धार । मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर धार में स्थित मां वाग्देवी के परम पवित्र धाम भोजशाला में इस बार का शुक्रवार (22 मई) एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक गौरव का साक्षी बनने जा रहा है। इंदौर हाई कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के बाद, अब हिंदू समाज आगामी 22 मई को पूरे स्वाभिमान और सम्मान के साथ भोजशाला परिसर में मां सरस्वती का भव्य पूजन-अर्चन और महाआरती करने जा रहा है।
भोज उत्सव समिति के संरक्षक अशोक जैन ने मंगलवार को एक पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए इसे एक युगांतरकारी क्षण बताया। उन्होंने कहा कि लगभग 721 वर्षों के लंबे और अनवरत संघर्ष के बाद हिंदू समाज को इस रूप में निर्बाध पूजा करने का यह पावन अवसर मिल रहा है।
22 मई का महा-आयोजन: धान मंडी से प्रस्थान करेगी भव्य यात्रा
अशोक जैन ने पत्रकार वार्ता में आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा साझा करते हुए बताया-
- सामूहिक प्रस्थान: 22 मई शुक्रवार को दोपहर ठीक 12 बजे धान मंडी चौराहे से सकल हिंदू समाज सामूहिक रूप से भव्य यात्रा के रूप में भोजशाला के लिए प्रस्थान करेगा।
- महाआरती का समय: दोपहर 1 बजे भोजशाला परिसर के भीतर मां वाग्देवी की भव्य महाआरती का आयोजन किया जाएगा।
- प्रमुख उपस्थिति: इस ऐतिहासिक घोषणा के दौरान भोजशाला आंदोलन से अनवरत जुड़े रहने वाले प्रखर कार्यकर्ता दीपक बिड़कर, सोनू गायकवाड सहित बड़ी संख्या में मातृशक्ति और युवा उपस्थित रहे।
अलाउद्दीन खिलजी के दंश से मुक्ति: 1997 के आंदोलन को मिला मुकाम
समिति के संरक्षक ने ऐतिहासिक तथ्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि राजा भोज द्वारा निर्मित इस पावन विद्या केंद्र और मां सरस्वती मंदिर पर वर्ष 1305 में क्रूर मुगल आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी के समय अवैध कब्जा किया गया था। तब से लेकर आज तक हिंदू समाज अपने इस गौरव को वापस पाने के लिए लगातार संघर्षरत रहा है।
उन्होंने बताया कि अनेक पूज्य संतों, सामाजिक संगठनों और राष्ट्रभक्त आंदोलनकर्ताओं के त्याग और तपस्या के बल पर वर्ष 1997 में जिस निर्णायक आंदोलन की शुरुआत हुई थी, उसे 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के बाद एक महान मुकाम हासिल हुआ है।
न्यायालयीन आदेश के बाद अब पुरातत्व विभाग (ASI) भी शासकीय रूप से इस पूरे परिसर को केवल “भोजशाला” नाम से ही संबोधित कर रहा है। यदि कोई अन्य कानूनी अड़चन नहीं आती है, तो इस शुक्रवार को इतिहास में पहली बार बिना किसी रुकावट के हिंदू समाज वहां महाआरती संपन्न करेगा।
भोजशाला में महासत्याग्रह और महाविजय महोत्सव: गूंजे वैदिक मंत्र
उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद धार की भोजशाला मंगलवार को ही आस्था, संस्कृति और असीम उत्साह के एक विशाल केंद्र में बदल गई थी। पहली बार आयोजित हुए इस ‘महासत्याग्रह’ और ‘महाविजय महोत्सव’ में हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। पूरे परिसर में “जय मां वाग्देवी”, “जय श्रीराम” के उद्घोष और पवित्र वैदिक मंत्रों की गूंज से दिशाएं गुंजायमान हो उठीं.
महिलाओं और संतों की भारी भागीदारी, हुई भव्य आतिशबाजी
सुबह तय समय पर शुरू हुआ यह सत्याग्रह पहले से कहीं अधिक व्यापक और भव्य स्वरूप में दिखाई दिया। बड़ी संख्या में मातृशक्ति, युवा और संत समाज हाथों में भगवा ध्वज लिए भोजशाला पहुंचे।
- धार्मिक अनुष्ठान और हवन: महासत्याग्रह के समापन के बाद मां वाग्देवी की विशेष पूजा-अर्चना और विधि-विधान से हवन किया गया। श्रद्धालुओं ने परिसर में जल रही ‘अखंड ज्योति’ के दर्शन किए, जिसे लोग सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण के रूप में देख रहे हैं।
- दीपों से जगमगाई भोजशाला: शाम होते ही पूरा परिसर रंग-बिरंगी आतिशबाजी और हजारों दीपों की रोशनी से सराबोर हो उठा। महाराजा भोज स्मृति वसंतोत्सव समिति और सकल हिंदू समाज के नेतृत्व में इस सफल आयोजन ने समाज की सक्रियता और एकजुटता का एक अमिट संदेश दिया है।
अदालत की कसौटी पर सत्य: क्या है ASI की 2,189 पन्नों की रिपोर्ट में?
