मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ: एक रुपये की टॉफी से 'मेक इन इंडिया' का ग्लोबल मास्टरस्ट्रोक!
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मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ: एक रुपये की टॉफी से ‘मेक इन इंडिया’ का ग्लोबल मास्टरस्ट्रोक!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साबित कर दिया कि कभी-कभी दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक समझौतों की नींव महज एक रुपये की टॉफी से भी रखी जा सकती है।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
May 20, 2026, 05:43 pm IST
in बिजनेस
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को मेलोडी गिफ्ट करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को मेलोडी गिफ्ट करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

कहते हैं कि कूटनीति बड़े-बड़े बंद कमरों में, भारी-भरकम फाइलों और सीरियस चेहरों के बीच होती है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साबित कर दिया कि कभी-कभी दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक समझौतों की नींव महज एक रुपये की टॉफी से भी रखी जा सकती है।

हाल ही में इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को पीएम मोदी द्वारा ‘मेलोडी’ टॉफ़ी गिफ्ट करने का वीडियो सोशल मीडिया पर क्या आया, इंटरनेट पर तो जैसे मीम्स और कूटनीति का ऐसा कॉकटेल बना कि एलन मस्क भी सोच में पड़ गए होंगे कि ‘ये हो क्या रहा है भाई!’

‘थैंक यू फॉर द गिफ्ट’: जब AI नहीं, असली मेलोडी गूंजी X पर

शुरुआत में जब यह खबर उड़ी, तो आज के डीपफेक के जमाने में लोगों को लगा कि यह पक्का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की कोई शरारत है। लेकिन सस्पेंस तब खत्म हुआ जब खुद इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी ने अपने ऑफिशियल ‘एक्स’ (ट्विटर) हैंडल से वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा— “थैंक यू फॉर द गिफ्ट!”

अब इधर मेलोनी जी मुस्कुराईं, उधर पूरा भारतवर्ष गदगद हो गया। विपक्ष भले ही इस केमिस्ट्री को देखकर मुंह बिचकाता रहे, लेकिन मुंह बिचकाने से क्या होगा? भारत का बच्चा-बच्चा जानता है कि ‘मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ’ कि इसमें इतना चॉकलेट क्यों है! मोदी जी ने इस एक रुपये की टॉफी से स्वदेशी की ऐसी ब्रांडिंग की कि ‘मेड इन इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ का डंका सीधे रोम की गलियों तक गूंज उठा।

कन्फेक्शनरी से कॉरिडोर तक: एक टॉफी और अरबों का बिजनेस

जरा क्रोनोलॉजी समझिए। उधर विपक्ष के कुछ नेता महीनों तक विदेशी दौरों, प्रेस कॉन्फ्रेंसों और भारी-भरकम प्रोपेगैंडा में पैसा पानी की तरह बहाते रहे, और इधर मोदी जी ने मेलोडी का एक पैकेट थमाकर न सिर्फ दिल जीता, बल्कि इंडो-मेडिटेरेनियन बिजनेस कॉरिडोर जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स और बड़े-बड़े रणनीतिक समझौतों की जमीन तैयार कर दी। इसे कहते हैं ‘स्मार्ट कूटनीति’—खर्चा कम, असर सबसे ज्यादा!

लेकिन इस मेलोडी डिप्लोमेसी ने सिर्फ दो देशों के रिश्ते ही मीठे नहीं किए, बल्कि भारत के कन्फेक्शनरी और FMCG सेक्टर को ग्लोबल हेडलाइंस में ला खड़ा किया है। भारत का कन्फेक्शनरी बाजार आज दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है। चॉकलेट, टॉफी और कुकीज़ के मामले में भारत अब सिर्फ एक कंज्यूमर नहीं, बल्कि एक बड़ा एक्सपोर्टर बनने की राह पर है। इटली, जो खुद अपनी ‘फरेरो रोशर’ (Ferrero Rocher) जैसी प्रीमियम चॉकलेट्स के लिए जाना जाता है, वहां भारत की पारले (Parle) की मेलोडी का पहुंचना यह दिखाता है कि भारतीय स्वाद में ग्लोबल होने का कितना दम है।

शेयर बाजार का ‘मेलोडी’ कन्फ्यूजन

अब जहां इतनी बड़ी चर्चा हो, वहां भारतीय शेयर बाजार के ‘भोले-भाले’ निवेशक पीछे कैसे रहते? जैसे ही मोदी जी द्वारा मेलोनी को मेलोडी गिफ्ट करने की खबर आई, दलाल स्ट्रीट पर एक अजीब सा भूचाल आ गया। खुदरा निवेशक पारले की कंपनी के शेयर ढूंढने लगे।

यहाँ पर एक बड़ा ही मजेदार और तथ्यात्मक ट्विस्ट है, जिसे समझना जरूरी है:

पारले प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (Unlisted)

मेलोडी, पारले-जी, हाइड एंड सीक और मोनाको जैसे लीजेंड्री ब्रांड्स बनाने वाली असली एफएमसीजी दिग्गज कंपनी पूरी तरह से चौहान परिवार के स्वामित्व में है। यह पूरी तरह प्राइवेट (Unlisted) कंपनी है, जिसका कोई शेयर बीएसई (BSE) या एनएसई (NSE) पर मौजूद नहीं है।

पारले इंडस्ट्रीज लिमिटेड (Listed – BSE: 532911):

शेयर बाजार पर इस नाम की एक कंपनी लिस्टेड जरूर है, लेकिन इसका बिस्कुट या टॉफी से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। यह रियल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर और वेस्ट रीसाइक्लिंग का काम करती है।

जब -जब पारले-जी या मेलोडी को लेकर कोई बड़ी नेशनल या इंटरनेशनल खबर आती है, तब-तब उत्साही निवेशक गलती से ‘पारले इंडस्ट्रीज’ के शेयर खरीदने दौड़ पड़ते हैं, जिससे उस कंपनी का शेयर बिना किसी वजह के अपर सर्किट छूने लगता है। तो भाई, मेलोडी डिप्लोमेसी अपनी जगह है, लेकिन निवेश करने से पहले ‘खुद जान जाओ’ वाले फॉर्मूले पर रिसर्च जरूर कर लें!

