अक्षरम-2026 : ‘जनसांख्यिकी बदलने से भविष्य भी बदल जाता है’
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अक्षरम-2026 : ‘जनसांख्यिकी बदलने से भविष्य भी बदल जाता है’

जनसांख्यिकी परिवर्तन केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर विमर्श बनता जा रहा है। कार्यक्रम में इस विषय पर सामाजिक कार्यकर्ता सतीश गोकुल पांडा ने अपने विचार रखे

Written byसतीश गोकुल पांडासतीश गोकुल पांडा
Apr 21, 2026, 10:58 am IST
in भारत, कला-साहित्य, हरियाणा

जनसांख्यिकी परिवर्तन से भारत ही नहीं, पूरा विश्व जूझ रहा है। इन दिनों जब भारत में जनगणना आरंभ होने वाली है, तब देश के सामने कई चुनौतियां आन पड़ी हैं। इनमें कहीं अलग श्रेणी की मांग है, तो कहीं धर्म और जाति समीकरण में बड़े बदलाव की चेतावनी है। बाहर का कोई व्यक्ति अपने घर आता है, तो वह निश्चित रूप से चुनौती है; लेकिन यदि हमारे घर के लोगों को ही कोई हमारे विरोध में खड़ा कर दे, वह और भी बड़ी समस्या है। उन पर आप तलवार भी नहीं चला सकते, यह बहुत बड़ी चुनौती है। न सिर्फ बांग्लादेशी घुसपैठिए, बल्कि यह उससे भी बड़ी चुनौती है। आज के दौर में यदि यह कहा जाए कि ‘डेमोग्राफी इज डेस्टिनी‘ यानी देश का भविष्य जनसंख्या के माध्यम से निर्धारित होता है, तो यह शत-प्रतिशत सही जान पड़ता है। क्योंकि जिस देश की जनसांख्यिकी बदलती है, उसका भविष्य भी बदलता है। जनसंख्या ही किसी भी देश का भविष्य तय करती है। यदि जनसांख्यिकी में कोई बदलाव हो रहा है, तो वहां के बुद्धिजीवी समाज को निश्चित रूप से सजग होना चाहिए और उन्हें इस बारे में चिंतन करना चाहिए।

कार्यक्रम में लगी प्रदर्शनी का अवलोकन करते गायक अनु मलिक और आयोजन समिति के सदस्य।
स्वदेशी हाट की एक झलक

जनगणना की शुरुआत

अंग्रेज जब शुरू-शुरू में भारत आए, तो वे हिंदू समाज की विविधता को देखकर हैरान थे। क्योंकि उनके लिए एक देवता, एक पुस्तक और एक धर्म ही सबकुछ था। यहां कुछ लोग विष्णु, शिव, देवी या पेड़-पौधे की पूजा करते हैं, कुछ किसी की पूजा नहीं करते हैं, फिर भी वे हिंदू हैं। हिंदू को परिभाषित करने के लिए, कि हिंदू कौन नहीं है, अंग्रेजी शासन की ओर से पहली बार 1871 में जनगणना की गई थी, लेकिन औपचारिक जनगणना 1881 की मानी जाती है। इस जनगणना में अंग्रेजों ने सिखों को अलग धर्म के रूप में अनुसूचित किया। उसके लिए अलग कॉलम बनाई गई और उस समय छह प्रतिशत सिख भारत में थे। धीरे-धीरे अंग्रेजों ने वर्गों की परिभाषा थोपी और भारतीयों ने उसे स्वीकार कर लिया। उन्होंने वनवासियों को हिंदू समाज से अलग कर दिया, और उन्हें आदिवासी की संज्ञा दी गई। साथ रहने वाले लोगों को अलग-अलग नाम देकर समाज को बांटना शुरू कर दिया। 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन इसके बाद भी धार्मिक जनगणना जारी रही। जनजाति समाज का कन्वर्जन होता रहा। हमारी जनगणना प्रणाली में धर्म और मत पंथ के छह भाग हैं, अन्य धार्मिक आस्था इस श्रेणी में नहीं आते हैं। यहूदी और पारसी समुदाय को एक अलग कोड दिया गया है।

परिवर्तन के प्रमुख कारण

भारत में जनसांख्यिकी परिवर्तन के तीन प्रमुख कारण हैं, घुसपैठ, कन्वर्जन और कुल प्रजनन दर; ये तीनों महत्वपूर्ण हैं। इनकी पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए। अगर आपके घर में कोई बाहरी व्यक्ति आ जाता है, वह आपके लिए निश्चित रूप से एक चुनौती होता है। इसके अलावा, अगर वह आपके घर के लोगों को आपके विरुद्ध खड़ा कर दे, वह और भी बड़ी चुनौती होती है। इसलिए ‘अन्य धार्मिक आस्था’ का मुद्दा बहुत गंभीर है।

