राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने दैनिक तरुण भारत के संपादक गणेश पांडे एवं पूर्व महानगर प्रचारक और लेखक रविंद्र देशपांडे के साथ संघ की विकसित होती संगठनात्मक संरचना, सामाजिक परिवर्तन में स्वयंसेवकों की भूमिका, पंच परिवर्तन की बढ़ती प्रासंगिकता, मीडिया और तकनीक के साथ जुड़ाव, संघ की यात्रा में प्रतिकूलता और अनुकूलता के समय की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। यह संवाद गत 19 मार्च को नागपुर स्थित तरुण भारत के शताब्दी वर्ष के अवसर पर नागपुर में हुआ था। प्रस्तुत हैं उस संवाद के संपादित अंश-
पंच परिवर्तन की संकल्पना को समाज की ओर से कैसा प्रतिसाद मिला है?
पंच परिवर्तन सर्वत्र स्वीकार है। लोगों ने जमीनी स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक अत्यंत उत्साह के साथ प्रतिक्रिया दी है। हाल ही में हमारे कार्यक्रम हुए हैं, जिनमें विभिन्न क्षेत्रों के लोग— शासन, प्रशासन और आर्थिक क्षेत्र के शीर्ष व्यक्तित्व सम्मिलित थे। उन सभी ने इसमें गहरी रुचि दिखाई और इसे मानवता के समग्र कल्याण के लिए एक आवश्यक कार्यक्रम के रूप में पहचाना। वे लोग संघ के विचार से सहमत हों या नहीं, चाहे वह हिंदू हों या नहीं, या वे भारतीय हों या नहीं। लेकिन पंच परिवर्तन को लेकर सर्वत्र एकमत हैं और उन सभी ने मन और बुद्धि से इस संकल्पना को स्वीकार किया है। लेकिन हम मानते हैं कि वास्तविक चुनौतियां उसके कार्यान्वयन के दौरान सामने आएंगी। पंच परिवर्तन मूलतः कर्मप्रधान है। यह केवल एक दार्शनिक विचार नहीं है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक परिवार और समग्र समाज द्वारा छोटे-छोटे, निरंतर कार्यों की आवश्यकता है। क्योंकि आचरण परिवर्तन से ही धीरे-धीरे व्यापक वातावरण में बदलाव आता है। लेकिन कार्य करने की क्षमता सबकी अलग-अलग होती है। अक्सर लोग किसी विचार को स्वीकार तो कर लेते हैं, लेकिन उसे अपने आचरण में नहीं उतार पाते। इसके बावजूद, हमारा अनुभव बताता है कि पंच परिवर्तन सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य है। उल्लेखनीय बात यह है कि हमारे समाज की महिलाएं इसे अपनाने और लागू करने में पहले से ही पुरुषों से दो कदम आगे हैं।

पंच परिवर्तन के संदर्भ में बहुत सारे कार्यक्रम, उपक्रम हुए और हो रहे हैं। लेकिन कुल मिलाकर मुख्यधारा के माध्यमों और सोशल मीडिया ने पंच परिवर्तन की संकल्पना को किस प्रकार लिया और उनसे आपकी क्या कुछ अपेक्षाएं हैं?
सोशल मीडिया पर आज अधिकतर लोग हैं और आज यह अपनी बात कहने का एक तकनीक का माध्यम है। इसका अच्छा उपयोग करना हो तो इसे अपनाना ही पड़ेगा। सोशल मीडिया में पंच परिवर्तन की कल्पना को लेकर अलग-अलग प्रकार की रील्स, मीम्स जैसी चीजें शुरू हुईं। यह धीरे-धीरे और बढ़ेगा। संघ के स्वयंसेवक भी सोशल मीडिया का उपयोग करते ही हैं। और संघ के प्रचार विभाग की योजना से भी कुछ चीजें हो रही हैं। सोशल मीडिया में हमें अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी।
समाज को साथ लेकर पंच परिवर्तन करना है। संगठन और समाज परिवर्तन, व्यक्ति निर्माण और व्यक्ति को जागृत करना, ये दोनों बातें एक साथ कैसे संभव होंगी?
