यूशन से 2,000 की कमाई। हम मिडिल क्लास भी नहीं थे, लोअर मिडिल। पर पापा का एक सपना था, बेटा बड़ा आदमी बने। उन्होंने कभी मुझसे नहीं कहा डॉक्टर बन, इंजीनियर बन। वह सिर्फ कहते, बेटा, जितना पढ़ना है पढ़, पैसे की चिंता मत कर। मैं पढ़ता गया। दसवीं में 95 प्रतिशत, बारहवीं में 97 फीसदी। कोचिंग की फीस 1 लाख थी। पापा ने पीएफ निकाला। मां ने अपनी चूड़ियां बेचीं। मैं कोटा गया।

दो साल पंखे के नीचे पढ़ा, मच्छर खाए। 2012 में रिजल्ट आया, AIR 147। आईआईटी बॉम्बे, कंप्यूटर साइंस। जिस दिन लेटर आया, पापा मिठाई का डिब्बा लेकर पूरे मोहल्ले में बांट आए। मां रो पड़ी। बोली, अब मेरा बेटा अमेरिका जाएगा। आईआईटी में मैं उड़ा। कोडिंग, हैकाथॉन, इंटर्नशिप। तीसरे साल में गूगल समर इंटर्न, 1 लाख स्टाइपेंड। मैंने पहली सैलरी से पापा को फोन दिलाया, मां को वॉशिंग मशीन। पापा ने फोन पर कहा, बेटा, अब तो रिटायरमेंट में आराम करूंगा। फाइनल ईयर में प्लेसमेंट। मैं दिन रात तैयारी करता। दिसंबर, 2015। मेरा इंटरव्यू हुआ एक कंपनी से। नाम था स्ट्राइप जैसी पेमेंट स्टार्टअप, बेस सैन फ्रांसिस्को। चार राउंड, आखिरी में सीटीओ ने कहा, वी वांट यू। ऑफर आया, 240k डॉलर, H1B, रीलोकेशन।

मैंने हॉस्टल में चिल्ला कर दोस्तों को बताया। रात को पापा को फोन किया। पापा चुप रहे, फिर बोले, बेटा, बहुत बड़ी बात है। मां ने कहा, पासपोर्ट बनवा ले। मैंने टिकट देखना शुरू किया, अगस्त 2016 जॉइनिंग। मार्च, 2016 में होली पर घर आया। पापा कमजोर लग रहे थे। खांसी। मैंने कहा, डॉक्टर को दिखाओ। बोले, कुछ नहीं, ठंड लग गई। मां भी थकी थकी। मैंने सोचा, उम्र है। अप्रैल में फोन आया, मां का। पापा गिर गए, अस्पताल में। मैं भागा। डॉक्टर ने कहा, लंग्स में इंफेक्शन, साथ में हार्ट की प्रॉब्लम। एंजियोप्लास्टी करनी पड़ेगी। खर्च, 3 लाख। पापा के पास मेडिकल था, पर आधा ही कवर। मैंने अपनी इंटर्नशिप के पैसे, 2 लाख, निकाल कर दिए। ऑपरेशन हुआ। पापा बच गए। मैं वापस बॉम्बे गया, फाइनल प्रोजेक्ट। मई में फिर फोन, मां को चक्कर आए। जांच हुई, ब्रेस्ट कैंसर, स्टेज 2। डॉक्टर ने कहा, कीमो शुरू करो। 6 साइकल। हर साइकल 80 हजार। कुल 5 लाख, प्लस सर्जरी। मैं सुन्न। पापा रिटायर हो चुके थे। पेंशन 12 हजार। घर में सेविंग खत्म। मैंने दोस्तों से उधार मांगा, 1 लाख मिला। बाकी। जून में मैं घर बैठा था, ऑफर लेटर हाथ में। वीजा इंटरव्यू 15 जुलाई को था। फ्लाइट 10 अगस्त की। मां की पहली कीमो 20 जून को। मैंने पापा से कहा, मैं लोन लेता हूं।

