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होम कला-साहित्य पुस्तक समीक्षा

संस्कृति से सरोकार

लेखिका ने हजारों वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति की गहनता को समझाने और प्रस्तुत करने का अभूतपूर्व प्रयास किया है। यह पुस्तक कुल छह भाग में विभाजित है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अनेक विषयों के पश्चात प्रश्न-उत्तर के माध्यम से विषय को गहराई से समझाया गया है।

Written byडॉ निखिल यादवडॉ निखिल यादव
Feb 26, 2026, 10:32 pm IST
inपुस्तक समीक्षा

आज भारत अपनी सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता और वैश्विक भूमिका को पुनः परिभाषित कर रहा है। ऐसे समय में एक पुस्तक आई है-‘भारतीय संस्कृति : चुनौतियां और संभावनाएं।’ यह पुस्तक भारतीय संस्कृति के जटिल विषयों पर गहन विवेचन प्रस्तुत करती है। जैसे- क्या यह (भारतीय संस्कृति) एक ही संस्कृति है या अनेक संस्कृतियों का संगम, यह बाकी संस्कृतियों से किस प्रकार भिन्न है, और इसका मूल उद्देश्य क्या है।

इन गूढ़ प्रश्नों पर पुस्तक अत्यंत सरल, रोचक और तथ्यपरक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। साथ ही मार्गदर्शन भी देती है कि किस प्रकार हमारे सांस्कृतिक मूल्य और दर्शन हमारे वर्तमान और भविष्य की दिशा में सहायक हो सकते हैं। लेखिका निवेदिता रघुनाथ भिड़े के तर्क प्रत्येक पाठक को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, साथ ही अपनी संस्कृति पर गर्व करने का अवसर भी देते हैं। इसके अतिरिक्त, यह पुस्तक पाठकों को तथ्यपरक और ज्ञानवर्धक अनुभव प्रदान करती है, जिससे वे भारतीय संस्कृति की गहनता और व्यापकता को समझ सकें। किसी भी पुस्तक का विचार, लेखन-शैली और भाव उसके लेखक को भी परिभाषित करता है।

यह पुस्तक इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी लेखिका ने विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी की जीवनव्रती कार्यकर्ता के रूप में अपना संपूर्ण जीवन भारतीय संस्कृति को आत्मसात करने, उसे व्यवहार में उतारने और उसके प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया है। अपने लगभग पचास वर्ष के सामाजिक जीवन में उन्होंने देश के विविध भागों में रहकर कार्य किया, भारतीय सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों का गहन अध्ययन किया और सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों को प्रत्यक्ष अनुभव किया। जब ऐसा जीवनानुभव किसी पुस्तक के रूप में अभिव्यक्त होता है, तो उसकी प्रामाणिकता और महत्ता स्वतः ही कई गुना बढ़ जाती है।

पुस्तक कुल छह भाग में विभाजित है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अनेक विषयों के पश्चात् प्रश्न-उत्तर के माध्यम से विषय को गहराई से समझाया गया है। एडवोकेट जे. साई दीपक द्वारा लिखित प्रस्तावना में इस पुस्तक को वर्तमान चुनौतियों के समक्ष स्थायी समाधान प्रस्तुत करने वाली कृति के रूप में वर्णित किया गया है।

प्रथम भाग पाठक को पुस्तक के उद्देश्य और विषयवस्तु से परिचित कराता है। द्वितीय भाग जीवन- दर्शन को संस्कृति का आधार मानते हुए उसके मूल स्वरूप की विवेचना करता है। तृतीय भाग जीवन-मूल्यों को संस्कृति की मेरुदंड के रूप में प्रस्तुत करता है। इस भाग में स्त्री-विमर्श से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर भी गहन प्रकाश डाला गया है, जो पाठकों को वर्तमान में इससे जुड़े प्रश्नों को गहराई से समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।

वहीं चतुर्थ भाग जीवन-व्यवस्था को जीवन-दर्शन तथा मूल्यों को आत्मसात करने की एक सुसंगठित प्रणाली के रूप में परिभाषित करता है। इस भाग में कुल-धर्म, जाति-धर्म, पंचमहायज्ञ, आश्रम-व्यवस्था, वर्ण एवं जाति-व्यवस्था, सांस्कृतिक मूल्य जैसे विषयों के साथ यह भी स्पष्ट किया गया है कि कैसे भारत, जो कभी विश्व का सर्वाधिक साक्षर राष्ट्र था, योजनाबद्ध रूप से निरक्षर बना दिया गया। स्वतंत्रता से पूर्व की भारतीय शिक्षा-व्यवस्था और ब्रिटिश शासन के पश्चात् उसके विनाश को ठोस तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया गया है।

पंचम भाग ब्रिटिश शासन द्वारा दिए गए उन गहरे आघातों की चर्चा करता है, जिनसे राष्ट्र-मानस को खंडित किया गया। किस प्रकार भ्रमों को जन्म देकर विभिन्न जातियों को एक-दूसरे के विरुद्ध भड़काया गया, नए-नए विमर्श गढ़े गए-जैसे आर्य-द्रविड़ विभाजन, जनजातियों में भ्रांतियां फैलाना, उन्हें ‘आदिवासी’ कहकर हिंदू सांस्कृतिक प्रवाह से अलग करने के प्रयास, तथा तथाकथित सेकुलरिज़्म के नाम पर राष्ट्र की संस्कृति और सभ्यता को आगे बढ़ने से रोकना-इन सभी विषयों का विश्लेषण इस भाग में मिलता है। अंतिम एवं षष्ठ भाग प्रतिसाद की चर्चा करता है-व्यक्तिगत स्तर पर और संगठित रूप में हम क्या कर सकते हैं, इस पर विचार करता है। साथ ही एक राष्ट्र के रूप में भारत को अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैश्विक भूमिका कैसे निभानी चाहिए, इसका स्पष्ट मार्गदर्शन भी प्रस्तुत करता है।

लेखिका ने हजारों वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति की गहनता को समझाने और प्रस्तुत करने का अभूतपूर्व प्रयास किया है। यह पुस्तक उन कार्यकर्ताओं को प्रबुद्ध और प्रेरित कर सकती है, जो अपनी संस्कृति पर आक्रमण नहीं होने देना चाहते और इसके अमूल्य मूल्यों की रक्षा करना चाहते हैं। यह पुस्तक इस बात पर भी बल देती है कि हम न केवल भारतीय ऋषियों द्वारा उद्घोषित विश्व को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देने के दायित्व का स्मरण रखें, बल्कि उस दायित्व को निभाने के लिए प्रत्येक क्षेत्र में समुचित रूप से विकसित भी हों।

Topics: स्त्री विमर्शसांस्कृतिक प्रवासेकुलरिज्मनिवेदिता रघुनाथ भिड़ेआध्यात्मिक मार्गदर्शनजीवन दर्शनराष्ट्रीय अस्मितावैश्विक भूमिकागहन विवेचनसंस्कृति की मेरुदंडभारतीय संस्कृतिजीवन-व्यवस्थासनातन संस्कृतिऔपनिवेशिक आघातसांस्कृतिक चेतनाभ्रम और विमर्श
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