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भारत की मातृ परंपरा : जहां पश्चिम ने दिवस बनाया, भारत ने ‘मातृदेवो भवः’ अपनाया

पश्चिम में जहां मातृ दिवस बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में अस्तित्व में आया, वहीं भारत में मातृत्व की आराधना हजारों वर्षों से रही है। भारतीय परंपरा में ‘मां’ को जैविक जन्मदात्री होने से कहीं अधिक सृष्टि की आधारशक्ति के रूप में स्‍वीकार्यता मिली है।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by Mahak Singh
May 10, 2026, 04:44 pm IST
inभारत
मातृ परंपरा

मातृ परंपरा

रात का दूसरा पहर था। घर की बत्ती बुझ चुकी थी। बरसात की ठंडी रात में छोटा-सा बच्चा बार-बार बिस्तर गीला कर देता। मां हर बार चुपचाप उठती, बच्चे को सूखी जगह पर सुला देती और स्वयं गीले हिस्से में सिमटकर लेट जाती। बच्चे की नींद टूटे नहीं, उसके चेहरे पर असुविधा की एक शिकन भी न आए, बस यही एक मां की चिंता थी। सुबह जब बच्चा जागता, उसे केवल मां की गोद का स्पर्श याद रहता, रात भर की वह तपस्या नहीं।

यही मां है!  वह स्वयं कष्ट सहकर भी संतान के लिए सुख चुनती है। शायद, इसी कारण भारत में मां के लिए किसी एक दिन की आवश्यकता कभी महसूस नहीं हुई। यहां मां वह संस्कृति का केंद्र बिन्‍दु है, जहां संस्‍कार एवं सभ्यताएं जन्‍म लेती हैं और पुष्‍पित-पल्‍लवित होती हैं। भारत में यही किसी मनुष्‍य जीवन के लिए उसका पहला देवत्‍व मिलन का साक्षात अनुभव है, इसलिए ही भारत में मां को सिर्फ एक संबंध नहीं माना गया, उसक देवता के रूप में स्‍वीकार किया गया है। आज दुनिया Mother’s Day मना रही है। अमेरिका से शुरू हुई यह परंपरा अब वैश्विक उत्सव बन चुकी है, किंतु भारत की सांस्कृतिक चेतना में मां का सम्मान किसी एक दिन का आयोजन नहीं है, यहां तो यह हजारों वर्षों से प्रवाहित जीवन-दर्शन है, जिसमें मां सर्वत्र विराजित है।

आधुनिक मातृ दिवस : अमेरिका से दुनिया तक

आधुनिक संदर्भ में देखें तो “मदर्स डे” की शुरुआत अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना जार्विस को अपनी मां ऐन जार्विस से मिली। ऐन जार्विस अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद महिलाओं और परिवारों के बीच सामाजिक समरसता के लिए कार्य करती थीं। 10 मई 1908 को वेस्ट वर्जीनिया के ग्राफ्टन स्थित चर्च में पहला औपचारिक मातृ दिवस समारोह आयोजित हुआ। बाद में 1914 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने मई के दूसरे रविवार को राष्ट्रीय अवकाश घोषित कर दिया।

अन्ना जार्विस चाहती थीं कि यह दिन मां के प्रति व्यक्तिगत कृतज्ञता का प्रतीक बने। उन्होंने “Mother’s Day” शब्द में ‘Mother’ को एकवचन रखा, क्योंकि उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मां के प्रति व्यक्तिगत सम्मान व्यक्त करना चाहिए। सफेद कार्नेशन फूल इस दिवस का प्रतीक बना, जो उनकी मां का प्रिय फूल था। पर इसमें भी विडंबना यह रही कि बाद में यही दिवस अत्यधिक व्यवसायिक हो गया। कार्ड, उपहार और बाजार आधारित उत्सवों ने इसे घेर लिया। स्वयं अन्ना जार्विस ने इसके व्यवसायीकरण का विरोध करते हुए कहा था- “लालच ने इस सबसे पवित्र भावना को भी बाजार में बदल दिया है।”

