पूरे देश का जनजातीय समुदाय अपने-अपने समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को लेकर दिल्ली के लालकिले में एकत्र हो रहा है एवं इस बात को अभिव्यक्त करना चाह रहा है कि जो भी व्यक्ति कन्वर्ट होकर सांस्कृतिक पहचान खो चुके हैं उन्हें समुदाय अब मान्यता देने वाला नहीं है एवं ऐसे व्यक्तियों को समुदाय अपने स्तर से अमान्य करार देगा।
लालकिले में जुटेगा देशभर का जनजातीय समाज: क्या है ‘सांस्कृतिक समागम’ का उद्देश्य?
Janjati Sanskritik Samagam Delhi Red Fort : भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जनजातीय समाज अपनी विशिष्ट पहचान, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ ऐसे ही समुदायों की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं, लोककला, नृत्य, संगीत और जीवनशैली को देश की राजधानी में एक मंच पर प्रस्तुत करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। यह समागम न केवल विभिन्न जनजातियों के बीच आपसी संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देगा, बल्कि उनकी परंपराओं को समझने और सराहने का अवसर प्रदान करता है।
जनजातीय समुदाय की पहचान
वर्त्तमान समय में जनजातीय समुदाय अनेक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्यायों से ग्रसित है। भारत में जनजातियों की प्रमुख समस्याओं में भूमि अलगाव (विस्थापन), अशिक्षा, निर्धनता, ऋणग्रस्तता, स्वास्थ्य समस्याएं और औद्योगीकरण के कारण विस्थापन शामिल हैं। मुख्य रूप से वनों पर निर्भर ये समुदाय, बाहरी लोगों (साहूकार, ठेकेदार) द्वारा शोषण और सांस्कृतिक पहचान के संकट (कन्वर्जन) का सामना कर रहे हैं।
सांस्कृतिक पहचान का संकट
बाहरी संस्कृतियों के प्रभाव के कारण इनकी अद्वितीय परंपराएं आस्था, पूजा—पद्धति रूढ़िगत प्रथायें, सामुदायिक जीवनशैली, जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार, जीवन मूल्य, सामाजिक तानाबाना, विधिक जनजाति पहचान और भाषाएं खतरे में हैं।
पहचान पर संकट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में औपनिवेशिक कल में विदेशी मिशनरियों द्वारा ईसाई मत के प्रचार-प्रसार हेतु जनजातीय क्षेत्रों का चयन किया गया। इन क्षेत्रों में मिशनरियों द्वारा शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की आड़ में कन्वर्जन का कार्य प्रारम्भ कर दिया गया। इस कारण से वर्तमान में जनजातीय क्षेत्रों में एक बड़ा जनसंख्या परिवर्तन एवं जनजातीय संस्कृति की पहचान का संकट खड़ा हो गया है। जनजातीय क्षेत्रों में निवासरत जनजातीय समाज जिनका निवास वनों में था, उनकी पहचान वन निवासी, गिरिजन के रूप में होती थी, उसे बदलकर औपनिवेशिक काल के अलगाववादी शक्तियों ने आदिवासी शब्द के रूप में पहचान देने का प्रयास किया, ताकि जनजातीय समाज एवं अन्य समुदाय के मध्य अलगाव की लकीरें खींची जा सकें।
आस्था एवं विश्वास में परिवर्तन
कन्वर्जन की अवधारणा विशेष रूप से विदेशी आक्रांताओं के भारत में आगमन एवं औपनिवेशिक काल खंड से आयी है। जिनकी यह अवधारणाएं थीं कि केवल एक विशेष पद्धति से ईश्वर को पूजना एवं केवल विशेष धर्म के प्रवर्तक के प्रति विश्वास ही धर्म है, बाकी सभी कुछ अधर्म है, जबकि भारत का जनजाति समुदाय बहुदेववादी एवं प्रकृति को पूजने वाला है। उसके लोकनृत्य, गीत, संगीत एवं लोकजीवन में प्रकृति के प्रति गहन आस्था है। धर्म परिवर्तन करने से उस व्यक्ति की आस्था एवं विश्वास बदल जाता है। एक चर्च की उपासना करने वाला व्यक्ति कभी भी प्रकृति के प्रति आस्था का भाव नहीं रख सकता। कन्वर्जन के पश्चात व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्य तक के सभी संस्कारों में परिवर्तित मत का प्रभाव गहन रूप से अंकित हो जाता है। जैसे चर्च में बत्तीसमाँ, शादी, ईसाई क़ब्रिस्तान में दफ़न जनजाति देवलोकों को शैतानी शक्तियां बताना आदि। साथ ही कन्वर्जन करने वाले व्यक्ति का साहचर्य सामुदायिक नहीं रह जाता, जबकि जनजाति समाज का जीवन सामुदायिक साहचर्य पर निर्भर रहता है।
विधिक एवं संविधानिक पहचान
यदि भारत में जनजाति समुदाय की विधिक पहचान की बात करें तो संविधान के अतिरिक्त 366 (25) पर परिभाषित किया गया है एवं आर्टिकल 342 में बताया गया है। जनजातीय समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान आदिम चरित्र सामुदायिक एवं भौगोलिक अलगाव एवं संकोची स्वभाव के कारण अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में रखा गया है एवं जनजातीय समुदाय केवल जन्म के आधार पर नहीं, अपितु अपनी विशिष्ट पहचान के कारण जनजातीय समुदाय की स्थिति को प्राप्त करता है।
सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: क्या कन्वर्जन के बाद खत्म हो जाएगा ST दर्जा?
