"भारतीय उच्च शिक्षा नीति के पुरोधा और निर्भीक राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन "
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होम भारत

भारतीय उच्च शिक्षा नीति के पुरोधा और निर्भीक राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रबल पक्षधर थे , उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अनेक बार महत्वपूर्ण और कड़वी नसीहतें दी थीं।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Sep 5, 2026, 03:37 pm IST
inभारत, शिक्षा
राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन

राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन

भारत रत्न डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन, भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति, फिर राष्ट्रपति के साथ महान् शिक्षाविद, दार्शनिक और राजनायिक थे। डॉ.राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को हुआ था, उन्होंने अपने जीवन के 40 वर्ष शिक्षक के रूप में व्यतीत किया, सन् 1962 में जब वे राष्ट्रपति बने, तो एक महत्वपूर्ण प्रसंग और जुड़ गया जिसे हम शिक्षक दिवस के नाम से जानते हैं, जिसकी कहानी इस प्रकार है कि, उनके मित्र और शिष्य 5 सितंबर सन् 1962 को उनके जन्मदिन को धूमधाम से मनाना चाहते थे, परंतु डॉ. राधाकृष्णन आत्म केंद्रित उत्सव मनाने से मना कर दिया सुझाव दिया कि ” यदि मेरे जन्मदिन को अलग से मनाने के बजाय 5 सितंबर को पूरे देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए, तो यह मेरे लिए सबसे बड़ा गौरव सम्मान होगा।” वस्तुतः इसका कारण डॉ.राधाकृष्णन की शिक्षकों के प्रति अगाध आस्था थी। तब से प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस संपूर्ण भारत में मनाया जाता है।

4 नवम्बर सन् 1948 को गठित,राधाकृष्णन आयोग (विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग, 1948-49) स्वतंत्र भारत का प्रथम शिक्षा आयोग था, जिसने देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था की मजबूत नींव रखी। स्वतंत्रता के बाद देश की तत्कालीन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इस आयोग ने भारतीय शिक्षा नीति को एक नई दिशा दी। आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना की गई। इसके माध्यम से देशभर के विश्वविद्यालयों को वित्तीय सहायता प्रदान करने और उच्च शिक्षा के मानकों को निर्धारित व नियंत्रित करने का अधिकार दिया गया। शिक्षा की संरचना में सुधार करते हुए आयोग ने एक सुव्यवस्थित शैक्षणिक मॉडल की नींव रखी, जिसके अंतर्गत स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश से पहले 12 साल की स्कूली/इंटरमीडिएट शिक्षा को आवश्यक बताया, जिसने आगे चलकर 10+2+3 शिक्षा पद्धति का मॉडल का आधार तैयार किया।

उच्च शिक्षा के अध्ययन को त्रिस्तरीय बनाए जाने की अनुशंसा की, जिसके अंतर्गत,स्नातक 3 वर्ष, स्नातकोत्तर 2 वर्ष और अनुसंधान की न्यूनतम 2 वर्ष अवधि होगी । शिक्षकों की स्थिति और कार्यप्रणाली में सुधार करने के लिए भी अनुशंसाएं की गयीं,शिक्षकों, जिसमें उनको को चार श्रेणियों में बांटा गया-प्रोफेसर, रीडर, लेक्चरर) और इंस्ट्रक्टर। उनके वेतनमान और सेवा शर्तों में सुधार की भी सिफारिश की गई।

भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए आयोग ने ‘ग्रामीण विश्वविद्यालयों’ की स्थापना पर विशेष बल दिया, जो कृषि और स्थानीय उद्योगों से जुड़े हों। साथ ही व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत कृषि, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून और वाणिज्य जैसे व्यावहारिक विषयों को मुख्यधारा की शिक्षा में शामिल करने की वकालत की गई। सर्व समावेशी शिक्षा और और महिला शिक्षा के अंतर्गत महिलाओं की शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने और लैंगिक समानता लाने के लिए अनुकूल वातावरण और सुविधाओं को बढ़ाने का सुझाव दिया गया। छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए पाठ्यक्रम में दार्शनिक, आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा को शामिल करने की बात कही गई।उच्च शिक्षा में स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया ताकि शिक्षा अधिक सुलभ हो सके, जबकि कुछ समय के लिए अंग्रेजी को भी जारी रखने का सुझाव दिया गया।

