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‘सार्वजनिक भूमि पर नमाज नहीं’

गत 4 अप्रैल को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने संभल जिले के इकोना गांव में एक जमीन पर नमाज अदा करने की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति कानून द्वारा शासित होती है और सभी के लिए होती है। इसलिए किसी को भी सामान्य मजहबी आयोजनों के लिए इसका प्रयोग करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता

Written byआदित्य कश्यपआदित्य कश्यप
May 13, 2026, 10:03 pm IST
in विश्लेषण, उत्तर प्रदेश
नमाज अदा करते मुसलमान (फाइल चित्र)

नमाज अदा करते मुसलमान (फाइल चित्र)

भारत में आस्था केवल पूजा-पद्धति नहीं है, वरन् यह जीवन-पद्धति है। यह मनुष्य के भीतर की श्रद्धा, परिवार की परंपरा, समाज की स्मृति और राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी होती है। इसीलिए हमारे संविधान ने धर्म या मजहब के अधिकार को बहुत अधिक महत्व दिया है। किंतु भारत की सभ्यता ने सदैव यह भी सिखाया है कि अपनी आस्था का सम्मान तभी सार्थक है, जब हम दूसरों की शांति, सुविधा और अधिकारों का भी उतना ही सम्मान करें। यही सर्वधर्म समभाव का मूल है। संविधान को अपनी सुविधा के अनुसार पढ़ना सरल है, पर उसे उसके संपूर्ण अर्थ में समझना कठिन। अधिकारों की भाषा आकर्षक होती है, किंतु संविधान केवल अधिकारों का ग्रंथ नहीं है; वह उत्तरदायित्व, मर्यादा और सह-अस्तित्व का भी आधार है।

असीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (याचिका संख्या 10803/2026) मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय इसी संवैधानिक संतुलन की पुनर्स्थापना करने वाला है। न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद और न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव की पीठ ने 4 अप्रैल, 2026 को दिए अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि धार्मिक या मजहबी स्वतंत्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है, पर वह असीमित नहीं है। वह लोक-व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन है। संविधान के अनुच्छेद 25(1) की भाषा स्वयं इस सीमा को स्पष्ट करती है, ”लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता का और धर्म या मजहब के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान अधिकार होगा।”


इस एक वाक्य में भारतीय संविधान की दृष्टि निहित है। धर्म मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार सभी व्यक्तियों को समान रूप से प्राप्त है, किंतु यह अधिकार लोक-व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य उपबंधों से ऊपर नहीं है। अतः मजहबी स्वतंत्रता का प्रयोग ऐसे ढंग से नहीं हो सकता जिससे अन्य नागरिकों के अधिकार, ग्राम या नगर की शांति, आवागमन, सार्वजनिक उपयोग या सामाजिक संतुलन प्रभावित हो।

इस प्रकरण में याचिकाकर्ता ने निवेदन किया था कि संभल जनपद के ग्राम इकोना स्थित एक भूमि पर नमाज पढ़ने के लिए उसे संरक्षण और अनुमति दी जाए। उसका कहना था कि वह भूमि उसकी व्यक्तिगत संपत्ति है और शासकीय अधिकारियों द्वारा मजहबी प्रार्थना में बाधा उत्पन्न की जा रही है। उसने संविधान के अनुच्छेद 19, 25, 26, 27 और 28 के उल्लंघन की बात की। दूसरी ओर राज्य का पक्ष था कि संबंधित भूमि खाता संख्या 613, गाटा संख्या 629 में आबादी भूमि के रूप में दर्ज है और श्रेणी 6(2), अर्थात् सार्वजनिक उपयोग की भूमि है। राज्य ने यह भी कहा कि जिस उपहार-विलेख के आधार पर स्वामित्व बताया गया, उसमें न गाटा संख्या थी, न खाता संख्या और न ही स्पष्ट राजस्व विवरण।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय

यहीं से इस प्रकरण का वास्तविक संवैधानिक प्रश्न सामने आता है। क्या मजहबी स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी भूमि, चाहे वह सार्वजनिक हो या व्यक्तिगत स्वामित्व वाली, को नियमित सामूहिक उपासना-स्थल में बदला जा सकता है? उच्च न्यायालय ने इसका उत्तर संतुलित ढंग से दिया। उसने व्यक्तिगत उपासना और सार्वजनिक प्रभाव वाली मजहबी गतिविधि के बीच स्पष्ट रेखा खींची।

न्यायालय ने माना कि व्यक्तिगत परिसर में पारिवारिक, सीमित और अव्यवधानकारी मजहबी गतिविधि सामान्यतः संविधान के संरक्षण में आती है। कोई व्यक्ति अपने घर या परिसर में शांतिपूर्वक प्रार्थना करता है, तो यह उसके मजहबी अधिकार का अंग है। किंतु जब वही गतिविधि नियमित, संगठित और बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी वाली सामूहिक गतिविधि बन जाती है, तब उसका स्वरूप बदल जाता है। वह केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं रहती; उसका प्रभाव मार्ग, आवागमन, ध्वनि, स्थानीय व्यवस्था और सामाजिक संतुलन पर पड़ सकता है। इसी कारण न्यायालय ने कहा कि व्यक्तिगत संपत्ति का संरक्षण भी पूर्ण नहीं है। व्यक्तिगत भूमि पर होने वाली गतिविधि जब सार्वजनिक रूप ले लेती है, तो राज्य उसे विधि और व्यवस्था के अधीन रख सकता है। यह मजहब के विरुद्ध हस्तक्षेप नहीं है; यह सार्वजनिक जीवन में व्यवस्था बनाए रखने की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

सार्वजनिक भूमि के प्रश्न पर न्यायालय का दृष्टिकोण और भी स्पष्ट है। सार्वजनिक भूमि सबकी होती है। किसी व्यक्ति या समूह को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह उसे नियमित मजहबी स्थल के रूप में प्रयोग करे। ऐसा प्रयोग न केवल समानता के सिद्धांत को प्रभावित करता है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता और लोक-व्यवस्था पर भी प्रश्न उत्पन्न करता है। राज्य का कर्तव्य है कि सार्वजनिक भूमि का उपयोग सभी नागरिकों के लिए समान रहे, किसी एक समूह के लिए विशेष न हो।

इस निर्णय की एक विशेषता यह भी है कि न्यायालय ने प्रकरण को किसी एक मजहब के संदर्भ में सीमित नहीं किया। शासनादेशों के संदर्भ में न्यायालय ने यह भी ध्यान दिया कि होलिका दहन जैसे हिंदू धार्मिक आयोजनों के लिए भी पारंपरिक स्थानों की ही बात कही गई है, नए स्थानों की नहीं। इसका अर्थ स्पष्ट है: नियम सभी मत—पंथों पर समान रूप से लागू होने चाहिए। यही सर्वधर्म समभाव का वास्तविक अर्थ है- न किसी धर्म का पक्ष, न किसी मजहब का विरोध, बल्कि सभी आस्थाओं के प्रति समान दृष्टि, समान विधि और समान मर्यादा।

याचिकाकर्ता ने कुछ पूर्व निर्णयों का सहारा लिया था, जिनमें व्यक्तिगत परिसर में प्रार्थना के अधिकार को संरक्षण दिया गया था। न्यायालय ने उन निर्णयों को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उनकी सीमा स्पष्ट की। वे निर्णय व्यक्तिगत, सीमित और अव्यवधानकारी उपासना के संदर्भ में थे। उन्हें इस रूप में नहीं पढ़ा जा सकता कि व्यक्तिगत संपत्ति को बिना किसी विधिक नियंत्रण के नियमित सामूहिक उपासना-केंद्र में बदला जा सकता है। विधि में संदर्भ महत्वपूर्ण होता है। किसी निर्णय को उसके तथ्यों से अलग करके सार्वभौमिक अधिकार में बदल देना न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।