भारत में मां : दिवस नहीं, सनातन संस्कृति में हर दिन है

पश्चिम में जहां मातृ दिवस बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में अस्तित्व में आया, वहीं भारत में मातृत्व की आराधना हजारों वर्षों से रही है। भारतीय परंपरा में ‘मां’ को जैविक जन्मदात्री होने से कहीं अधिक सृष्टि की आधारशक्ति के रूप में स्‍वीकार्यता मिली है। तैत्तिरीय उपनिषद ने उद्घोष किया-  “मातृदेवो भवः।” (शिक्षावल्ली, 1.11.2) अर्थात्, मां को देवता के समान मानो।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि यहां मां को पिता और गुरु से पहले स्थान दिया गया। यह भारतीय समाज की संवेदनात्मक संरचना को स्पष्ट करता है। वस्‍तुत: भारतीय ज्ञान परंपरा में मातृत्व का उल्लेख परिवार तक सीमित नहीं मिलता है। यहां पृथ्वी, नदियों और प्रकृति को भी मां कहा गया। अथर्ववेद में कहा गया- “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” (अथर्ववेद, 12.1.12) यानी कि पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं। इसी तरह से ऋग्वेद में मां सरस्वती के लिए कहा गया है- “अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति।”(ऋग्वेद, 2.41.16) अर्थात्, हे सरस्वती! तुम श्रेष्ठ माता, श्रेष्ठ नदी और श्रेष्ठ देवी हो। यहां मातृत्व को लेकर कहना होगा कि सिर्फ मनुष्य जीवन तक ही सीमित होता हुआ दिखाई नहीं देता है, यह संपूर्ण सृष्टि का भाव रूप में दिखता है।

शक्ति आराधना : मां को देवी मानने की परंपरा

भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक विशेषता यह है कि यहां ईश्वर को भी “मां” के रूप में पूजा गया। दुर्गा सप्तशती में देवी की स्तुति करते हुए कहा भी गया-

“या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥” (अध्याय 5, श्लोक 16) 

यहां तात्‍पर्य यह है कि जो देवी सभी प्राणियों में ‘माता’ के रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, उनको नमस्कार है, उनको बार-बार नमस्कार है। यह श्लोक बताता है कि ईश्वर (देवी शक्ति) हर जीव में माता के रूप में ममता, करुणा और स्नेह के साथ निवास करती हैं। यह सर्वोच्च शक्ति को नमन करने और उनके मातृभाव को स्वीकार करने का मंत्र है। इस तरह के अन्‍य अनेक मंत्री मार्केण्‍डेय पुराण के अंतर्गत हमें दुर्गासप्‍तशती में मिलते हैं।

इस तरह से देखें तो भारतीय समाज में शक्ति, करुणा और संरक्षण का सर्वोच्च प्रतीक मां ही रही है और आज भी है। यही कारण है कि देशभर में देवी मंदिरों और शक्तिपीठों की विशाल परंपरा विकसित हुई। कामाख्या मंदिर, वैष्णो देवी मंदिर, कालिका मंदिर, ज्वालामुखी मंदिर जैसे शक्तिपीठ भारतवासियों के लिए सिर्फ धार्मिक स्थल भर नहीं हैा, यह मातृत्व की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा के प्रतीक हैं। भारत के बाहर भी प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक भूभाग में स्थित हिंगलाज माता मंदिर और जेसोरेश्वरी काली मंदिर इस अखंड परंपरा के जीवंत प्रमाण हैं।

महाकाव्‍य और साहित्‍य में मां

भारतीय महाकाव्यों में मां नैतिक शक्ति के स्रोत के रूप में हम सभी के सामने आती है। रामचरितमानस में माता कौशल्या का वात्सल्य हो या माता सीता का मातृत्व, हर प्रसंग में मां त्याग और करुणा की प्रतिमूर्ति दिखाई देती है। एक रामायण में तो यहां तक कहा गया कि “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”(युद्धकाण्ड, 6.113.47) अर्थात्, माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं। महाभारत में कुंती का संघर्ष और गांधारी का धैर्य मातृत्व की असाधारण शक्ति को प्रकट करता है। अनेक श्‍लोकों के माध्‍यम से मां का महत्‍व बताया गया है।

