सम्राट कपिलेंद्र देव के राज्याभिषेक की 591वीं वर्षगांठ पर भव्य आयोजन, इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से पुनः देखने की जरूरत
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सम्राट कपिलेंद्र देव के राज्याभिषेक की 591वीं वर्षगांठ पर भव्य आयोजन, इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से पुनः देखने की जरूरत

महान गजपति सम्राट कपिलेंद्र देव के राज्याभिषेक की 591वीं वर्षगांठ को उत्कल विश्वविद्यालय के एमकेसीजी सभागार में “गजपति दिवस” के रूप में अत्यंत गरिमा और सांस्कृतिक महत्व के साथ मनाया गया।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Lalit Fulara
Jul 2, 2026, 01:20 pm IST
in ओडिशा

भुवनेश्वर: महान गजपति सम्राट कपिलेंद्र देव के राज्याभिषेक की 591वीं वर्षगांठ को उत्कल विश्वविद्यालय के एमकेसीजी सभागार में “गजपति दिवस” के रूप में अत्यंत गरिमा और सांस्कृतिक महत्व के साथ मनाया गया। यह आयोजन ओडिशा की ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक पहचान और मध्यकालीन भारत के एक शक्तिशाली शासक की उपलब्धियों को स्मरण करने के उद्देश्य से किया गया।इस अवसर पर देशभर से आए प्रमुख इतिहासकारों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों और विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिष्ठित हस्तियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य सम्राट कपिलेंद्र देव के राजनीतिक, सैन्य और सांस्कृतिक योगदान को स्मरण करते हुए उनके युग के ऐतिहासिक महत्व पर विचार-विमर्श करना था।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि इतिहास को पुनः भारतीय दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को अपने स्वदेशी नायकों, सांस्कृतिक मूल्यों और ऐतिहासिक उपलब्धियों से प्रेरणा मिलनी चाहिए। इसके लिए इतिहास का अधिक संतुलित, प्रासंगिक और संदर्भ आधारित पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है। यह कार्यक्रम उत्कल विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग, ओडिशा साहित्य अकादमी तथा बियॉन्ड हेरिटेज ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। इसमें प्रदर्शनी, डॉक्यूमेंट्री स्क्रीनिंग और विद्वत चर्चा के माध्यम से कपिलेंद्र देव के शासनकाल की ऐतिहासिक महत्ता को व्यापक रूप से प्रस्तुत किया गया।

कपिलेंद्र देव की विरासत पर प्रदर्शनी का उद्घाटन
कार्यक्रम का उद्घाटन ओडिशा के भाषा, साहित्य एवं संस्कृति मंत्री सूर्यवंशी सूरज ने दीप प्रज्वलित कर किया। इसके पश्चात उन्होंने “War, Emperor and Eternal: Gajapati Kapilendra Deva” नामक विशेष प्रदर्शनी का औपचारिक उद्घाटन किया। इस प्रदर्शनी में सम्राट कपिलेंद्र देव के जीवन, सैन्य अभियानों, प्रशासनिक उपलब्धियों तथा सांस्कृतिक योगदान को दुर्लभ चित्रों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और शोध सामग्री के माध्यम से प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शनी में गजपति साम्राज्य के विस्तार और उसकी प्रशासनिक संरचना की विस्तृत झलक प्रस्तुत की गई, जिसे दर्शकों ने अत्यंत सराहा। प्रदर्शनी ने कपिलेंद्र देव के शासनकाल की राजनीतिक शक्ति, प्रशासनिक दक्षता और सांस्कृतिक योगदान को प्रभावी ढंग से उजागर किया।

कपिलेंद्र देव: साहस, दूरदर्शिता और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मंत्री सूर्यवंशी सूरज ने सम्राट कपिलेंद्र देव को केवल एक विजेता नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी शासक और ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान के मजबूत स्तंभ के रूप में वर्णित किया।
उन्होंने कहा कि कपिलेंद्र देव का शासनकाल ओडिशा के इतिहास का स्वर्णिम युग था, जिसने न केवल राज्य की राजनीतिक पहचान को मजबूत किया बल्कि ओड़िया भाषा, परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण एवं विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। मंत्री ने कहा, “कपिलेंद्र देव साहस, दूरदर्शिता और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक हैं। उनका शासन ओडिशा के इतिहास का सबसे गौरवशाली अध्याय है और उनकी उपलब्धियाँ आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेंगी।” उन्होंने आगे कहा कि ओडिशा की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने और उसे बढ़ावा देने के लिए शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक प्रयासों को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास लेखन समय की आवश्यकता
कार्यक्रम में विद्वानों ने कहा कि इतिहास लेखन और शिक्षण को भारतीय दृष्टिकोण से पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है । हरियाणा संस्कृति एवं साहित्य बोर्ड के उपाध्यक्ष तथा वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि इतिहास अक्सर विजेताओं द्वारा लिखा गया है, जिसके कारण अनेक स्वदेशी नायक और उनकी उपलब्धियाँ उपेक्षित रह गईं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी शिक्षा प्रणाली में औपनिवेशिक प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जबकि भारतीय प्रतिरोध, वीरता और सांस्कृतिक योगदान को पर्याप्त स्थान नहीं मिला है।

