कौन थे भगवान बिरसा मुंडा? जिनके एक नारे ने अंग्रेजी शासन को हिला दिया था
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कौन थे भगवान बिरसा मुंडा? जिनके एक नारे ने अंग्रेजी शासन को हिला दिया था

भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को वर्तमान झारखंड के उलीहातु गांव में हुआ था। अत्यंत साधारण परिवार में जन्मे बिरसा ने बचपन से ही जनजातीय समाज की पीड़ा और संघर्ष को करीब से देखा।

Written byMahak SinghMahak Singh
Jun 9, 2026, 02:12 pm IST
in भारत
भगवान बिरसा मुंडा

भगवान बिरसा मुंडा

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनेक ऐसे वीरों ने अपने संघर्ष और बलिदान से देश को गौरवान्वित किया है, जिनकी गाथाएं आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देती हैं। ऐसे ही महान क्रांतिकारी, जननायक और जनजातीय समाज के गौरव थे धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा। उनकी जयंती 15 नवंबर को जनजाति गौरव दिवस के रूप में मनाई जाती है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2021 में इस दिवस की घोषणा कर जनजातीय समाज के योगदान और विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान देने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

अन्याय के विरुद्ध आवाज

भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को वर्तमान झारखंड के उलीहातु गांव में हुआ था। अत्यंत साधारण परिवार में जन्मे बिरसा ने बचपन से ही जनजातीय समाज की पीड़ा और संघर्ष को करीब से देखा। उस समय अंग्रेजी शासन की नीतियों के कारण जनजातीय समुदाय अपनी जमीन, जंगल और जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों से वंचित होता जा रहा था। बाहरी शक्तियां उनकी सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक परंपराओं को कमजोर करने का प्रयास कर रही थीं। इन परिस्थितियों ने युवा बिरसा के मन में अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संकल्प पैदा किया। बिरसा मुंडा ने केवल अंग्रेजी शासन का विरोध ही नहीं किया, बल्कि जनजातीय समाज में सामाजिक और सांस्कृतिक जागरण का भी अभियान चलाया। उन्होंने लोगों को अपनी परंपराओं, संस्कृति और आस्था के प्रति जागरूक रहने का संदेश दिया। उनका मानना था कि किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति और मूल्यों में निहित होती है। इसलिए उन्होंने जनजातीय समुदाय को अपनी जड़ों से जुड़े रहने और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने की प्रेरणा दी।

उनके नेतृत्व में जनजातीय समाज ने अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ एक सशक्त आंदोलन खड़ा किया। उनका प्रसिद्ध नारा “अबुआ दिशुम-अबुआ राज” अर्थात “हमारा देश, हमारा राज” जनजातीय स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया। यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि अपने अधिकारों और अस्तित्व की रक्षा का उद्घोष था। बिरसा मुंडा ने लोगों को संगठित किया और उन्हें अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का साहस दिया। बिरसा मुंडा द्वारा संचालित आंदोलन को इतिहास में “उलगुलान” अर्थात महान जनक्रांति के नाम से जाना जाता है। इस आंदोलन ने अंग्रेजी शासन को चुनौती दी और यह स्पष्ट कर दिया कि जनजातीय समाज अपने अधिकारों के लिए किसी भी संघर्ष से पीछे नहीं हटेगा। बिरसा मुंडा की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि लोग उन्हें भगवान का स्वरूप मानने लगे और सम्मानपूर्वक “धरती आबा” कहकर पुकारने लगे, जिसका अर्थ है धरती का पिता।

स्वतंत्रता आंदोलन और जनजातीय अधिकारों के लिए संघर्ष

उनका संघर्ष केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था। वे सामाजिक सुधारक भी थे। उन्होंने अंधविश्वास, कुरीतियों और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई। उनका उद्देश्य जनजातीय समाज को शिक्षित, जागरूक और आत्मनिर्भर बनाना था। उन्होंने लोगों में स्वाभिमान और आत्मविश्वास का संचार किया, जो किसी भी समाज की उन्नति के लिए आवश्यक होता है। यद्यपि भगवान बिरसा मुंडा का जीवन बहुत छोटा रहा और मात्र 25 वर्ष की आयु में 9 जून 1900 को उनका निधन हो गया, लेकिन इतने कम समय में उन्होंने जो कार्य किए, वे उन्हें अमर बना गए। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और जनजातीय अधिकारों के संघर्ष का एक स्वर्णिम अध्याय है। उनका जीवन हमें अपनी संस्कृति, परंपराओं और राष्ट्रीय एकता के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देता है। वे हमें सिखाते हैं कि आत्मसम्मान, साहस और संगठन की शक्ति से किसी भी अन्याय का सामना किया जा सकता है।

Topics: Birsa Munda JayantiTribal Freedom FighterIndian Freedom StruggleBhagwan Birsa MundaTribal RightsJanjatiya Gaurav DivasBirsa Munda's biographyHistory of Birsa Munda
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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