पापा बोले, कौन देगा। घर गिरवी रखना पड़ेगा। मैंने कहा, रख देंगे। पापा ने मना किया। बोले, ये घर तेरी मां की निशानी है। उस रात मैं छत पर बैठा। आसमान में प्लेन जा रहा था। मैंने सोचा, यही प्लेन मुझे ले जाएगा। दूसरी तरफ मां नीचे दर्द में। मैंने अपने मेंटर को मेल किया। क्या जॉइनिंग डिफर हो सकती है 6 महीने। रिप्लाई आया-सॉरी विवेक, वी नीड पीपल नाउ। यू कैन रिप्लाई नेक्स्ट ईयर। मैंने फिर मेल किया, रिमोट पॉसिबल। नो।

14 जुलाई की रात। वीजा इंटरव्यू कल। मां की दूसरी कीमो परसों। पापा दवाई लेने गए थे। लौटे तो पर्ची गिर गई। झुक कर उठा नहीं पाए। मैंने उठाई। उस वक्त समझ आया, मैं अगर चला गया तो ये दोनों कैसे रहेंगे। पापा रिटायर्ड। बीमार। मां कीमो पर। कोई भाई बहन नहीं। रिश्तेदार मदद नहीं करते। कौन अस्पताल ले जाएगा, कौन दवाई लाएगा, कौन रात को पानी देगा। मैंने सुबह वीजा इंटरव्यू कैंसिल किया।

कंपनी को मेल लिखा, थैंक यू फॉर ऑफर, ड्यू टू फैमिली मेडिकल इमरजेंसी आई एम अनेबल टू जॉइन। दोस्तों ने फोन किया। पागल है क्या। 1.6 करोड़ की जॉब छोड़ रहा है। मैंने कहा, हां। मां को नहीं बताया। पापा को बताया। वह चुप रहे, फिर बोले, बेटा तेरा करियर। मैंने कहा, करियर फिर बन जाएगा, आप फिर नहीं मिलोगे। मैंने कानपुर में ही नौकरी खोजी। एक लोकल सॉफ्टवेयर कंपनी। सैलरी 35 हजार। मैंने जॉइन कर ली। सुबह 9 से शाम 6 ऑफिस।

शाम को अस्पताल। कीमो में मां के बाल गए। वह रोती। मैं विग ले आया। पापा की दवाई टाइम पर देता। 2016 से 2018। दो साल ऐसे निकले। मां की सर्जरी हुई, रिकवरी हुई। कैंसर रिमिशन में आया। पापा की तबीयत स्थिर। पर पैसे खत्म। मैंने लोन लिया 7 लाख। 2018 में कंपनी बंद हो गई। मैं बेरोजगार। इंटरव्यू दिए। बेंगलुरु से ऑफर आया 18 लाख। मैंने मना किया। पापा बोले जा बेटा। मैंने कहा, अब नहीं छोड़ सकता। मां को हर तीन महीने चेकअप, पापा को डायबिटीज। कौन देखेगा। दोस्त बोले- तू अपना करियर मार रहा है। मैंने कहा—करियर मेरा है, मां बाप भी मेरे। मैंने घर के नीचे छोटी सी दुकान खोली, पापा के नाम पर। शर्मा जनरल स्टोर। कंप्यूटर छोड़ कर दाल चावल बेचने लगा। पहले दिन शर्म आई। आईआईटी का लड़का दुकान पर। फिर एक आंटी आईं। बोलीं बेटा तुम्हारी मां ने मुझे पढ़ाया था। तुम दुकान खोलो, हम यहीं से लेंगे। धीरे-धीरे दुकान चली। मैं सुबह 6 बजे होलसेल मंडी जाता। सामान लाता। दिन में दुकान, रात को फ्रीलांस कोडिंग। 500 डॉलर की वेबसाइट बनाता। 2019 में मां पूरी तरह ठीक।

डॉक्टर ने कहा, क्लियर। उस दिन मैं दुकान बंद कर के मंदिर गया। प्रसाद चढ़ाया। घर आया तो पापा बोले, बेटा, तूने हमारे लिए सब छोड़ दिया। मैंने कहा छोड़ा नहीं, बदला है। 2020 लॉकडाउन। दुकान एसेंशियल में खुली। लोगों को राशन चाहिए था। मैंने होम डिलीवरी शुरू की। साइकिल पर जाता। पापा हिसाब लिखते। मां पैकिंग करतीं। उस लॉकडाउन में हमने 2 लाख कमाए। मैंने लोन का आधा चुका दिया। 2021 में मैंने दुकान के साथ एक छोटा कंप्यूटर क्लास शुरू किया। बच्चों को कोडिंग सिखाना शुरू किया। फीस 500 महीना। 20 बच्चे आए।