ये दोनों बातें एक साथ हों, तभी परिवर्तन संभव है। समाज परिवर्तन जिन्हें करना है, वे यदि किसी अनुशासन में न हों तो वे समाज के साथ बह जाएंगे या स्वयं बिगड़ेंगे और समाज को भी बिगाड़ेंगे। इसलिए जिन्हें समाज परिवर्तन करना है, उनकी तैयारी अर्थात संगठन और जो संगठित हो चुके हैं, उन्होंने उस संगठन को केवल अपने तक सीमित न रखकर समाजहित में उसका प्रतिदिन व्यवहार में उपयोग करते हुए चलना, यह जागरण का काम हुआ। ये दोनों बातें एक साथ होनी चाहिए। इसलिए संगठन के लिए संगठन, यह संघकार्य की शुरुआत है, लेकिन उस संगठन का एक विशिष्ट बल तैयार हो जाने के बाद स्वयंसेवक अपने आप काम करने लगता है। इससे जो वातावरण बनता है, उसमें फिर समाज परिवर्तन के लिए ऐसे छोटे-छोटे कार्यों की समाज को आदत लगाना, समाज का प्रबोधन करना, अपने उदाहरण से समाज को परिवर्तन सिखाना होने लगता है। स्वयंसेवक यह कर सकते हैं। यह शुरू भी हो चुका है। बीज से पौधा एक विशिष्ट स्तर पर आने के बाद ही उसमें फूल आते हैं। फिर फल आते हैं। अब संघ की जो स्थिति है, उसमें संघकार्य की समाज में स्वाभाविक अभिव्यक्ति यही है कि समाज परिवर्तन के कार्य में स्वयंसेवक को वह अनुशासन और संस्कार बनाए रखते हुए, अपना उदाहरण सामने रखकर, आत्मीयता से समाज को जोड़कर यह परिवर्तन लाना चाहिए। वह काम शुरू हो चुका है।

इस शताब्दी वर्ष पर संघ की संरचना, भौगोलिक कार्यक्षेत्र और कार्यपद्धति में भी परिवर्तन की चर्चा है। इसके पीछे मूल विचार क्या है और उनकी दिशा क्या है?
संघ का काम बड़ा हुआ है। काम बड़ा होने पर उसकी रचना का विकेंद्रित होना आवश्यक है। अर्थात संघ के व्यक्तिनिर्माण के कार्य का ‘वॉल्यूम’ अब बड़ा हो गया है और संघ से अपेक्षाएं बढ़ने के कारण संघ के स्वयंसेवकों को जो काम करने पड़ते हैं, वे भी बहुत बढ़ गए हैं। इसलिए और छोटी इकाइयां बनाकर पहले जो केंद्रीय स्तर से काम करने पड़ते थे, वह अब निचले स्तर से किया जाए और जो नए-नए कार्य करने पड़ते हैं, उन्हें ऊपरी स्तर संभाले, ऐसी कल्पना है। इस प्रकार की एक विकेंद्रित रचना करना आवश्यक है। कोई भी संगठन बड़ा हो जाए, कोई भी आंदोलन बड़ा हो जाए, तो यह सब करना पड़ता है। यह स्वाभाविक परिवर्तन है। इसलिए संभाग के रूप में यह रचना हुई। अब काम इतना बढ़ गया है कि प्रत्येक बात के लिए अलग व्यवस्था चाहिए। देखिए, संघ की कार्यपद्धति बदलती नहीं है। वह एक ही है और वही एक रहेगी। दूसरी कोई नहीं। बाकी उसका जो वर्णन होता है, रूप का वर्णन होता है। वह रूप है। वह कालानुसार बदलता रहता है। कालानुसार, काम की अवस्था के अनुसार संघ कार्य करता है और आगे भी करता रहेगा। पर मूलतः जो कार्यपद्धति है, वह एक ही है।
संघ का दृष्टिकोण मीडिया में शायद ही कभी सही या समग्र रूप से प्रस्तुत किया जाता है। संचार माध्यमों के संबंध में संघ की वर्तमान स्थिति, समझ और भविष्य की दिशा क्या है?