भारत में ‘अन्य धार्मिक आस्था’ विषय के जनक अंग्रेज हैं। अंग्रेजों को यह स्पष्ट था कि भारतीय समाज बहुत मजबूत है, यह एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है, गूंथा हुआ है। उनको बांटने के लिए उन्हें तोड़ना जरूरी था, क्योंकि यहां समाज को बांटे बिना वे लंबे समय तक अपना शासन नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने ‘डिवाइड एंड रूल,’अथवा ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति अपनाई। उन्होंने भारतीय समाज के अलग-अलग समूह, वर्ग और जाति को अलग-अलग पहचान देना शुरू कर दिया। उनको अलग करके परिभाषाएं दे दीं और कहा, ‘ये अलग हैं।’ उन्होंने एक योजना के अंतर्गत ‘धार्मिक जनगणना’ का षड्यंत्र भी रचा था। इसी का परिणाम है कि आज ‘ORP’ (Other Religion Persuasion) यानी ‘अन्य धार्मिक आस्था’ के बहाने जनसांख्यिकी परिवर्तन करने वाला एक पूरा तंत्र देश में सक्रिय है।

1951 में स्वतंत्रता के बाद भारत की पहली जनगणना हुई। तब से लेकर 2011 की जनगणना को देखें, तो मुसलमानों की जनसंख्या में 45 प्रतिशत वृद्धि हुई है और ‘अन्य धार्मिक आस्था’ वालों की संख्या में 53 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह जैविक वृद्धि हो ही नहीं सकती-यह बाहरी ताकतें ही कर सकती हैं। चिंता का विषय है कि वे ऐसे लोगों की जनसंख्या को बढ़ाने में क्यों लगी हैं? उनका उद्देश्य स्पष्ट है, ऐसे लोगों को अलग-अलग पहचान देना, उन पहचानों को बढ़ाना और फिर उनको आपस में लड़वाना। अंग्रेजों के जाने के बाद भी ऐसी वामपंथी सोच ने देश को तोड़ने की भरसक कोशिशें की हैं।

इन ईसाई मिशनरियों की भूमिका लोगों को ईसाई बनाने की होती है, बस आप ईसाई बन जाइए, कन्वर्जन कर लीजिए। क्योंकि किसी के लिए अपनी जड़ों से कटना आसान नहीं होता। व्यक्ति के लिए तुरंत निर्णय करना आसान नहीं होता, लेकिन ऐसे में लोगों को भड़काना आसान हो जाता है। ईसाई मिशनरियों ने यही तरीका अपनाया। उन्होंने अपने काम को पूरा करने के लिए दो चरणों का सिद्धांत बनाया है।

‘डेमोग्राफिक चेंज और देश की सुरक्षा’ सत्र के वक्ता (बाएं से) डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, श्री कुलदीप रत्नु, श्री बिनय कुमार सिंह एवं श्री सतीश गोकुल पांडा
‘भारत विभाजन – पीड़ा और पाठ’ सत्र के वक्ता (बाएं से) श्री राजीव तुली, श्री कृष्णानंद सागर एवं डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

कन्वर्जन की प्रक्रिया

पहले चरण में व्यक्ति को सर्वप्रथम उसके मूल से तोड़ा जाता है। उसकी छोटी पहचान के प्रति सजग किया जाता है। वे लोगों को यह कहकर भड़काते हैं, जैसे, तुम आदिवासी हो, तुम हिंदू नहीं हो; हिंदुओं ने तुम पर अत्याचार किया है; तुमको जंगल में खदेड़ दिया है; उन्होंने तुम्हें पिछड़ा बनाया। इस तरह उनकी ‘आदिवासी‘ पहचान मजबूत की जाती है और फिर वह एक बड़े समूह से कट जाता है, जड़ से भी कट जाता है। जिस मानसिक अवस्था में वह पहुंचता है, वहां दूसरे चरण यानी उसे ईसाई बनाने का काम आसान हो जाता है।

