ईरान-अमेरिका युद्ध: क्या तेल-गैस के बाद इंटरनेट बनेगा जंग का मैदान? क्या होगा, यदि हुआ डिजिटल ब्लैकआउट?
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ईरान-अमेरिका युद्ध: क्या तेल-गैस के बाद इंटरनेट बनेगा जंग का मैदान? क्या होगा, यदि हुआ डिजिटल ब्लैकआउट?

सामान्य धारणा यह है कि इंटरनेट सैटेलाइट के माध्यम से संचालित होता है किंतु वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है। विश्व का लगभग 95-97 प्रतिशत अंतर्राष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक समुद्र की गहराइयों में बिछी फाइबर-ऑप्टिक सबमरीन केबल्स के जरिए प्रवाहित होता है।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल — edited by Mahak Singh
Apr 2, 2026, 01:46 pm IST
in भारत

इतिहास गवाह है कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, उन जीवन रेखाओं पर लड़े जाते हैं, जो किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था और समाज को जीवित रखती हैं। एक महीने से जारी ईरान-अमेरिका संघर्ष के अब एक खतरनाक मोड़ पर दस्तक देने के कयास पूरी दुनिया में लगाए जा रहे हैं। खतरा अब केवल मिसाइलों, ड्रोनों या तेल के कुओं तक सीमित नहीं है बल्कि उस अदृश्य धागे (इंटरनेट) पर है, जिसने पूरी दुनिया को एक ‘ग्लोबल विलेज’ बना रखा है। ईरान द्वारा लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य के नीचे बिछी सबमरीन केबल्स को काटने की चेतावनी ने दुनियाभर के तकनीकी विशेषज्ञों और नीति-निर्धारकों की नींद उड़ाई हुई है क्योंकि यदि यह ‘डिजिटल लाइफलाइन’ कटती है तो इंटरनेट ब्लैकआउट के कारण दुनिया केवल अंधेरे में नहीं डूबेगी बल्कि आधुनिक सभ्यता का पूरा ढ़ांचा चरमरा जाएगा। दरअसल, आज का विश्व केवल भू-राजनीतिक सीमाओं से नहीं बल्कि अदृश्य डिजिटल तंतुओं से जुड़ा है। समुद्र की गहराइयों में बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबल आधुनिक सभ्यता की नसों की तरह हैं, जिनसे डेटा, संवाद, अर्थव्यवस्था और तकनीकी प्रगति का संचार होता है। यही कारण है कि आज एक गंभीर प्रश्न उभर रहा है कि क्या तेल के बाद अब इंटरनेट अगली बलि बनने जा रहा है?

सबमरीन केबल्स: वैश्विक कनेक्टिविटी की रीढ़

सामान्य धारणा यह है कि इंटरनेट सैटेलाइट के माध्यम से संचालित होता है किंतु वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है। विश्व का लगभग 95-97 प्रतिशत अंतर्राष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक समुद्र की गहराइयों में बिछी फाइबर-ऑप्टिक सबमरीन केबल्स के जरिए प्रवाहित होता है। ये केबल्स आधुनिक वैश्विक व्यवस्था की वह अदृश्य जीवन रेखा हैं, जो महाद्वीपों को जोड़ते हुए संचार, व्यापार और तकनीकी प्रगति को निरंतर गति प्रदान करती हैं। वर्तमान में दुनियाभर में 400 से अधिक सक्रिय बड़े सबमरीन केबल नेटवर्क कार्यरत हैं, जो प्रकाश की गति से डेटा का आदान-प्रदान करते हैं। हमारे दैनिक जीवन की लगभग हर डिजिटल गतिविधि (ई-मेल, वीडियो कॉल, बैंकिंग लेन-देन, क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यहां तक कि रक्षा एवं कूटनीतिक संचार) इन्हीं केबल्स पर निर्भर करता है। चिंता का विषय यह है कि अत्यधिक महत्वपूर्ण होने के बावजूद ये केबल्स संरचनात्मक रूप से बेहद संवेदनशील हैं। अक्सर गार्डन पाइप जितनी पतली ये केबल्स समुद्र के तल पर असुरक्षित स्थिति में पड़ी रहती हैं, जहां प्राकृतिक आपदाओं या मानवीय हस्तक्षेप से इन्हें क्षति पहुंच सकती है। यदि इन डिजिटल धमनियों में बाधा आती है तो यह केवल तकनीकी व्यवधान नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता के लिए गंभीर संकट बन सकता है।

