आशा भोसले का अनकहा और अनूठा सफर: 12 हजार गीतों का कीर्तिमान, मौन हुई संगीत की जादुई आवाज
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आशा भोसले का अनकहा और अनूठा सफर: 12 हजार गीतों का कीर्तिमान, मौन हुई संगीत की जादुई आवाज

800 से अधिक फिल्मों में 12,000 से ज्यादा गीतों को अपनी आवाज देकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज होने वाली आशा जी का जीवन केवल सुरों की साधना भर नहीं था बल्कि यह संघर्ष, आत्मविश्वास और निरंतर आत्म-नवाचार की अद्भुत गाथा भी था।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Apr 12, 2026, 03:39 pm IST
inमनोरंजन
Asha Bhosle passed away

आशा भोसले

भारतीय संगीत आकाश का वह अनमोल सितारा सदा के लिए मौन हो गया है, जिसकी स्वर-लहरियों ने सात दशकों तक हर पीढ़ी की धड़कनों को एक नई ताल दी। 12 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में आशा भोसले का निधन केवल एक महान गायिका का जाना नहीं बल्कि उस अद्वितीय ‘अदा’, ‘नजाकत’ और ‘स्वैग’ का अवसान है, जिसने साड़ी की गरिमा में भी भारतीय पॉप और कैबरे संगीत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई।

800 से अधिक फिल्मों में 12,000 से ज्यादा गीतों को अपनी आवाज देकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज होने वाली आशा जी का जीवन केवल सुरों की साधना भर नहीं था बल्कि यह संघर्ष, आत्मविश्वास और निरंतर आत्म-नवाचार की अद्भुत गाथा भी था। हर दौर में खुद को नए अंदाज में ढ़ालते हुए उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची कला समय की सीमाओं से परे होती है।

साये से शिखर तक: संघर्ष से सृजन की अद्भुत यात्रा

8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के एक प्रतिष्ठित संगीत परिवार में जन्मी आशा का जीवन आरंभ से ही सुरों से जुड़ा था किंतु नियति ने उनके बचपन को सहज नहीं रहने दिया। पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर से शास्त्रीय संगीत की प्रारंभिक शिक्षा मिली परंतु महज 9 वर्ष की आयु में पिता के निधन ने उनके जीवन से संरक्षण का साया छीन लिया। परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा था और बड़ी बहन लता मंगेशकर ने घर की जिम्मेदारी संभाली। ऐसे कठिन समय में आशा जी ने भी कम उम्र में ही संघर्ष को अपना साथी बना लिया। पार्श्व गायन की दुनिया में उनका सफर किसी सरल राह पर नहीं चला। उस दौर में लता मंगेशकर का वर्चस्व था और बड़े संगीतकारों की पहली पसंद वही थी। संगीत विशेषज्ञों के अनुसार, आशा जी को शुरुआती दिनों में वे गीत मिलते थे, जिन्हें प्रमुख गायिकाएं अस्वीकार कर देती थी, चाहे वे उस समय के हिसाब से ‘बोल्ड’ माने जाने वाले गीत रहे हों। लेकिन यहीं से उनकी असाधारणता प्रकट हुई। उन्होंने हर गीत को केवल गाया नहीं बल्कि उसमें अपनी आत्मा उंडेल दी। यही जिद, यही प्रयोगधर्मिता आगे चलकर उनकी पहचान बनी और उनकी आवाज को अद्भुत बहुमुखी प्रतिभा का प्रतीक बना गई।

ओपी नैयर और ‘नई आशा’ का उदय

आशा भोसले के संगीत सफर में वास्तविक परिवर्तन तब आया, जब उनकी मुलाकात संगीतकार ओ.पी. नैयर से हुई। नैयर साहब ने उस समय की परंपरा को चुनौती देते हुए लता मंगेशकर के बिना संगीत रचना का निर्णय लिया और उन्हें आशा की आवाज में वह अनोखी ‘शरारत’, ‘चंचलता’ और ‘कशिश’ दिखाई दी, जिसकी वे तलाश कर रहे थे। 1957 की फिल्म नया दौर का गीत ‘उड़े जब जब जुल्फें तेरी’ आशा जी के करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ, जिसने उन्हें मुख्यधारा की नायिकाओं की आवाज बना दिया। वहीं 1956 की सी.आई.डी. में ‘लेके पहला पहला प्यार’ गीत में शमशाद बेगम की स्थिरता और आशा की चुलबुली अदाओं का अद्भुत संगम श्रोताओं के दिलों में बस गया। यही वह दौर था, जब आशा जी ने अपनी ऐसी गायिका की एक अलग पहचान गढ़ी, जिसकी आवाज में ‘बोल्डनेस’, ‘वेस्टर्न वाइब’ और अद्वितीय ऊर्जा का सम्मोहन था।

