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बंगाल विजय : बलिदान, संघर्ष और जनता की जीत

चुनाव परिणाम आने के बाद बंगाल की सड़कों पर जो उत्सव देखा गया, वह केवल एक दल की जीत का जश्न नहीं था — वह 15 वर्षों के भय, दमन और निराशा से मिली मुक्ति का उत्सव था।

Written byकैलाश विजयवर्गीयकैलाश विजयवर्गीय
May 8, 2026, 07:40 pm IST
in भारत, विश्लेषण, पश्चिम बंगाल

वर्ष 2021 में बंगाल विधान सभा चुनाव की तैयारी बड़े जोरों-शोरों से चल रही थी। पार्टी कार्यालय में देर रात तक बैठक चलती थी, कार्यकर्ताओं का जोश देखकर मन आश्वस्त था — सत्ता परिवर्तन की लहर साफ दिख रही थी। ऐसी ही एक रात बीरभूम जिले में देर रात तक  कार्यकर्ताओं की बैठक ली। अगली सुबह बार-बार आ रहे फोन कॉल ने मेरी नींद खोल दी। फोन पर एक महिला की घबराई हुई, कांपती आवाज़ थी— वह एक समर्पित कार्यकर्ता की  पत्नी थी जो पिछली रात में मेरे साथ बैठक में था। वो बोली  — “ओ राते बाड़ि आशेनि। ताके हुमकि देओया होयेछिलो। ताके बाँचाओ।”(वो रात में घर नहीं आए। उन्हें धमकी दी गई थी। उन्हें बचा लो)

भारतीय जनता पार्टी का महासचिव और पश्चिम बंगाल का 2015 से 2021 तक प्रभारी रहने के नाते ऐसी घबराई और कराहती आवाजें मैंने कई बार सुनी थी। बंगाल में लगातार लोगों से बातचीत करने के कारण बांग्ला भाषा न आने के बावजूद मुझे यह समझ आ गया था कि आज एक और कार्यकर्ता की जान खतरे में है। मैंने तुरंत पुलिस को सूचित किया। कुछ ही घंटों बाद पता चला कि उस कार्यकर्ता का शव एक खंडहर में फांसी के फंदे से लटका मिला। शरीर पर गहरे घावों के निशान साफ बता रहे थे कि यह हत्या थी — आत्महत्या नहीं। लेकिन बंगाल में पुलिस, प्रशासन और माफिया का गठजोड़ इतना मजबूत था कि मामले को “आत्महत्या” करार देकर  दबा  दिया गया।

यह कहानी किसी एक कार्यकर्ता की नहीं है। बंगाल में बीजेपी परिवार से जुड़ी ऐसी सैकड़ों माताएं, पत्नियां और बहनें हैं जिन्होंने अपने प्रिय जनों की राह देखी  — और वो कभी नहीं आए। सैंकड़ों  भाजपा कार्यकर्ताओं को ममता राज में इसी तरह — योजनाबद्ध, निर्मम तरीक़े से  — चुप करा दिया गया।

माफिया राज: हिंसा एक राज्य-नीति बन गई

बंगाल में पिछले 15 वर्षों की टीएमसी सरकार ने राजनीतिक हिंसा को एक राज्य-संरक्षित व्यवस्था में बदल दिया था। टीएमसी द्वारा संरक्षित कुख्यात अपराधी हर जिले में मौजूद थे। इनमें  प्रमुख थे — डायमंड हार्बर के जहांगीर और संदेशखाली का शेख शाहजहां, जो बंगाल में आतंक का राज चलाते थे। हजारों मुस्लिम समर्थकों के बल पर इन्होंने नकली नोट, हथियार तस्करी, ड्रग्स और घुसपैठ का पूरा जाल बिछा रखा था। जो भी इनके विरुद्ध आवाज़ उठाता, उसे इन अपराधियों का सामना करना पड़ता।