होर्मुज और लाल सागर: दुनिया के ‘डिजिटल चोकपॉइंट’

दशकों तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ‘तेल की जीवनरेखा’ के रूप में देखा जाता रहा, जहां से विश्व के समुद्री तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है किंतु 21वीं सदी में इसका स्वरूप बदल चुका है। अब यह केवल ऊर्जा ही नहीं बल्कि वैश्विक डिजिटल कनेक्टिविटी का भी अत्यंत महत्वपूर्ण कॉरिडोर बन गया है। इसी प्रकार लाल सागर आज केवल एक समुद्री मार्ग नहीं बल्कि डेटा प्रवाह की धुरी के रूप में उभर चुका है। भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने वाला सबसे छोटा और रणनीतिक रूप से संवेदनशील मार्ग है। अनुमानतः वैश्विक इंटरनेट डेटा का 15 से 30 प्रतिशत प्रवाह इसी मार्ग से होकर गुजरता है, जो इसे ‘डिजिटल चोकपॉइंट’ की संज्ञा देता है। यही कारण है कि यहां किसी भी प्रकार की अस्थिरता केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक प्रभाव उत्पन्न करती है। इस क्षेत्र से गुजरने वाली प्रमुख सबमरीन केबल परियोजनाएं इसकी अहमियत को और स्पष्ट करती हैं। 2Africa, Blue-Raman और SEA-ME-WE-6 जैसी विशाल परियोजनाएं महाद्वीपों के बीच डेटा के निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करती हैं। ये केवल तकनीकी ढांचे नहीं बल्कि वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था की धड़कन हैं। यदि किसी सैन्य तनाव, समुद्री दुर्घटना, लंगर गिरने या जानबूझकर किए गए हमले से ये केबल्स क्षतिग्रस्त होती हैं तो उसका प्रभाव तत्काल वैश्विक स्तर पर महसूस किया जाता है।

डिजिटल ब्लैकआउट: थम जाएगी दुनिया की रफ़्तार

यदि समुद्र के नीचे बिछी वैश्विक डेटा केबल्स को निशाना बनाया जाता है तो उसका प्रभाव किसी पारंपरिक युद्ध से कहीं अधिक व्यापक और विनाशकारी होगा। यह एक ऐसा ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ होगा, जिसमें न केवल संचार तंत्र ठप पड़ेगा बल्कि आधुनिक सभ्यता की पूरी कार्यप्रणाली चरमरा सकती है। सबसे पहला और गहरा आघात वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर पड़ेगा। आज की अर्थव्यवस्था रियल-टाइम लेन-देन पर आधारित है, जहां सैकेंडों में अरबों डॉलर का प्रवाह होता है। यदि कनेक्टिविटी बाधित होती है तो अंतर्राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियां ठहर जाएंगी, शेयर बाजारों में भारी गिरावट आ सकती है और एटीएम से लेकर ऑनलाइन ट्रांजैक्शन तक बैंकिंग सेवाएं अचानक निष्क्रिय हो जाएंगी। यह स्थिति वैश्विक आर्थिक अराजकता को जन्म दे सकती है। ई-कॉमर्स और सप्लाई चेन पर भी गहरा संकट मंडराएगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर आधारित लॉजिस्टिक्स सिस्टम डेटा प्रवाह के बिना निष्प्रभावी हो जाएंगे, जिससे वस्तुओं की आपूर्ति बाधित होगी और वैश्विक व्यापार अव्यवस्थित हो जाएगा। सबसे गंभीर प्रभाव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्लाउड सेवाओं पर पड़ेगा। आज के एआई मॉडल और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर निरंतर डेटा प्रवाह पर निर्भर हैं। जैसे ही यह प्रवाह रुकता है, ये उन्नत प्रणालियां निष्क्रिय हो जाती हैं, चाहे वह रक्षा तंत्र हो, स्वास्थ्य सेवाएं हों या संचार नेटवर्क।

