बार-बार टूटा, फिर भी नहीं झुका सोमनाथ मंदिर
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सोमनाथ अमृत महोत्सव: बार-बार टूटा, फिर भी नहीं झुका सोमनाथ मंदिर

महमूद गजनवी ने मंदिर पर हमला करके भारी लूटपाट और तोड़फोड़ की। शिवलिंग को तोड़ा गया और हजारों श्रद्धालुओं की हत्या कर दी गई। इस घटना ने हिन्दू समाज के मन पर गहरा घाव छोड़ा।

Written byMahak SinghMahak Singh
May 11, 2026, 02:10 pm IST
in भारत
Somnath Temple History

Somnath Temple History

दिसंबर 1922 में प्रसिद्ध साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी पहली बार गुजरात के प्रभास पाटन पहुंचे। वहां उन्होंने सोमनाथ मंदिर के टूटे हुए अवशेष देखे। मंदिर की टूटी दीवारें, बिखरे पत्थर और उजड़ा हुआ मंडप देखकर उनका मन गहरे दुख और शर्म से भर गया। उन्हें लगा कि यह खंडहर केवल एक मंदिर का नहीं, बल्कि भारत के अपमान और दर्द का प्रतीक है। उन्होंने अपनी आंखों के सामने उस पुराने भव्य सोमनाथ मंदिर की कल्पना की, जहां हजारों श्रद्धालु पूजा करने आते थे, बड़े-बड़े आचार्य पूजा-अर्चना करते थे और मंदिर श्रद्धा का प्रमुख केंद्र था। लेकिन विदेशी आक्रमणकारियों ने इसे नष्ट कर दिया।

आस्था, वैभव और सोमनाथ पर हमला

सोमनाथ मंदिर भारत के सबसे पवित्र मंदिरों में माना जाता है। यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। माना जाता है कि प्रभास क्षेत्र वही स्थान है जहां भगवान श्रीकृष्ण ने देह त्यागी थी। प्राचीन समय से ही यह स्थान हिन्दुओं की आस्था का बड़ा केंद्र रहा है। यहां दूर-दूर से लोग दर्शन करने आते थे। सन 1025 ईस्वी में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला किया। उस समय मंदिर बहुत समृद्ध और प्रसिद्ध था। इतिहासकार अलबेरूनी ने भी अपने लेखों में सोमनाथ मंदिर की भव्यता का वर्णन किया है। उसने लिखा कि मंदिर में अपार धन-संपत्ति थी और यहां हर दिन गंगाजल और कश्मीर से फूल लाए जाते थे। लोगों की गहरी आस्था इस मंदिर से जुड़ी हुई थी।

सोमनाथ पर हमला

महमूद गजनवी ने मंदिर पर हमला करके भारी लूटपाट और तोड़फोड़ की। शिवलिंग को तोड़ा गया और हजारों श्रद्धालुओं की हत्या कर दी गई। इस घटना ने हिन्दू समाज के मन पर गहरा घाव छोड़ा। यह केवल एक मंदिर का विनाश नहीं था, बल्कि लोगों की आस्था और सम्मान पर भी चोट थी। बाद के मुस्लिम लेखकों ने भी इस हमले का वर्णन किया है। उनके अनुसार, महमूद अचानक बड़ी घुड़सवार सेना लेकर आया और हमला करके जल्दी वापस लौट गया। इतिहासकारों के अनुसार, उस समय भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। देश में राजनीतिक एकता नहीं थी। भारतीय राजा अपनी सेनाएं इकट्ठा करने में समय लगाते थे, जबकि महमूद तेज घुड़सवार सेना के साथ अचानक हमला करता था। इसी कारण वह कई बार सफल हुआ। उसकी सेना में तेज गति और अचानक आक्रमण की रणनीति थी।

पढ़ें देवेंद्र स्वरूप जी का लेख- ऐसे हुआ था सोमनाथ मंदिर का विध्वंस

पुनर्निर्माण बना आत्मसम्मान का प्रतीक

सोमनाथ मंदिर का इतिहास केवल विध्वंस की कहानी नहीं है, बल्कि संघर्ष और पुनर्निर्माण की कहानी भी है। मंदिर कई बार टूटा और कई बार फिर से बनाया गया। धीरे-धीरे यह भारत की राष्ट्रीय अस्मिता और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया। महात्मा गांधी भी सोमनाथ की इस पीड़ा को महसूस करते थे। सरदार वल्लभभाई पटेल, कन्हैयालाल मुंशी और अन्य नेताओं ने स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्णय लिया। आजादी के बाद सरदार पटेल और मुंशी जी के प्रयासों से मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू हुआ। 11 मई 1951 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नए मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की। यह केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भारत के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक भी था।

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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