उन्होंने कहा, “हमें विदेशी दृष्टिकोण को हटाकर इतिहास को भारतीय परिप्रेक्ष्य से पुनः लिखने की आवश्यकता है ताकि नई पीढ़ी अपने वास्तविक नायकों से प्रेरणा प्राप्त कर सके।” उन्होंने कपिलेंद्र देव को एक शक्तिशाली और दूरदर्शी शासक बताते हुए कहा कि उन्होंने बंगाल सल्तनत और बहमनी सुलतान जैसे शक्तिशाली विरोधियों को पराजित किया। साथ ही उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सम्राट भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे और स्वयं को उनके सेवक मानते थे। प्रो. अग्निहोत्री ने विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से आह्वान किया कि वे ऐसे उपेक्षित ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर गहन अध्ययन करें और उन्हें पाठ्यक्रमों एवं शैक्षणिक विमर्श मंे उचित स्थान दिलाएं।

डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से पुनर्जीवित हुआ गौरवशाली इतिहास
कार्यक्रम में “लाखे राजा रा मौड़ा मणि: द ग्लोरियस स्टोरी ऑफ गजपति” शीर्षक से एक डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शित की गई। इस डॉक्यूमेंट्री में कपिलेंद्र देव के जीवन, उनके सैन्य अभियानों, प्रशासनिक रणनीतियों और गजपति साम्राज्य के विस्तार को विस्तारपूर्वक दिखाया गया। फिल्म ने मध्यकालीन भारत में ओडिशा के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। डॉक्यूमेंट्री को दर्शकों से उत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया प्राप्त हुई और इसने ओडिशा के गौरवशाली इतिहास के प्रति गर्व की भावना को और मजबूत किया।

विद्वत चर्चाओं में ऐतिहासिक पुनर्जागरण पर मंथन
कार्यक्रम में दो महत्वपूर्ण पैनल चर्चाएँ आयोजित की गईं। पहली चर्चा का विषय था— “ओडिशा के गौरवशाली इतिहास के संदर्भ में अनुसंधान और शिक्षा का पुनरुद्धार” जबकि दूसरी चर्चा का विषय था—“क्षेत्रीय नायक से राष्ट्रीय प्रतीक तक”इन चर्चाओं में शामिल विद्वानों और विशेषज्ञों ने ओडिशा के इतिहास पर गहन शोध, अभिलेखों के संरक्षण और क्षेत्रीय इतिहास को राष्ट्रीय विमर्श में शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ओडिशा के कई ऐतिहासिक व्यक्तित्व मुख्यधारा के इतिहास में पर्याप्त रूप से स्थान नहीं पा सके हैं, जिसे दूर करने के लिए संरचित शोध और पाठ्यक्रम सुधार की आवश्यकता है।

इस कार्यक्रम में कई विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे, जिनमें कटक के सांसद भरतृहरि महताब, पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित मूर्तिकार अद्वैत गदनायक, राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के पूर्व निदेशक प्रो. प्रफुल्ल कुमार मिश्रा, उत्कल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. चंडी प्रसाद नंदा, तथा ओडिशा साहित्य अकादमी के सचिव डॉ. चंद्रशेखर होता प्रमुख थे। इनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम के शैक्षणिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को और अधिक सुदृढ़ किया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने सामूहिक रूप से ओडिशा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि कपिलेंद्र देव जैसे महान शासकों की स्मृति को संरक्षित करना न केवल सांस्कृतिक गर्व का विषय है, बल्कि यह इतिहास के प्रति जागरूकता बढ़ाने का भी माध्यम है।

वक्ताओं ने यह भी कहा कि ऐसे आयोजनों को नियमित रूप से आयोजित किया जाना चाहिए ताकि ओडिशा की विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक पहचान मिल सके। कार्यक्रम का समापन इस साझा संकल्प के साथ हुआ कि शोध, शिक्षा और सांस्कृतिक प्रयासों के माध्यम से ओडिशा के गौरवशाली अतीत को और अधिक मजबूती से स्थापित किया जाएगा तथा सम्राट कपिलेंद्र देव की विरासत आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेगी।

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