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बंदूक नहीं, भविष्य की चाह

बस्तर अब बदल रहा है। अब वहां नक्सलियों के नारे नहीं गूंजते, सरकार ने यहां विकास, विश्वास और संवाद का त्रिकोण खड़ा किया, जिसका नतीजा सामने है

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Apr 4, 2026, 09:41 am IST
inभारत, विश्लेषण, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ की स्थापना, विकास के संकल्प और नक्सलवाद की फांस का दर्द… यह सब पाञ्चजन्य ने निकट से देखा-समझा और बताया है। पाञ्चजन्य के प्रथम सम्पादक, अटल बिहारी वाजपेयी ने ही छोटे राज्यों और विकेन्द्रित विकास के दृष्टिपथ पर बढ़ते हुए इस राज्य की नींव रखी थी।

मुझे रिपोर्टिंग के समय उस रात का भी स्मरण है जब केशकाल घाटी के अंधेरे में उतरते हुए हर मोड़ के साथ नक्सली हिंसा की कहानियां मन में जीवित हो उठती थीं। और नहीं भूलती आगे की वह यात्राएं जब घाटी-कन्दराओं से गुजरते बस्तर, अबूझमाड़, नारायणपुर की राह के दृश्य बदलने लगे।

अंधेरे से उजाले की ओर

केशकाल घाटी का अंधेरा जब अचानक फरासगांव के उजाले में बदलने लगा, जहां रात साढ़े दस बजे भी युवा खेल रहे हैं, हंसी गूंज रही है, और भय के स्थान पर सामान्य जीवन की धड़कन सुनाई दे रही है, तो मान लीजिए कि यह एक दिन और किसी खास समय की कहानी नहीं बल्कि संकल्प के साथ एक दिशा में लगातार बढ़ते कदमों की पदचाप है। यही छत्तीसगढ़ की कहानी है। यही इस लंबे संघर्ष का सार है। एक तरफ दशकों तक भय, रक्त और भ्रम का साम्राज्य, और दूसरी तरफ धीरे धीरे उभरती जीवन की स्वाभाविक आकांक्षा, अपेक्षाएं और रंग।

बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा, कांकेर, अबूझमाड़। ये केवल भौगोलिक नाम नहीं रहे, बल्कि एक वैचारिक संघर्ष के प्रतीक बन गए। लंबे समय तक यह प्रचार हुआ कि यह पूरा क्षेत्र वामपंथी हिंसा का प्राकृतिक आधार है, मानो यहां के लोग स्वेच्छा से इस हिंसक विचारधारा के साथ खड़े हैं। परंतु जब जमीन पर जाकर देखा गया, तो एक अलग ही सच सामने आया। लोग जुड़े नहीं थे, लोग जकड़े हुए थे। भय, दबाव, और विकल्पों के अभाव ने उन्हें घेर रखा था।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है कि इस संघर्ष में जो लोग मारे गए, जो भटके, जो हथियार उठाने को मजबूर हुए, वे कोई बाहरी शत्रु नहीं थे। वे हमारे ही बच्चे थे, हमारे ही भाई बहन थे, जिन्हें एक आयातित हिंसक विचारधारा की भट्टी में झोंक दिया गया। यह लड़ाई और जीत इसलिए केवल सुरक्षा बलों की नहीं है, यह समाज की लड़ाई है, यह भारतीयता के विचार की जीत है।

पाञ्चजन्य 31 जनवरी,2024 और 28 अप्रैल,2024

सुरक्षा और विकास

पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में जो परिवर्तन आया है, वह केवल आंकड़ों का परिवर्तन नहीं है, बल्कि मनोविज्ञान का परिवर्तन है। एक समय था जब नक्सली हिंसा अपने चरम पर थी। वर्ष 2010 में माओवादी हिंसा में हजार से अधिक लोगों की जान गई। आज ये आंकड़े मिट-सिमट चुके हैं। यह केवल सैन्य सफलता नहीं है, यह रणनीतिक और सामाजिक परिवर्तन का संकेत है।

