800 साल पुराने मंदिर को तोड़े जाने पर चुप्पी और लेनिन की प्रतिमा गिराने पर वामपंथियों का रूदन, ये दोगलापन क्यों?
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800 साल पुराने मंदिर को तोड़े जाने पर चुप्पी और लेनिन की प्रतिमा गिराने पर वामपंथियों का रूदन, ये दोगलापन क्यों?

बंगाल में लेनिन प्रतिमा टूटी तो वामपंथी बिलख उठे, लेकिन तेलंगाना में 800 साल पुराना मंदिर तोड़ा गया तो चुप्पी। लाल आतंक और राष्ट्रवाद विरोधी विचारधारा से सने दोगलेपन को समझिए।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
May 10, 2026, 11:40 am IST
in भारत, विश्लेषण
वामपंथियों का दोगलापन देखिए-लेनिन की प्रतिमा तोड़े जाने पर रूदन और मंदिर गिराए जाने पर चुप्पी

वामपंथियों का दोगलापन देखिए-लेनिन की प्रतिमा तोड़े जाने पर रूदन और मंदिर गिराए जाने पर चुप्पी

भारत में अंग्रेजों का शासन समाप्त होने के बाद वामपंथी शासन लाने का सपना देखने वाले लेनिन, जिनके शासनकाल में रूस में लाखों लोग मारे गए थे, की प्रतिमा को पिछले दिनों बंगाल में तोड़ दिया गया। इस पर पूरा वाम कुनबा खफा है। मोटे – मोटे आँसू बहाए जा रहे हैं और साथ ही यह कहा जा रहा है कि लेनिन तो अंग्रेजों को भारत से भगाना चाहते थे।

लेनिन ने भारत से औपनिवेशिक शासन की विदाई के लिए काफी लिखा था और भारतीय क्रांतिकारियों का साथ दिया था। यह बात देखने में आकर्षक और सुंदर लग सकती है कि लेनिन ने भारत में औपनिवेशिक शासन का विरोध किया था। परंतु लेनिन ने क्या यह विरोध भारत की आत्मा के शासन को लाने के लिए किया था या फिर लेनिन भारत को एक और गुलामी की तरफ धकेलना चाहते थे? भारतीयों को उनकी जड़ों से दूर करने वाले अंग्रेजी शासन के खिलाफ वे कौन सा शासन लाना चाहते थे? क्या अपने शासन वाला मॉडल, जिसमें लगभग 50 लाख लोग अकाल से मारे गए थे और 10 लाख से अधिक लोग लाल आतंक के चलते अर्थात राजनीतिक कारणों से मारे गए थे।

लेनिन की प्रतिमा गिराए जाने पर वामपंथियों का रूदन

तो फिर ऐसा क्या है कि लेनिन की प्रतिमा गिराए जाने पर वामदल के लोग रो रहे हैं? लोग कह रहे हैं कि वह भारत को आजादी दिलाना चाहता था? मगर क्या वाकई? यह सच है कि भारत में उसने अंग्रेजी शासन का विरोध किया था और यह भी सच है कि वह चाहता था कि अंग्रेज भारत से चले जाएं, मगर उसके बाद वह क्या चाहता था? क्या लेनिन की मंशा या चाहत यही थी कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारतीय जड़ों से जुड़ा हुआ शासन आए? भारत में मंदिरों का शासन आए या फिर उसकी मंशा कुछ और ही थी। आइए जानते हैं कि लेनिन की मंशा आखिर थी क्या?

क्या थी मंशा?

जो भी लोग यह कह रहे हैं कि लेनिन तो भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराना चाहता था, वह दरअसल सबसे बड़ा झूठ बोल रहे हैं। वह झूठ इसलिए बोल रहे हैं कि लेनिन ने यह जरूर चाहा था कि भारत से अंग्रेज जाएं, मगर यह नहीं चाहा था कि भारत में भारत की आत्मा का राज हो। बल्कि वह एक छल था। छल यह था कि अभी राष्ट्रवादी ताकतों के साथ मिलकर खड़े रहो और जब अंग्रेज चले जाएं तो राष्ट्रवादी ताकतों को धक्का देकर खुद सत्ता हासिल कर लो।

