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… सब को माफ कर दो!

आज कहने तो चिकित्सा विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है, लेकिन बड़े-बड़े चिकित्सकों का कोई कौशल हरीश को जीवन न दे सका। पिछले 13 वर्ष से मध्यम वर्ग के माता-पिता ने देश-दुनिया का कोई ऐसा कोना नहीं छोड़ा, जहां उसे ले जाकर ठीक करने की कोशिश न की हो, पर एक ठूंठ बनकर रह गया हरीश का शरीर फिर हरकत में न आ सका। लाचार परिवार को तीन साल की कानूनी लड़ाई के बाद हरीश को यंत्रों के सहारे जीवित न रखकर इच्छा मृत्यु की अनुमति दी गई

Written byसुनील रायसुनील राय
Mar 22, 2026, 02:04 pm IST
inविश्लेषण, उत्तर प्रदेश
सर्वोच्च न्यायालय ने 32 वर्षीय हरीश राणा को 13 वर्ष तक कोमा जैसी स्थिति में रहने के बाद इच्छामृत्यु की अनुमति दी (प्रकोष्ठ में) युवा हरीश राणा

सर्वोच्च न्यायालय ने 32 वर्षीय हरीश राणा को 13 वर्ष तक कोमा जैसी स्थिति में रहने के बाद इच्छामृत्यु की अनुमति दी (प्रकोष्ठ में) युवा हरीश राणा

महाभारत काल में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा, “किं आश्चर्यम्?” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “मृत्यु इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है।” देश में पहली बार किसी को इच्छा मृत्यु की मिली अनुमति ने एक नई सोच को जन्म दिया। उच्चतम न्यायालय से हरीश राणा की इच्छा मृत्यु की अनुमति मिलने के साथ ही उनके परिवार का 13 साल का संघर्ष, पीड़ा और उम्मीद आखिर समाप्त हो गई। बीते 15 मार्च को जब ब्रह्मकुमारी लवली दीदी ने हरीश राणा से कहा, “सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए जाओ।” सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस वीडियो को देखकर लोगों का मन भारी हो गया। हरीश के पिता ने इलाज के लिए अपना घर बेच दिया। जीविकोपार्जन के लिए बर्गर बेचे। मां ने जैसे बचपन में हरीश की देखभाल की थी, वैसे ही उसके बेड को साफ किया। मगर नियति की क्रूरता टस से मस नहीं हुई।

हरीश राणा की मां निर्मला देवी और पिता अशोक राणा ने हरीश को अपनी आंखों के सामने बड़ा होते देखा था। जिस मां ने उसे जन्म दिया था, उस मां से अपने बेटे की पीड़ा अब और देखी नहीं जा रही थी। हरीश के माता-पिता को यह भी आभास हो रहा था कि बुढ़ापा करीब आ रहा है। अगर उन लोगों को कुछ हो गया तो हरीश की देखभाल कौन करेगा? उन लोगों ने यह तय किया कि अपने बेसुध लाडले के प्रति ममत्व को छोड़कर अब भगवान की गोद में सौंप देंगे। हरीश 12 सितंबर, 1993 को दिल्ली में पैदा हुआ था। 19 साल की उम्र तक माता-पिता ने उसे हंसते-खेलते देखा था। निर्मला देवी बताती हैं, “हरीश ने कभी किसी भी बात पर जिद नहीं की। डांटने पर घर में छिप जाता था। हरीश हंसमुख स्वभाव का था। वह और लोगों को भी हंसाता रहता था। दिल्ली में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद वह सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने चंडीगढ़ गया और एक पेइंग गेस्ट हाउस के कमरे में रहने लगा। 21 अगस्त 2013 को वज्रपात हुआ। पीजी की चाैथी मंजिल से गिरने पर हरीश के सिर में गंभीर चोट आई। वहां उसे अस्पताल ले जाया गया। उसके बाद चंडीगढ़ पीजीआई में ले गए। कई जगह के चक्कर लगाने के बाद हम लोग हार गए। हमने हर जगह इलाज कराया। व्रत, पूजा-पाठ से लेकर सभी जतन किए, लेकिन हरीश ठीक नहीं हो पाया। 13 साल से मेरा बेटा घर के बिस्तर पड़ा रहता था। जैसे बचपन में नहलाती थी, उसी तरह से उसकी बिस्तर पर सेवा कर रही थी। बिस्तर पर पड़े-पड़े उसके शरीर में घाव हो गए थे।”