संचार माध्यम सार्वजनिक जीवन का एक अनिवार्य भाग हैं। सार्वजनिक जीवन के सभी पहलुओं पर विचार संघ में और संगठन में होता ही है। केवल बात यह है कि संघ की एक अनूठी पद्धति है। वह ऐसी है कि जानकारी चाहिए हो तो कार्यालय में फोन न करके प्रचार विभाग को फोन करना चाहिए। प्रचार प्रमुख सबको ज्ञात हैं। प्रसार माध्यम हैं और प्रसार माध्यमों का समाजजीवन में एक स्थान है। प्रबोधन और संस्कार के लिए यह एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उसका विचार सभी को करना ही चाहिए और उसकी व्यवस्था भी होनी चाहिए। संघ का काम जब तक केवल व्यक्ति निर्माण केंद्रित स्वरूप में चल रहा था, तब तक इसकी कुछ अधिक आवश्यकता नहीं थी और वह काम ‘फोकस्ड’ होकर करने का काम है। इसलिए उधर ध्यान भी नहीं था। पर जैसे-जैसे संघ बड़ा हुआ, संघ को जानने की आवश्यकता बढ़ी। अब उसे जानने की भी आवश्यकता निर्मित हुई है। पहले प्रचलित प्रवृत्ति केवल संघ का विरोध करने की थी। आज संघ को जानने की वास्तविक जिज्ञासा है। इसलिए वह व्यवस्था आवश्यकता के अनुसार खड़ी हुई है। आवश्यकता के अनुसार एक प्रचार विभाग शुरू हुआ औरउसने धीरे-धीरे अपना तंत्र खड़ा किया है और अब वह अच्छी अवस्था में है।

अनेक बार ऐसा होता है कि आपके वक्तव्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता है। आपको प्रसंग से बाहर उद्धृत किया जाता है और फिर हंगामा खड़ा कर दिया जाता है। जब ऐसा होता है तो आपको क्या लगता है?
मुझे कुछ भी नहीं लगता। मुझे दया आती है और हंसी आती है, बस। यह होना ही है। क्योंकि संघ के विरोध में बोलने के लिए अब आलोचकों के पास बहुत कुछ नहीं है। उन्हें कुछ-न-कुछ तो बोलना ही है। फिर वे ऐसी युक्तियों का सहारा लेते हैं। वास्तव में, मुझे लगता है कि यह हमारे लिए एक सीखने का अनुभव होता है। हम सीखते हैं कि लोग हमारी बातों को किस प्रकार गलत समझ सकते हैं या उसके कितने अर्थ निकाल सकते हैं। यह हमें सिखाता है कि हमें अपनी बात कैसे कहनी चाहिए और अपने विचारों को और बेहतर ढंग से कैसे व्यक्त करना चाहिए। इसलिए यह अंततः एक अच्छी बात है।
प्रतिकूलताओं के बीच संघ इतनी तीव्र गति से कैसे बढ़ पाया?
