अदालतों में फैल रहा AI जनित फर्जी फैसलों का जहर, सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों और जजों को किया आगाह
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अदालतों में फैल रहा AI जनित फर्जी फैसलों का जहर, सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों और जजों को किया आगाह

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कुछ वकील अपनी दलीलों को मजबूत करने के लिए चैटजीपीटी (ChatGPT) जैसे एआई टूल्स का सहारा ले रहे हैं।

Written byजय प्रकाश गुप्ताजय प्रकाश गुप्ता
Mar 27, 2026, 04:08 pm IST
inभारत
supreme court

सुप्रीम कोर्ट

आजकल लोग हर काम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का प्रयोग करने लगे हैं। इसके फायदे हैं तो इसके नुकसान भी कम नहीं। एआई के बढ़ते इस्तेमाल ने अब न्यायपालिका के सामने एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। वहां भी एआई जनेरेटेड फर्जी दलील और फैसले का वकील इस्तेमाल करते पाए गए। ऐसा ही एक मामला मुंबई में सामने आया जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों द्वारा अदालती कार्यवाही में AI जनित ‘फर्जी’ फैसलों का हवाला देने पर कड़ी चिंता जताई है।

शीर्ष अदालत ने इसे केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर न्याय व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा करार दिया है। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों और जजों को बेहद सावधान रहने की सलाह दी है।

कुछ वकील कर रहे हैं चैट जीपीटी का इस्तेमाल

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कुछ वकील अपनी दलीलों को मजबूत करने के लिए चैटजीपीटी (ChatGPT) जैसे एआई टूल्स का सहारा ले रहे हैं। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब ये टूल्स ऐसे अदालती फैसलों का हवाला दे देते हैं, जो वास्तव में कभी पारित ही नहीं किए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एआई द्वारा ‘गढ़े गए’ (काल्पनिक) फैसलों को मिसाल के तौर पर पेश करना अदालत का समय बर्बाद करने के साथ-साथ न्याय की मूल भावना के साथ खिलवाड़ है। कोर्ट ने कहा कि यह ‘डिजिटल कचरा’ अब पूरी दुनिया की अदालतों में फैल रहा है, जिसे रोकने के लिए तकनीकी और कानूनी सतर्कता जरूरी है।

कैसे पकड़ा गया एआई का फर्जीवाड़ा?

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब बॉम्बे हाईकोर्ट में महाराष्ट्र किराया नियंत्रण अधिनियम से जुड़े एक मामले की सुनवाई हो रही थी। एक निजी कंपनी के निदेशक की ओर से पेश की गई लिखित दलीलों ने जज का ध्यान खींचा। वह दलील कुछ अजीबोगरीब लग रही थी। लिखित दलीलों में ‘हरे रंग के टिक-मार्क’ (ग्रीन टिक मार्क्स), खास तरह के बुलेट पॉइंट्स और बार-बार दोहराई गई बातें मौजूद थीं, जो आमतौर पर एआई बॉट्स की पहचान होती हैं।

दिया गया था फर्जी फैसले का हवाला

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि वकील ने एक ऐसे पुराने फैसले का हवाला दिया जिसका रिकॉर्ड कहीं भी नहीं था। वह न तो कोर्ट की लाइब्रेरी में मिला और न ही ऑनलाइन डेटाबेस में। हाईकोर्ट के लॉ क्लर्कों ने घंटों उस फैसले को खोजने की कोशिश की, लेकिन अंत में पता चला कि वह फैसला पूरी तरह से एआई द्वारा ‘काल्पनिक’ तौर पर तैयार किया गया था।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने इन दलीलों पर सख्त टिप्पणी की थी, जिसे हटाने के लिए याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणियां तो हटा दीं, लेकिन इस खतरे के बारे में वकीलों और जजों को आगाह करते हुए सतर्क रहने के निर्देश भी दिए। साथ ही कहा कि यह जहर पूरी दुनिया की अदालतों में फैल रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह मानती है कि तकनीक जहां सुगमता लाती है, वहीं वह तथ्यों से भी अपने सहुलियत के हिसाब से छेड़छाड़ कर सकती है। वकीलों के लिए यह एक बड़ी चेतावनी है कि वो अपने शोध के लिए केवल मशीनों पर निर्भर न रहें, अन्यथा उनकी पेशेवर साख और अदालत की गरिमा दोनों खतरे में पड़ सकती हैं।

न्याय व्यवस्था में एआई के इस्तेमाल के हो सकते हैं घातक दुष्परिणाम

एआई अक्सर अपनी जानकारी की कमी को ‘काल्पनिक तथ्यों’ से भरने की कोशिश करता है। इससे जजों और क्लर्कों को फर्जी संदर्भों की जांच में घंटों बर्बाद करने पड़ सकते हैं जैसा कि इस मामले में हुआ। अगर किसी फर्जी फैसले को आधार मान लिया जाए, तो गलत न्याय हो सकता है। साथ ही बिना शोध (रिसर्च) किए एआई पर निर्भरता वकीलों के पेशेवर स्तर को गिराएगी।

 

Topics: Chat GPT In LawLegal EthicsTech ThreatLawyers ResponsibilityAI Generated ContentArtificial IntelligenceBombay High CourtIndian JudiciarySupreme Court of IndiaJudicial SystemFake Judgments
जय प्रकाश गुप्ता
जय प्रकाश गुप्ता
लेखक करीब एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। अभी स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहरी पकड़ है। [Read more]
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