राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह माननीय दत्तात्रेय होसबाले जी का अमेरिका प्रवास केवल एक विदेश यात्रा नहीं, बल्कि संघ के लिए वैश्विक बौद्धिक संवाद के एक नए चरण का संकेत है। यह प्रवास इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह संघ के शताब्दी वर्ष की पृष्ठभूमि में हुआ, जब संघ केवल भारत के भीतर ही नहीं, बल्कि विश्व के विचारक वर्ग, नीति संस्थानों और प्रवासी समाज के बीच भी अधिक गंभीरता से समझा जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि पहले संघ के वरिष्ठ अधिकारियों ने विदेश प्रवास नहीं किए। माननीय रज्जू भैया के उच्च अधिकारी के रूप में तीन महत्वपूर्ण विदेश प्रवास हुए थे, जिनमें जापान, अफ्रीका और इंग्लैंड शामिल थे। इन प्रवासों में उन्होंने अनेक सार्वजनिक और सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लिया और वहां के प्रसार जगत को साक्षात्कार भी दिए, जिनमें बीबीसी भी शामिल था। जापान में माननीय रज्जू भैया ने बौद्ध समाज के भिक्षुओं और विद्वानों के साथ भी कई कार्यक्रम किए। परंतु उन कार्यक्रमों का स्वरूप आज के अर्थ में व्यापक सामुदायिक जुड़ाव नहीं कहा जा सकता। वह मुख्यतः हिंदू समाज और संबंधित सांस्कृतिक समाजों के साथ सौहार्दपूर्ण बंधुत्व संबंधों को मजबूत करने का प्रयत्न था।

इस बार माननीय दत्ता जी का प्रवास अपने उद्देश्य और स्वरूप दोनों में भिन्न था। इस प्रवास में हिंदू स्वयंसेवक संघ और भारतीय समाज से जुड़े लोगों के साथ-साथ अमेरिकी बौद्धिक वर्ग, थिंक टैंक्स, सामाजिक नेतृत्व और अन्य समुदायों के सामने संघ के दर्शन, हिंदुत्व और भारतीय सभ्यता दृष्टि को समझाने का सजग प्रयास दिखाई दिया। यह केवल अपने लोगों से संवाद नहीं था, बल्कि उन लोगों से भी संवाद था जो लंबे समय से भारत, हिंदू समाज और संघ को प्रायः दूसरे स्रोतों के माध्यम से समझते रहे हैं।
यह मानने में संकोच नहीं होना चाहिए कि आज भी अमेरिका विश्व की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में है। उसके विश्वविद्यालयों, थिंक टैंक्स, मीडिया संस्थानों और नीति केंद्रों का प्रभाव केवल अमेरिकी समाज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक धारणा निर्माण पर भी पड़ता है। पश्चिमी सभ्यता की श्रेष्ठता का विमर्श हो, कम्युनिस्ट देशों की आलोचना हो, इस्लामी कट्टरवाद पर बहस हो या भारत जैसे सभ्यतागत राष्ट्रों की छवि गढ़ने का प्रश्न हो, अमेरिका का अकादमिक और प्रचार तंत्र निर्णायक भूमिका निभाता रहा है।
राजनीतिक इस्लाम और 26/11 जैसे आतंकी आक्रमणों ने विश्व राजनीति को एक अलग मोड़ दिया। पहले अमेरिका और पश्चिम के कई वर्गों को लगता था कि आतंकवाद तीसरे विश्व की समस्या है। परंतु इस्लामी जिहादी आतंकवाद ने जब पश्चिमी विश्व के द्वार पर दस्तक दी, तब भारत, अफ्रीका और एशिया के आतंकी अनुभव अचानक दूर की घटनाएं नहीं रहे। यह विचारधारा अपने विध्वंसक रूप में विश्व के सामने आई। फिर भी अमेरिकी अकादमिक विश्व में आधुनिक नव साम्यवाद, और पहचान आधारित राजनीति का उपयोग करते हुए अनेक कट्टरपंथी या उनके समर्थक वैचारिक नेटवर्क स्वयं को पीड़ित समाज की भाषा में प्रस्तुत करने लगे। इस्लामोफोबिया जैसे शब्दजाल ने कई बार वास्तविक कट्टरवाद की आलोचना को भी संदिग्ध बनाने का काम किया। यदि यह विमर्श अमेरिका के विश्वविद्यालयों, मीडिया और अकादमिक तंत्र से संचालित न होता, तो शायद इतनी आसानी से वैश्विक