साधारणतः प्रचार या प्रसिद्धि किसी संस्था की जीवन रेखा होती है। उससे वह संगठन बढ़ता है। पर संघ की जीवन रेखा अलग है। ऐसे किसी साधन से संघ नहीं बढ़ता। संघ बढ़ा है तो स्वयंसेवकों के आपसी प्रेम से। कार्यकर्ताओं का समाज के प्रति आत्मीय भाव से। इससे संघ बढ़ता है। इसलिए अब प्रसिद्धि हो, न हो या विरोध हो, न हो, यह तो कोई बंद नहीं कर सकता। आपातकाल में स्वयंसेवक ऐसी चर्चा करते थे कि संघ पर बंदी है, पर बंद कुछ नहीं था। शुरुआत में थोड़ी समस्याएं आईं, उन्हें अल्पकाल में ठीक कर लिया गया। संघ चलता रहा। औपचारिक शाखा नहीं लग रही थी, लेकिन स्वयंसेवक होने के नाते हमारे कार्यकर्ता चर्चाओं में गर्व से कहते थे, “जब तक दो व्यक्ति अभी भी मिल सकते हैं, संघ को बंद नहीं किया जा सकता।” यह सब हुआ, लेकिन इसका हम पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। हम मानसिक रूप से तैयार थे। हमें पता था कि इस अग्निपरीक्षा से गुजरना है, लेकिन हमें यह भी पता था कि यह हमें तोड़ नहीं पाएगी। हम एक-एक व्यक्ति जोड़ते गए और बढ़ते रहे। स्वयंसेवकों की श्रद्धा, विश्वास और उनकी परस्पर आत्मीयता से सब प्रकार के, सब स्वभाव के लोग एकत्र काम करते रहे। तल्लीनता से करते रहे। अर्थात संघ पर आघात हुआ तो लोगों ने उसे ढाल बनकर झेला। प्रतिकूलता के बावजूद संघ बढ़ा, उसका कारण यही है। अब यहां से धीरे-धीरे अनुकूलता निर्मित होने लगी है। यही इस यात्रा का स्वरूप रहा है।

फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे माध्यम आज प्रभावी हैं। विशेष बात यह है कि ये माध्यम सबके लिए खुले हैं। उन पर किसी का नियंत्रण नहीं है। जिसे जैसा लगता है, वह उसे वैसे ही व्यक्त करता है। कुछ भारतीय विचार विरोधी तत्व स्वयंसेवक का ही चोगा ओढ़कर समाज को दिग्भ्रमित करते रहते हैं। अनजाने में समाज के बहुत से लोग यह समझते हैं कि ये संघ के ही लोग हैं और भ्रमित हो जाते हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करने के लिए कि सोशल मीडिया मंचों का उपयोग संघ और राष्ट्र के हित में सकारात्मक और उचित रूप से हो, क्या स्वयंसेवकों को यह प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है कि वे स्वयं को कैसे व्यक्त करें?
आवश्यकता है और वह काम हो भी रहा है। मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, यूट्यूबर्स, इन सबकी बैठकों का आयोजन, उनकी सूची बनाना, बीच-बीच में उन्हें बैठाकर विशेष सामग्री देना, यह सब प्रचार विभाग ने शुरू किया है। नई प्रौद्योगिकियां और नए साधन लगातार उभरते रहते हैं। सोशल मीडिया की परिभाषित विशेषता उसकी खुली प्रकृति है। यह तकनीक प्रत्येक के हाथ में है। हमारा विवेक ठीक होना चाहिए। अपनी शैली में जो बात कहनी है, वह ठीक से कही जानी चाहिए। ‘सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, मा ब्रूयात सत्यम अप्रियम। प्रियं च नानृतं ब्रूयात।’ (सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य न बोलो, न ही प्रिय असत्य बोलो)। यह अनुशासन है। अनुशासन का पालन करके इन सबका प्रशिक्षण करना चाहिए।
आपने कहा कि जब चार लोग, जो स्वयं को स्वयंसेवक बताते हैं, ऑनलाइन कुछ अनर्गल लिख देते हैं तो गलतफहमियां पैदा होती हैं। ऐसा होता है। लेकिन जब हम प्रमाण के साथ समाज के बीच जाते हैं। और जो बोलते हैं, वही अधिकृत होता है। हमारे कार्यकर्ताओं का भी दायित्व है कि वे प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से स्थिति स्पष्ट करें। साथ ही स्वयंसेवकों को यह सिखाने की तैयारी भी शुरू हो चुकी है कि इन मंचों का उपयोग कैसे किया जाए। आप प्रौद्योगिकी को रोक नहीं सकते। उभरती हुई प्रौद्योगिकी का रचनात्मक उपयोग करना हमारे हाथ में है और हमें यह करना ही होगा।
क्या ‘जेन-ज़ी’ यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी शाखाओं की ओर आकर्षित हो रही है और क्या संघ उन्हें जोड़ने के लिए कोई विशेष प्रयास कर रहा है?
