प्रधानमंत्री मंत्री के पद पर राहुल गांधी और ‘गांधी परिवार’ को कोई भी बाहर का व्यक्ति बर्दाश्त नहीं है। राहुल गांधी 13 मार्च को लखनऊ आए थे। यहां आकर उन्होंने कांशीराम को याद किया। उन्होंने कहा, “कांशीराम जी समाज में बराबरी की बात करते थे और वे इसलिए सफल हुए क्योंकि कांग्रेस उस समय अपना काम पूरी तरह से नहीं कर सकी थी। यदि कांग्रेस ने दलितों और पिछड़ों के लिए सही ढंग से काम किया होता, तो शायद कांशीराम जी को अलग राह नहीं चुननी पड़ती। यदि जवाहरलाल नेहरू आज जीवित होते, तो कांशीराम जी कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री होते।”
जब हुई थी किरकिरी
दरअसल, राहुल गांधी का मानना है कि जब भी केंद्र में सरकार बनी और प्रधानमंत्री गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को बनाया गया, तो उस दौर में उस प्रधानमंत्री ने ठीक से काम नहीं किया। राहुल गांधी ने इस बात को वर्ष 2007 में ही स्पष्ट कर दिया था, जब उन्होंने बड़े ही आक्रोश में मंच से कहा था, “अगर गांधी परिवार का कोई व्यक्ति होता तो बाबरी ढांचा कभी भी नहीं गिरता।” उनके इस बयान के बाद कांग्रेस पार्टी की काफी फजीहत हुई। तुरंत कांग्रेस पार्टी की तरफ से बयान जारी किया गया कि यह राहुल गांधी का व्यक्तिगत बयान है। वर्ष 2007 में राहुल गांधी को सक्रिय राजनीति में आए हुए कुछ वर्ष ही हुए थे। कांग्रेस पार्टी ने सफाई देकर यह बताने की कोशिश की थी कि राहुल राजनीति में अभी नए हैं, इसलिए भावावेश में उन्होंने बयान दे दिया। मगर इतने वर्षों बाद भी राहुल के मन से यह कसक अभी निकली नहीं है। 13 मार्च को राहुल गांधी ने लखनऊ में फिर पूरी दृढ़ता से पी. वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल को जमकर कोसा।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 1993 में समझौते के बाद सपा-बसपा गठबंधन ने जब उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ा, तो सभी राजनीतिक दलों का समीकरण बिगाड़ दिया। उस दौर के कई कद्दावर नेता चुनाव हार गए। सपा-बसपा गठबंधन सत्ता में आया। इस बेमेल गठबंधन के सत्ता में आने के कुछ दिन बाद से ही बयानबाजी का दौर शुरू हो गया। हर महीने की पहली तारीख को बसपा के पार्टी कार्यालय पर सरकार के कार्यों की समीक्षा होती थी और उसके बाद प्रदेश सरकार को कोई न कोई अल्टीमेटम दिया जाता था।
एक जून 1995 को बसपा की बैठक में समर्थन वापस ले लिया गया। स्टेट गेस्ट हाउस में मायावती को सपाइयों ने घेर लिया था। मायावती ने आरोप लगाया था कि उनकी हत्या करने के इरादे से सपा के गुंडों ने गेस्ट हाउस को घेर लिया था। तभी से 2 जून 1995 को ‘गेस्ट हाउस कांड’ के नाम से जाना जाता है। प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के आदेश पर तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने मुलायम सरकार को बर्खास्त कर दिया था। उसके बाद 2 जून 1995 को मायावती भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से मुख्यमंत्री बनी थीं। यह वही कार्यकाल है, जब पी. वी. नरसिम्हा राव केंद्र में प्रधानमंत्री थे।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2024 के दिसंबर माह में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निधन पर कांग्रेस के नेताओं ने निगम बोध घाट पर अव्यवस्था का आरोप लगाया था। उस समय पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के भाई मनोहर राव ने कांग्रेस को आइना दिखाया। मनोहर राव ने कहा, “कांग्रेस को 20 साल पीछे मुड़कर देखना चाहिए कि उन्होंने अपने नेता पी. वी. नरसिम्हा राव को कितना सम्मान दिया। यहां तक कि सोनिया गांधी भी उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुईं। कांग्रेस ने उनके लिए एक भी प्रतिमा नहीं बनवाई और न ही उन्हें भारत रत्न दिया। कांग्रेस ने नरसिम्हा राव के लिए कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय तक के द्वार भी नहीं खोले।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का निधन हुआ, इसका दुख है। वे 10 साल प्रधानमंत्री रहे, वह पी. वी. नरसिम्हा राव की कैबिनेट में वित्त मंत्री थे। उस दौरान पी. वी. नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह ने गुरु-शिष्य की तरह काम किया और बहुत विकास किया। कांग्रेस के लोग भाजपा से शिकायत कर रहे हैं कि मनमोहन सिंह का ठीक तरह से अंतिम संस्कार नहीं किया गया। उन्हें पीछे मुड़कर देखना चाहिए कि मनमोहन सिंह की सरकार में उनके गुरु पी. वी. नरसिम्हा राव को क्या सम्मान दिया गया था। दो गज जमीन तक अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली में नहीं मिली। मनमोहन सिंह के निधन पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और पूरी कैबिनेट माैजूद थी, लेकिन पी. वी. नरसिम्हा राव के समय कौन आया था? सोनिया गांधी हैदराबाद तो आ सकती थीं, लेकिन नहीं आईं।”