प्रभाव न बना पाता। इसी प्रकार भारत को भी लंबे समय तक जातिवाद, अंधविश्वास और पिछड़ेपन से ग्रस्त समाज के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह विमर्श केवल विचारों का मतभेद नहीं था, बल्कि एक ऐसी नैरेटिव शक्ति थी, जिसने भारत की सभ्यतागत जटिलता को समझे बिना उसे एक रूढ़ छवि में बंद कर दिया। नरेन्द्र मोदी जी के उदय से पहले भी अमेरिका में ऐसे विचारकों, प्रसार माध्यमों और राजनीतिक लोगों की कमी नहीं थी जो भारत को पाकिस्तान या अफ्रीका के संकटग्रस्त देशों के स्तर पर देखकर समझते थे।
यदि भारत और हिंदू समाज के बारे में ऐसी धारणाएं दशकों तक बनी रहीं, तो हिंदुत्व के वाहक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में वहां कैसा विमर्श चलता रहा होगा, यह सहज समझा जा सकता है। पिछले वर्षों में हिंदू समाज ने अपनी शिक्षा, परिश्रम, तकनीकी कौशल और बौद्धिक शक्ति के आधार पर अमेरिका में अत्यंत सफल प्रवासी समाज के रूप में स्थान बनाया है। इसका विराट रूप मोदी जी के अमेरिका प्रवासों में वहां के समाज और नेताओं ने देखा। परंतु इसका एक नकारात्मक पक्ष भी सामने आया, विशेषकर ट्रम्प 2.0 के समय, जब भारतीय मूल के लोगों, उच्च कौशल वाले पेशेवरों और हिंदू समाज को लेकर ईर्ष्या, आशंका और राजनीतिक प्रतिक्रिया के संकेत भी दिखे।

हमारी बड़ी समस्या संवाद की रही है। अर्थात विचारों को समय पर, स्पष्टता से और सही भाषा में समाज तक पहुंचाने की। कुछ वर्ष पहले मेरे (लेखक के) अमेरिका प्रवास के दौरान कई तरुणों और प्रवासी भारतीयों ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीसीए) के बारे में नाराजगी व्यक्त की। उनका कहना था कि भारत सरकार उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठीक से समझा नहीं पाई, या शायद भारतीय राजनयिकों ने उसे पर्याप्त आवश्यक नहीं समझा। परिणाम यह हुआ कि एक नीति, जिसका उद्देश्य विशिष्ट ऐतिहासिक और मानवीय संदर्भ से जुड़ा था, उसे मुस्लिम विरोधी कहकर व्यापक आलोचना का विषय बनाया गया। उसी समय भारतीय मूल के कुछ मुस्लिम संगठनों के नेताओं के साथ मेरी लगभग दो घंटे खुलकर बहस चली। उस चर्चा से यह स्पष्ट हुआ कि सही संवाद न होने पर एक अच्छी पहल भी निंदा का विषय बन सकती है और भारत मुस्लिम विरोधी है, इस प्रकार के विमर्श का खाद्य बन सकती है।
पिछले वर्ष संयोग से मेरा फिर अमेरिका प्रवास हुआ। तब कुछ अफ्रीकी मूल के सामाजिक नेताओं, यहूदी संस्थाओं और विचारकों से चर्चा हुई। उस समय भारतीय हिंदू समाज को सबसे अधिक सफल और समृद्ध समाजों में से एक के रूप में देखा जा रहा था, किंतु कई स्थानों पर इसमें प्रशंसा से अधिक ईर्ष्या और दूरी का भाव भी था। मानना होगा कि भारत की सांप और हाथी पालने वाले देश वाली पुरानी छवि को इसी सफल प्रवासी समाज और तकनीकी विशेषज्ञों ने बदला है। माननीय दत्ता जी ने अपनी परिचर्चा में स्मित हास्य से कहा कि भारत को कभी land of slums, snakes and swamis के रूप में देखा जाता था।
उस प्रवास में मुझे ध्यान आया कि वहां का अन्य समाज हमें गोरों के समकक्ष रख रहा है। हमारे संघर्ष, आक्रमणों, सांस्कृतिक विध्वंस और सदियों के नरसंहार के बारे में उन्हें बहुत कम जानकारी है। इसलिए हमारे समाज के प्रति उनकी दृष्टि अधूरी है। वास्तविकता यह है कि हमारा अनुभव वहां के अनेक प्रताड़ित समाजों के अनुभव से अधिक साम्य रखता है, परंतु विमर्श वैसा नहीं बना। जब मैंने अफ्रीकी मूल के कुछ लोगों से भारत के नरसंहार, मंदिर विध्वंस, आक्रमणों और सांस्कृतिक संघर्षों की बात की, तो उन्हें आश्चर्य हुआ। इसके बाद भारतीय समाज को देखने की उनकी दृष्टि बदली। हिंदू धर्म और हिंदू समाज के बारे में दृष्टिकोण बदलने का प्रयत्न भी इस प्रवास में हुआ।
इसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छवि उसके प्रत्यक्ष कार्य से बहुत भिन्न बनाई गई है। यह विश्व को बताना आवश्यक है। दत्ता जी से पूछे गए प्रश्नों से यह अज्ञान स्पष्ट दिखाई दिया। दलित विरोधी, महिला विरोधी, मुस्लिम और ईसाई समाज विरोधी नीतियां जैसे आरोप बार-बार संघ पर लगाए जाते हैं। इन विषयों पर संघ के सर्वोच्च नेतृत्व द्वारा स्पष्ट विचार रखना आवश्यक था। इसलिए यह प्रवास और वहां के बड़े विचारकों तथा थिंक टैंक्स से चर्चा अत्यंत आवश्यक थी।
भारतीय राजनीति में संघ प्रेरित व्यक्तित्वों की उपस्थिति और प्रभाव को देखते हुए संघ की स्पष्ट भूमिका का अंतरराष्ट्रीय महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। भारत के प्रधानमंत्री स्वयं संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं, यह बात विश्व जानता है। इसलिए संघ के बारे में आधिकारिक और स्पष्ट विचारों का अमेरिका भारत संबंधों और विदेशों में हिंदुत्व से प्रेरित कार्य करने वाले संगठनों पर भी प्रभाव पड़ेगा। वर्षों से संघ और हिंदू विरोधी प्रचार के आधार पर विदेशों में हिंदू संस्थाओं को संदेह की दृष्टि से देखने, उन पर कीचड़ उछालने और कभी-कभी वहां की राज्यव्यवस्था का उपयोग हिंदू समाज को दबाने के लिए करने के प्रयास हुए हैं। इसलिए दत्ता जी का यह प्रवास आवश्यक था।
दत्ता जी के साथ हुए प्रश्नोत्तरों से संघ की कई विषयों पर भूमिका आधिकारिक रूप से सामने आई। इससे संघ और हिंदुत्व को समझने में सहायता मिली होगी, इसमें कोई संदेह नहीं। उनके अनेक उत्तर संघ की पारंपरिक सोच को उजागर करते हैं और विचार की निरंतरता भी दर्शाते हैं। दत्ता जी ने उत्तर संक्षिप्त, स्पष्ट और ऐसी भाषा में दिए जिसे वहां का बौद्धिक वर्ग और सामान्य समाज आसानी से समझ सके। भारत और उसकी संस्कृति के बारे में वहां सीमित जानकारी है, इसलिए यह शैली विशेष रूप से उपयोगी रही।
हिंदू शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू कोई संकीर्ण मजहबी पहचान नहीं है। हम किसी एक किताब या एक पैगंबर तक सीमित नहीं हैं। यह कथन हिंदू संस्कृति और अन्य कई सभ्यताओं के मूलभूत अंतर को स्पष्ट करता है। ‘मेरा ही सत्य अंतिम सत्य है और अन्य सब मिथ्या हैं,’ इस प्रकार का दूसरे पर हावी होने का विचार विश्व के संघर्षों का मूल कारण रहा है। हिंदू केवल एक संज्ञा नहीं, बल्कि एक विशेषण भी है। ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ हिंदू संस्कृति की वह विशेषता है जो विश्व के विविध समाजों को जोड़ती है और लोगों को पंथ के आधार पर अलग नहीं करती। हम परम सत्य तक पहुंचने के विविध मार्गों का सम्मान करते हैं, इसलिए हम विश्वबंधुत्व की बात कर सकते हैं। वसुधैव कुटुंबकम् की भावना में विश्व बाजार नहीं, बल्कि एक विशाल परिवार है। भारतीय संस्कृति एक सभ्यतागत पहचान है, एक जीवन पद्धति है। हम प्रकृति, विविधता और सह-अस्तित्व को मानते हैं। इसलिए हिंदू और हिंदू सनातन संस्कृति को पोषित करने वाला संगठन या समाज किसी पर हावी हो ही नहीं सकता। अपनी बात को स्पष्टता से रखना यह कहना नहीं है कि हम सबसे श्रेष्ठ हैं।