करीब चार वर्ष पहले अशोक राणा और निर्मला देवी हर तरफ से निराश हो गए। उन्हें इस बात की भी चिंता सताने लगी कि उन लोगों की भी उम्र बढ़ रही है। उनके बाद हरीश का ध्यान कौन रखेगा? अब हरीश का आगे इलाज कराया जाए या फिर पीछे हटा जाए? जीवन इस दो राहे पर आकर रुक गया। दरअसल, जवान बेटे को बचाने के लिए हरीश राणा के माता-पिता ने जी-तोड़ मेहनत की थी। 32 वर्षीय हरीश राणा की जिंदगी के करीब 13 वर्ष अचेतन अवस्था में बिस्तर पर गुजर चुके थे। बीतते समय के साथ घर की आर्थिक हालत खराब होती चली गई। उम्मीद की किरण कमजोर पड़ने लगी। अंततः हरीश राणा के माता-पिता ने निर्णय लिया कि अपने बेटे को और तड़पता हुआ नहीं देख सकते हैं।

अशोक राणा ने कुछ लोगों से अपनी पीड़ा साझा की और फिर यह निर्णय लिया गया कि हरीश राणा की इच्छा मृत्यु की अनुमति प्राप्त करने के लिए याचिका दायर की जाएगी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इच्छा मृत्यु की उस याचिका को जुलाई 2024 में खारिज कर दिया। क्योंकि वह मशीन पर नहीं थे और बाहरी सहायता के बिना जीवित रह सकते थे। अशोक राणा ने उसके बाद उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर अपने बेटे की इच्छा मृत्यु की मांग की। मरीज की स्थिति से जुड़े सभी पहलुओं को अति गंभीरता से परखने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश राणा की इच्छा मृत्यु के लिए दाखिल की गई याचिका को स्वीकार करते हुए इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान कर दी।

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे. बी.पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने जीवन रक्षक प्रणाली हटाकर “पैसिव यूथेनेशिया” (प्राकृतिक मृत्यु की ओर जाने देना) की अनुमति दे दी। आजादी के बाद हरीश राणा का यह पहला उदाहरण है जब देश की उच्चतम न्यायालय ने किसी मामले में इच्छा मृत्यु की स्वीकृति प्रदान की है। इसके पूर्व जो भी मामले इच्छा मृत्यु के मामले न्यायालय के समक्ष विचार के लिए लाए गए थे। उन्हें उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया था।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अपर महाधिवक्ता विनोद कुमार शाही का कहना है कि उच्चतम न्यायालय ने हरीश राणा के मामले में इच्छा मृत्यु की अनुमति दी है। यह स्वागत योग्य निर्णय है। ऐसे मामले जिसमें मरीज का जीवन, कृत्रिम उपकरण के बल पर चल रहा हो और उस कृत्रिम उपकरण को हटा लेने के बाद मरीज के जीवित रहने की संभावना पूर्ण रूप से समाप्त हो गई है। ऐसे में इच्छा मृत्यु की अनुमति दिया जाना न्यायोचित है। कई बार ऐसा भी देखने में आया है कि किसी व्यक्ति के जीवन में उतना खर्च नहीं हुआ होगा, जितना उसके आखिर समय के इलाज में खर्च हो जाता है। हरीश राणा के इलाज के खर्च को अगर देखा जाए तो उनके माता-पिता को अपना पुश्तैनी घर बेचना पड़ा। 70 हजार रुपए प्रति दिन इलाज का खर्च आ रहा था। हरीश राणा के पिता को जीविकोपार्जन के लिए बर्गर भी बेचना पड़ा। इसलिए उच्चतम न्यायलय का यह निर्णय उचित है। अपर महाधिवक्ता विनोद कुमार शाही का कहना है कि इच्छा मृत्यु के मामले में किसी भी प्रकार का दुरुपयोग न होने लग जाए या फिर इस तरह के मुकदमों में बहुत तेजी आ जाए। इसकी संभावना बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि हरीश राणा का मेडिकल बोर्ड ने दो बार गहन परीक्षण किया। उच्चतम न्यायालय ने मेडिकल रिपोर्ट को देखने के बाद यह आदेश जारी किया है।

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस के कुलपति एवं विख्यात समाजशास्त्री डाॅ. बद्री नारायण बताते हैं कि यदि किसी को सिर में चोट लग गई है या किसी अन्य कारण से उस मरीज का मस्तिष्क काम नहीं कर रहा है। चिकित्सकों का भी यह स्पष्ट मत है कि कृत्रिम उपकरण के बिना मरीज को आगे जीवित नहीं रखा जा सकता है। ऐसे में इच्छा मृत्यु की अनुमति दिया जाना उचित है। लेकिन इसके अतरिक्त कोई यह कहता है कि उसका जीवन बहुत कष्ट में है। उसे इच्छा मृत्यु दी जानी चाहिए। इस प्रकार की प्रवृति का समर्थन नहीं किया जा सकता है। यह एक प्रकार से आत्महत्या जैसा हो जाएगा। आत्महत्या कोई क्यों करता है? क्योंकि उसको बहुत मानसिक कष्ट हो रहा होता है। इसलिए ऐसे मामलों में ही इच्छा मृत्यु की अनुमति उचित है, जिसमें मेडिकल के आधार पर यह तय हो गया हो कि कृत्रिम उपकरण के आधार पर ही मरीज की सांस चलती रहेगी और मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है।