द्वेष का कारण
दरअसल, पी. वी. नरसिम्हा राव के प्रति दुर्भावना यूं ही नहीं है। राजीव गांधी की हत्या के बाद जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए, तो कांग्रेस सबसे बड़े राजनीतिक दल के तौर पर उभरी। उस समय यह समझा जा रहा था कि नारायण दत्त तिवारी को नेता चुना जाएगा, मगर अपने राजनीतिक करियर में जब उनके प्रधानमंत्री बनने का समय आया, तब वह अपनी लोकसभा सीट पर चुनाव हार गए थे, इसलिए पी. वी. नरसिम्हा राव को नेता चुना गया।
प्रधानमंत्री बनने के बाद पी. वी. नरसिम्हा राव ने सोनिया गांधी को राजनीति से दूर रखने के लिए बोफोर्स तोप घोटाले का बेहतर ढंग से राजनीतिक इस्तेमाल किया। ऐसा माना जाता है कि राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी बोफोर्स तोप घोटाले की जांच से डरी हुई थीं।
पी. वी. नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी के तौर-तरीकों का विरोध करते हुए गांधी परिवार के अत्यंत करीबी नारायण दत्त तिवारी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (तिवारी) का गठन किया था। उस समय के कुछ बड़े कांग्रेस के नेता भी पार्टी में शामिल हुए थे। बकायदा दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में इस पार्टी का गठन किया गया था। कहा यह भी जाता है कि नारायण दत्त तिवारी ने सोनिया गांधी के इशारे पर कांग्रेस पार्टी को तोड़कर नई पार्टी बनाई थी।
वर्ष 1996 के चुनाव में 350 सीटों पर पार्टी ने चुनाव भी लड़ा था, मगर चुनाव परिणाम से साफ हो गया था कि जनता ने तिवारी कांग्रेस को नकार दिया। जानकार मानते हैं कि सोनिया गांधी यह देखना चाहती थीं कि जनता अगर तिवारी कांग्रेस को स्वीकार कर लेगी, तो उनके लिए आगे की राह आसान हो जाएगी। मगर चुनाव में असफल होने के बाद उन्हें समझ में आया कि पुरानी वाली कांग्रेस में ही संघर्ष करके आगे बढ़ना पड़ेगा।
जैसे ही कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के अनुकूल वातावरण बना और वे अध्यक्ष चुनी गईं, वर्ष 1998 में बेइज्जत करके सीताराम केसरी को कांग्रेस कार्यालय के बाहर कर दिया गया। जिन नेताओं ने कांग्रेस से बगावत करके तिवारी कांग्रेस बनाई थी, उन सभी नेताओं को वर्ष 2004 में केंद्र सरकार में मंत्री बनाया गया। नारायण दत्त तिवारी को राज्यपाल बनाया गया था। पी. वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में गांधी परिवार को कांग्रेस पार्टी में स्थापित होने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था। वही टीस अभी भी रह-रहकर राहुल गांधी को परेशान कर रही है।
मायावती का तंज
लखनऊ में राहुल गांधी ने कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग की। इस पर मायावती ने एक्स हैंडल पर लिखा “जैसा कि सर्वविदित है कि कांग्रेस पार्टी ने काफी वर्षों तक केंद्र की सत्ता में रहकर दलितों के मसीहा व भारतीय संविधान के मूल निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का कभी भी आदर-सम्मान नहीं किया और न ही उन्हें ‘भारत रत्न’ प्रदान किया।
भला फिर यह पार्टी अब मान्यवर कांशीराम को कैसे भारत रत्न देने की मांग कर सकती है। इसी कांग्रेस पार्टी ने केंद्र में अपनी सत्ता के रहते हुए कांशीराम के देहांत होने पर एक दिन का भी राष्ट्रीय शोक घोषित नहीं किया, तथा न ही उस समय उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने भी राजकीय शोक घोषित किया।
इसी प्रकार दूसरी पार्टियों के हाथों में खेलकर दलित समाज के बने अनेक संगठन व पार्टियां आदि भी इनके नाम को भुनाने की कोशिश में हमेशा लगी रहती हैं। खासकर कांग्रेस पार्टी से जरूर सजग रहें, जिसकी दलित-विरोधी सोच व मानसिकता होने की वजह से ही बहुजन समाज पार्टी बनानी पड़ी है।”
