हिंदू राष्ट्र भी किसी के विरोध की अवधारणा नहीं है। बिखरे हुए और आत्मविस्मृत समाज को संगठित करना उस समाज की ऐतिहासिक आवश्यकता है। एक संगठित और आत्मविश्वास से भरा समाज ही अपने राष्ट्र की प्रगति कर सकता है। हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को थियोक्रेटिक राज्य के रूप में नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक आत्मचेतना, राष्ट्रीय एकात्मता और सभ्यतागत निरंतरता के रूप में समझना चाहिए।
दत्ता जी ने हिंदू जीवन पद्धति में प्रकृति के साथ एकात्म होकर जीने के दर्शन की बात की। इस विषय में माननीय सुदर्शन जी कहा करते थे कि हिंदू विचार प्रकृति के दोहन की बात करता है, उसके शोषण की नहीं। वे महात्मा गांधी का स्मरण करते हुए कहते थे कि पृथ्वी में हमारी आवश्यकताएं पूरी करने की क्षमता है, परंतु हमारे लालच को पूरा करने की क्षमता नहीं। यदि पूरी मानवता को अमेरिका जैसा जीवन स्तर चाहिए, तो कई पृथ्वियों की आवश्यकता होगी। आज पश्चिम में प्रकृति को बचाने की चिंता इसलिए बढ़ी है, क्योंकि प्रकृति का जिस प्रकार शोषण किया गया, उससे मानव जीवन ही संकट में आ गया है। पश्चिमी सोच में यह भाव प्रायः कम रहा कि हम इस ईश्वर कृत ब्रह्मांड में प्रकृति के अंग हैं और उसका केवल संरक्षण ही नहीं, सम्मान भी करना हमारा कर्तव्य है। चिंता प्रायः यह रही कि हमारा उपभोग आधारित जीवन स्तर बना रहे। इसलिए हिंदू जीवन पद्धति इस पृथ्वी के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है।
पश्चिम के सामने दत्ता जी ने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सत्य को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इतिहास में हिंदुओं ने किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया। हमने किसी को उपनिवेश नहीं बनाया। इसलिए हमें किसी प्रकार का ‘ऐतिहासिक अपराधबोध’ महसूस करने की आवश्यकता नहीं है। अमेरिका में यूरोप से आकर बसे लोगों ने जिस प्रकार स्थानीय समुदायों का शोषण किया और साम्राज्यवादी देशों ने अफ्रीका तथा एशिया के समाजों का जिस प्रकार दोहन किया, उसके बिना प्रत्यक्ष उल्लेख के भी दत्ता जी ने हिंदू सभ्यता और पश्चिमी सभ्यता के अंतर को स्पष्ट कर दिया। इस विचार को अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक ले जाएं तो दत्ता जी का कथन और अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है। उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि आज की दुनिया में सहयोग और विश्वास बहुत जरूरी है। देशों को एक-दूसरे के साथ सम्मान और संतुलन के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
हम देख पाते हैं कि हिंदू दर्शन में विश्वबंधुत्व है। विश्व मात्र बाजार नहीं है। यह विश्व शांति और सभी राष्ट्रों के उत्कर्ष का मार्ग है। भारत ने कोविड आपदा में विश्व मित्र के रूप में बिना संकीर्ण लाभ-हानि का विचार किए अनेक देशों की सहायता की। उसमें भी संघ के संस्कारों से निकले नेतृत्व की हिंदू दृष्टि झलकती है।