लेनिन का कहना था कि औपनिवेशिक शासन हटाने के लिए कम्युनिस्टों को bourgeois-nationalist movements (राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन) का समर्थन करना चाहिए, मगर अस्थाई रूप से और कुछ शर्तों के साथ। अर्थात यह समर्थन तब तक रहे, जब तक औपनिवेशिक शक्ति चली नहीं जाती। लेनिन की नेशनल एंड कोलोनियल क्वेस्शन्स पर शोध में लिखा था कि सभी कम्युनिस्ट पार्टियों को इन देशों में राष्ट्रवादी, लोकतान्त्रिक स्वतंत्रता आंदोलनों में सहायता करनी चाहिए, मगर साथ ही यह भी कहा था कि कम्युनिस्टों को अपनी अलग पहचान बनाई रखनी चाहिए।

इसे भी पढ़ें: केरल कांग्रेस में CM पद की रेस तेज: सतीसन, चेन्निथला और वेणुगोपाल में त्रिकोणीय लड़ाई

जो किसान और श्रमिक हैं, उन्हें क्रांतिकारी चेतना देनी चाहिए और किसानों का अलग संघ बनाना चाहिए। राष्ट्रवादियों के साथ कोई भी स्थाई गठबंधन नहीं होना चाहिए। और अंत में जनता को मोबीलाइज़ करना है और राष्ट्रवादी ताकतों को उखाड़ फेंकना है।

इस में भारतीय कम्युनिस्ट एमएन रॉय ने भी अपने विचार दिए थे और सख्त रुख अपनाते हुए उन्होनें कम्युनिस्ट संगठन पर ही बल दिया था। हालांकि लेनिन और एमएन रॉय की चर्चा के बाद काफी परिवर्तन आए थे, परंतु मूल भाव यही था कि राष्ट्रीय आंदोलनों का इस्तेमाल जरूर करना है, परंतु वर्ग संघर्ष को भूलना नहीं है।

लेनिन के शासनकाल में लाखों हत्याएं

जिस भारत प्रेमी लेनिन की प्रतिमा के गिराए जाने पर वामदल हजार आँसू बहा रहे हैं उसी लेनिन के शासनकाल में लाखों हत्याएं हुईं। राजनीतिक हत्याएं हुईं। उसे अपना राजनीतिक विरोधी बर्दाश्त ही नहीं था। उसे विपरीत विचार सहन नहीं थे और जो भारत में भी कम्युनिस्ट पार्टियों का यही रवैया है। कम्युनिस्ट कहे जाने वाले केरल में भाजपा और आरएसएस के कार्यकर्ताओं की हत्याएं जिस प्रकार होती हैं और हुई हैं, वह साफ दिखाता है कि उन्हें एक ही रंग चाहिए औ वह है लाल!

लेनिन ने चेका अर्थात गुप्त पुलिस के माध्यम से एक रणनीतिक राजनीतिक हत्याओं का दौर आरंभ किया। उसने अपने विरोधियों और क्लास enemies को चुन चुनकर मरवाया। और वह भी बिना किसी भी मुकदमे के। यह संख्या हजारों में नहीं बल्कि लाखों में पहुंची थी।

इसके साथ ही उसके कारण जो गृह युद्ध छिड़ा, अकाल पड़ा उनमें लाखों लोग मारे गए वो अलग। अनुमान के अनुसार दस लाख से अधिक लोगों की हत्याएं उसके शासनकाल में हुई थीं। लेनिन खुद कहता था कि “terror is necessary” अर्थात आतंक आवश्यक है। लेनिन का मानना था कि आतंक इसलिए आवश्यक है क्योंकि क्रांति को बचाने के लिए अपने क्लास एनेमीज़ को कुचलना आवश्यक है। उसका एक प्रसिद्ध आदेश था, जिसमें उसने स्पष्ट लिखा था, “Comrades! The uprising by the five kulak volosts must be mercilessly suppressed. You need to hang (hang without fail, so that the people see) no fewer than 100 of the notorious kulaks, the rich and the bloodsuckers.”

अर्थात

“साथियों! पांच कुलक वोलोस्ट के विद्रोह को बेरहमी से दबाना होगा। …

आपको कम से कम 100 बदनाम कुलकों, अमीरों और खून चूसने वालों को फांसी देनी होगी (बिना चूके फांसी देनी होगी, ताकि लोग देख सकें)।“

अर्थात वह इस सीमा तक हिंसक था कि वह लोगों को बिना किसी मुकदमे के फांसी चढ़ाना चाहता था और उसने ऐसा किया भी था। उसने अपने इसी आदेश में लिखा था कि यह काम इस तरह से किया जाना चाहिए कि सैकड़ों मील दूर तक के लोग इसे देखें, कांप उठें, जान जाएं और चिल्ला उठें: वे खून चूसने वाले कुलकों का गला घोंट रहे हैं और आगे भी घोंटते रहेंगे।

