थोलंग गांव : भीषण बर्फबारी, 6 महीने बिजली और सड़क नहीं, फिर भी अधिकारियों की खान
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थोलंग गांव : भीषण बर्फबारी, 6 महीने बिजली और सड़क नहीं, फिर भी अधिकारियों की खान

अधिकारियों की खान कहा जाने वाला एक गाँव ऐसा भी है जहाँ हर घर से क्लास वन ऑफिसर है I हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में स्थित थोलंग गाँव की कहानी विपरीत परिस्थितियों में भी शिक्षा और दृढ़ इच्छाशक्ति से सफलता पाने की एक अद्भुत मिसाल है।

Written byप्रमोद कुमारप्रमोद कुमार
May 19, 2026, 11:09 am IST
inजीवनशैली, पर्यावरण, हिमाचल प्रदेश

अधिकारियों की खान कहा जाने वाला एक गाँव ऐसा भी है जहाँ हर घर से क्लास वन ऑफिसर है I हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में स्थित थोलंग गाँव की कहानी विपरीत परिस्थितियों में भी शिक्षा और दृढ़ इच्छाशक्ति से सफलता पाने की एक अद्भुत मिसाल है। यह छोटा सा गाँव, जो साल के 6 महीने भारी बर्फबारी के कारण दुनिया से कटा रहता है, अपनी असाधारण शैक्षणिक उपलब्धियों के कारण पूरे भारत में “ऑफिसर्स विलेज” के रूप में जाना जाता है। थोलंग गाँव यह साबित करता है कि भौगोलिक दुर्गमता और कठिन परिस्थितियां सफलता के रास्ते में बाधा नहीं बनतीं, अगर शिक्षा को प्राथमिक हथियार बना लिया जाए।

हिमालय की गोद में बसा लगभग 400 लोगों की आबादी और महज 34-36 घरों वाले थोलंग गाँव ने देश को 100 से अधिक गज़ेटेड ऑफिसर दिए हैं, जिनमें आईएएस, आईपीएस, एचएएस, डॉक्टर और इंजीनियर बहुतायत में हैं।

पहला अधिकारी बनने का श्रीगणेश

थोलंग गाँव में सबसे पहले अमरनाथ विद्यार्थी 1964 बैच के आईएएस अधिकारी बने, इन्होने गाँव में शिक्षा की नींव रखी उसके उपरांत 1968 बैच आईएएस अफसर बने स्व. प्रेम चंद जिन्हें डॉ. पीडी लाल अर्थात प्रेम चंद के नाम से भी जाना जाता है I डॉ. पीडी लाल ने गाँव के युवाओं को उच्च शिक्षा की राह दिखाई। जनजातीय बहुल गाँव होने के कारण जागरूकता की ऐसी बयार चली, इस गाँव के लोग जनजातीय कल्याण की नीतियों का सही लाभ उठाने में अग्रणी रहने लगे। इन योजनाओं से लाभान्वित होने के उपरांत सभी युवा अपनी पढाई और सुनियोजित प्रतियोगी परीक्षाओं की ओर ध्यान देने लगे I परिणामतः अधिकारी बनने का शिलशिला प्रारंभ हो चला I

गाँव में सौ प्रतिशत साक्षरता

यह गाँव लाहौल घाटी में एक अत्यंत दुर्गम स्थान पर स्थित है I सर्दियों में जहाँ 6 महीने तक यहाँ बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव रहता है। जहाँ के लोग बौद्ध मत का पालन करते हैं और स्थानीय देवता राजा घेपन में अटूट विश्वास रखते हैं।

भौगोलिक पर्यावरणीय विषमताओं को चुनौतियाँ देते हुए इतनी दुर्गम जगह पर होने के बावजूद भी, यहाँ साक्षरता दर 100 प्रतिशत है एवं यहाँ की लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं स्नातक हैं।

शिक्षा को बनाया हथियार

1920 के दशक में, जब आसपास के क्षेत्रों में शिक्षा का नामोनिशान नहीं था, तब गाँव में विद्यालय की स्थापना हुई, गाँव वालों को तभी समझ में आ गया था कि दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और गरीबी से लड़ने का एकमात्र रास्ता शिक्षा है। शिक्षा को ही थोलंग ग्रामवासियों ने अपनी सफलता का आधार शिक्षा को बनाया ।

पिछले चार दशकों में, गाँव के 8 से अधिक निवासियों ने सर्वोच्च सिविल सेवाओं में स्थान प्राप्त किया है। इनमें से ए.एन. विद्यार्थी हिमाचल के पूर्व मुख्य सचिव रहे । श्री राम सिंह ठाकुर एवं नाज़िन विद्यार्थी आईपीएस रहे । गाँव के कई युवाओं ने भारतीय सेना, इंजीनियरिंग और चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है।

सफलता के कारण

कठिन भौगोलिक स्थिति ने निवासियों को अधिक उद्यमी और मेहनती बनाया। पहले के सफल अधिकारियों को देखकर नई पीढ़ी भी सिविल सेवाओं की ओर प्रेरित होती रही। अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने और अच्छी शिक्षा ने सरकारी नौकरियों के द्वार खोले।
शिक्षा के साथ-साथ, थोलंग की महिलाएं भी आत्मनिर्भर बनी और घरों को संभाला जिससे गाँव के अधिकतम परिवार अपनी संतानों को समुचित शिक्षा प्रदान कर सके । स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से, महिलाएं घर में पाली गई भेड़ों के ऊन से मोज़े और अन्य गर्म कपड़े बनाकर, अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का कम किया।

क्या कहते हैं लोग

गाँव के प्रति धारणा के विपरीत अपने गाँव के प्रति स्वाभिमान और गर्व का अनुभव करने हेतु हमारे गाँव ने शिक्षा अस्त्र बनाकर जीवन संग्राम में मजबूती से खड़े होने का काम किया I दुर्गमता को कमजोरी नहीं वरन वर्ष में छ: माह बर्फ़बारी और ठण्ड के कारण घरों में रहने की मज़बूरी को अवसर के रूप में ग्रामीणों ने अपनाया और यही से कामयाबी की राह बनी I
-युवराज बोध, थोलंग, निवासी

थोलंग गाँव समुद्र तल से लगभग 9,970 फीट की ऊँचाई पर है, शीत ऋतु में 6 महीने के लिए क्षेत्र में अत्यधिक बर्फ रहने के कारण शेष दुनिया से कटा रहने वाला यह गाँव अपनी सादगी और प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जाना जाता है। इस गाँव जौ, मटर, सेब, चेरी और आलू के सीढ़ीदार खेती होती है। गाँव का समुदाय अत्यंत घनिष्ठ है और एक-दूसरे का सहयोग करने वाला है, यही यहाँ की सफलता का मुख्य आधार भी है।

Topics: सीढ़ीदार खेतीराजा घेपनपाञ्चजन्य विशेषजनजातीय क्षेत्रमेरा गांव मेरी पहचानथोलंग गांवऑफिसर्स विलेजअधिकारियों की खानलाहौल-स्पीति जिलालाहौल घाटीहिमाचल प्रदेशमहिला आत्मनिर्भरता
प्रमोद कुमार
प्रमोद कुमार
पाञ्चजन्य में असिस्टेंट एडिटर। राष्ट्रीय मुद्दों और सामाजिक सरोकार में रुचि। [Read more]
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