संघ का लक्ष्य हर स्तर पर समाज के निर्माण में योगदान देना है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले पिछले दिनों जर्मनी के प्रवास पर रहे। इस दाैरान उन्होंने बर्लिन में जर्मनी के प्रमुख नीति-निर्माण संस्थानों के प्रतिनिधियों से चर्चा की और भारतीय प्रवासी समुदाय से भी संवाद किया। उन्होंने जर्मनी के प्रमुख संस्थानों, स्टिफ्टुंग विसेनशाफ्ट उंड पॉलिटिक (जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स), कोनराड-एडेनॉयर-स्टिफ्टुंग (कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन) और बर्लिन के अभिगोर्डनेटेनहाउस (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) से जुड़े सदस्यों, के साथ भी चर्चाएं कीं। इस दौरान जर्मनी में भारतीय समुदाय की अहम भूमिका पर भी बात हुई। दत्ता जी ने जर्मन प्रतिनिधियों को भविष्य में भारत आकर इस संवाद को आगे बढ़ाने का निमंत्रण दिया। उन्होंने कहा “अगले 100 वर्षों के लिए रा. स्व. संघ का लक्ष्य परिवार से लेकर समाज और पर्यावरण तक हर स्तर पर टिकाऊ समाज के निर्माण में योगदान देना है, जो साझा सार्वभौमिक मूल्यों पर आधारित हो।”
उन्होंने कहा,“जर्मनी में रह रहे भारतीयों की जिम्मेदारी है कि वे वहां के सामाजिक और आर्थिक जीवन में सकारात्मक योगदान दें। ” उन्होंने रा. स्व. संघ को दुनिया के बड़े स्वयंसेवक-आधारित संगठनों में से एक बताते हुए शिक्षा, सेवा कार्यों और सांस्कृतिक गतिविधियों में उसके योगदान को बताया। प्रवास के दौरान उन्होंने बर्लिन में एक सार्वजनिक कार्यक्रम को भी संबोधित तिकया। इसमें 200 से अधिक भारतीय मूल के लोग शामिल हुए। यह कार्यक्रम रा. स्व. संघ के शताब्दी वर्ष परआयोजित किया गया था।

भारतीय मुसलमान और संघ
संघ पर मुस्लिम विरोधी होने का आरोप बार बार लगाया गया है। पश्चिम में भी लंबे समय तक यही विमर्श चलता रहा। दत्ता जी ने इस विषय पर स्पष्ट कहा कि भारत के ज्यादातर मुसलमानों के पूर्वज यहीं के हैं। वे इसी समाज का हिस्सा हैं। कन्वर्जन या उपासना पद्धति बदलने से आपकी जड़ें नहीं बदलतीं। उन्होंने संघ की उस सोच को दोहराया जो श्रीगुरुजी के 1971 के साक्षात्कार से लेकर अलग-अलग समय पर सभी सरसंघचालकों द्वारा अपने-अपने ढंग से रखी जाती रही है।
जब तक हम इस स्वत्व के भाव को तथाकथित अल्पसंख्यकों के मन में नहीं जगाते, तब तक इस टकराव के प्रश्न का स्थायी उत्तर नहीं मिल सकता। माननीय सुदर्शन जी तो यहां तक कहते थे कि भारत के अल्पसंख्यक 99.9 प्रतिशत भारतीय मूल के हैं, तो वे वास्तव में अल्पसंख्यक कैसे हो सकते हैं? माननीय मोहन भागवत जी भी इस बात को कई बार रख चुके हैं। माननीय छागला जी ने अपनी पुस्तक में लिखा था कि मैं हिंदू हूं क्योंकि मैं अपनी वंशावली आर्य पूर्वजों से जोड़ता हूं और उस दर्शन तथा संस्कृति को संजोता हूं जो उन्होंने पीढ़ियों को सौंपी। हम इंडोनेशिया का उदाहरण कई बार देते हैं कि उपासना पद्धति बदलने से संस्कृति नहीं बदल जाती। कट्टरपंथ और राजनीतिक स्वार्थों के चलते मुसलमानों को यह समझाना आसान नहीं है, परंतु इस ऐतिहासिक सत्य को स्वीकार किए बिना इसका दूरगामी उत्तर नहीं है। साथ ही जहां गलत विचार फैलाए जा रहे हैं, उनका स्पष्ट उत्तर देना भी आवश्यक है। विश्वसनीयता इसी से बढ़ती है।
दत्ता जी ने यह भी कहा कि सभी लोग समाज का हिस्सा हैं। हम संवाद और सहभागिता में विश्वास करते हैं। संघ सतत चर्चा और खुली बातचीत करता रहा है। यह आवश्यक भी है। माननीय बालासाहेब देवरस ने इस खुली चर्चा की शुरुआत की थी, जिसे माननीय सुदर्शन जी ने बहुत आग्रह के साथ आगे बढ़ाया। सभ्य समाज में यही मार्ग श्रेयस्कर है। यह हमारे स्वभाव के अनुसार भी है। ऐसा करते हुए, जहां आवश्यक हुआ, संघ ने अनुचित व्यवहार और विचारों का कड़े शब्दों में खंडन भी किया है।

संघ और महिलाएं