‘मेक इन इंडिया’ का मीठा स्वाद

इस पूरे वाकये ने यह साबित कर दिया है कि ब्रांडिंग के लिए हमेशा करोड़ों के विज्ञापनों की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक सही समय पर दिया गया ‘देसी गिफ्ट’ दुनिया के सबसे बड़े मंच पर देश की साख बढ़ा देता है। मोदी जी ने जॉर्जिया मेलोनी को भारत आने का निमंत्रण भी दे दिया है। अब देखना यह है कि जब मेलोनी जी भारत आएंगी, तो उन्हें पारले-जी चाय में डुबोकर खिलाया जाता है या कुछ और!

पर इतना तो तय है कि भारत की कन्फेक्शनरी का यह ‘मीठा जादू’ कूटनीति के रास्ते वैश्विक व्यापार के नए दरवाजे जरूर खोल रहा है।

आइये अब बात कर लेते हैं भारत और इटली की कन्फेक्शनरी मार्केट की भी। क्योंकि वैश्विक कन्फेक्शनरी बाजार में भी भारत की धमक है। अमेरिका, चीन और जर्मनी जैसे देशों के साथ कदमताल करता चलता है।

भारत में कन्फेक्शनरी मार्केट

कन्फेक्शनरी मार्केट वैल्यू लगभग 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब ₹38,000 से ₹40,000 करोड़ रुपये) है। इसमें मुख्य रूप से चॉकलेट, कैंडी, टॉफी और च्युइंग गम शामिल हैं। इसमें बेकर्स कन्फेक्शनरी (कुकीज और पैक्ड केक) के कुछ हिस्सों को जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा 6 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाता है।

विभिन्न रिपोर्ट के मुताबिक बाजार में सालाना ग्रोथ रेट 5% से 7.5% के बीच है। शहरों के विस्तार और व्यस्त जीवनशैली के कारण ‘ऑन-द-गो’ स्नैकिंग और पैक्ड कन्फेक्शनरी की मांग तेजी से बढ़ी है। क्विक-कॉमर्स (जैसे Blinkit, Zepto) और सुपरमार्केट्स की वजह से इसकी पहुंच बहुत आसान हो गई है।

प्रीमियमाइजेशन का ट्रेंड चल रहा है। लोग डार्क चॉकलेट, ऑर्गेनिक, शुगर-फ्री, और ‘आर्टिसनल’ प्रोडक्ट्स के लिए ज्यादा पैसे देने को तैयार हैं।

दुनिया भर में मेलोडी को लेकर चर्चा हो रही है तो इसके और इसे बनाने वाली कंपनी के बारे में बात कर लेते हैं। भारत के बाजार को मेलोडी का स्वाद 1982-83 के दौरान लगा।  इसे पारले कंपनी बनाती है।

पारले से जुड़ी खास बातें

स्थापना: साल 1929 में ब्रिटिश शासन के दौरान चौहान परिवार ने की थी। यह परिवार स्वदेशी आंदोलन से बेहद प्रभावित था और ब्रिटिश बिस्कुट कंपनियों को भारतीय बाजार में टक्कर देना चाहता था।

नाम की वजह: इस कंपनी की पहली फैक्ट्री मुंबई के विले पारले (Vile Parle) इलाके में लगी थी, इसी जगह के नाम पर कंपनी का नाम ‘पारले’ पड़ा।

पारले-जी : कंपनी ने साल 1939 में बिस्कुट बनाना शुरू किया, जिसे शुरुआत में ‘पारले ग्लूको’ कहा जाता था। आज पारले-जी दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाले बिस्कुट ब्रांड्स में से एक है।

आज के समय में चौहान परिवार का यह बिजनेस मुख्य रूप से तीन अलग-अलग भारतीय कंपनियों में बंट चुका है, जो पूरी तरह स्वदेशी है-

पारले प्रोडक्ट्स : जो पारले-जी, 20-20, क्रैकजैक, हाइड एंड सीक और मेलोडी जैसी खाने-पीने की चीजें बनाती है।

पारले एग्रो : जो फ्रूटी और एप्पी फिज़ जैसे पेय पदार्थ बनाती है।

बिसलेरी इंटरनेशनल : जो पानी का ब्रांड ‘बिसलेरी’ संभालती है।

यह कंपनी एक सदी से भारतीय एंटरप्राइज के रूप में काम कर रही है और इसका मालिकाना हक आज भी चौहान परिवार के पास ही है।

इटली में क्या है मार्केट

इटली में कन्फेक्शनरी मार्केट लगभग 9 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है। 2033 तक इसके 11.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की संभावना है।

भारत की विपक्षी पार्टियां प्रधानमंत्री के मास्टर स्ट्रोक को नहीं समझ पाती हैं। यह मेलोडी नहीं, स्वदेशी की हनक थी। विपक्ष के सवालों का बस एक ही जवाब है – मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ।

Topics: Giorgia Meloniजॉर्जिया मेलोनीmelody toffeeमेलोडीमेलोडी पर राजनीतिMelodiपीएम मोदी मेलोनी मेलोडी टॉफीमेलोडी खाओ खुद जान जाओपीएम मोदीपारले मेलोडी टॉफी इटलीPM Modiभारत इटली संबंध 2026इटली की प्रधानमंत्रीकूटनीति में मेलोडी
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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