समाज बने जागरूक

मेदांता हॉस्पिटल के पूर्व एसोसिएट डायरेक्टर एवं न्यूरो सर्जन डॉ. प्रमोद चाैरसिया का कहना है कि मस्तिष्क मृत्यु का मतलब है कि व्यक्ति का दिमाग पूरी तरह और स्थाई रूप से काम करना बंद कर देता है। इस स्थिति में व्यक्ति खुद से सांस नहीं ले सकता और उसे मशीनों के सहारे जीवित रखा जाता है। चिकित्सक कई विशेष जांच के बाद ही मस्तिष्क मृत्यु की पुष्टि करते हैं। एक बार मस्तिष्क मृत्यु हो जाने पर व्यक्ति का वापस जीवित होना संभव नहीं होता।

आज के समाज, विशेषकर भारत जैसे देश में, मस्तिष्क मृत्यु का नैतिक और आर्थिक दोनों तरह से महत्व है। नैतिक रूप से यह हमें अंगदान के बारे में सोचने का अवसर देता है। मस्तिष्क मृत व्यक्ति के अंग जैसे हृदय, किडनी, लिवर आदि दूसरे जरूरतमंद मरीजों को दान किए जा सकते हैं। इससे कई लोगों की जान बच सकती है और उनके जीवन को सुगम बना सकते हैं। आर्थिक रूप से भी यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि लंबे समय तक मशीनों पर इलाज बहुत महंगा होता है और परिवार पर आर्थिक बोझ बहुत बढ़ जाता है।

यदि समाज में मस्तिष्क मृत्यु और अंगदान के बारे में सही जानकारी और जागरूकता बढ़े, तो इससे कई लोगों की जान बचाई जा सकती है और स्वास्थ्य संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकता है। इसलिए मस्तिष्क मृत्यु को समझना और इसके बारे में लोगों को जागरूक करना आज के समाज में बहुत जरूरी है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रति वर्ष एक से डेढ़ लाख ब्रेन डेड के मामले अस्पतालों में पहुंचते हैं। अधिकतर मरीजों की ब्रेन डेथ सिर में चोट लगने के कारण होती है। यह एक ऐसी गंभीर स्थिति है जिसमें मरीज का ब्रेन डेड हो चुका होता है और हृदय की धड़कन चल रही होती है।

कुछ ऐसी ही कहानी अरुणा शानबाग की

मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में अरुणा शानबाग ने नर्स के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। लगभग 25 वर्ष की आयु में वह खुशहाल जिंदगी की ओर आगे बढ़ रही थी तभी 27 नवंबर, 1973 को उसके साथ दुर्घटना घटी। इस घटना के बाद वह 42 वर्ष तक अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी रही और अंततः वर्ष 2015 के मई माह में अरुणा की मृत्यु हो गई। अरुणा ने अस्पताल में काम करने के दौरान यह देखा कि वहां पर चोरी हो रही थी। इस बात की शिकायत उन्होंने अस्पताल के अधिकारियों से की थी। चोरी करने वाला वार्ड ब्वाय सोहनलाल अरुणा शानबाग से चिढ़ गया था। 27 नवंबर, 1973 की रात जब अरुणा अपनी ड्यूटी खत्म कर कपड़े बदल रही थीं, तभी सोहनलाल ने उन पर हमला किया। उसने कुत्ता बांधने वाली लोहे की चेन से उनका गला कस दिया। दुष्कर्म और हत्या का प्रयास किया। इस घटना के बाद सोहनलाल के खिलाफ दुष्कर्म एवं हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज किया गया। इस मुकदमे में सोहनलाल के खिलाफ बलात्कार के आरोप की पुष्टि नहीं हो सकी, मगर जानलेवा हमले के मामले में वह दोषी पाया गया। उसे न्यायालय ने सात साल की सजा सुनाई। सजा काटकर वह दिल्ली चला गया। घटना के बाद घायल अरुणा को अस्पताल में भर्ती कराया गया। वह कोमा में चली गईं। 1973 से लेकर 2015 तक वह कोमा में रहीं। 42 वर्ष तक कोमा में रहने के बाद वर्ष 2015 में उनकी मृत्यु हो गई। 2011 में जब वह अस्पताल में भर्ती थीं तो अस्पताल की नर्स पिंकी ने उच्चतम न्यायालय में अरुणा की इच्छा मृत्यु की अनुमति के लिए याचिका दाखिल की थी। न्यायालय ने इस याचिका को खारिज कर दिया था। न्यायालय की ओर से कहा गया था कि यह याचिका अरुणा के किसी परिजन के द्वारा दाखिल नहीं की गई है , बल्कि अस्पताल की तरफ से दाखिल की गई है। अस्पताल की नर्स पिंकी ने अरुणा की चार दशक से अधिक समय तक सेवा की। इस दौरान अरुणा के रिश्तेदारों ने भी उनसे नाता तोड़ लिया था। कोई रिश्तेदार उनकी खबर तक लेने नहीं जाता था।