संघ को पुरुष प्रधान और महिला विरोधी के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है। इस विषय पर दत्ता जी ने कहा कि महिलाएं समाज के हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं और आगे भी निभाएंगी। कई वर्ष पहले जब यह प्रश्न माननीय मोरोपंत पिंगले जी से किया गया था, तो उन्होंने कहा था कि संघ की शाखा में महिलाएं नहीं हैं, परंतु संघ में महिलाएं अच्छी संख्या में हैं। यह बात सत्य है।
संघ की शाखा के समानांतर स्त्रियों के लिए राष्ट्र सेविका समिति का कार्य वंदनीय लक्ष्मीबाई केलकर मौसी ने 1936 में प्रारंभ किया। डॉ. हेडगेवार जी के मार्गदर्शन और प्रेरणा से संघ ने पूर्ण भ्रातृभाव से इस कार्य में सहायता की। राष्ट्र सेविका समिति का दीर्घकालिक संगठनात्मक विस्तार और महिला नेतृत्व भारतीय समाज में स्त्री सहभागिता की गंभीर चर्चा का महत्वपूर्ण विषय है। संघ सृष्टि के अन्य अनेक संगठनों में भी महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रही हैं।
माननीय मोहन भागवत जी कहा करते हैं कि हिंदू संगठन में संघ और समिति दो समानांतर पटरियों के समान हैं। वे यह भी कहते हैं कि महिलाओं को देवी बनाकर केवल पूजनीय बनाकर न बैठा दें, न उन्हें दबाकर रखें और न ही उन्हें पुरुष की प्रतिस्पर्धी मानकर उनसे व्यवहार करें। वे कोई सहायता नहीं चाहतीं। उन्हें केवल स्वतंत्रता दें कि वे जो चाहें, वह कर सकें। उन्हें आपकी दया, करुणा या निर्देश की आवश्यकता नहीं है। वे स्वयं अपना मार्ग चुन सकती हैं और उत्तम कार्य कर सकती हैं। भारत में गुलामी काल की विकृति को छोड़ दें तो महिला हर क्षेत्र में कार्य करती रही थी और उसे पुरुष के बराबर सम्मान प्राप्त था। पुरुष और महिला एक-दूसरे के पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। यही हिंदू विचार है।
‘भूमि, सांस्कृतिक मूल्यों, इतिहास और समाज से निर्मित होता है राष्ट्र’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले और अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री सुनील आंबेकर पिछले दिनों यूनाइटेड किंगडम के प्रवास पर रहे। इस दौरान लंदन स्थित चैथम हाउस (रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स) में “रा.स्व. संघ के विश्व दृष्टिकोण” विषय पर चर्चा आयोजित की गई। दत्ता जी ने कहा कि संघ स्वयंसेवक समाज के हर वर्ग से आते हैं, और संगठन पूरी तरह स्वयंसेवकों के माध्यम से संचालित 1,29,000 से अधिक सेवा गतिविधियां चलाता है।
सिटी ऑफ लंदन स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबिलिटी में “जमीनी स्तर से भारत को समझना” विषय पर संवाद हुआ, जिसमें केंद्र के निदेशक, फेलो और शोधकर्ता शामिल हुए। इस चर्चा में भारत को एक सभ्यतागत इकाई के रूप में समझने पर विचार हुआ। दत्ता जी ने ‘राष्ट्र’ और आधुनिक ‘नेशन स्टेट’ के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि राष्ट्र भूमि, सांस्कृतिक मूल्यों, इतिहास और समाज से निर्मित होता है, जो अनादि काल से अस्तित्व में है, जबकि ‘नेशन स्टेट’ फ्रांसीसी क्रांति के बाद विकसित एक अवधारणा है। इस दौरान हिंदू समाज में आत्म-सुधार की परंपरा और उसी के आधार पर संघ कार्य की दृष्टि पर भी चर्चा हुई।
व्यापार जगत के प्रतिनिधियों के साथ “वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में रा. स्व. संघ के वैश्विक दृष्टिकोण” विषय पर संवाद हुआ। दत्ता जी ने कहा कि स्वयंसेवक संसाधनों की कमी के बावजूद समाज को कुछ न कुछ देने का मार्ग खोज लेते हैं। कार्यक्रम में सेवा भारती जैसी संस्थाओं के शिक्षा, स्वास्थ्य और जनजातीय कल्याण के कार्यों तथा परोपकार की भूमिका पर विशेष चर्चा हुई।