मरम्मत की चुनौतियां

समुद्र की गहराइयों में बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबल्स की मरम्मत किसी सामान्य अवसंरचना की तरह सरल नहीं होती बल्कि यह अत्यंत जटिल, महंगी और समय-साध्य प्रक्रिया है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दुनिया में गिने-चुने विशेष ‘केबल रिपेयर शिप’ ही उपलब्ध हैं, जो हजारों मीटर गहराई में जाकर सटीक स्थान पर क्षतिग्रस्त केबल की पहचान और मरम्मत कर सकते हैं। इतिहास बताता है कि सामान्य परिस्थितियों में भी यह कार्य आसान नहीं होता और युद्धकालीन परिस्थितियों में तो मरम्मत कार्य अत्यंत जटिल हो जाता है। 2022 में टोंगा ज्वालामुखी विस्फोट के बाद एकमात्र केबल को ठीक करने में 37 दिन लग गए थे। वहीं फरवरी 2024 में हूती के हमलों की वजह से लाल सागर में सीकॉम, टीजीएन और एएई-1 जैसी 4 प्रमुख केबल कट गई थी, जिसके चलते एशिया और यूरोप के बीच का 25 प्रतिशत इंटरनेट ट्रैफिक प्रभावित हुआ था। लाल सागर में केबल क्षतिग्रस्त होने की घटना में मरम्मत महीनों तक टलती रही क्योंकि युद्ध जैसी स्थिति में बीमा कंपनियों और मरम्मत एजेंसियों ने जोखिम उठाने से इनकार कर दिया था। इन केबल्स को पूरी तरह ठीक होने में लगभग 5 महीने लग गए थे। स्पष्ट है कि संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में यह प्रक्रिया और अधिक जटिल हो जाती है, जिससे डिजिटल व्यवधान अस्थायी नहीं बल्कि लंबी वैश्विक अस्थिरता का कारण बन सकता है।

भारत पर प्रभाव: डिजिटल महाशक्ति के लिए चुनौती

जहां तक भारत पर डिजिटल ब्लैकआउट के प्रभाव की बात है तो तेजी से विकसित होती भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था अपनी संरचना में जितनी सशक्त दिखती है, भौगोलिक रूप से उतनी ही संवेदनशील भी है। भारत में यूपीआई, ऑनलाइन बैंकिंग, ई-गवर्नेंस और स्टार्टअप इकोसिस्टम का विस्तार हो रहा है। देश का अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय डेटा प्रवाह मुंबई और चेन्नई स्थित लैंडिंग स्टेशनों के माध्यम से संचालित होता है, जो सीधे पश्चिम एशियाई समुद्री मार्गों से जुड़े हैं। यह केंद्रीकरण जोखिम को और बढ़ाता है क्योंकि किसी एक बिंदु पर समस्या होने से व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। भारत का एक बड़ा डेटा ट्रैफिक पश्चिम एशिया के रास्ते यूरोप और अमेरिका तक जाता है। यदि होर्मुज या लाल सागर में केबल्स को नुकसान पहुंचता है तो भारत में इंटरनेट स्पीड घट सकती है, नेटवर्क आउटेज हो सकते हैं और डिजिटल सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में किसी भी व्यवधान का सबसे बड़ा आघात भारत के आईटी और सेवा क्षेत्र पर पड़ेगा, जो वैश्विक ग्राहकों को निर्बाध कनेक्टिविटी के माध्यम से सेवाएं प्रदान करता है। कनेक्टिविटी बाधित होने का अर्थ है, न केवल अरबों डॉलर का संभावित नुकसान बल्कि विश्वसनीयता पर भी गहरा आघात। साथ ही, क्लाउड आधारित सेवाओं और वैश्विक सर्वर्स पर निर्भर डिजिटल प्लेटफॉर्म भी प्रभावित होंगे, जिससे देश की डिजिटल गति धीमी पड़ सकती है। हालांकि भारत के पास कुछ वैकल्पिक मार्ग मौजूद हैं, जैसे सिंगापुर और प्रशांत महासागर के रास्ते, लेकिन ये न तो पर्याप्त हैं और न ही पूरी क्षमता को संभाल सकते हैं। इसके अलावा, इन मार्गों से डेटा भेजने में अधिक समय और लागत लगती है, जिससे सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