इस पीढ़ी के भीतर भारत को महान राष्ट्र के रूप में देखने की गहरी इच्छा है और साथ ही हमारी विरासत के प्रति गहरा सम्मान है। आप इन्हें हिंदू कह सकते हैं या भारतीय। कुछ इसे धार्मिक दृष्टि से देखते हैं, कुछ नहीं। वे वैचारिक सूक्ष्मताएं हैं। किन्तु उस विरासत की स्वीकृति और उसे उच्चतर स्थान पर देखने की इच्छा, बहुत स्पष्ट रूप से विद्यमान है। इसके अतिरिक्त, प्रामाणिकता और सेवा के आदर्श जेन-ज़ी को बहुत आकर्षित करते हैं। इसी कारण वे हमारे विचार से स्वाभाविक रूप से बहुत शीघ्र—तीव्र जुड़ जाते हैं। किन्तु आज के वातावरण में प्रतिदिन भौतिक रूप से शाखा में जाना कभी-कभी कठिन होता है। उनके पास अनेक कार्य होते हैं और कुछ सामाजिक-आर्थिक वर्गों में रहने वाले लोग अक्सर व्यापक सामाजिक वास्तविकताओं से अलग-थलग रहते हैं। वे एक बिल्कुल अलग ही दुनिया में रहते हैं। इसलिए, जहां भी हम सीधे उनके पास पहुंच सकते हैं और जहां यह सहज रूप से सुलभ है, वहां वे निश्चित रूप से शाखा में आते हैं। किन्तु हम यह भी चाहते हैं कि यदि वे प्रतिदिन नहीं आ सकते, तब भी वे जुड़ें। इसलिए संघ मध्यवर्ती संपर्क-बिंदु स्थापित कर रहा है, ताकि उन्हें धीरे-धीरे शाखा की ओर लाया जा सके।
हमने अपनी कार्य-पद्धति में कुछ नई बातें जोड़ी हैं। जैसे इन लोगों के बीच कैसे और अधिक काम किया जाए? हम ‘बाल गोकुलम’ जैसी वैकल्पिक गतिविधियों की योजना बना रहे हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए कि सक्रिय जेन-ज़ी प्रतिभागियों की संख्या वास्तव में बढ़े, हम शीघ्र ही इस आंकड़े को संकलित करना और अपनी अखिल भारतीय बैठकों में इस पर चर्चा करना शुरू करेंगे। हम इस पर सक्रिय रूप से विचार कर रहे हैं। लेकिन मुझे कहना होगा कि उनकी वैचारिक ग्रहणशीलता के संदर्भ में, वर्तमान में हमारे कार्य के लिए उनके बीच बहुत अनुकूल वातावरण है।
प्रतिकूल काल में स्वयंसेवकों ने प्रसिद्धि-पराङ्मुख रहकर काम किया। आज ऐसा कहा जाता है कि यह अनुकूलता का काल है। आज स्वयंसेवक थोड़ा प्रसिद्धि-अभिमुख भी हुआ है। प्रतिकूलता से प्रसिद्धि तक की इस यात्रा में स्वयंसेवकों के स्वरूप या स्वभाव में कुछ परिवर्तन आया है ? और क्या यह अनुकूलता का युग संघ के लिए अलग तरह की विशिष्ट चुनौती भी प्रस्तुत करती है?