हाल के वर्षों में सरकार की रणनीति में स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है। केवल बंदूक के जवाब में बंदूक नहीं, बल्कि विकास, विश्वास और संवाद का त्रिकोण खड़ा किया गया। जब संसद में गृहमंत्री यह कहते हैं कि देश नक्सलवाद के अंत की ओर निर्णायक चरण में पहुंच चुका है, तो यह केवल राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि उस जमीन पर हुए बदलाव का प्रतिबिंब है।

बस्तर के जिस क्षेत्र को कभी रेड कॉरिडोर यानी लाल गलियारा कहा जाता था, आज उसे विकास कॉरिडोर में बदलने की मुहिम आशा जगाती है। सड़कें बनी हैं, स्कूल खुले हैं, शिक्षा के नए मॉडल आए हैं। दंतेवाड़ा का एजुकेशन सिटी हो या लाइवलीहुड कॉलेज, यह केवल संस्थान नहीं हैं, बल्कि उस वैचारिक शून्य को भरने के प्रयास हैं जिसे नक्सलवाद ने पैदा किया था।

खेल, शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से जनजातीय युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है। खेल प्रतियोगिताएं, स्थानीय प्रतिभाओं को मंच, और रोजगार से जुड़ने के अवसर यह दिखाते हैं कि युवा अब बंदूक नहीं, भविष्य चुनना चाहते हैं। यही सबसे बड़ा बदलाव है।

परंतु इस परिवर्तन को समझने के लिए केवल विकास के आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। हमें उन कठिनाइयों को भी देखना होगा जिन्होंने इस संघर्ष को लंबा बनाया। पहला आयाम है राजनीतिक इच्छाशक्ति। भाजपा ने यह कठिन कार्य कैसे कर दिखाया और कांग्रेस क्यों इसे नहीं कर पाई ? उत्तर स्पष्ट है जब राज्य का तंत्र स्पष्ट और दृढ़ नहीं होता, जब नीतियों में भ्रम होता है, जब हथियार के साथ चलने वाली राजनीति के लिए जगह बनी रहती है, तब ऐसी हिंसक विचारधाराएं जगह बना लेती हैं। यह भी सच है कि लोकतंत्र को खुलेआम ललकारने वाले तत्वों को ही विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा पोषण और प्रश्रय मिला। नक्सलवाद को केवल सामाजिक समस्या बताकर उसकी वैचारिक और सुरक्षा चुनौती को कमतर आंका गया, और इससे समस्या की रोकथाम तो दूर रोग और बढ़ता गया।

दूसरा आयाम है सुरक्षा रणनीति। बीजापुर और सुकमा जैसे हमलों ने बार बार यह दिखाया कि यह संघर्ष केवल साहस से नहीं, बल्कि सटीक रणनीति और समन्वय से जीता जाता है। यदि सूचना तंत्र कमजोर हो, यदि स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) का पालन न हो, तो भारी नुकसान हो सकता है। पिछले वर्षों में सुरक्षा बलों ने अपने तरीके लगातार बदले और सुधारे। छोटे ऑपरेशन, बेहतर इंटेलिजेंस, स्थानीय सहयोग, और तकनीक का उपयोग इस बदलाव के प्रमुख तत्व रहे हैं।

तीसरा और सबसे जटिल आयाम है वह वैचारिक और सहजीवी तंत्र जिसने इस हिंसा को पोषित किया। जंगल में बंदूक उठाने वाला अकेला नहीं होता। उसके पीछे एक पूरा नेटवर्क होता है जो कभी उसे वैचारिक समर्थन देता है, कभी आर्थिक संसाधन, और कभी सामाजिक वैधता। यही वह समीकरण है जो लोकतंत्र के आंगन में विषबेल के फैलने की राह बनाता है।

बस्तर में होता विकास कार्य

आगे की चुनौती

आज जब यह देखा जा रहा है कि नक्सलवाद समाप्ति की ओर है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हिंसा अचानक एक तिथि के बाद समाप्त हो जाएगी। ऐसा मानना न केवल सरलता होगी बल्कि खतरनाक भी। यह लड़ाई अब निर्णायक चरण में अवश्य है, परंतु अंतिम नहीं। बची हुई हिंसक शक्तियां, छोटे समूह, और भारत विरोधी जहरीला वैचारिक नेटवर्क अभी भी सक्रिय हैं। इसलिए आगे की लड़ाई दो स्तरों पर लड़ी जानी है। एक, सुरक्षा बलों के माध्यम से बचे हुए सशस्त्र समूहों को समाप्त करना। और दूसरा, समाज और बौद्धिक क्षेत्र में उस विचारधारा को चुनौती देना जिसने इस हिंसा को जन्म दिया।