2019 चुनाव के बाद इस आतंक को देखते हुए मैंने शेख शाहजहां के अवैध कार्यों  से अवगत कराते हुए माननीय अमित शाह जी को एक पत्र लिखा था। बाद में इसके विरुद्ध CBI जांच हुई, हजारों करोड़ रुपये की अवैध संपत्ति और आपराधिक गतिविधियों की जानकारी सामने आई। सीबीआई की जांच रिपोर्ट के आधार पर शेख शाहजहां सलाखों के पीछे तो कर दिया गया लेकिन उसके फैलाए हुए आपराधिक जाल और टीएमसी के साथ जुड़ाव ने बंगाल का भारी नुकसान किया था।

शेख शाहजहां के हौसले इतने बुलंद थे कि जब प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी जांच के लिए उसके ठिकानों पर गए तो उसने इन अधिकारियों पर ही हमला करवा दिया था।

टीएमसी के जिलाध्यक्ष अनुब्रत मंडल उर्फ “कोस्तू दादा” की कहानी भी कुछ इस तरह की है, वे भी माफिया तंत्र का हिस्सा थे और बाद में पशु तस्करी के आरोप में जेल भी गए। इस तरह टीएमसी के माफिया लगभग हर जिले में पनप रहे थे, जिनके दम पर ममता जी सत्ता में बनी हुई थीं। नेता, अधिकारी और असामाजिक तत्वों का यह नेक्सस बंगाल में खुलकर काम कर रहा था।

बंगाल में राजनीतिक हिंसा कोई नई बात नहीं थी। वामपंथी शासन के 34 वर्षों में भी इसे संरक्षण मिलता रहा। 2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने घोषणा की थी — “बंगाल में अब बदला नहीं, बदलाव की राजनीति होगी।” लेकिन वास्तव में उन्होंने वामपंथी तौर-तरीकों को ही और अधिक आक्रामक रूप में अपना लिया। देश में चुनावों के दौरान इतनी व्यापक हिंसा के दृश्य बंगाल के अतिरिक्त और किसी राज्य में नहीं मिलेंगे।

भाजपा का झंडा उठाना भी खतरनाक था

2014 के बाद जैसे-जैसे बंगाल में भाजपा की लोकप्रियता बढ़ने लगी, टीएमसी की बौखलाहट भी उसी अनुपात में बढ़ती गई। भाजपा कार्यकर्ताओं के नाम के पोस्टर लगाए जाते जिनमें “सिर काट देने” की खुली धमकियां होतीं। भाजपा कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। घरों में घुसकर हमला करना, महिलाओं के साथ अभद्रता और अत्याचार सामान्य बना दिया गया था। टीएमसी के गुंडो द्वारा भाजपा के पार्टी कार्यालयों पर बमों से हमले किए जाते। बंगाल के आधे से अधिक जिलों में भय का ऐसा माहौल था कि लोग पार्टी का झंडा तक नहीं उठा सकते थे।

2018 के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में टीएमसी ने हिंसा और भय के बल पर पंचायत की 34 प्रतिशत सीटों पर निर्विरोध कब्जा कर लिया। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान दक्षिण 24 परगना में श्री अमित शाह जी की जनसभा से पहले, भाजपा कार्यकर्ताओं को केवल झंडा और बैनर लगाने पर पीटा गया। टीएमसी के पार्टी कार्यालयों से भारी मात्रा में बम बरामद होते थे। क्या आप सोच सकते हैं कि भारत में किसी राजनैतिक पार्टी के दफ्तर में बम मिले?

West Bengal Election forign media
प्रतीकात्मक तस्वीर

“जय श्री राम” का उद्घोष भी बन गया अपराध

ममता बनर्जी द्वारा धार्मिक तुष्टीकरण और घुसपैठियों को संरक्षण देने की नीति के विरोध में आम जनता ने “जय श्री राम” के नारे को विरोध का प्रतीक बना लिया था। जब उनके काफिले के सामने लोग यह नारा लगाते, तो वे स्वयं पुलिस को आदेश देकर उन्हें गिरफ्तार करवाती थीं। “जय श्री राम” बोलने वालों को ढूंढ-ढूंढकर हिरासत में लिया जाता था। भगवान श्री राम का नाम लेना भी “अपराध” हो गया था। ममता बनर्जी ने भाजपा से नफरत में भगवान श्री राम से भी खुली नफरत प्रकट की — और यह दृश्य बता रहा था कि बंगाल में टीएमसी का शासन किस सीमा तक गिर चुका था।