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में निर्णित बहुचर्चित मामले चिंथदा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, 24 मार्च, 2026 आपराधिक अपील संख्या 1580 वर्ष 2026 (एसएलपी (आपराधिक) संख्या 9231/2025 से उत्पन्न) के भाग 55 (g) में व्यक्त किया गया है कि -अनुसूचित जनजातियों के संबंध में, यह न्यायालय स्पष्ट करता है कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के विपरीत, संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 धर्म के आधार पर बहिष्कार का प्रावधान नहीं करता है।
अतः, अनुसूचित जनजाति का दर्जा केवल धर्मांतरण पर आधारित नहीं हो सकता, बल्कि इस बात पर निर्भर होना चाहिए कि आवेदक में जनजातीय पहचान के आवश्यक गुण, जिनमें प्रथागत रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित जनजातीय समुदाय द्वारा स्वीकृति शामिल हैं, अभी भी मौजूद हैं और उन्हें मान्यता प्राप्त है या नहीं। यदि कन्वर्जन या उसके बाद के किसी आचरण के परिणामस्वरूप जनजातीय जीवनशैली से पूर्ण रूप से अलगाव और समुदाय द्वारा मान्यता का नुकसान होता है, तो अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त करने का मूल आधार ही समाप्त हो जाता है।
इसके विपरीत, यदि ऐसे गुण स्पष्ट रूप से विद्यमान हैं या वास्तव में पुनः स्थापित हो गए हैं और जनजातीय समुदाय द्वारा स्वीकार किए गए हैं, तो दावे को यांत्रिक रूप से अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। ऐसे मामलों में मूल्यांकन तथ्यों पर आधारित होता है और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार सक्षम प्राधिकारी के पास होता है।
इस प्रकार इस निर्णय से यह स्पष्ट है कि जो भी जनजाति समुदाय का व्यक्ति अपनी पहचान के आवश्यक गुण जिनमें प्रथागत रीति—रिवाज (कस्टमरी प्रैक्टिस) सामाजिक संगठन जिनमें पाहन, पण्डा, पुजारा, मानकी, तड़वी, मुकद्दम, गांव पटेल, जातिगत पंचायत, पेसा ग्राम सभा, स्वायत्त जिला परिषद सामाजिक संगठन के रूप में शामिल हैं तथा सामुदायिक जीवन शैली जिसके अन्तर्गत सारा समुदाय एक होकर कार्य करता है एवं गांव में समुदाय आधारित आजीविका के साधन अपनाये जाते हैं साथ ही जिस बात पर माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशेष जोर दिया गया है उसके अन्तर्गत समुदाय की मान्यता अर्थात यदि कोई जनजातीय व्यक्ति ईसाई या मुस्लिम मजहब ग्रहण करता है तथा सामाजिक संगठन द्वारा उस व्यक्ति को जनजाति के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है, तो उस व्यक्ति की अनुसूचित जनजाति के रूप में उस समुदाय की विधिक मान्यता समाप्त हो जाती है अर्थात उस व्यक्ति को समुदाय से प्राप्त होने वाले शैक्षणिक, राजनीतिक एवं शासकीय सेवा में मिलने वाले लाभों से वंचित किया जा सकता है। जहाँ तक निर्णय में समुचित प्राधिकारिक का अर्थ है यहाँ समुचित प्राधिकारी से तात्पर्य ऐसे जाति प्रमाण पत्र जारी करने वाले अधिकारी से है।
इस प्रकार माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये निर्णय से यह स्पष्ट है 5वीं एवं 6वी अनुसूची क्षेत्रों में सामुदायिक संगठन अर्थात पारम्परिक ग्राम सभा (पेसा ग्राम सभा) स्वायत्त जिला परिषदों द्वारा जनजातीय समुदाय के ऐसे व्यक्तियों को जिन्होंने कन्वर्जन के कारण अपनी रूढ़ी, रीति-रिवाज, परम्परा एवं सामुदायिक जीवनशैली को खो दिया है, उन्हें उस समुदाय विशेष का अनुसूचित जनजाति होने का लाभ प्राप्त नहीं होगा।
इस प्रकार नई दिल्ली के लालकिले में आयोजित यह सांस्कृतिक समागम इस मायने में भी अत्यन्त महत्पूर्ण है कि पूरे देश का जनजातीय समुदाय अपने-अपने समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को लेकर दिल्ली के लालकिले में एकत्र हो रहा एवं इस बात को अभिव्यक्त करना चाह रहा है कि जो भी व्यक्ति कन्वर्ट होकर सांस्कृतिक पहचान खो चुके हैं उन्हें समुदाय अब मान्यता देने वाला नहीं है एवं ऐसे व्यक्तियों को समुदाय अपने स्तर से अमान्य करार देगा।

