परीक्षा प्रणाली में तत्कालीन रटने वाली परीक्षा प्रणाली की जगह आयोग ने आधुनिक वैज्ञानिक मूल्यांकन पद्धतियों को अपनाने और परीक्षाओं को अधिक विश्वसनीय बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इस प्रकार, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने औपनिवेशिक (ब्रिटिश) शिक्षा ढांचे को बदलकर एक भारतीय लोकतांत्रिक और प्रगतिशील शिक्षा नीति का मार्ग प्रशस्त किया।

शिक्षा के क्षेत्र में वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के पैरोकार थे, उनका दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा केवल आजीविका कमाने का साधन नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क के सही उपयोग और नैतिक चरित्र के निर्माण का माध्यम है। उनका मानना था कि देश के सबसे उत्कृष्ट दिमागों को ही शिक्षक बनना चाहिए।

परिवार इसलिए अपने नाम के आगे लगाता था सर्वपल्ली

डॉ. राधाकृष्णन का जन्म एक गरीब लेकिन विद्वान ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज ‘सर्वपल्ली’ गांव के रहने वाले थे, इसलिए उनका परिवार अपने नाम के आगे सर्वपल्ली लगाता था।वे बचपन से ही एक अत्यंत मेधावी छात्र थे और अपनी अधिकांश पढ़ाई छात्रवृत्ति
के भरोसे पूरी की। उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की।डॉ.राधाकृष्णन जी खुद को सबसे पहले एक शिक्षक मानते थे। उन्होंने देश-विदेश के कई बड़े विश्वविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया,मात्र 21 वर्ष की आयु में उन्होंने मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के जूनियर लेक्चरर के रूप में आजीविका शुरू की थी ।वे मैसूर विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रहे।

वे आंध्र विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। वे इंग्लैंड के प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पूर्वी धर्म और नैतिकता के प्रोफेसर नियुक्त होने वाले पहले भारतीय थे।उन्होंने भारतीय दर्शन और हिंदू धर्म को पश्चिमी दुनिया के सामने बेहद तार्किक रूप से प्रस्तुत किया और दोनों संस्कृतियों के बीच एक सेतु का काम किया।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति (1952–1962) और दूसरे राष्ट्रपति (1962–1967) थे। सन 1949 से 1952 तक वे सोवियत संघ में भारत के राजदूत रहे।1952 में वे देश के पहले उपराष्ट्रपति चुने गए और राज्यसभा के सभापति के रूप में इसकी लोकतांत्रिक परंपराओं की नींव रखी।सन् 1962 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बाद वे भारत के दूसरे राष्ट्रपति बने। शिक्षा और राष्ट्र के प्रति उनकी महान सेवाओं के लिए उन्हें सन् 1954 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। दार्शनिक राष्ट्रपति के रूप में जाने जाते हैं।जब वे भारत के राष्ट्रपति बने, तो उनकी गरिमा, तटस्थता और नैतिक आचरण ने इस पद की प्रतिष्ठा को बहुत ऊंचा उठाया। वे एक ऐसे शासक के रूप में उभरे जो प्लेटो के ‘दार्शनिक राजा’ की अवधारणा को चरितार्थ करता था।

पूर्व और पश्चिम के विचारों को जोड़ने वाले सेतु

डॉ राधाकृष्णन महान दार्शनिक, प्रख्यात शिक्षाविद और भारतीय संस्कृति के प्रखर संवाहक थे। उनका जीवन और कृतित्व पूर्व और पश्चिम के विचारों को जोड़ने वाले एक मजबूत सेतु की तरह रहा है। पश्चिमी विद्वान अक्सर वेदांत और हिंदू दर्शन की यह कहकर आलोचना करते थे कि इसमें नैतिकता की कमी है। राधाकृष्णन ने अपने गहन शोध और तुलनात्मक अध्ययन से इन तर्कों को खारिज किया। वेदांत की आधुनिक व्याख्या कर उन्होंने अद्वैत वेदांत को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय अध्यात्म मनुष्य को संसार से भागना नहीं, बल्कि नैतिक आचरण के साथ लोक-कल्याण करना सिखाता है। पश्चिमी जगत के विद्वान पॉल आर्थर के अनुसार, डॉ. राधाकृष्णन पूर्व और पश्चिम के दार्शनिक विचारों के बीच एक जीवंत “पुल” थे।