अंधेरे में जलती मशालें: संगठन का संकल्प

ऐसे विषम वातावरण में भी भाजपा ने हिम्मत नहीं हारी। अनेक बलिदान और कठिनाइयों को झेलते हुए भी भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल में राष्ट्रवाद और सच्चे लोकतंत्र के लिए लड़ना जारी रखा।  हमने एक-एक जिले में, एक-एक बूथ पर कार्यकर्ताओं को संगठित किया। संगठन के साथी घर-घर जाते, कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते और टीएमसी की तानाशाही के सामने डटकर खड़े होने का आह्वान करते। जिन्होंने धमकियों की परवाह न करते हुए पार्टी का झंडा थामे रखा — उन्हीं अनाम बलिदानियों के कंधों पर यह संगठन खड़ा है।

भाजपा के इसी संगठन ने टीएमसी के संगठित भ्रष्टाचार को उजागर किया। तुष्टीकरण की नीति से बंगाल में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव और बंगाली अस्मिता की लूट का पर्दाफाश किया। राज्य से हो रहे सतत पलायन, महिला सुरक्षा और विकास के मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर उठाया। इसका परिणाम सामने आया — 2016 की मात्र 3 विधानसभा सीटों से बढ़कर 2026 में भाजपा ने 207 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया।

बीजेपी का बंगाल जीतना क्यों आवश्यक था

 बंगाल एक सीमावर्ती राज्य है जिसमें राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर राष्ट्र प्रथम को अपना आदर्श मानने वाली सरकार का होना आवश्यक था। सीमा पार से तस्करी, घुसपैठ, हथियार और नशे का कारोबार राज्य सरकार के समर्थन से ही फल फूल रहा था। इन संगठित अपराधों पर रोक लगाने के लिए बीजेपी का बंगाल की सत्ता में आना आवश्यक था।

चुनाव परिणाम आने के बाद बंगाल की सड़कों पर जो उत्सव देखा गया, वह केवल एक दल की जीत का जश्न नहीं था — वह 15 वर्षों के भय, दमन और निराशा से मिली मुक्ति का उत्सव था। आम लोगों ने सड़कों पर उतरकर जिस प्रकार अपनी खुशी और संतुष्टि व्यक्त की, यह जनविश्वास दर्शाता है कि टीएमसी सरकार ने उन्हें कितने लंबे समय तक भय और निराशा में जकड़े रखा था।

मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं — यह चुनाव तुष्टीकरण बनाम राष्ट्रीयता, हिंसा बनाम विकास और भय बनाम सुरक्षा के बीच लड़ा और जीता गया है। राष्ट्रवाद से नफरत करने वालों को और बंगाल की साझी संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश करने वालों को बंगाल की जनता ने मुंहतोड़ जवाब दे दिया है।

यह जनादेश माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और अमित शाह जी के नेतृत्व में बंगाल के नए निर्माण का शंखनाद है। बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार एक तरह से आज़ादी की तरह है। देश की जनता बंगाल की इस आज़ादी के लिए दोनों नेतृत्व को बहुत लंबे समय तक याद करेगी। सैकड़ों शहीद कार्यकर्ताओं का बलिदान व्यर्थ नहीं गया — बंगाल जाग चुका है, और अब लौट रहा है अपनी उस गरिमा की ओर जो उसे हमेशा से मिलनी चाहिए थी।

(लेखक 2015 से 2021 तक पश्चिम बंगाल में बीजेपी के प्रभारी रहे हैं )

Topics: बंगाल चुनावकैलाश विजयवर्गीयजनादेशविधानसभा चुनाव परिणामपाञ्चजन्य विशेषजन का मनसत्ता परिवर्तनघुसपैठधार्मिक कट्टरताराष्ट्रवादबंगाल जनादेशबंगाल में भाजपातृणमूल कांग्रेस का माफिया राजजय श्री राम
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