NCRB की रिपोर्ट:  नारी अस्मिता और सुरक्षा के लिए संवेदनशील होता भारत
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NCRB की रिपोर्ट:  नारी अस्मिता और सुरक्षा के लिए संवेदनशील होता भारत

महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की करें तो इस रिपोर्ट के अध्‍ययन से सामने आता है कि 1.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।

Written byडॉ. निवेदिता शर्माडॉ. निवेदिता शर्मा
May 7, 2026, 10:20 am IST
inभारत
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

भारत में नारी सम्मान, सुरक्षा और सशक्तीकरण की चर्चा वर्तमान दौर में नीति, कानून और सामाजिक व्यवहार में स्पष्ट बदलाव के रूप में उभर रही है। बीते वर्षों में केंद्र एवं राज्‍य सरकारों द्वारा अपनाई गई बहुआयामी रणनीतियों, कानूनी सुधारों, तकनीकी हस्तक्षेपों और जन-जागरूकता अभियानों ने एक ऐसे वातावरण का निर्माण किया है, जहां महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को केंद्र में रखा जा रहा है। ताजा आंकड़े इस परिवर्तन की दिशा को पुष्ट करते हैं और यह संकेत देते हैं कि देश धीरे-धीरे अधिक सुरक्षित और संवेदनशील समाज की ओर अग्रसर है।

अपराध दर में गिरावट है बदलते परिदृश्य का संकेत

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के वर्ष 2024 के आंकड़े एक सकारात्मक प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। वर्ष 2024 में देशभर में कुल 58.85 लाख अपराध दर्ज किए गए, जबकि 2023 में यह संख्या 62.41 लाख थी। इस प्रकार कुल अपराधों में लगभग छह प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। अपराध दर भी घटकर 418.9 रह गई, जो 2023 में 448.3 थी। हत्या जैसे गंभीर अपराधों में भी 2.4 प्रतिशत की कमी देखी गई, जहां 2024 में 27,049 मामले सामने आए। इन अपराधों के पीछे मुख्य कारण विवाद, निजी रंजिश और आर्थिक लाभ रहे। निश्‍चित तौर पर यह गिरावट शासन-प्रशासन की प्रभावशीलता और कानून-व्यवस्था में सुधार का संकेत है।

महिलाओं के खिलाफ अपराध: घटती दर, बढ़ती सजगता

यदि यहां चर्चा महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की करें तो इस रिपोर्ट के अध्‍ययन से सामने आता है कि 1.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2024 में 4.41 लाख मामले दर्ज हुए, जबकि 2023 में यह संख्या 4.48 लाख थी। प्रति लाख महिला आबादी पर अपराध दर भी घटकर 64.6 हो गई, जो पहले 66.2 थी। यह बदलाव महिलाओं की सुरक्षा के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता और प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेपों का परिणाम माना जा सकता है। इन अपराधों में पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता प्रमुख कारण बना हुआ है, जिसके बाद अपहरण और महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से किए गए हमले आते हैं। हालांकि यह स्थिति यह भी संकेत देती है कि घरेलू स्तर पर जागरूकता और सामाजिक सुधार की आवश्यकता अभी बनी हुई है।

सरकार की योजनाएं: सशक्तिकरण की आधारशिला

महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने कई योजनाएं संचालित की हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान ने समाज में बालिकाओं के प्रति दृष्टिकोण को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ‘वन स्टॉप सेंटर’ योजना के तहत हिंसा से पीड़ित महिलाओं को एक ही स्थान पर कानूनी, चिकित्सीय और मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।

‘महिला हेल्पलाइन 181’ और ‘नारी शक्ति केंद्र’ जैसी पहलें महिलाओं को तत्काल सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। ‘उज्ज्वला योजना’ के माध्यम से महिलाओं को सुरक्षित और स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराया गया है, जिससे उनके स्वास्थ्य और जीवन स्तर में सुधार हुआ है। इसी तरह से देश भर में राज्य स्तर पर भी अनेक योजनाएं लागू की गई हैं, जैसे ‘लाड़ली लक्ष्मी योजना’, ‘कन्या सुमंगला योजना’ और ‘महिला शक्ति केंद्र’, जोकि आज महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देती हैं।

तकनीकी हस्तक्षेप और पुलिसिंग में सुधार

महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तकनीक का व्यापक उपयोग किया जा रहा है। ‘सेफ सिटी प्रोजेक्ट’ के तहत शहरों में सीसीटीवी कैमरे, स्मार्ट लाइटिंग और आपातकालीन कॉल बॉक्स स्थापित किए गए हैं। मोबाइल एप्स जैसे ‘हिम्मत’, ‘रक्षा’ और ‘शक्ति’ महिलाओं को संकट के समय तुरंत सहायता प्राप्त करने में सक्षम बनाते हैं।

पुलिस बल में महिला कर्मियों की संख्या बढ़ाई जा रही है और विशेष महिला थानों की स्थापना की गई है। साथ ही, जेंडर सेंसिटाइजेशन ट्रेनिंग के माध्यम से पुलिस अधिकारियों को संवेदनशील बनाया जा रहा है, जिससे पीड़ित महिलाओं के साथ व्यवहार में सुधार हो।

सामाजिक जागरूकता: बदलाव की असली ताकत

इसके साथ आज यह भी एक सच है कि कानून और योजनाओं के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता भी महिलाओं की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मीडिया, शिक्षा संस्थानों और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे अभियान समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा दे रहे हैं। स्कूलों और कॉलेजों में जेंडर समानता पर आधारित पाठ्यक्रम और कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं, जिससे नई पीढ़ी में सम्मान और समानता की भावना विकसित हो रही है। ‘मी टू’ जैसे आंदोलनों ने महिलाओं को अपनी आवाज उठाने का साहस दिया है और समाज में जवाबदेही की भावना को मजबूत किया है।

कमजोर वर्गों की सुरक्षा: समावेशी दृष्टिकोण

अनुसूचित जाति और जनजाति के विरुद्ध अपराधों में भी कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2024 में एससी के विरुद्ध 55,698 मामले दर्ज हुए, जो 2023 की तुलना में 3.6 प्रतिशत कम हैं। एसटी के विरुद्ध अपराधों में 23.1 प्रतिशत की उल्लेखनीय गिरावट देखी गई, जहां 2024 में 9,966 मामले सामने आए। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि सरकार की नीतियां समाज के सभी वर्गों को ध्यान में रखते हुए बनाई जा रही हैं और उनका प्रभाव भी व्यापक स्तर पर दिखाई दे रहा है।

यहां कहना यही है कि सामने आई एनसीआरबी की रिपोर्ट आज सकारात्‍मक सोच के साथ विश्‍वास पैदा करती है कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए आवश्यक कदम अपना प्रभावी असर दिखा रहे है, इसलिए ही आज भारत में महिलाओं की सुरक्षा और अस्मिता के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता एक सकारात्मक बदलाव का संकेत दे रही है। आंकड़ों में आई गिरावट, योजनाओं की प्रभावशीलता और सामाजिक जागरूकता मिलकर एक नए भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जहां नारी सम्मान सर्वोपरि है। आगे के लिए यही कहना है कि यह यात्रा निरंतर है और इसमें हर कदम महत्वपूर्ण है।

 

Topics: महिला अपराधमहिला सुरक्षाभारतीय कानूनएनसीआरबी की रिपोर्टअपराधों में कमीअपराध दर
डॉ. निवेदिता शर्मा
डॉ. निवेदिता शर्मा
(लेखिका मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्‍य रही हैं) [Read more]
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