बंगाल में क्यों लगाई गई थी लेनिन की प्रतिमा

अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर ऐसे आदमी की प्रतिमा बंगाल में पहली बात तो थी क्यों? आखिर इस प्रतिमा का औचित्य क्या रहा होगा और यह भी प्रश्न है कि आखिर बंगाल में वामदलों के 34 सालों के शासनकाल में इन प्रतिमाओं को ही क्यों लगाया गया? क्या आतंकों के उस संदेश को देने के लिए या मन में बैठाने के लिए कि जो लेनिन ने किया, वही हम करेंगे?

यह भी भारत का और बंगभूमि का दुर्भाग्य है कि जिस लेनिन ने आतंक को आवश्यक कहा, अपने विरोधियों को बिना किसी मुकदमे के फांसी पर लटकाया, लाल आतंक फैलाया, राष्ट्रवाद कुचलने के लिए हर संभव कार्य किया उसी लेनिन को देवता स्वरूप बताकर राष्ट्रवाद की चेतना वाले प्रदेश में जगह-जगह प्रतिमाएं लगाई गईं। वन्देमातरम की भूमि पर माँ की वंदना को ही जैसे इन प्रतिमाओं के मध्यम से कुचल दिया गया।

तेलंगाना में 800 वर्ष पुराने मंदिर तोड़े जाने पर चुप्पी

अब यहाँ पर वामपंथियों का दोगलापन और दुष्टता दिखाई देती है। जब वे आंतक को आवश्यक बताए जाने वाले लेनिन की प्रतिमा गिराए जाने पर शोक मनाकर लेख लिख रहे हैं, उसी समय भारत में तेलंगाना की कॉंग्रेस सरकार ने वारंगल जिले में 800 वर्ष पुराने काकतीय काल के प्राचीन मंदिर को किसी स्कूल के लिए तोड़ दिया। और वह मंदिर भी साधारण नहीं था, बल्कि उस मंदिर में दुर्लभ तेलुगु शिलालेख थे। उसमें विरासत थी, उसमें धरोहर थी। मगर लेनिन का इतिहास बताने वाले लोग इस अनूठे और दुर्लभ मंदिर को सरकार द्वारा तोड़े जाने पर रो नहीं रहे हैं, दुख नहीं मना रहे हैं और न ही वे यह कह रहे हैं कि यह गलत हुआ। उनके लिए जैसे वह मंदिर है ही नहीं।

मगर वे बंगाल में लोगों द्वारा लेनिन की प्रतिमा के तोड़े जाने को लेकर आसमान सिर पर उठाए हुए हैं, इसे फासीवाद का हमला, कामकाजी वर्ग पर हमला कह रहे हैं। तो क्या यह मानकर चलें कि उनके लिए लेनिन और उसकी आतंकी विचारधारा ही इतिहास है और जो भारत का शिव का इतिहास है वह उनके लिए मायने रखता ही नहीं है। वह विचारधारा जो कहती थी कि क्रांति को बनाए रखने के लिए आतंक जरूरी है, और राष्ट्रवादी विचारों का इस्तेमाल अपने लिए करो और अपने विरोधियों को बिना किसी सुनवाई के दुष्टता पूर्वक मार डालो, उनके लिए अपनी है और 800 वर्ष पुरानी धरोहर उनके लिए कुछ मायने ही नहीं रखती है।

यही दोहरापन ही वामपंथ की सबसे बड़ी विशेषता है। प्रतिमाएं कभी भी मात्र प्रतिमा नहीं होती हैं, वे विचारधारा का प्रतीक और दर्पण होती हैं। वे बताती हैं कि आपके आदर्श क्या हैं, आप कैसा समाज चाहते हैं, आप दरअसल कैसा होना चाहते हैं। और अपनी हरकतों से वामपंथी लगातार यह साबित करते हैं कि वे दरअसल लेनिन जैसा ही होना चाहते हैं, जो आतंक को आवश्यक और विरोधियों को बिना सुनवाई के मारना चाहता था।

इस दोगलेपन के बाद तो यह पूछना भी निरर्थक ही है कि “तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है कॉमरेड?”

Topics: लेनिन प्रतिमा तोड़ीवामपंथी दोगलापनतेलंगाना 800 वर्ष पुराना मंदिर तोड़ामंदिर तोड़ा
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