इस प्रकरण के तथ्य भी याचिकाकर्ता के पक्ष में नहीं थे। उपखंडीय दंडाधिकारी की रिपोर्ट के अनुसार, उस स्थान पर केवल ईद के अवसर पर सामूहिक नमाज पढ़ने की परंपरा थी। न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता वर्तमान सीमित परंपरा की रक्षा नहीं कर रहा था, बल्कि नियमित और बड़े स्तर पर सामूहिक नमाज पढ़ने की व्यवस्था स्थापित करना चाहता था। याचिकाकर्ता को अपनी अर्जी में यह भी स्वीकार था कि ग्राम में लंबे समय से सौहार्दपूर्ण वातावरण रहा है। ऐसे में न्यायालय ने इस प्रयास को सामाजिक संतुलन के लिए संवेदनशील माना।

यहां एक सावधानी भी उतनी ही आवश्यक है। यदि कोई नागरिक अपने घर में शांतिपूर्वक पूजा, प्रार्थना या कोई अन्य मजहबी अभ्यास कर रहा है, तो उस पर अनावश्यक रोक संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगी। किंतु यदि व्यक्तिगत गतिविधि अपने प्रभाव में सार्वजनिक हो जाती है, तो प्रशासन को मौन दर्शक बने रहने की भी आवश्यकता नहीं है। न्यायालय ने उचित ही कहा कि राज्य को वास्तविक अव्यवस्था होने तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है; संभावित सार्वजनिक प्रभाव को देखते हुए वह उचित निवारक कदम उठा सकता है।

इस निर्णय का महत्व केवल विधिक नहीं, सामाजिक और सभ्यतागत भी है। यह हमें स्मरण कराता है कि भारत की शक्ति किसी एक आस्था की प्रधानता में नहीं, बल्कि अनेक आस्थाओं के संतुलित सह-अस्तित्व में है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह नहीं कहा कि कोई व्यक्ति नमाज नहीं पढ़ सकता या अपने मजहब का पालन नहीं कर सकता। न्यायालय ने केवल यह कहा कि सार्वजनिक भूमि पर विशिष्ट मजहबी अधिकार का आग्रह नहीं किया जा सकता, और व्यक्तिगत भूमि को भी नियमित, संगठित, सार्वजनिक प्रभाव वाले मजहबी स्थल में बदलना स्वतः संरक्षित अधिकार नहीं है। व्यक्तिगत और सीमित उपासना संरक्षित है, किंतु जब मजहबी गतिविधि सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तो वह विधि और व्यवस्था के अधीन आएगी।

यही भारतीय संविधान की परिपक्वता है। वह आस्था को दबाता नहीं, पर उसे मर्यादा से जोड़ता है। वह स्वतंत्रता देता है, पर उसे उत्तरदायित्व से अलग नहीं करता। वह सभी मत—पंथों को सम्मान देता है, पर किसी को भी सार्वजनिक व्यवस्था से ऊपर नहीं रखता। अंततः यह निर्णय सर्वधर्म समभाव के पक्ष में है, और बताता है कि अधिकार तभी सुरक्षित रहते हैं, जब वे दूसरों के अधिकारों के साथ संतुलन में रहें। आस्था लोकतंत्र की आत्मा हो सकती है, किंतु लोक-व्यवस्था उसकी आवश्यक संरचना है। आत्मा और संरचना, दोनों का साथ रहना ही भारत की संवैधानिक और सांस्कृतिक शक्ति है।

 

 

 

Topics: संवैधानिकनमाज अदान्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तवलोक-व्यवस्थामजहबी स्वतंत्रताव्यक्तिगत बनामस्वास्थ्यव्यक्तिगत उपासनाधार्मिक स्वतंत्रताप्रशासनिक निष्पक्षतान्यायालयपाञ्चजन्य विशेषहोलिका दहन
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