बस्तर के जंगलों में जब युवक यह कहते हैं कि अब पहले जैसा नक्सली डर और दबदबा नहीं है, तो यह संकेत है कि दृश्य बदल रहा है। जब कोई युवा यह कहता है कि वह अपने क्षेत्र में रहकर ही काम करना चाहता है, तो यह विश्वास की वापसी है। जब रात में बाजार खुले रहते हैं, जब खेल प्रतियोगिताएं होती हैं, जब बच्चे पोर्टा केबिन स्कूल में पढ़ते हुए गीत गाते हैं, तो यह केवल विकास नहीं, बल्कि सामान्य जीवन की पुनर्स्थापना है।

यह भी स्वीकार करना होगा कि इस संघर्ष ने समाज को गहरे घाव दिए हैं। हजारों परिवार प्रभावित हुए हैं। सुरक्षा बलों के जवानों ने बलिदान दिया है। जनजातीय समाज ने दोहरी मार झेली है। एक तरफ नक्सलियों का दबाव, दूसरी तरफ राज्य की उपस्थिति का अभाव। इस पीड़ा को समझे बिना कोई भी विश्लेषण अधूरा रहेगा।

परंतु आज स्थिति बदल रही है। यह बदलाव केवल सरकार का नहीं, बल्कि समाज का भी है। स्थानीय लोगों का सहयोग बढ़ा है। सूचनाएं मिल रही हैं। नक्सली भर्ती में गिरावट आई है। यह सब संकेत हैं कि जमीन पर विश्वास लौट रहा है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस लड़ाई को केवल सुरक्षा या विकास के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यह एक समग्र संघर्ष है जिसमें सुरक्षा, विकास, राजनीति, समाज और विचार सभी शामिल हैं।

और अंततः, यह एक राष्ट्रीय प्रश्न है। क्योंकि जब देश के किसी हिस्से में हिंसा और अलगाव की विचारधारा पनपती है, तो उसका प्रभाव पूरे राष्ट्र पर पड़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस संघर्ष को केवल क्षेत्रीय समस्या न माना जाए, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के संदर्भ में समझा जाए।

बस्तर क्षेत्र के एक स्कूल में पढ़ाई करते छात्र और छात्राएं

आज जब बस्तर की वही लाल जमीन धीरे धीरे सामान्य जीवन की ओर लौट रही है, तो यह केवल एक क्षेत्र की कहानी नहीं है। यह उस क्षमता की कहानी है जो भारत के समाज और लोकतंत्र में है। कठिनाइयों के बावजूद, भ्रमों के बावजूद, हिंसा के बावजूद, अंततः जीवन की स्वाभाविक धारा ही विजयी होती है।

लेकिन यह विजय स्थायी तभी होगी जब हम सजग रहेंगे। क्योंकि यह विषबेल पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इसकी जड़ें गहरी रही हैं। इसलिए इसे एकबार खोदना समेटना ही नहीं, सतर्कता से इसकी पुनरावृत्ति रोकना भी उतना ही आवश्यक है।


जीत सामने है, यह तय है। घोषणा भी ठीक किन्तु यह संघर्ष अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। समस्या का निर्मूलन और नवनिर्माण की तैयारी अपने निर्णायक मोड़ पर है। और इस मोड़ पर समाज, राज्य और राष्ट्र तीनों को एक साथ खड़ा होना होगा। तभी यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि आने वाली पीढ़ियां छत्तीसगढ़, बस्तर, अबूझमाड़ को केवल प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए जानें, न कि हिंसा और भय से भरे रक्तरंजित इतिहास के लिए।

‘भारत हुआ नक्सल-मुक्त’

 

Topics: कौशल विकासलाल गलियाराअबूझमाड़वामपंथी हिंसाकेशकाल घाटीनक्सलवाद की फांसनक्सलमुक्त भारतसुरक्षा बलहितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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