भारत में हाल ही में इच्छा मृत्यु का मामला सामने आया है और साथ ही एक नई बहस भी आरंभ हुई है कि क्या ऐसा हो जाना चाहिए? क्या सरकार की ओर से इच्छा मृत्यु दे दी जानी चाहिए? यह जितना जटिल मामला है उतना ही संवदेनशील भी। क्या एक व्यक्ति जो मृत्यु को चुन रहा है, या फिर जिसे मृत्यु दी जा रही है, वह इतना स्वस्थ है कि उसके अंगों से दूसरों को जीवन मिल जाए, तो ऐसे व्यक्ति को मृत्यु दी जानी चाहिए? यह अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है।
अब यह प्रश्न स्पेन की नोएलिया कास्टिलो की मौत से उठ खड़ा हुआ है। नोएलिया की कहानी इच्छा मृत्यु पर प्रश्न उठाती है। उन्हें पिछले सप्ताह इच्छा मृत्यु दे दी गई। उनकी उम्र मात्र 25 वर्ष थी और वे ऐसी बीमारी से पीड़ित भी नहीं थी, जो जानलेवा हो और जिसका इलाज न हो। फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने मृत्यु का रास्ता चुना और क्यों अब यह पूरी प्रक्रिया प्रश्नों के घेरे में है।
क्या है मामला?
25 वर्षीय नोएलिया एक ऐसे अपराध का शिकार हुईं, जिसका शिकार प्राय: महिलाएं हो जाया करती हैं। अर्थात उनके साथ बलात्कार हुआ। देह के साथ हुआ यह अपराध वे एक बार झेल गईं। मगर फिर वर्ष 2022 में उसके साथ तीन लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया। वह इसे झेल नहीं पाई और उसकी देह और आत्मा पर जो प्रहार हुआ, उसके चलते उसने अपना जीवन समाप्त करना चाहा। वह एक बिल्डिंग की पाँचवी मंजिल से कूद गई कि उसका जीवन समाप्त हो जाए। मगर उसका जीवन समाप्त नहीं हुआ, बल्कि और कष्टप्रद हो गया।
उसका नीचे का धड़ लकवाग्रस्त हो गया। उसकी मेडिकल रेपोर्ट्स के अनुसार उसके ठीक होने की संभावनाएं कम थीं या फिर कहें कि शून्य थीं। मगर वह केवल नीचे के धड़ के लकवाग्रस्त अंगों की। शेष उसका शरीर ठीक था। मगर शायद वह उस ट्रॉमा से बाहर नहीं आ पाई थी जो उसकी देह के साथ हुआ था। यह भी कहा जा रहा है कि वह एक ऐसे परिवार से थी, जिसमें कभी परिवार का सुख नहीं था।
एक टूटे परिवार की लड़की की देह जब टूटी तो वह ऐसे टूट गई कि उसका मन ही जीने का नहीं हुआ। प्रकृति ने उसे मौत तो नहीं दी, मगर जब उसने मरने का प्रयास किया तो उसके बदले में ऐसा जीवन दे दिया, जिसने नोएलिया को एक और खौफनाक कदम उठाने के लिए बाध्य कर दिया।
स्पेन में वर्ष 2021 में Organic Law on the Regulation of Euthanasia पारित हुआ। और इसी कानून के अंतर्गत नोएलिया ने अपने आप को समाप्त करने की अर्जी दी। नोएलिया की अर्जी को वर्ष 2024 में स्वीकार कर लिया गया था। मगर उसके पिता ने आपत्ति दर्ज कराते हुए इस पर कानूनी रूप से रोक लगवाने में सफलता पाई।
आखिर क्यों मरने पर तुली नोएलिया
परंतु वह एक अस्थाई सफलता थी, क्योंकि नोएलिया अपने निर्णय पर अडिग थी। नोएलिया को केवल मौत चाहिए थी। क्या ऐसा कहा जाए कि समाज के कारण ही उसने ठीक होना न चुनकर मरना चुना? उसके पिता ने वर्ष 2024 में यह कहकर आपत्ति दर्ज की कि नोएलिया की मानसिक सेहत बुरी हो चुकी है और इसके कारण ही वह इस आत्महत्या का निर्णय ले रही है। नोएलिया के पिता ने एक जंग लड़ी। इस जंग में सरकार जीवन समाप्त करने की तरफ थी, तो वहीं दूसरी तरफ एक पिता लड़ रहा था कि उसकी बेटी का जीवन बच जाए। मगर एक टूटी हुई बेटी के लिए केवल जीवन समाप्त करना ही एक लक्ष्य बन गया था। वह जैसे जीना ही नहीं चाहती थी। वह अपनी बेटी की जान बचाने के लिए European Court of Human Rights तक भी गया, मगर उसे वहाँ से मायूसी मिली, जब मानवाधिकार न्यायालय ने भी यह कह दिया कि स्पेन के पास नोएलिया के जीवन को समाप्त करने में सहायता के अधिकार हैं।