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की इंदौर खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट माना था कि “पुरातत्व एक विज्ञान है” और इस विवाद का अंत करने के लिए वैज्ञानिक निष्कर्षों पर पूरी तरह भरोसा किया जा सकता है। एएसआई के 98 दिनों के सर्वे और उसकी 2,189 पृष्ठों की विस्तृत रिपोर्ट ने भोजशाला के मंदिर होने के अकाट्य प्रमाण देश के सामने रखे हैं:
1. नींव में उत्कीर्ण है ‘शारदा सदन’: वैज्ञानिक खुदाई के दौरान वर्तमान ढांचे के ठीक नीचे 10वीं-11वीं शताब्दी की परमारकालीन मजबूत नींव पाई गई है। सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि यहाँ मिले बेसाल्ट पत्थरों पर स्पष्ट अक्षरों में ‘शारदा सदन’ लिखा हुआ है, जो राजा भोज के काल के सुप्रसिद्ध संस्कृत विश्वविद्यालय और सरस्वती मंदिर का ही नाम था।
2. ‘आइकॉनोग्राफिक इरेजर’ से पहचान मिटाने की क्रूर कोशिश: रिपोर्ट के अनुसार, बाद के कालखंड में मस्जिद का निर्माण करने के लिए प्राचीन हिंदू मंदिर के ही स्तंभों और शिलाखंडों का पुनरुपयोग किया गया। इस दौरान मंदिर के सनातनी प्रतीकों, मूर्तियों और संस्कृत के श्लोकों को जानबूझकर छेनी-हथौड़ी से घिसकर मिटाने (Iconographic Erasure) या पत्थरों को जानबूझकर उल्टा और आड़ा-तिरछा लगाने का प्रयास किया गया ताकि मंदिर की पहचान छिप सके।
1455 ईस्वी का फारसी शिलालेख देता है गवाही: परिसर के भीतर मालवा सल्तनत के शासक महमूद खिलजी के काल (1455 ईस्वी) का एक फारसी शिलालेख मिला है। एएसआई द्वारा किए गए इसके आधिकारिक अनुवाद (खंड 4, पृष्ठ 260) में यह साफ लिखा है कि: “एक पुराने आश्रम (शिक्षण केंद्र/मंदिर) को ध्वस्त कर मूर्तियों को नष्ट किया गया और उसे नमाज की जगह (मस्जिद) में परिवर्तित किया गया।”
भोजशाला की स्थापत्य कला: मंदिर होने के 5 जीवंत प्रमाण
- स्तंभों की विशिष्ट कला: इस परिसर में कुल 106 मुख्य स्तंभ और 82 अर्धस्तंभ हैं। इन सभी पर कीर्तिमुख (सिंहमुख), नागबंध, चैत्य गवाक्ष और कमल के पत्तों की सुंदर नक्काशी है, जो शुद्ध रूप से मध्यकालीन भारतीय मंदिर शैली की पहचान है।
- संस्कृत शिलालेखों की बहुलता: सर्वे के दौरान परिसर से 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख मिले हैं, जबकि इसके विपरीत अरबी-फारसी के केवल 56 अभिलेख ही मिले।
- मूर्तियों के प्रामाणिक साक्ष्य: सर्वे के दौरान परिसर और उसके मलबे से भगवान गणेश, ब्रह्मा, नृसिंह और अर्धनारीश्वर सहित कुल 94 मूर्तियों के अवशेष और वास्तु चिन्ह मिले हैं।
- सम्राट भोज की कालजयी रचनाएं: यहाँ के विशाल पत्थरों पर स्वयं महाराजा भोज द्वारा रचित ‘अवनीकुर्मास्तन’ और उनके गुरु मदन द्वारा रचित ‘पारिजात मंजरी’ नाटिका के अंश उत्कीर्ण हैं।
- परमारकालीन सिक्के: खुदाई में 10वीं से 11वीं शताब्दी के इंडो-सासानियन सिक्के भी प्राप्त हुए हैं, जो परमार राजवंश के वैभवशाली शासनकाल की पुष्टि करते हैं।
शिक्षा का वैश्विक केंद्र थी राजा भोज की भोजशाला
परमार-पंवार राजवंश पर 12 वर्षों तक गहन शोध करने वाले और राजा भोज कल्याण सेवा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेंद्र सिंह पंवार के अनुसार, भोजशाला केवल एक धार्मिक स्थल नहीं थी। यह महाराजा भोज के काल में भारत का एक विख्यात और महान संस्कृत विश्वविद्यालय (महाविद्यालय) था, जहाँ सुदूर क्षेत्रों से छात्र विद्या ग्रहण करने आते थे।
पवित्र पत्थरों पर व्याकरण और शिक्षा से जुड़े नागबंध लेख मिलना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि यह मां सरस्वती की आराधना के साथ-साथ ज्ञान की साधना का सर्वोच्च केंद्र था। दिनभर चले इस भव्य आयोजन ने आज धर्म और संस्कृति के संरक्षण को लेकर समाज की सक्रियता और एकजुटता का एक अमिट संदेश दिया है।

