आरडी बर्मन के साथ सुरों की क्रांतिकारी जुगलबंदी

1970 का दशक हिंदी सिनेमा में संगीतात्मक प्रयोगों का स्वर्णिम काल था और इसी दौर में आशा भोसले को मिला उनका सबसे सशक्त रचनात्मक साथी ‘आर.डी. बर्मन’, जिन्हें प्यार से ‘पंचम दा’ कहा जाता है। इस अद्वितीय जोड़ी ने न केवल गीतों को नया रूप दिया बल्कि संगीत की परंपरागत सीमाओं को भी तोड़ डाला। ‘पिया तू अब तो आजा’ और ‘दम मारो दम’ जैसे गीतों ने आशा जी को ‘कैबरे क्वीन’ के रूप में स्थापित कर दिया। उनकी आवाज में जो ऊर्जा और आधुनिकता थी, उसने भारतीय संगीत में पश्चिमी प्रभाव को एक नया आयाम दिया। हालांकि ‘दम मारो दम’ को लेकर उस समय काफी विवाद हुआ। इसे ‘अश्लील’ कहकर आलोचना झेलनी पड़ी, यहां तक कि ऑल इंडिया रेडियो ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया और दूरदर्शन ने फिल्म से इसे हटा दिया। दिलचस्प यह है कि जहां एक ओर वे कैबरे और पॉप की पहचान बन रही थी, वहीं ‘इजाज़त’ के ‘मेरा कुछ सामान’ में उन्होंने गहन भावनाओं की ऐसी अभिव्यक्ति दी, जो उनकी असाधारण बहुमुखी प्रतिभा को सिद्ध करती है।

‘उमराव जान’: जब आशा ने दुनिया को चौंका दिया

1980 के दशक तक आशा भोंसले को प्रायः चुलबुले, चंचल और आधुनिक गीतों की आवाज के रूप में देखा जाने लगा था लेकिन इसी धारणा को तोड़ते हुए संगीतकार खय्याम ने उन्हें फिल्म ‘उमराव जान’ (1981) के लिए चुना। यह एक ऐसा निर्णय था, जिसने इतिहास रच दिया। खय्याम साहब की शर्त भी उतनी ही असाधारण थी, ‘आशा, मुझे इन गीतों में तुम्हारी जानी-पहचानी आवाज नहीं चाहिए।’ उन्होंने उनसे अपनी आवाज का स्केल लगभग डेढ़ सुर नीचे लाकर गाने को कहा ताकि गजलों में नजाकत और गहराई उतर सके। परिणाम अद्भुत था। ‘दिल चीज क्या है’ और ‘इन आंखों की मस्ती के’ जैसे गीतों में आशा जी ने ऐसी संजीदगी, दर्द और अदब का संसार रचा कि हर श्रोता मंत्रमुग्ध हो उठा। यह केवल गायन नहीं बल्कि भावनाओं की सूक्ष्म अभिव्यक्ति थी। इसी फिल्म ने यह सिद्ध कर दिया कि उनकी प्रतिभा किसी एक शैली तक सीमित नहीं है और इसके लिए उन्हें अपना पहला राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

