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हम से अब पराया केक खाया नहीं जाएगा

जब बरसात बरसकर मन को तृप्त कर देगी तो समझेंगे कि किसी अपने ने बांहों में भरकर सम्मान दे दिया है। यह गर्मी, यह सर्दी ही अब हमारी है, यह अपने गांव की चारदीवारी ही हमारी है, यह घर की चौखट से बनी सुरक्षा ही हमारी है।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 11, 2025, 12:18 pm IST
inसोशल मीडिया

अभी उस बच्चे ने ऊआं-ऊआं किया भी नहीं था कि दादी ने बटुए से कुछ रुपये निकालकर नवजात के हाथ से छुआकर नर्स के हाथ पर रख दिए। बच्चे ने अधखुली आंखों से यह देख लिया और जान लिया कि मैं इस दुनिया में कुछ देने आया हूं। पहला जन्मदिन आया तब भी कुछ न कुछ बच्चे के हाथों से दान कराया गया और यह परंपरा बन गई। बच्चे से अक्सर कहा जाता कि हाथ देने के लिए हैं, मांगने के लिए नहीं। देते-देते मन के अंदर कब स्वाभिमान भरता चला गया, पता ही नहीं चला। किसी के आगे हाथ पसारना मानो इज्जत का सौदा कर लेना। हमारी पीढ़ी की जिंदगी इसी सत्य के साथ बड़ी होती गई। जैसे-जैसे बड़े होते गए, देने का भाव भी बढ़ता गया और जब दाता बन गए तो सम्मान भी मिलता गया। घर में जो भी बड़ा, वह सबसे अधिक सम्माननीय हो गया। माता-पिता तो मानो भगवान के बराबर हो गए। जो उनकी मर्जी, वही श्रेष्ठ, वही अनुकरणीय। घर में हर काम उन्हीं से पूछकर होता।

लेकिन नई पीढ़ी के साथ सब कुछ बदल गया। अब दान या देने का भाव श्रेष्ठ नहीं रहा। संतान को उपहार लेने की आदत पड़ गई, बात-बात में उपहार और दान का भाव नदारद। सम्मान न जाने किस कोने में जा छिपा! जो उपहार दे, वह सम्मान का पात्र होने लगा, लेकिन उपहार भी कब तक? बच्चे का हाथ पसरता चला गया। फिर इच्छित वस्तु पाने की लालसा उत्पन्न होने लगी और इस लालसा ने पाने की जिद को जन्म दिया। माता-पिता का संसार अलग हो गया और संतान का संसार अलग। एक का संसार स्वाभिमानपूर्ण और दूसरे का संसार वैभवपूर्ण।

एक ने दान दे-देकर सादगी को अपना लिया तो दूसरे ने उपहार पा-पाकर वैभव को अंगीकार कर लिया। एक अपने गांव-कस्बे में खुश तो दूसरा सरहदों को पार करने लगा। सरहदों के पार बच्चों की खुशियां बसने लगीं और सरहदों के दायरे में माता-पिता की खुशियां दम तोड़ने लगीं। उनका स्वाभिमान, उनकी सादगी अब बीते कल की बात हो गई। अरे! आप जितनी तनख्वाह से ज्यादा तो हमारे यहां चपरासी को मिलती है। दबी जुबान से यह बात कही जाने लगी। सम्मान ताक पर चला गया और वहीं से बैठा-बैठा समय के फेर को देखता रहा। एक दिन उसने भी छलांग लगाई और बच्चों की गोद में जा बैठा। घर में सम्मान का स्थान अब माता-पिता की जगह बच्चों के पाले में आ गया। बच्चे अनुकरणीय बनते चले गए, घर के काम उनकी इच्छा से होने लगे।

नन्हें अतिथि के स्वागत में पहले भी दादी-नानी बिछ जाती थीं, अब भी बिछने के लिए तैयार रहने लगीं, लेकिन अब परिदृश्य बदल गया। नन्हा मेहमान सरहदों के पार जन्म लेने लगा और सादगी व स्वाभिमान से परिपूर्ण जिंदगी सरहदों से भीख मांगने लगी। ‘मेरे रक्त से मिलने का अवसर दे दे’, सामने से दुत्कार आ जाती–हमारे वैभव में रम तो नहीं जाओगे? कैसे बताएं कि एक दाना भी मुफ्त का नहीं लिया और तुम हमें लालची सिद्ध कर रहे हो! सरहद के पहरेदारों की मर्जी पर आपका स्वाभिमान गिरवी रखवा दिया जाने लगा।