क्या है समाधान?

वर्तमान संकट ने स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य की वैश्विक स्थिरता अब केवल भौतिक सीमाओं से नहीं बल्कि डिजिटल अवसंरचना की सुरक्षा से भी निर्धारित होगी। ऐसे में ‘डिजिटल डायवर्सिफिकेशन’ केवल विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। भारत जैसे उभरते डिजिटल शक्ति केंद्र के लिए वैकल्पिक डेटा मार्गों का विकास अत्यंत आवश्यक है, विशेषकर प्रशांत महासागर के रास्ते अमेरिका से कनेक्टिविटी जैसे विकल्प भले ही अधिक महंगे और उच्च लेटेंसी वाले हों पर संकट के समय जीवनरेखा साबित हो सकते हैं। साथ ही, Starlink जैसे लो-अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट नेटवर्क आपात स्थितियों में सहायक हो सकते हैं, हालांकि वे अभी सबमरीन केबल्स की क्षमता का पूर्ण विकल्प नहीं हैं। नीतिगत स्तर पर, घरेलू डेटा सेंटरों को सुदृढ़ करना, नए केबल प्रोजेक्ट्स में निवेश बढ़ाना और बहु-मार्गीय कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसके साथ ही कूटनीतिक प्रयास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं ताकि अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क्षेत्रों को ‘डिजिटल युद्धक्षेत्र’ बनने से रोका जा सके। यह चुनौती केवल तकनीकी नहीं बल्कि रणनीतिक, आर्थिक और वैश्विक सहयोग की परीक्षा है, जिसका समाधान दूरदर्शिता और संतुलित नीति में निहित है।

डेटा सुरक्षा ही वास्तविक शक्ति

20वीं सदी में ‘तेल ही शक्ति है’ का सिद्धांत वैश्विक राजनीति की धुरी था किंतु 21वीं सदी में यह स्थान निर्विवाद रूप से ‘डेटा ही शक्ति है’ ने ले लिया है। आज सूचना का प्रवाह ही अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और शासन की आधारशिला बन चुका है। ऐसे में यदि ईरान-अमेरिका तनाव समुद्र की गहराइयों तक पहुंचकर डिजिटल अवसंरचना को निशाना बनाता है तो यह केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रहेगा बल्कि पूरी मानवता के डिजिटल अस्तित्व पर आघात होगा। ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ की आशंका हमें यह अहसास कराती है कि हमारी आधुनिक प्रगति कितनी नाजुक तंतुओं पर टिकी है। समय की मांग है कि सबमरीन केबल्स को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर’ घोषित कर युद्धकाल में भी इन्हें संरक्षित रखने हेतु सख्त वैश्विक नियम बनाए जाएं। इंटरनेट आज केवल संचार का माध्यम नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का निर्णायक उपकरण है। यदि इसकी धारा बाधित होती है तो न केवल अर्थव्यवस्था बल्कि आधुनिक जीवन की गति भी थम सकती है और यही भविष्य के युद्धों का सबसे संवेदनशील मोर्चा बनता जा रहा है।

Topics: India's digital economycyber warfare threatArtificial Intelligencedigital infrastructureStrait of HormuzIran US conflictsubmarine cablesinternet blackoutglobal internet networksubmarine cable security
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