विदेशों में भी इच्छा मृत्यु की स्वीकार्यता

उरुग्वे की सीनेट ने अक्तूबर 2025 में इच्छा मृत्यु को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाला कानून पारित किया। इसके साथ ही, दक्षिण अमेरिकी देश उरुग्वे उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है, जहां गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज कानूनी तौर पर अपनी जीवन समाप्त कर सकते हैं।
उरुग्वे पहला ऐसा देश है, जिसने इच्छामृत्यु को कानूनी रूप से अनुमति प्रदान की है। इससे पहले कोलंबिया और इक्वाडोर ने वहां की सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के माध्यम से इच्छा मृत्यु को अपराध की श्रेणी से बाहर किया था।
अमेरिका के 10 राज्यों और एक संघीय जिले में इच्छा मृत्यु (सहायता प्राप्त मृत्यु) कानूनी रूप से मान्य है। 1997 में ओरेगन इच्छा मृत्यु की अनुमति देने वाला पहला राज्य था।
ऑस्ट्रेलिया के हर राज्य में स्वैच्छिक सहायता प्राप्त मृत्यु कानूनी रूप से मान्य है। विक्टोरिया पहला राज्य था जिसने 2017 में सहायता प्राप्त मृत्यु या इच्छा मृत्यु की अनुमति दी थी।
न्यूजीलैंड में इस कानून को 2020 में एक जनमत संग्रह द्वारा मंजूरी दी गई थी और इच्छा मृत्यु कानून 2021 में लागू हुआ।

परिवार को 10 लाख रु. की सहायता

गाजियाबाद जनपद के रहने वाले अशोक राणा को उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से आर्थिक सहायता दी गई है। सरकार की ओर से दस लाख रूपए की आर्थिक सहायता की स्वीकृति दी गई है। जिलाधिकारी गाजियाबाद रवींद्र कुमार मांदड़ ने अशोक राणा से मुलाकात की। उन्होंने बताया कि विगत 13 वर्ष में इलाज के दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गई थी। प्रदेश सरकार की ओर से दस लाख रूपए की आर्थिक सहायता दी गई है। इसके साथ ही गाजियाबाद विकास प्राधिकरण या नगर निगम की ओर से निर्मित दुकान का आवंटन किया जाएगा। हरीश राणा की दवाइयों का अभी तक का खर्च प्रदेश सरकार की ओर से दिया जाएगा। आगे भी किसी प्रकार की मदद की आवश्यकता होगी तो उसका भी ध्यान रखा जाएगा।

परिवार की हो रही काउंसिलिंग

हरीश राणा की निगरानी अब 10 सदस्यीय डॉक्टरों की टीम कर रही है। मेडिकल बोर्ड में पांच और डॉक्टरों को जोड़ा गया है। इसमें खासकर मनोचिकित्सकों की टीम शामिल है। भर्ती होने के बाद से उनकी इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को शुरू कर दिया गया है। इसके तहत उनका न्यूट्रिशन सपोर्ट सिस्टम हटा लिया गया है। साथ ही, उन्हें किसी भी तरह का वेंटिलेटर सपोर्ट सिस्टम नहीं दिया गया है। फिलहाल, इलाज के नाम पर उन्हें सिर्फ कुछ दवाइयां दी जा रही हैं जिसमें दिमाग से संबंधित प्रमुख दवाएं हैं। परिवार की काउंसिलिंग भी एम्स के चिकित्सकों द्वारा की जा रही है। इसके लिए एम्स प्रशासन ने मनोचिकित्सकों की एक टीम बनाई है, जो प्रतिदिन हरीश के माता-पिता और भाई से बातचीत कर रही है। इसका उद्देश्य उन्हें भावनात्मक सहारा देना, स्थिति को समझने में मदद करना और मानसिक रूप से मजबूत बनाना है।

Topics: प्राकृतिक मृत्युअचेतन अवस्थामस्तिष्क मृत्युनियति की क्रूरतापुश्तैनीहरीश राणाअंगदानपाञ्चजन्य विशेषइच्छामृत्यु
सुनील राय
सुनील राय
पाञ्चजन्य ब्यूरो चीफ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश [Read more]
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