मुझे फिर से कोडिंग का मजा आया। 2022 में एक बच्चा अंश, जो मेरे पास पढ़ता था। उसने नेशनल ओलंपियाड जीता। न्यूज में आया, ‘कानपुर के किराना वाले आईआईटीयन से सीख कर जीता।’ वह आर्टिकल वायरल हुआ। उसी हफ्ते मुझे मेल आया स्ट्राइप के उसी सीटीओ से। लिखा था— विवेक, आई सॉ योर स्टोरी। वी आर ओपनिंग इंडिया ऑफिस। वुड यू लाइक टू लीड एजुकेशन इनिशिएटिव रिमोट, पार्ट टाइम। मैंने हां कहा। अब मैं सुबह दुकान, दोपहर क्लास, शाम को यूएस टीम के साथ काम। सैलरी डॉलर में नहीं, पर इज्जत में बहुत। पिछले महीने पापा 68 के हुए। मैंने छोटा सा फंक्शन रखा।

दोस्त आए, वही जो कहते थे कि तुमने करियर बर्बाद किया। पापा ने माइक लेकर कहा मेरा बेटा अमेरिका नहीं गया। पर मेरे पास रहा। जब मैं अस्पताल में था, उसने मेरा हाथ पकड़ा। जब इसकी मां के बाल गए, इसने चोटी बनाई। करियर तो बहुत लोग बनाते हैं, बेटा कोई कोई बनाता है। मां ने धीरे से कहा, मुझे आज भी वह ऑफर लेटर याद है। तूने अलमारी में क्यों रखा। मैंने कहा, ताकि याद रहे मैंने क्या छोड़ा। बोली, तूने छोड़ा नहीं, तूने चुना। आज दुकान पर बैठा हूं। सामने स्कूल के बच्चे टॉफी ले रहे हैं। लैपटॉप पर कोड चल रहा है।

पापा बगल में अखबार पढ़ रहे हैं, मां काउंटर पर बैठी हैं। कभी कभी रात को वह ऑफर लेटर निकालता हूं। 240,000 डॉलर। फिर मां की हंसी सुनता हूं, पापा की खांसी कम हुई है, देखता हूं। और लेटर वापस रख देता हूं। लोग पूछते हैं पछतावा होता है। मैं सच कहता हूं, पहले होता था। जब दोस्त बेंगलुरु से फोटो डालते थे यूएस ट्रिप की। अब नहीं। क्योंकि मैंने करियर का त्याग नहीं किया, मैंने करियर को रीडिफाइन किया। मेरा करियर अब सिर्फ कोड नहीं, केयर है।

मैंने माता पिता के लिए अमेरिका छोड़ा, पर उनके साथ जिंदगी जी ली। पापा को हर सुबह चाय दे पाता हूं, मां के पैर दबा पाता हूं। ये 2.4 करोड़ में नहीं मिलता। अगर फिर से मौका मिले, तो मैं फिर वही करूंगा। वीजा कैंसिल, जॉब छोड़, दुकान खोली। क्योंकि कुछ त्याग घाटा नहीं होते, वे निवेश होते हैं, प्यार में। और आज जब कोई बच्चा पूछता है, भैया आप आईआईटी करके दुकान क्यों, मैं हंस कर कहता हूं, क्योंकि मेरे माता-पिता मेरी सबसे बड़ी कंपनी हैं। और मैं उनका फुल टाइम सीईओ हूं।

Topics: सच्चा प्यारविवेक शर्मासाइंस गोल्ड मेडलिस्टअमेरिका सपनात्याग और समर्पणमाता पिता कीसेवाकंप्यूटरत्याग नहीं निवेशआईआईटी बॉम्बेमाता-पिताप्रेरणादायकजीवन दर्शनभावुक कहानी
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