डॉ.राधाकृष्ण महान लेखक थे, उन्होंने दो खंडों में ‘इंडियन फिलॉसफी’ के नाम से भारतीय दर्शन के इतिहास पर सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक पुस्तक लिखी। उनकी ‘द हिंदू व्यू ऑफ लाइफ’ पुस्तक हिंदू धर्म और उसके जीवन दर्शन को सरल रूप से समझाती है। ‘एन आइडियलिस्ट व्यू ऑफ लाइफ ‘ पुस्तक में उनके दार्शनिक और आध्यात्मिक विचार मिलते हैं।वहीं ‘द प्रिंसिपल उपनिषद्स’ पुस्तक में मुख्य उपनिषदों का अंग्रेजी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या दी गई है। ‘ईस्टर्न रिलीजंस एंड वेस्टर्न थॉट’ पुस्तक में उन्होंने पूर्वी और पश्चिमी धर्मों व विचारों के आपसी प्रभाव का अध्ययन प्रस्तुत किया है। उन्होंने भगवद्गीता का भी गहराई से अध्ययन कर उस पर अपनी टीका लिखी।

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रबल पक्षधर थे , उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को देश की सुरक्षा, रक्षा तैयारियों और राजनीतिक फैसलों को लेकर अनेक बार महत्वपूर्ण और कड़वी नसीहतें दी थीं। यद्यपि दोनों के बीच गहरे और आत्मीय संबंध थे, तथापि एक दार्शनिक और निष्पक्ष राष्ट्राध्यक्ष होने के नाते डॉ.राधाकृष्णन ने नेहरू सरकार की कमियों पर कभी पर्दा नहीं डाला।

भारत-चीन युद्ध के समय नेहरू को नसीहत दी

सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध पर डॉ. राधाकृष्णन ने नेहरू को सबसे कड़ी और कड़वी नसीहत दी थी। डॉ. राधाकृष्णन, सन् 1962 में चीन के हाथों भारत की हार के बाद, नेहरू सरकार की नीतियों की सार्वजनिक रूप से और सीधे तौर पर आलोचना की थी। उन्होंने नेहरू को आईना दिखाते हुए कहा था कि यह हार हमारी “अदूरदर्शिता” और “लापरवाही” का परिणाम है। हम आधुनिक दुनिया की वास्तविकताओं से दूर होकर अपनी ही बनाई काल्पनिक दुनिया में जी रहे थे।

डॉ.राधाकृष्णन, रक्षा मंत्री वी.के.कृष्णा मेनन के त्यागपत्र को लेकर नेहरू से भिड़ गए थे, उनका मानना था कि युद्ध में भारत को मिली शिकस्त के बाद देश और सेना का मनोबल टूट चुका था।

रिपोर्ट्स और ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार, डॉ. राधाकृष्णन ने प्रधानमंत्री नेहरू से स्पष्ट कहा था कि यदि वे मेनन का इस्तीफा नहीं लेते हैं, तो उन्हें पूरी कैबिनेट को बर्खास्त करने जैसे कड़े कदम उठाने पड़ेंगे। नेहरू पहले तैयार नहीं थे परंतु भारी राजनीतिक और सार्वजनिक दबाव के चलते अंततः नवंबर 1962 में कृष्णा मेनन को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

निष्कर्षतः,डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का समग्र मूल्यांकन यही दर्शाता है कि वे केवल एक राजनेता या विचारक नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक भारत के बौद्धिक और नैतिक मार्गदर्शक थे। उन्होंने भारत को अपनी समृद्ध दार्शनिक विरासत पर गर्व करना सिखाया और पश्चिमी दुनिया को भारतीय चिंतन की गहराई से अवगत कराया।

भारतीय शिक्षा प्रणाली को दिया आकार

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को आकार देने, नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने और भारतीय दर्शन को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में अतुलनीय योगदान दिया। डॉ.राधाकृष्णन,शिक्षा का मुख्य उद्देश्य छात्रों का बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास मानते थे। उनके अनुसार चरित्र के बिना ज्ञान अधूरा है। वे मानते थे कि देश में शिक्षक सबसे प्रबुद्ध मस्तिष्क वाले होने चाहिए। शिक्षक विद्यार्थियों के जीवन से अज्ञानता दूर कर उन्हें सत्य का मार्ग दिखाते हैं।

Topics: भारत रत्नशिक्षा पद्धति1962 भारत-चीन युद्धअद्वैत वेदांतराधाकृष्णन आयोगदार्शनिक राष्ट्रपतिउच्च शिक्षा नीतिभारतीय दर्शनवी. के. कृष्णा मेननविश्वविद्यालय अनुदान आयोगशिक्षक दिवसडॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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