हां, निश्चित ही अनुकूलता ही चुनौती है, क्योंकि पतन की शुरुआत अनुकूलता से ही होती है। चढ़ेगा वही गिरेगा, यह निश्चित है। जो ऊपर जाएगा, वही वापस आएगा और गिर गया तो फिर ऊपर आना कठिन होता है। इसलिए यह चुनौती निश्चित रूप से होती है। अभी संघ का स्वयंसेवक प्रसिद्धि में आया है, पर वह प्रसिद्धि-अभिमुख हो गया है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। संघ एक संगठन है और स्वयंसेवक अभी भी प्रसिद्धि-अभिमुख नहीं हुआ है। वह ऐसा न हो, इसके प्रयत्न भी शुरू हो चुके हैं। हमारे जो बौद्धिक वर्ग के विषय होते हैं, उनमें इन सब विषयों का समावेश होता है। उपेक्षित स्थिति में कैसे काम करना, विरोध में कैसे काम करना, इस पर हम बोलते हैं। अब अनुकूलता में कैसे काम करना, यह भी विषय है। साधन अब उपलब्ध हैं। कमी नहीं है। बहुत प्रभाव, समृद्धि है क्या? तो नहीं। लेकिन पेट भरने भर को है। ऐसा होते हुए भी उसका उपयोग करना और उसका योग्य कारण के लिए उपयोग करना महत्त्वपूर्ण है। जो साधन हैं वे काम के लिए हैं, हम साधनों के लिए नहीं, यह प्रवृत्ति सुदृढ़ कैसे हो, इस दृष्टि से बौद्धिकों में, बैठकों में चर्चा के विषय आते रहते हैं। अनुकूलता की बाधा न हो, उसके लिए जितने प्रयत्न होने चाहिए उतने कर रहे हैं और करेंगे। अनुकूलता एक परीक्षा है। उसे पार करके आगे जाना पड़ता है।
एक ओर वह वैचारिक मूल है जिससे एक स्वयंसेवक का निर्माण होता है, और दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ऐसे समय भी आते हैं जब वही विचार कुछ विचित्र या विकृत रूप में प्रदर्शित होता दिखता है। क्या बीच के इस ‘ग्रे एरिया’ पर ध्यान देने की आवश्यकता है?
इसे इस प्रकार देखिए। मूल विचार एक ही है और सबके द्वारा स्वीकार किया गया है। विचार पूर्णतः स्पष्ट है, हिंदुस्थान एक हिंदू राष्ट्र है। किन्तु जब प्रारंभिक दिनों में संघ शुरू हुआ, तब हिंदू समाज के सामने सबसे स्पष्ट समस्या क्या थी? वह था दंगा—फसाद। एक समस्या स्वतंत्रता-संग्राम की थी, और दूसरी कुछ मुसलमान वर्गों की आक्रामकता की। परिणामस्वरूप, संघ के विचार को समाज में उस समय के अनुकूल ढंग से अभिव्यक्त करना पड़ा। अब वह युग बीत चुका है। आज चुनौतियां भिन्न हैं। इसलिए अभिव्यक्ति भी बदलनी चाहिए। यह परिवर्तन ऊपर से आरम्भ होकर नीचे तक पहुंचना चाहिए। हम पहले से ही इस परिवर्तन की प्रक्रिया में हैं। आज लाखों स्वयंसेवक हैं। मान लीजिए उनमें से दो हजार अत्यंत सक्रिय हैं। उन दो हजार में से शायद दो सौ ऐसे हों जो इस सूक्ष्म परिवर्तन को पूरी तरह न समझ पाएं, जबकि शेष लोग उसे पूरी तरह समझते हों। इसे देखते और जानते हुए इसे स्वीकार करना पड़ता है और आगे बढ़ना होता है। यह एक निरंतर और दोहरी प्रक्रिया है। कुछ स्वयंसेवकों की गलतियों से कभी-कभी संघ की प्रतिष्ठा धूमिल होती है और उसी समय बहुसंख्य के उत्कृष्ट कार्य