प्रवास के दौरान प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों,ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, यूसीएल, एसओएएस, एलएसई और ससेक्स के विद्वानों के साथ चर्चा आयोजित की गई। इसमें ऑक्सफोर्ड के सेंटर फॉर हिंदू स्टडीज के प्रो. गेविन फ्लड, एसओएएस के राजनीति शास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. मैथ्यू नेल्सन और यूसीएल की प्रो. लूसिया मिशेलुट्टी सहित कई विद्वान शामिल हुए।
इस दौरान ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के विभिन्न दलों के सांसदों के साथ “भारत के भविष्य के निर्माण में रा. स्व. संघ की भूमिका” विषय पर एक संवाद आयोजित हुआ। इसमें कंजरवेटिव पार्टी के सांसद बॉब ब्लैकमैन सहित लेबर पार्टी के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। चर्चा में संघ के मूल सिद्धांत, शिक्षा, स्वास्थ्य, जनजातीय कल्याण और आपदा राहत में उसके जमीनी कार्य तथा भारत के भविष्य को लेकर उसकी दृष्टि पर विचार हुआ। साथ ही, भारत-ब्रिटेन संबंधों को सुदृढ़ करने में भारतीय प्रवासी समुदाय की भूमिका पर भी चर्चा हुई।
पश्चिम में संघ की छवि
दत्ता जी ने स्पष्ट कहा कि संघ अमेरिका के कुख्यात कू क्लक्स क्लैन का भारतीय संस्करण नहीं है। संघ एक खुला संगठन है। यह कोई गुप्त संस्था नहीं है। कोई भी आकर देख सकता है कि हम क्या करते हैं। यह कथन केवल बचाव नहीं था, बल्कि उस लंबे प्रचार का प्रतिवाद था जिसमें संघ को हिंसक, गुप्त, दलित विरोधी, महिला विरोधी और अल्पसंख्यक विरोधी संगठन के रूप में चित्रित किया गया।
हिंदू दर्शन किसी को ऊंच या नीच नहीं मानता। वह किसी समाज या पंथ को हीन मानकर उसे नष्ट करने की सोच नहीं रखता। दत्ताजी ने यह भी स्वीकार किया कि संघ ने लंबे समय तक विश्व पटल पर अपनी बात रखने का विशेष प्रयत्न नहीं किया, पर अब वह कर रहा है। उनका प्रवास इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
प्रवासी भारतीयों के लिए संदेश
दत्ता जी ने प्रवासी भारतीयों से कहा कि जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, उन्हें उस देश के प्रति पूरी निष्ठा रखनी चाहिए। उन्हें वहां के समाज में सकारात्मक योगदान देना चाहिए। इस विषय पर मुझे श्रीगुरुजी का एक मार्गदर्शन स्मरण आता है। जब संघ प्रेरित स्वयंसेवक भारत के बाहर वहां के हिंदू समाज में काम करने लगे, तो वे श्रीगुरुजी से मार्गदर्शन लेने भारत आए। उन्होंने पूछा कि स्वयंसेवक अपने दत्तक समाज में कैसे काम करें। श्रीगुरुजी ने कहा कि आप अपने देश में ऐसे उत्तम काम करें कि हम गर्व से उनकी बात भारत में कर पाएं। और हम भारत में ऐसे काम करें कि आपका सिर भारतीय होने के नाते गर्व से ऊंचा हो। उन्होंने यह भी कहा कि भारत आपकी जन्मभूमि और प्रेरणाभूमि है, परंतु अब आपका स्वीकार किया हुआ राष्ट्र वह है जहां आप स्थित हैं। अतः उस समाज के लिए भी आपकी जिम्मेदारी बनती है। उनके इस मार्गदर्शन को समझते हुए स्वयंसेवकों ने अपने-अपने देशों में सेवा कार्य खड़े किए, स्थानीय निवासियों की सेवा की, चाहे वह 1950 में केन्या हो या 2020 में अमेरिका।

संस्कृति और आधुनिकता