और इसके साथ ही नोएलिया की जीवन लीला समाप्त हो गई। पिछले सप्ताह जब उसका जीवन समाप्त हुआ, तो यह बहुत ही पीड़ादायक क्षण रहा, जिसमें एक युवा जीवन असमय इसलिए समाप्त हो गया क्योंकि उसे सहेजने के लिए कोई नहीं था।
शारीरिक और मानसिक पीड़ा से टूट गई थी नोएलिया
वह बिखर रही थी शारीरिक पीड़ा और मानसिक पीड़ा से। उसे पीड़ा से मुक्ति का यही मार्ग उचित लगा। जबकि उसे परिवार और प्रेम से इस पीड़ा से मुक्ति मिलनी चाहिए थी। वह इस सीमा तक टूटी हुई थी कि उसने एक इंटरव्यू में कहा था कि उसके पिता आखिर उसे क्यों जिंदा रखना चाहते हैं?
दर्द से राहत का उपहार या जीवन समाप्त करने का औजार?
यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है कि कथित सरकार समर्थित इच्छा मृत्यु क्या कहीं उपयोगी जीवन समाप्त करने का औजार तो नहीं है? क्योंकि इसमें वह युवा जीवन अभी जी सकता था। नोएलिया जीवित रह सकती थी, हालांकि उसके शरीर के निचले हिस्से के सही होने की संभावना नहीं थी, परंतु फिर भी जीवन था। उसके जीवन पर कोई खतरा नहीं था। ऐसा नहीं था कि वह मरने जा रही थी और ऐसा भी नहीं था कि उसे जीवन भर यह दर्द सहना पड़ता?
क्या मेडिकल साइंस इतना विकसित नहीं हो पाया है कि वह दर्द को ऐसा कर दे कि इंसान जीवन जी सके। स्पेन का जो इच्छा मृत्यु का कानून है। उसमें बहुत व्यापक परिभाषा है। मीडिया के अनुसार स्पेन का जो मौत में सहायता वाला कानून है, उसके अनुसार वे लोग भी मौत चाह सकते हैं, जो गंभीर, लंबी और विकलांग होने वाली स्थिति से पीड़ित हैं, जीसके कारण ऐसी मानसिक और शारीरिक कष्ट होता है, जिसके ठीक होने की संभावना न हो।
और यह दयापूर्ण मृत्यु से परे की स्थिति है। जो भी इच्छा मृत्यु का कानून बनता है, उसमें समय से पूर्व जीवन समाप्त करने का तर्क यही दिया जाता है कि यह बहुत वृद्ध या ऐसे लोगों के लिए है, जिन्हें जानलेवा बीमारी है और भयंकर कष्ट है। परंतु जो पूरी तरह से जीवित है और जिसे किसी मानसिक सदमे के चलते यह लगता है कि उसे नहीं जीना, वह भी कानून के दायरे में आ जाए, यह तो कल्पना ही डरावनी है। इसमें तो वे तमाम जीवन जो कभी न कभी तनाव में आकर यह सोचते हैं कि जीवन समाप्त कर लिया जाए, उनका भी जीवन सरकार समाप्त कर सकती है? यह अमानवीयता भरा कदम है।
जहां जीवन को सहेजना चाहिए और यह तमाम सरकारों का कार्य है कि वह युवा जीवन को सहेजे और मृत्यु को अपनी सहज गति से आने दे, तो वहाँ पर मृत्यु को सरल बनाया जा रहा है और कानून सम्मत बनाया जा रहा है। इससे बड़ी विडंबना हो ही नहीं सकती है। स्पेन की नोएलिया की यह मृत्यु न ही सहज थी और न ही उसके जाने का समय था, परंतु उसे सांत्वना देने और सहारा देने के स्थान पर सरकार ने उसकी मौत की मांग मान ली।