से उसकी प्रतिष्ठा ऊंची भी उठती है। हमें इस गतिशीलता का प्रबंधन करना होता है। और ऐसा करते हुए, हम उन दो सौ व्यक्तियों की मानसिकता और दृष्टिकोण को परिष्कृत करने पर निरंतर काम करते रहते हैं। हम यह कार्य लगातार कर रहे हैं। किन्तु आज समाज में संघ के बारे में सामान्य धारणा नकारात्मक नहीं है। जिन्हें राजनीतिक या अन्य प्रकार का लाभ प्राप्त करना है, वे हमेशा हंगामा खड़ा करने का प्रयास करेंगे। पर हम सबसे मिलते हैं। इस शताब्दी काल में ही हमने विविध राजनीतिक धाराओं के लोगों से संवाद किया है, वामपंथी झुकाव वाले लोगों से लेकर अन्य अनेक विचारधाराओं तक। बड़ी संख्या में लोग स्पष्ट रूप से कहते हैं, “हम संघ से नहीं हैं; हम संघ के राजनीतिक विरोधी भी हो सकते हैं, लेकिन हम मानते हैं कि संघ अच्छा काम कर रहा है।” इसके अतिरिक्त, ‘पंच परिवर्तन’ पहल पर सब लोग हमारे साथ हैं। उन्होंने हमें यह बात मौखिक रूप से भी कही है और सार्वजनिक रूप से भी कही है। इसलिए, वह कोई बाधा नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि मैं यहां हिंदू समाज के विषय में, हिंदुओं के लिए, कोई वक्तव्य देता हूं, तो बंगाल में उसका संदर्भ बिल्कुल भिन्न हो सकता है और वहां यह प्रश्न उठ सकता है कि उनकी विशिष्ट परिस्थिति को देखते हुए वहां क्या कहा जाना चाहिए। इन सभी अभिव्यक्तियों को एकरूप करने में समय लगता है, किन्तु यह हो रहा है।
प्रतिभाशाली, सक्षम युवा जो सचमुच समाज की सेवा करना चाहते हैं, क्या उन्हें केवल राजनीति को चुनना चाहिए, या उन्हें सामाजिक कार्य को प्राथमिकता देनी चाहिए?
आप कहीं भी जाएं, कोई भी क्षेत्र चुनें, आपको सामाजिक कार्य अवश्य करना चाहिए। जो भी कार्य हम करते हैं, वह हम अपने लिए करते हैं, अपने आंतरिक संतोष के लिए करते हैं। हम उसे अपने परिवार के लिए करते हैं और उसे समाज के लिए करते हैं। हमारे कार्य में ये तीनों आयाम होने चाहिए। जब ऐसा होता है, तब वह कार्य वास्तव में उत्कृष्ट बनता है। इसलिए, यदि कोई युवा अपने मार्ग के बारे में सोच रहा है, तो सामाजिक कार्य करना तो एक निर्विवाद बात है। आप जो भी करियर चुनें, वह समाज के कल्याण को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। यदि आप सरकारी नौकरी भी करते हैं, और अपने कर्तव्यों को उत्कृष्टता के साथ तथा लोकाभिमुख होकर निभाते हैं, तो वह भी सामाजिक कार्य है। ‘सामाजिक कार्य’ केवल कुछ विशिष्ट जनकल्याण गतिविधियों तक सीमित नहीं है। जब हम कोई भी कार्य ईमानदारी से, निःस्वार्थ भाव से, उत्कृष्टता के साथ, और तन, मन, धन के पूर्ण समर्पण से करते हैं, तो उसके परिणामस्वरूप स्वस्थ समाज के लिए सकारात्मक फल वाले ही होते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए, प्रत्येक व्यक्ति को अपने चुने हुए कार्य को अच्छी तरह करने का प्रयास करना चाहिए।
