हम तो यह दोहा पढ़-पढ़कर बड़े हुए थे- रहिमन वे नर मर गए जो कहीं मांगन जायं और अब मांगने के साथ ही स्वाभिमान को मारने जैसा जतन हो गया। जब स्वाभिमान ही शेष नहीं रहा, तब जिंदगी भर कमाया आत्मविश्वास भी डोल गया। परदेस में ऐसा नहीं करना और वैसा नहीं करना की लाचारी हमेशा साथ चिपक गई। देश की मुद्रा बदल जाने से दान देने वाले हाथ रिक्त हो गए। हाथ रिक्त हुए तो सम्मान छिटक गया। माता-पिता एक असहाय से प्राणी, जिनकी समाज में कोई अहमियत नहीं होती, बनकर रह गए। कल तक जो मुठ्ठी भर दौलत में भी राजा बने हुए थे, आज परदेस में बसे पुत्र के सामने भिखारी से भी ज्यादा खराब स्थिति में आ गए।

सोशल मीडिया पर करता था अभद्र टिप्पणी। ( प्रतीकात्मक चित्र)

अपने गांव-देहात में कभी रसोइये के हाथ में 500 रुपये धरती तो कभी मेहतरानी के हाथ में 50 रुपये धर कर खुश हो लेती और दान के भाव को बनाकर अपने स्वाभिमान को सहेजकर रख लेती। घर की दादी अब उलझन में झूलने लगी। क्या-क्या बिसरा दूं? जब मखमल से बना घाघरा और उस पर गोटे-पत्ती के काम की ओढ़नी पहनकर गांव में निकलती थी तो उम्रदराज भी शोहदे बन जाते थे। क्या इस पहनावे को छोड़ दूं?

अपने पल्लू में हमेशा कुछ रुपये बांधकर निकलने वाली दादी, जब सामने कोई बच्चा मिल जाता तो झट गोली-बिस्कुट के नाम पर उसके हाथ में दो-चार रुपये धरकर बड़ा होने को भाव को छोड़ दूं? रात-बिरात कोई भी रिश्तेदार घर का दरवाजा खट-खटा देता और उसके लिये आधी रात को भी थाली में दो रोटी परोसने का मन का सुख छोड़ दूं? आस-पड़ोस में बच्चा होने पर दाई का हाथ बंटाने के लिए सबसे पहले जाकर खड़े हो जाने का कर्तव्य भाव छोड़ दूं? जच्चा-बच्चा के गीत छोड़ दूं या शादी-ब्याह के नाच छोड़ दूं? समधी दरवाजे पर खड़े हों तो गाली गाने का हक छोड़ दूं? गाय और कुत्ते को रोटी देने का रिवाज छोड़ दूं या आस-पड़ोस के बच्चों को खिलाने का शौक छोड़ दूं? अपनी जूती पहनकर गांव भर को नापने का अरमान छोड़ दूं। या नदी किनारे जाकर कपड़े धोने का चाव छोड़ दूं?

यदि इन सबको छोड़ दूं तो फिर जीने का आधार ही क्या रह जाएगा, तो क्यों न अपने देश में ही प्राण छोड़ दूं। नहीं, न प्राण छोड़े जाएंगे और न ही देश छोड़ा जाएगा। न दान देने का हाथ खींचा जाएगा, न मांगने को हाथ पसारा जाएगा। जब अपने देश की ठंडी हवा शरीर को छूकर निकलेगी तो समझेंगे कि किसी अपने ने सहला दिया है। जब बरसात बरसकर मन को तृप्त कर देगी तो समझेंगे कि किसी अपने ने बांहों में भरकर सम्मान दे दिया है। यह गर्मी, यह सर्दी ही अब हमारी है, यह अपने गांव की चारदीवारी ही हमारी है, यह घर की चौखट से बनी सुरक्षा ही हमारी है। हम चुटकी में चावल लेकर ही खीर बनाने को तैयार रहेंगे। हम से अब पराया केक खाया नहीं जाएगा।

Topics: माता-पिता
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