90 के दशक से नई सदी तक: सदाबहार आशा

1990 का दशक हिंदी संगीत में नई आवाजों और नए प्रयोगों का दौर था लेकिन इस बदलते परिदृश्य में भी आशा भोसले ने अपनी प्रासंगिकता को न केवल बनाए रखा बल्कि उसे एक नई चमक भी दी। ए.आर. रहमान के साथ फिल्म रंगीला में उनका जादू एक बार फिर श्रोताओं पर छा गया। ‘तन्हां तन्हां’ और ‘रंगीला रे’ जैसे गीतों को उन्होंने उस उम्र में गाया, जब अधिकांश कलाकार विराम ले लेते हैं। 60 वर्ष की आयु पार कर चुकी आशा जी की आवाज तब भी 18 वर्ष की युवती जैसी ताजगी और चंचलता से भरी हुई थी। आगे चलकर ‘खल्लास’ और ‘शरारा शरारा’ जैसे गीतों में उनकी ऊर्जा, आधुनिकता और लयबद्धता ने यह सिद्ध कर दिया कि वे समय के साथ केवल चलती नहीं बल्कि उसे दिशा भी देती हैं। आशा भोसले सचमुच एक ऐसी आवाज रही, जो हर दौर में नई होकर भी सदाबहार बनी रही।

उपलब्धियां और सम्मान

आशा भोंसले का व्यक्तित्व केवल गायकी तक सीमित नहीं था बल्कि वे बहुमुखी प्रतिभा की अद्भुत मिसाल थी। संगीत के साथ-साथ उन्हें पाक-कला में भी गहरी रुचि थी और वे एक उत्कृष्ट शेफ के रूप में जानी जाती थीं। उनकी इसी रुचि ने ‘आशाज’ नाम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रेस्टोरेंट श्रृंखला को जन्म दिया, जो दुनिया के 10 से अधिक देशों में भारतीय स्वाद का परचम लहरा रही है। सम्मानों की दृष्टि से भी उनका सफर उतना ही गौरवशाली रहा। उन्हें वर्ष 2008 में पद्म विभूषण, 2000 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और 7 फिल्मफेयर पुरस्कारों से नवाजा गया। इसके अतिरिक्त, सबसे अधिक गीत रिकॉर्ड करने वाली कलाकार के रूप में उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है, जो उनकी अथाह साधना और समर्पण का प्रमाण है। उनके करियर के विभिन्न पड़ाव भी उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाते हैं। 1950 के दशक में ओ.पी. नैयर के साथ चुलबुलेपन का रंग (उड़े जब जब जुल्फें तेरी), 70 के दशक में आर.डी. बर्मन के साथ पश्चिमी और कैबरे शैली का नवाचार (दम मारो दम), 80 के दशक में खय्याम के साथ गजलों की गहराई (दिल चीज क्या है) और 90 के दशक में ए.आर. रहमान के साथ आधुनिक संगीत की नई ऊर्जा (रंगीला रे)।

एक युग, जो कभी समाप्त नहीं होगा

बहरहाल, आशा भोसले का जाना मानो संगीत के उस विराट पुस्तकालय का शांत हो जाना है, जिसमें हर भावना (प्रेम, पीड़ा, शरारत, विरह और उल्लास) के लिए एक अलग सुर, एक अलग रंग सहेजा हुआ था। उन्होंने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के विराट व्यक्तित्व की छाया में रहते हुए भी अपनी एक स्वतंत्र, सशक्त और विशिष्ट पहचान गढ़ी, ऐसी पहचान, जो किसी तुलना की मोहताज नहीं रही। उनका जीवन एक संदेश है कि कला की कोई उम्र नहीं होती। उन्होंने यह साबित किया कि यदि भीतर जिजीविषा और सुरों में ‘आशा’ जीवित हो तो समय भी उसे थका नहीं सकता। हर दौर में खुद को नया रूप देकर उन्होंने यह दिखाया कि सच्चा कलाकार कभी पुराना नहीं होता, वह हर पीढ़ी के साथ फिर से जन्म लेता है। आज भले ही आशा भोंसले का भौतिक अस्तित्व हमारे बीच न हो लेकिन उनकी आवाज सदा जीवित रहेगी। जब भी ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ की धुन गूंजेगी या किसी महफिल में ‘आज जाने की जिद न करो’ की नजाकत बिखरेगी, आशा भोसले अपनी मधुर मुस्कान और अमिट उपस्थिति के साथ हमारे दिलों में हमेशा जीवित रहेंगी। अलविदा, सुरों की अमर जादूगरनी!

 

Topics: प्रख्यात गायिका आशा भोसलेप्लेबैक सिंगरआशा भोसलेआशा भोसले का निधनआशा भोसले का सफरआशा भोसले के गीत
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