इसी तरह से भारतीय भक्ति साहित्य ने मां को भावनात्मक ऊंचाई प्रदान की गई है। सूरदास ने यशोदा और कृष्ण के संबंध को अमर कर दिया- “मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो।” (सूरसागर)। इसी प्रकार से अनेक भक्‍त कवि मां और पुत्र के सहज स्नेह का सांस्कृतिक चित्र उकेरते हुए मिलते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा- “प्रेम मगन कौसल्या निशि दिन जात न जान।” (रामचरितमानस, बालकाण्ड) अर्थात्, माता कौशल्या पुत्र प्रेम में इतनी मग्न हैं कि उन्हें दिन-रात का भान ही नहीं रहता। स्वामी विवेकानंद ने कहा कि “मैं जो कुछ हूं, अपनी मां के कारण हूं।”(विवेकानंद साहित्य)। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने मां को “जीवन की पहली कविता” कहा। आधुनिक भारतीय साहित्य में भी मां सर्वोच्च संवेदना बनी रही हैं। महादेवी वर्मा ने लिखती हैं-  “मां के समान कोई छाया नहीं, मां के समान कोई सहारा नहीं।”(श्रृंखला की कड़ियां)

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी मातृत्व राष्ट्रीय प्रतीक बना। “भारत माता” का विचार राजनीतिक नारा कभी नहीं रहा है, यह हर भारतवासी का अपनी मातृभूमि के प्रति भावनात्मक समर्पण है, इसीलिए ही वंदे मातरम् में राष्ट्र को मां कहकर संबोधित किया गया।

भारतीय परिवार और मां का शाश्वत स्थान

भारत में मां पालनकर्ता और संस्कारों की प्रथम गुरु है। बच्चे का पहला शब्द “मां” होता है और जीवन के अंतिम क्षणों में भी सबसे अधिक स्मरण मां का ही आता है। भारतीय परिवारों में मां घर की चेतन्‍यता है। वह परिवार को भावनात्मक रूप से जोड़नेवाली इकाई  है। यही कारण है कि मां की मृत्यु के बाद भी उसका स्थान रिक्त ही रहता है।

बाजार और भावनाओं के बीच मातृ दिवस

आज दुनिया में मातृ दिवस बड़े पैमाने पर बाजार आधारित उत्सव बन चुका है। कार्ड, उपहार, फूल और ऑनलाइन अभियानों ने इसे एक उद्योग का रूप दे दिया है, किंतु भारतीय दृष्टिकोण इससे कहीं व्यापक है। यहां मां का सम्मान उपहार देकर पूरा नहीं होता है, यहां मां की सेवा, उसके प्रति संवेदनशीलता और जीवनभर सम्मान को ही सच्ची मातृ वंदना माना गया है।

वस्‍तुत: भारत ने सदियों पहले ही यह सिखा दिया था कि मां सम्‍मान के लिए किसी कैलेंडर की तारीख कभी नहीं हो सकती है, वह तो जीवन की सबसे पवित्र अनुभूति है, इसलिए भारत में मातृ दिवस हर दिन है। हर सुबह मां की वंदना से आरंभ है। हर प्रार्थना में “जय माता दी” का स्वर है और हर शुभ कार्य में मां का आशीर्वाद है।भारतीय संस्कृति में मां घर में, मंदिर में और राष्ट्र की चेतना में पूजनीय है। मां अनादि काल से भारत की आत्मचेतना मे मौजूद है। तभी उसके गुजर जाने के बाद वह पुरखों में स्‍थान पाती है, हर वर्ष जब तक पीढ़ि‍यां हैं, वह मां पितृ देव के रूप में पूजनीय है, जीवन के रहते और जीवन के बाद भी, यही भारत है और यही भारत में मां की महिमा है।

Topics: मां की महिमाभारतीय संस्कृति में मांमातृदेवो भवःMother’s Day in Indiaभारतीय परंपरा में मांभारतीय संस्कृतिमां का सम्मानभारत मातामां और संस्कारसनातन संस्कृतिMothers Day 2026दुर्गा सप्तशतीMothers Dayभारतीय परिवार व्यवस्था
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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