मेघालय में 1991 में ‘अन्य धार्मिक आस्था’ में विश्वास करने वालों की संख्या 58 प्रतिशत थी, जिनमें से 23 प्रतिशत ईसाई बन गए। नागालैंड में 1951 में 98 प्रतिशत नागा समुदाय के लोग थे, वे एक झटके में हिंदू धर्म से कट गए। झारखंड में 2011 की जनगणना में 32 तहसीलें ऐसी हैं, जहां पर खुद को ‘अन्य धार्मिक आस्था’ बताने वाले यानी “मैं हिंदू नहीं हूं” कहने वाले 50 प्रतिशत से अधिक हैं। 66 तहसीलें हैं, जहां हर चौथे व्यक्ति ने निशान लगाया कि “मैं हिंदू नहीं हूं”; 11 तहसीलों में 80 प्रतिशत और 2 तहसीलों में 90 प्रतिशत लोगों ने ‘अन्य धार्मिक आस्था’ वाले कॉलम में निशान लगाया है। इनमें अधिकतर मुसलमान या ईसाई हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ भी इसी ओर उन्मुख हैं। जनसांख्यिकी परिवर्तन आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है।

यदि गौर से देखा जाए और निरीक्षण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि ‘अन्य धार्मिक आस्था’ का प्रभाव उन क्षेत्रों में सघन है, जिन्हें पहले नक्सल प्रभावित क्षेत्र माना जाता था। इसके अलावा, ‘सिलीगुड़ी गलियारा’-जो पूर्वोत्तर को शेष भारत से जोड़ता है-एक अत्यंत संवेदनशील इलाका है। इस क्षेत्र में ‘अन्य धार्मिक आस्था’ में 5500 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। योजना बनाकर जिले, क्षेत्र और प्रांत को चुनना और वहां ‘अन्य धार्मिक आस्था’ के माध्यम से जनसांख्यिकी परिवर्तन कराना बेहद चौंकाने वाला है। ईसाई मिशनरियों ने ‘अन्य धार्मिक आस्था’ का एक ऐसा भ्रम खड़ा गया है, जिसके तहत वनवासी समाज को यह कहकर समाज से अलग किया जा रहा है कि आप लोग हिंदू नहीं हैं। अंग्रेजों ने पहले ही आपको अलग धर्म कोड दिया है और भारत की सरकार आपको हिंदू बनाना चाहती है। इसके चलते ही झारखंड में अलग धर्म कोड की मांग उठने लगी है।

संभव है कि निकट भविष्य में इस तरह के कई जनजाति समाज अपनी-अपनी अलग कोड की मांग करने लगें। छत्तीसगढ़ में गोंड समाज को भड़काने का प्रयास किया जा रहा है।जनगणना की चर्चा जब से शुरू हुई है, तभी से कुछ राज्यों में विशेषकर जनजाति बहुल 9 राज्यों में खुद को ‘अन्य धार्मिक आस्था’ वाला बताने का अभियान शुरू हो गया है। उल्लेखनीय है कि 2011 की जनगणना के समय 80 लाख लोगों ने ओआरपी पर निशान लगाकर यह घोषित किया कि वे हिंदू नहीं हैं। जनसांख्यिकी परिवर्तन का खेल खेलने वालों ने इसे अपना हथियार बना लिया है। समाज में सामाजिक अस्थिरता और वैमनस्य पैदा करने के लिए इसका बखूबी प्रयोग किया जा रहा है। 2011 जनगणना के अनुसार मध्यप्रदेश में 2001 से 2011 के बीच खुद को ‘अन्य धार्मिक आस्था’ में विश्वास रखने वाला बताने वालों की वृद्धि 1223 प्रतिशत है, और छत्तीसगढ़ में 2747 प्रतिशत। यह जैविक वृद्धि हो ही नहीं सकती। झारखंड में 2011 की जनगणना में 32 तहसीलें ऐसी हैं, जहां पर ‘अन्य धार्मिक आस्था’ में विश्वास रखने वाला कहने वालों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। 66 तहसीलें हैं, जहां हर चौथे व्यक्ति ने ‘अन्य धार्मिक आस्था’ वाले कॉलम में निशान लगाया कि “मैं हिंदू नहीं हूं”; 11 तहसीलों में 80 प्रतिशत और 2 तहसीलों में 90 प्रतिशत लोगों ने ‘अन्य धार्मिक आस्था’ वाले कॉलम में निशान लगाया। n

Topics: धार्मिक आस्थाजनसांख्यिकी परिवर्तनडेमोग्राफी इज डेस्टिनीजनगणनाधार्मिक जनगणनाईसाई मिशनरियांघुसपैठ और कन्वर्जनराष्ट्रीय सुरक्षाकुल प्रजनन दरआंतरिक सुरक्षाधर्म और जातिपाञ्चजन्य विशेषजड़ों से काटनाDivide and Ruleवामपंथी सोच
सतीश गोकुल पांडा
सतीश गोकुल पांडा
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