इन संवादों में संघ की ओर से एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही गई जो हमारे दर्शन और सनातन दृष्टि का मूल स्रोत है। भारतीय समाज जहां भी जाता है और जितना आधुनिक ज्ञान प्राप्त करता है, उसकी अपनी जड़ों के प्रति आस्था कम नहीं होती, बल्कि कई बार बढ़ती है। पश्चिम के कई वैज्ञानिक और विचारक भी जब भारतीय दर्शन और हिंदू विचार को समझते हैं, तो उन्हें विज्ञान और हिंदू दृष्टि में मूलभूत विरोध नहीं दिखता।
दत्ताजी ने कहा कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। हम अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भी आधुनिक बन सकते हैं। उन्होंने इसमें जापान और चीन का उदाहरण दिया। हम कह सकते हैं कि प्राचीन सभ्यताओं की यह विशेषता है कि वे आधुनिकता में अपने को अप्रासंगिक नहीं पातीं। जो सभ्यताएं अपनी जड़ें नहीं छोड़तीं, वे अधिक संतुलित, सुखी और सफल होती हैं।
संघ का उद्देश्य समाज में एकता, समरसता और सकारात्मक सोच को बढ़ाना है। दत्ता जी ने इस विचार को विश्व पटल पर स्थापित करने का प्रयास किया। संघ के विचार और भूमिका को विश्व के सामने रखने और समझाने का प्रयास आगे भी चलता रहेगा, ऐसा लगता है।
संघ के विरुद्ध विमर्श कई दशकों तक सफलतापूर्वक इसलिए चला क्योंकि संघ ने आधिकारिक रूप से वैश्विक मंचों पर अपनी भूमिका और अपनी जानकारी बहुत कम दी। संभव है कि संघ का मानना रहा हो कि संघ तो भारत में काम करता है, विश्व क्या सोचता है इससे क्या अंतर पड़ता है। परंतु समय ने स्पष्ट कर दिया कि जब भारत और हिंदू समाज वैश्विक स्तर पर उभर रहे हैं, तब संघ के बारे में चलाए गए विमर्श का प्रभाव केवल विचार क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। संघ को नारी विरोधी, दलित विरोधी, मुस्लिम विरोधी और हिंसक संगठन बताकर, उसकी प्रेरणा से चलने वाले संगठनों को फासीवादी, अत्याचारी या आतंकवादी कहकर, उन्हें कानूनी और सामाजिक रूप से दबाने के अंतरराष्ट्रीय प्रयास वर्षों से होते रहे हैं। लगता है कि संघ नेतृत्व ने इस चुनौती को गंभीरता से समझा है। इसलिए दत्ता जी के इस प्रवास के अर्थ गहरे हैं।

संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। सौ वर्ष की इस यात्रा में संघ ने व्यक्ति निर्माण, समाज संगठन और राष्ट्रीय चेतना को केंद्र में रखा। आज संघ जब पंच परिवर्तन, सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण चेतना, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों पर समाज संवाद कर रहा है, तब दत्ता जी का अमेरिका प्रवास केवल छवि सुधार का प्रयास नहीं रह जाता। यह संघ के विचार को समाज व्यवहार, नीति विमर्श और सभ्यतागत संवाद से जोड़ने का प्रयास बन जाता है।
भारत का दर्शन संपूर्ण विश्व के लिए उपयोगी हो सकता है। हमारा आग्रह है कि हिंदुत्व और भारतीय दर्शन विश्व को संघर्ष, उपभोगवाद और प्रकृति विनाश की दिशा से बचा सकते हैं। प्रकृति का पोषण भी हिंदू दृष्टि से अधिक सार्थक रूप में हो सकता है। यदि इस विचार को विश्वव्यापी बनाना है, तो विचारों के प्रवाह को दिशा देने वाली अमेरिका की भूमि पर यह संवाद आवश्यक था।
इस दृष्टि से माननीय दत्ता जी का अमेरिका प्रवास एक मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। इस प्रवास का महत्व तीन कारणों से विशेष है-पहला, संघ ने अपनी बात स्वयं कही। दूसरा, अमेरिकी बौद्धिक और नीति जगत तक प्रत्यक्ष संवाद पहुंचा। तीसरा, हिंदुत्व को सर्वोच्चता नहीं, बल्कि सभ्यागत बहुलवाद, समरसता, प्रकृति सम्मान और विश्वबंधुत्व की दृष्टि के रूप में प्रस्तुत किया गया। यही इस प्रवास का वास्तविक संदेश है।
















